मैंने देखा है

मैंने देखा है , रिश्तों का दम घुटते

, सुबह-शाम उन्हें मरते

मैंने देखा है , उनको बाहर से हँसते

, उन्हें भीतर से सुलगते

मैंने देखा है उनको अहम् की आग में जलते

उन्हें एकांत की गहराई में डूबते

मैंने देखा है उनके क़दमों को डगमगाते

उन्हें दिलों में गिरह बाँधे

मैंने देखा है उनकी नज़रों को धुंधलाते

उन्हें बीते दिनों में झांकते

मैंने देखा है उनको छत पर शामियाना ताने

उन्हें छेद से तारों को ताकते

मैंने देखा है उनको रातों में जागते

उन्हें सपनों को तरसते ।

 

 

बेग़ाना दिल

ऐ दिल तू क्यों अपनों में भी बेगाना सा फिरता है ,

क्यों कोई तेरा पहचाना सा नही लगता है ,

तू धड़कता तो है पर अनजाना सा धड़कता है ,

ऐ दिल तू क्यों अपनों में भी बेगाना सा फिरता है ।

सब अपनी ही धुन में चलते हैं ,

अपने सपनों में डूबे रहते हैं ,

तू उनकी धुन का तार नही बन पाता है ,

उन सपनों में अपने को नही तू पाता है ,

ऐ दिल तू क्यों अपनों में भी बेगाना सा फिरता है ।

उन आँखों में क्यों खोया सा कुछ लगता है ,

हर पेशानी पर धुंधला सा पसीना दिखता है ,

क्यों उन आँखों में फिर मुलाक़ात नही दिखती है ,

क्यों उस पेशानी पर सुकूँ का रंग नही आता है ,

ऐ दिल तू क्यों अपनों में भी बेगाना सा फिरता है ।

बहार है , रंग है , हर चेहरा फिर बेरंगा सा क्यों लगता है ,

भाग रहा वो झोंके से बस , मन खोया सा लगता है ,

लहरों पर बस नाव रखी है , पतवारों को भूल गया है ,

डूबेगा या पार करेगा , इसी फेर में लगा हुआ है ,

ऐ दिल तू क्यों अपनों में भी बेगाना सा फिरता है ।

 

 

सावन

सावन पहले भी आता था ,

बारिश के संग कितनी खुशियाँ भी लाता था ,

बारिश में नहाना होता था ,

कागज़ की नाव चलाना भी बड़ा काम होता था ।

नीम पर पड़ा झूला कितना सुहाना होता था ,

हर पींग पर आसमान को छूना होता था ,

इंद्रधनुष के रंगों से कुछ रंग चुरा कर बस्ते में भरना होता था ।

स्कूल से लौटते , पानी भरे गड्ढों में छाई-छप्प कर

साथी को बस यूँही भिगोना होता था ।

भीगे तन पर डाँट नही , पकोंड़ों से दुलार होता था ।

तब नदियाँ , नदियाँ थीं ,

कचरे का ढेर उसमें किसी ने डाला नही था ,

पॉलिथिन का भी बोलबाला नही था ,

गाय-भैंस का गोबर सड़कों पर फैला नही था

क्योंकि गाय-भैंस का घर में भी एक ठिकाना था ।

चिकिनगुनिया और डेंगू के डर ने अब सबको घेरा है ,

तब इनका कहीं कोई बसेरा नही था ।

अबके सावन आएगा , कितनों को अपने साथ ले जाएगा

ये तो हमने कभी सोचा भी नही था !

हम कहाँ से कहाँ आ गए !

एक बूंद को जीवन माना था ,

जीवन ही जीवन का दुश्मन बन जाएगा ,

सावन ने ये तो कभी सोचा भी नही था ।

क्या झमेला है !

क्या झमेला है !

ये रिश्तों का कैसा रेलम-पेला है ?

