आसमां

ऐ आसमां तू यूं ही इतराता है !
सारे जहां पे छाया रहता है ,
तुझमें जो रंग समाए हैं ,
सारे तूने सूरज से चुराए हैं ,
चांद – तारों ने तुझे अंधेरी – काली रात से बचाया है ,
बादलों ने भर-भर तेरी प्यास को बुझाया है ,
सारे नक्षत्रों ने तेरा मान बढ़ाया है ,
फिर तू क्यों इतराया है ,
तू बता , क्या तू ही सबका सरमाया है ?
तू ही बता , क्या सूरज , चांद, तारों , बादल , नक्षत्रों के बिना तेरा कहीं गुज़ारा है ? 
माला जोशी शर्मा

धड़कता दिल

धड़कता तो दिल पहले भी था ,

हर नए क़दम पर धड़कता था ,

कभी किसी की निगाह पर धड़कता था

तो कभी किसी ख़्याल पर धड़कता था ,

शायद जवानी के जज़्बात पे धड़कता था !

धड़कता तो दिल आज भी है !

हर उठते क़दम पर धड़कता है ,

तारीक़ नज़र पर धड़कता है ,

जज़्बातों को दफ़्न करने पर धड़कता है ,

धड़कनें तो वही हैं जनाब पर वक्त की धड़कनें अब ख़िलाफ़ हैं ।

माला जोशी शर्मा

अपना आसमाँ

सब अपना – अपना आसमाँ चाहते हैं ,

समय की बालू पर अपने क़दमों के निशाँ बनाना चाहते हैं ,

कभी अकेले तो कभी कारवाँ साथ चाहते हैं ,

साथ जो चला उसका साथ चाहते हैं ,

लेकिन आसमाँ अपना जुदा चाहते हैं ।

 

मन

रात इतनी ख़ामोशी से चली आती है ,

ख़्यालों की पोटली बगल में दबा लाती है ,

जल-थल सब सो जाता है ,

मन पंछी बन उड़ जाता है ,

न जाने कहाँ-कहाँ दौड़ लगाता है ,

खुली आँख सपने दिखलाता है ,

रात दबे पाँव चली जाती है ,

भोर अपने रंग बिखराती है ,

परिंदे-चरिंदे शोर मचाते हैं ,

मन गुमनामी की चादर तान सो जाता है ।

जय माता की

जय माता की , जय माता की , जयकार मची थी

माँ की भक्ति में डूबे सब , रोली कुमकुम उड़ा रहे थे

गली-गली में नेता , संस्कृति का डंका बजा रहे थे

वहीं किसी नुक्कड़ पर एक बेटी माँ को पुकार रही थी

संस्कृति भक्त बने कुछ उसकी चुन्नी उड़ा रहे थे ।

उसके नाज़ुक , कोमल तन को गिद्द बने वो नोच रहे थे ,

इस पर भी उन्हें चैन न आया ,

कोमल तन को मोम बनाया ,

आग्नि से उपजी द्रौपदी को , आग्नि को ही सौंप रहे थे !

माँ की भक्ति में डूबे सब , रोली कुमकुम उड़ा रहे थे

माता क्रुद्ध आँखों से , झूठे भक्तों की झूठी भक्ति देख रही थी

अपनी बेटी की तड़पन पर सागर को भी जला रही थी ,

सोच रही थी , कैसे भक्त हुए ये मेरे !

दीप जला कर मुझे जलाते !

पत्थर को चुन्नी हैं चढ़ाते , अक्स को मेरे वस्त्रहीन हैं करते !

गौ को माता कहते जाते , कन्या को ये नोच जलाते !

इंसानों का खून बहाते , मिट्टी की मूरत को रोज़ सजाते !

एक बार मैं यज्ञ में कूदी , ये अब तक मुझे जला रहे हैं !

कहाँ गया वो शिव का तांडव ?

अपमान मेरा जो सह न पाया , आज नही वो लौट के आया ,

झूठे जग की झूठी भक्ति देख के उसने जग बिसराया ।

माला जोशी शर्मा

तलाश

अपने से कहीं दूर भाग जाना चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ,

हर सुबह कहीं भटक जाती हूं ,

ढलते सूरज के साथ डूब जाती हूं ,

रात के अंधेरे में खो जाती हूं ,

ख़ुद को ढूंढती रह जाती हूं ,

अपने से कहीं दूर भाग जाना चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ।

हर गली , हर राह में जाती हूं ,

पेड़ों की शाखों में अटक जाती हूं ,

घने फूलों में मन को उलझाती हूं ,

फिर उलझन को सुलझाती हूं ,

अपने से कहीं दूर भाग जाना चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ।

अधूरे गीत की कड़ी बन जाती हूं ,

सुर – ताल कहीं से उधार लाती हूं ,

बिखरे पन्नों को क्रम से लगाती हूं ,

काग़ज़ के टुकड़ों को यादों की गोंद लगाती हूं ,

अपने से कहीं दूर भाग जाना ‌ चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ।

माला जोशी शर्मा

 

 

 

 

 

मौन

दिल की बात कह देना , चैन से सो जाना

अच्छा होता है लेकिन कितना मुश्किल भी तो होता है !

उसने पहली बार मुझसे कहा था

मेरा हाथ लेकर दिल पर भी रखा था कि

तुम सा साथी मिल जाए तो जीवन संवर जाए ।

मेरा दिल एक बार को धड़का ज़रुर था

लेकिन उसने मुझसे कहा तो कुछ भी नही था ,

मेरा मौन था , उसने समझा ये हया में लिपटा इश्क था ।

कई बार ज़ुबां ने दिल के तारों की हरक़त महसूस कर कुछ कहना चाहा

लेकिन किसी के दिल को दुखाना मुझे कब मंज़ूर था ।

ठंडी बालू पर क़दमों के निशां पड़ते रहे और हम मौन चलते रहे , चलते रहे ।

मुझे रातों में सोना था , दिल की बात खुलकर किसी से कहना था ,

दिल की बात कह देना , चैन से सो जाना

अच्छा होता है लेकिन कितना मुश्किल भी तो होता है ।