बूंद बूंद ज़िंदगी

blade of grass blur bright close up
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बूंद-बूंद यूँ ज़िंदगी भरती जा रही है ,

हर दिन वो बदलती जा रही है ,

बच्चे थे तो बड़े होने के सपने देखा करते थे ,

माँ-बाप भी हमारे सपनों का घट बूंद-बूंद भरा करते थे ,

कब माँ-बाप बिछड़ गए और ज़िंदगी यूँ ही बूंद-बूंद भरती रही ,

हम परिवार वाले हो गए और हमारे बच्चे भी शामिल हो गए ,

वही किस्सा हम भी दोहराते रहे , अपने साथ उनके सपनों का घड़ा भी भरते रहे ,

फिर बच्चे छूटते रहे और हम अपना घड़ा बूंद-बूंद यूँ ही भरते रहे ,

ज़िंदगी बूंद-बूंद यूँ ही भरती जा रही है , हर दिन वो बदलती जा रही है ।

समझ नही आ रहा कहाँ जा रही है ?

पहले मैं मन की करती थी , मन से चलती थी

अब मैं मन की कब करती हूँ ? मन से कम चलती हूँ ।

मन की कम सुनती हूँ और इग्नोर करती हूँ ,

चलती हूँ तो दवाईयाँ साथ रखती हूँ ।

बस बूंद-बूंद यूँ ज़िंदगी भरती जा रही है ,

कब छलक जाएगी पता नही लेकिन मैं फिर भी उसे बूंद-बूंद भरती जा हूँ ,

हर दिन वो बदलती जा रही है ।

माला जोशी शर्मा

कितना है बदनसीब ज़फ़र

 

बहादुर शाह ज़फ़र हिंदुस्तान के आख़िरी बादशाह की ग़ज़ल ,

“लगता नहीं है दिल मेरा , उजड़े दयार में” सुन रही थी कि विचारों का सिलसिला शुरु हो गया । बादशाह को अंग्रेज़ी हुकुमत ने कैद कर बर्मा भेज दिया , ये अंग्रेज़ कुछ भी कर जाते थे ! वो उस , बूढ़े , लाचार बादशाह की बग़ावत से इतना घबरा गए कि इतने बड़े हिंदुस्तान में कहीं भी क़ैद करने की नही सोची । बेचारगी और अकेलेपन के अपने अंतिम दिनों में बादशाह कहते हैं ,

कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए

दो ग़ज़ ज़मीं भी ना मिली कू-ए-यार में

विचार कीजिए कि वो उस समय कितने दर्द और रुही कुल्फ़त से गुज़र रहे होंगे । ये दर्द शायद अंग्रेज़ी हुकूमत नही समझ पाई , समझती तो शायद उन्हें हिंदुस्तान में ही दफ़्न करने की इजाज़त दे देती लेकिन उन्हें भय किसी और बात का था । हुआ ये कि बादशाह ने बर्मा में ही आख़िरी साँस ली , उनकी रुह तड़पती रही और उन्हें वहीं दफ़्न कर दिया गया । उन्हें क्या पता था कि कभी ऐसा भी होगा या ऐसा भी ज़माना आएगा कि जहाँ दफ़्न करना या होना इतना दर्द भरा नही होगा । ऐसा मेरे ज़हन में तब आया जब मैं विदेश में रही । मेरी पहली प्रतिक्रिया तो हैरानी ही थी क्योंकि मैंने इससे पहले ऐसा कभी न सुना था और न पढ़ा था , हिंदुस्तानी जो ठहरी । एक दिन टी वी देखते हुए देखा कि अजीब विज्ञापन है , पहले तो मेरी समझ में नही आया लेकिन जब फिर से वही विज्ञापन आया तो ध्यान दिया कि फ़्यूनरल का विज्ञापन है । यहाँ दफ़्न करने के लिए विज्ञापन दिए जाते हैं जिनमें मरने को इतना ग्लैमरस बना कर दिखाते हैं कि पूछो मत । फ़्यूनरल के लिए कंपनियाँ चल रही हैं जो सुंदर कफ़न पसंद करने से लेकर आपकी पसंद के किन फूलों से आपको सजाया जाएगा तक की गारंटी लेती हैं । अब आप कहेंगे कि इसमें क्या बुराई है ? बिल्कुल कोई बुराई नही है , आप मरने के बाद क्या चाहते हैं ये आपका व्यक्तिगत मसला है । मैं केवल एक रिवाज़ की बात कर रही हूँ , संस्कारों की बात कर रही हूँ , संस्कारों की भिन्नता की बात कर रही हूँ जिसके कारण हिंदुस्तान के बादशाह ने रंजोग़म में दम तोड़ा । बेचारे बादशाह , आज के युग में पैदा हुए होते तो ! तो , वो भी किसी ऐसी कंपनी को हायर कर सकते थे और उनका जनाज़ा भी शान-ओ-शौकत से निकलता लेकिन जनाब , तब आपको शायद ये ग़ज़ल न सुनने को मिलती जो आपकी आँखें नम कर देती है ।