भीड़ सी मची है जैसे अजनबियों का मेला है ,

न मैं जानूँ उन चेहरों को

न वो पहचानें मेरी राहों को फिर भी लाखों के लाईक्स हो गए !

तू काम का है तो मेरा है वरना तू भीड़ में भी अकेला है ।

क्या करें यूज़ एंड थ्रो का ज़माना है !

क्रैडिट से काम चलाना है , कौन सा अपनी जेब से जाना है !

हम सिर्फ़ बंटोरते रह गए , वो हमारे पिन कोड से समेट कर ले गए !

कहता तो वो मुझको अपना था फिर मेरा नंबर ब्लॉक कर कहाँ चले गए !

पहले तो रिश्तों की एहमियत पर बड़े-बड़े मैसेज भेजा करते थे ,

इंसान के अख़लाक़ पर हिला देने वाले वीडियो शेयर किया करते थे !

हम उन उपदेशों पर अपने को आँकते रह गए

और वो उपदेशों के सैंसेशन बन ज़माने को हाँकते चले गए ।

एहसास

सुमेधा , की आँखों से आँसू थमने का नाम नही ले रहे थे , बच्चे भी माँ को देख सहमें से उसकी बगल में दुबक कर सो गए थे । पाँच साल की परी और दो महीने का मुन्ना उसकी दोनों बाहों का तकिया बना कर चुपचाप सो रहे थे । धीरज का कहीं कुछ पता नही था , कह कर गया था ऑफ़िस में देर हो जाएगी लेकिन कितनी देर होगी ये नही कहा था ।

हर रोज़ की तरह बाहर के कमरे से गालियों और शराब की दुर्गंध आ रही थी । सुमेधा ने अपने कमरे की भीतर से सिटकनी लगा ली थी । आज भी सुधीर को छोड़ने कुछ अंजान , टेढ़ी मुस्कान लिए , आर-पार करती नज़रों से सुमेधा को सिर से पाँव तक घूरते वो लोग वहीं मंडराते रहे थे और पूछा था ,

भाभी जी कौन हैं ये आपके ?

सुमेधा  उनकी नज़रों से भीतर तक काँप रही थी उसने थरथराते हुए जवाब दिया था जो वो कई बार नए-नए अजनबियों को दे चुकी थी ,

जी , मेरे पति के छोटे भाई हैं , ये ऑफ़िस से आते ही होंगे ।

उसने “ये ऑफ़िस से आते ही होंगे” पर खासा ज़ोर दिया था । उसके तन को भेदती वो अजनबी नज़रें उसे घूर रही थीं जैसे वो निरवस्त्र हो । वो तेज़ी से भीतर कमरे में आई और कमरा बंद कर लिया था । परी भयभीत सी सुमेधा से चिपक गई थी , मुन्ना माँ की छाती से चिपका उसकी धड़कनें महसूस करता खोया सा उसे ताक रहा था ।

पता नही वो लोग गए या वहीं हैं लेकिन उसका भय कायम था । उसकी शादी के बाद से ये सिलसिला चल रहा था और आगे कब तक चलेगा वो नही जानती थी । उसने अपने लिए लड़ना सीखा ही नही था , कभी ज़रुरत ही नही पड़ी थी । पापा के रहते वो कितनी महफ़ूज़ थी । उसका चेहरा पढ़कर ही वो सब जान जाते थे लेकिन अब उसका चेहरा पढ़कर जानने वाला कोई नही था । उसे कुछ कहने की आदत ही नही थी , काश कोई ऐसा होता जो उसके दिल को समझ लेता , उसके सुख या दुख को जानता । धीरज इस बारे में कुछ नही कहते थे , न ही सुनते थे । आज सब कुछ उसकी बरदाश्त से बाहर हो रहा था , वो अपने इन हालातों से मुक्ति चाहती थी । कोई रास्ता सूझ नही रहा था कि क्या करे , कैसे करे ? कोई नही था जिससे दिल हल्का करले , बस पापा को याद करते-करते रोती रही ।