दरअसल , मैं थोड़ी कन्फ़्यूज़ हूँ , मुझे इन फ़्यूनरल के विज्ञापनों ने दुविधा में डाल दिया है । मेरे विचार कुछ गड्ड-मड्ड से हो रहे हैं , सच मानिए तो शुरु में मैं सकते में आ गई थी कि ये क्या विज्ञापन है ! हज़म होने में थोड़ा समय लगा और बुढ़ापे के अकेलेपन और असुरक्षा की भावना का अंदाज़ा भी हुआ और अंजाने में ही दो संस्कृतियों की तुलना भी हो गई । यानि ज़फ़र साहब को तो विदेशियों ने देश निकाला दे दिया था इसलिए उनकी रुह तड़पती रही लेकिन आप तो अपने ही देश में अपने जनाज़े के लिए अपनों के काँधे नही , अंजानों के काँधे ढूँढ रहे हैं ! दूसरी ओर एक विचार आता है कि जब मर ही गए तो कौन काँधा दे रहा है कौन नही  इससे मतलब ? लेकिन हिंदुस्तानी इस बात को समझने में थोड़ा समय लगाएगा , वो कहेगा कि ज़फ़र साहब का दर्द गहरा था , उनके साथ ज़्यादती हुई । मरने के बाद उनकी आखिरी इच्छा पूरी होनी चाहिए थी और उन्हें हिंदुस्तान में दफ़्न करने की इजाज़त मिलनी चाहिए थी , लेकिन मसला राजनैतिक था , बगावत का ख़तरा था इसलिए वो कहते हैं ,

बुलबुल को बागबाँ से ना सैयाद से ग़िला ,

किस्मत में क़ैद लिखी थी फ़सल-ए-बहार में ।

यानि कि हालात तो आज भी वही हैं केवल परिस्थितियों का अंतर है । विचार करने की बात है कि क्या हमारे बुज़ुर्ग इस परिस्थिती की कगार पर खड़े हैं ! जिस दिन हिंदुस्तान में इस तरह के विज्ञापन आने लगेंगे उस दिन समझ लो कि क्या होगा । मेरे विचार से वो दिन दूर नही क्योंकि धीरे-धीरे एक संस्कृति लुप्त हो रही है । मैं कल्पना नही कर पा रही कि जिस दिन हिंदुस्तान में ऐसे विज्ञापन आने लगेंगे तो लोगों की प्रतिक्रिया क्या होगी क्योंकि हमारे लिए तो काँधा कौन देगा इस पर न जाने क्या-क्या कह दिया गया है और कहा जाता है । शायद इसीलिए बहादुर शाह ज़फ़र ने अपने आप को बदनसीब कहा होगा ।