कोई नर्म , मुलायम स्पर्श उसके पास बैठा और उसके सिर को सहलाता रहा , वही पापा का स्पर्श था , बड़ा सुखद एहसास , उसे कब नींद आ गई पता नही । सुबह मुन्ना की कुनमुनाहट से उसकी आँख खुली , परी अब भी गहरी नींद में सो रही थी । उसे याद आया कि धीरज ऑफ़िस से पहुँचा कि नही ? दरवाज़ा खोला तो देखा धीरज सोफ़े पर सो रहा था और सुधीर नदारद था ।

सुमेधा किचन में मुन्ने का दूध बनाने गई तो मुन्ने को झूले में लिटा गई । मुन्ना माँ को पास न पाकर रोने लगा तो धीरज की आँख खुल गई । वो ऑफ़िस के ही कपड़ों में सो गया था । किचन में आकर सुमेधा के पास खड़ा हो गया , सुमेधा मुड़ी तो उसे सामने देख कर घबरा गई ,

अरे , सॉरी , मुझे पता ही नही चला तुम कल रात कब लौटे । मैं दरअसल कल बहुत डर गई थी इसलिए कमरा अंदर से बंद कर लिया था । कब नींद आ गई पता ही नही चला । 

धीरज उसका मुँह देख रहा था ,

मेधा , तुम ठीक तो हो ? कल क्या हुआ , तुम बाहर का दरवाज़ा खुला छोड़कर क्यों सो गईं ? ये सुधीर कहाँ चला गया ?

सुमेधा की आँखें बरस रही थीं , उसने सुबकते हुए बीती रात का सारा किस्सा सुना दिया । धीरज चुपचाप सुनता रहा और एक लंबी , बेबस साँस छोड़ता हुआ कमरे में आया तो देखा कि सुधीर के बिस्तर पर एक ख़त रखा था ।

धीरज भाईसाहब और सुमेधा ,

मैं कल जब नशे में सोया था तो सुमेधा के पापा ने आकर मुझे हिलाकर उठाया और पकड़ कर बाहर ले गए । उन्होंने मुझ से कहा कि अगर मैं ये घर छोड़कर नही गया तो वो कुछ भी कर सकते हैं । उन्होंने मुझसे कहा कि उनकी बेटी सुमेधा की आँखों में आँसू का कारण तुम बने हो और ये मैं सह नही सकता

भाईसाहब सच मानिए वो थे सचमुच थे , मुझे बहुत डर लग रहा है , वो मेरा पीछा कर रहे हैं । मैं जा रहा हूँ , सुमेधा मुझे माफ़ कर देना , अब मैं तुम्हें सताने कभी नही आऊँगा ।

सुधीर

सुमेधा रोती जा रही थी , कल की बात तो उसने धीरज को बता दी थी लेकिन वो एहसास नही बताया था । क्या था वो एहसास जो अब भी उसकी परवाह कर रहा था , जो अब भी उसकी आँखों में आँसू नही देख सकता था ।

अजीब है ये ज़िंदगी

ये ज़िंदगी भी बड़ी अजीब है !

चलते – चलते बदल जाती है !

सोचते कुछ हैं तो कर कुछ और जाती है !

चाहते कुछ हैं तो दे कुछ और जाती है !

किसी को ख़्वाब बेशुमार तो किसी को ख़ुमारी दे जाती है !

हम पीछा किए गए इसका और ये हमें डॉज दिए जाती है !

किसी को थपकी दे-दे सुलाती है तो किसी को नींदों में डराती है !

ऐ ज़िंदगी , तू सचमुच बड़ी अजीब है !

आ हम पर भी कुछ करम कर , हमारे ख़्वाबों पर भी रहम कर ।

चल हमारे संग भी दो क़दम , कर लेंगे हम उसी में बसर ।