समय बदल रहा है , सोच बदल रही है ,ये तो हमें मानना ही पड़ेगा , इस का प्रमाण मुझे हाल ही में मिला । हमारे अभिन्न मित्र हैं , उनके 96 साल के पिता जिन्हें मैं अपने गुरु समान मानती हूँ , बेहद प्रगतिशील व्यक्ति । तथाकथित उच्च ब्राहमण कुल में जन्में ,  उन्होंने अपना शरीर छोड़ने से पहले एक वसीयत लिखी कि जब उनकी आत्मा शरीर त्याग दे तो उनका शरीर आर्मी हॉस्पिटल वालों को दान कर दिया जाए जहाँ उनका शरीर शोध कार्य के काम आ सके ।  उन्होंने पहले ही आँखों के अस्पताल में अपनी आँखों को दान के लिए लिख दिया था । जिस दिन उन्होंने अपने प्राण त्यागे तो उनके पुत्र ने उनकी इच्छानुसार उनका शरीर दान कर दिया । उन्होंने तो उपरोक्त सारे विवाद ही समाप्त कर डाले ! उन्होंने , काँधा देना , दफ़्न करना , मुखाग्नि देना जैसी औपचारिकताओं को समाप्त कर आत्मा और परमात्मा की बात सोची और इस शरीर को नश्वर ही माना , मिट्टी ही माना । ये बात हम कहते-सुनते तो हैं लेकिन मानते नही । कबीर को पढ़ते हैं लेकिन समझते नही , कबीर कह गए ,

माटी कहे कुम्हार से , तू क्या रौंदे मोए ,

एक दिन ऐसा आएगा , मैं रौंदूँगी तोए ।

शरीर की नश्वरता पर उन्होंने अनगिनत बातें , अलग-अलग तरह से उदाहरण दे कर कहीं ,

उड़ जाएगा , हंस अकेला , जग दरशन का मेला……

जिस दिन हम इस सोच को अपना लेंगे तो अपने को दफ़्न के लिए बदनसीब नही कहेंगे ।

चलिए सोच बदलते हैं ।

माला जोशी शर्मा

जीना इसी का नाम है

वो कुछ खास थी ,

चेहरे पर जीवन की जलती-बुझती प्यास थी ,

आँखों में न जाने किस की तलाश थी ,

उसके मुस्कुराते होठों की लाली बड़ी खास थी ,

बालों में नए ज़माने की चमक भी साफ़ थी ,

खूबसूरत रंगीले कपड़ों में अंग्रेज़ी झलक लाजवाब थी ,

वो मुझे छू कर निकली तो महक मेरे साथ थी ,

वो फूलों सी नाज़ुक , चाल उसकी लाजवाब थी ,

मैं अपलक उसे ताकती कितनी हैरान थी ,

मैं अपनी उम्र की थकान लिए अपने भीतर झाँक रही थी ,

वो वॉकिंग स्टिक लिए , गर्व से मुस्कुराते हुए चल रही थी ।

स्कूल की यादों की कड़ी 2

स्कूल की यादों की जब कड़ी जुड़ने लगती है तो एक के बाद एक जुड़ती चली जाती है । मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ , सोचा नही था कि एक लिखूँगी तो आगे बढ़ती ही जाऊँगी । ये यादें किसी क्रमबद्ध पूर्वनियोजित योजना से नही लिखीं , बस जहाँ जो याद आया वो लिख डाला ।

जब मैं हॉस्टल में गई उस समय मेरी उम्र कोई सात साल की रही होगी , तीसरी कक्षा में थी । सच कहूँ , तो मुझे याद नही कि मैं कभी मम्मी-पापा को याद कर के रोई थी । सुबह पाँच बजे से उठ कर नित्यक्रम में ऐसे जुट जाते कि रात को नौ बजे बेसुध होकर बिस्तर पर पछाड़ खा कर गिर जाते । अब ऐसे में घरवालों को याद करने का समय ही नही मिलता था ।

तीसरी -चौथी क्लास तक हमें बाई नहलाती थी और हमारे छोटे-बड़े सारे कपड़े धोबी से धुलते थे इसलिए हर कपड़े पर हमारा नंबर और नाम लिखा होता था । सुबह बाथरुम में हमें लाईन से खड़ा कर बाईयाँ नहलाती तो बस उस समय मम्मी याद आ जाती थीं । बाईयाँ हमें कपड़ों की तरह धो डालती थीं , साबुन रगड़ा , पानी दनादन डाला और तौलिया लपेट कर दूसरी बाई बाहर खड़ा कर देती जहाँ तख़त पर लाईन से हमारे कपड़े रखे होते थे और हमें ख़ुद अपना नाम या नंबर देख कर उठाने होते थे । कभी-कभी बाथरुम में आए साबुन और पानी के तूफ़ान से गुज़रने के बाद गफ़लत में हम किसी और के कपड़े भी उठा लेते थे । बस पूछिए मत उसके बाद जो सी बी आई और एफ़ बी आई की तरह तलाशी ली जाती थी । हर तैयार बच्चे को पकड़ कर उसका नंबर चैक किया जाता था , हमारे जैसे लल्लूराम का तो दिल धड़कने लगता था । अब अपने पीछे लिखे नंबर को ख़ुद चैक भी नही कर पाते थे और अगर कहीं पकड़े गए तो सबके सामने बाई कपड़े बदलेगी । अब ये दोबारा सबके सामने वस्त्रहीन होना तो मम्मी की याद दिला ही देता था । अफ़सोस ! फिर भी हमारे जैसे ऐसी ग़लती बार-बार कर जाते थे , लल्लूराम जो ठहरे । अगर ख़ुदा-ना-खास्ता आपके सिर में कहीं जूएँ हो गईं तो समझ लो कि आपकी ख़ैर नही । बाईयाँ आपको पकड़ कर सिर में इतने गुस्से से दवाई डालेंगी और सुबह – शाम नहलाएँगी , जब तक आप उन जीवों से छुटकारा नही पा लोगे तब तक बाईयाँ आपको छोड़ेगीं नही । हम बाईयों से छिपते ही फिरते थे , पता नही कब पकड़ कर नहलाने लग जाएँ , यही डर दिल में समाया रहता था । वो नहलाने का जो सिलसिला चला तो हमारी नस-नस में बस गया और हम कब नहाने के शौकीन हो गए पता ही नही चला ।

स्कूल के बाद लगभग चार बजे हमारा खेलने का समय होता , उस उम्र में हमें सबसे अच्छा लकड़ी के घोड़ों पर चढ़ कर पकड़म-पकड़ाई खेलना लगता था । लकड़ी के घोड़े से मेरा मतलब है दो लंबे डंडे जिन पर नीचे पैर रखने की जगह बनी होती थी और हमें उस पर खड़े होकर संतुलन बनाना होता था । ओह !! कैसे करते थे पता नही !! एक बार उन्हीं पर जबरदस्त संतुलन बना हम खेल रहे थे , मैं सबको पकड़ रही थी । भागते-भागते मैं ग्राउंड के बाहर लगी लकड़ी की फ़ैंसिंग तक पहुँच गई जो काले रंग में रंगी थीं । मुझे अपने कानों में फुफकार सुनाई दी , मैंने मुड़कर देखा तो काला कोबरा अपनी पूँछ पर खड़ा फन फैलाए फुफकार रहा था । देखते ही मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई , ज़बान तालू से चिपक गई । मैं चिल्लाना चाहूँ लेकिन आवाज़ गले में दब जाए । मुँह खुला , आँखें फटी , जैसे आँखें उस पर चिपक गई थीं किसी जादू की तरह । सहेलियाँ पकड़ो-पकड़ो की पुकार कर रही थीं , जब मैं न हिली तो वे पास आईँ और मैंने ऊँगली का इशारा साँप की ओर किया । अब सब की चीख निकली तो मेरे घोड़े एक ओर और मैं धम्म से नीचे ज़मीन पर । हंगामा हो गया , चौकीदार आ गए , हमें हटा कर कोबरा को पकड़ लिया गया । ऐसे हादसों से जूझते हुए कई बार हमें अप्रत्याशित मुसीबतों का भी सामना करना पड़ जाता था ।

हॉस्टल में कई बार आपको अपने से थोड़े बड़े बच्चों की दादागिरी का शिकार होना पड़ जाता है । ऐसे गुंडा टाईप के बच्चे सिर्फ़ लड़के ही नही होते लड़कियाँ भी होती हैं । ऐसे बच्चे लल्लू टाईप के बच्चों पर नज़र रखते हैं क्योंकि उन्हीं के दम पर उनका बड़प्पन या गुंडागिरी चल पाती है । अगर मैं ग़लत नही हूँ तो इस तरह का शोषण बड़ों में भी होता है यानि ये मानव प्रवृति ही है । ऐसी ही एक लड़की हमारी डोरमैट्री में थी जो पाँचवीं में पढ़ती थी और हम तीसरी में । हम दो लड़कियाँ दिल्ली की थीं जो उसी साल आई थीं , दूसरी थी सुनीता जिसकी अभी तक अँगूठा चूसने की आदत भी नही गई थी । वो रात को मेरे बिस्तर पर आकर एक हाथ से मेरा कान कुरेदती और दूसरे हाथ का अँगूठा उसके मुँह में होता । उसे ऐसे ही नींद आती थी लेकिन मुझे ऐसे नींद नही आती थी बल्कि मेरी नींद तो उड़ जाती थी । मैं उसे उसके बिस्तर पर धकेलती थोड़ी देर में वो फिर लुढ़क कर मेरे पास आ जाती । एक दिन हम इसी धकेला-धकेली में लगे थे कि वही गुंडा लड़की हमारे पास आकर खड़ी हो गई । हम काफ़ी डर गए , मेरा सुनीता से वायदा था कि उसकी अँगूठा चूसने वाली बात किसी को नही बताऊँगी । अब हम लल्लूराम सच्चाई और दोस्ती को बहुत सीरिसली लेते थे भला अपने दोस्त से वादाखिलाफ़ी कैसे कर सकते थे । अँधेरे में चुपचाप उसका मुँह ताकते रहे । उसने फुसफुसा कर हमारे कान में कहा ,

क्यों जाग रही हो अब तक ? वार्डन को शिकायत करुँ ? चुपचाप चलो मेरे साथ ।

हम हिपनोटाज़्ड से उसके पीछे चल दिए , वैसे भी हमारी क्या मजाल जो उसका हुक्म ना मानें । हमें कोने में ले जाकर उसने एक ओर इशारा करते हुए हमारे कान में कहा ,

देखो , उस लड़की का आज घर से पार्सल आया है और उसमें चॉकलेट्स आई हैं । जाओ उसकी अलमारी खोलो और चॉकलेट्स निकाल कर लाओ ।

उसके सामान्य ज्ञान पर हम हैरान थे , ये सुनते ही हमारी हवा खुश्क हो गई , हाथ-पैर भीतर ही भीतर काँपने लगे । चोरी !! जब हम टस से मस नही हुए तो उसकी गुस्से में फुसफुसाहट सख़्त हो गई ,

देख क्या रही हो , आगे बढ़ो , इससे पहले कि कोई जगे , काम ख़त्म कर के मेरे पास आओ ।

पता नही कुछ लोगों की कमांड में जन्मजात जागीरदारी होती है तो कुछ की फ़ितरत ही नौकरशाही वाली होती है । उस दिन लगा कि हम नौकरशाही फ़ितरत के हैं , हाँलाकि तब तक प्रेमचंद का साहित्य हमारे लिए अछूता था । ख़ैर ! हम आगे बढ़े , हमारे पास उसकी बात न मानने का विकल्प नही था । एक ने अलमारी खोली और एक ने सामने ही रखा पैकेट निकालना चाहा कि पलास्टिक हमारी चोरी की गवाही देने चरमरा उठा , हम छिटक कर पीछे हट गए । चॉकलेट की मालकिन सतर्क थी , उसने करवट बदली । अंधेरे में सामने दो साए देख कर वह चिल्ला पड़ी और लाईटें जल उठीं , हम रंगे हाथों पकड़े गए थे । गुंडा लड़की ने हमें आँखें दिखाईं और अपने बिस्तर में दुबक गई । वॉर्डन अपने कमरे से बाहर आ गईं , हमें पकड़ कर अपने कमरे में ले गईं । मेरी ओर इशारा कर के बोलीं ,

अरे , तुम तो बड़ी शरीफ़ लगती हो , तुम्हारे घर से तो वैसे ही पार्सल आते रहते हैं , फिर तुम क्यों चॉकलेट चुराने चली थीं ?

जवाब में हमारे पास केवल आँसू थे , दोनों ओर डर था , इधर भी और उधर भी । सच बताएँ तो मुश्किल , न बताएँ तो मुश्किल इसलिए बस रोना ही हमारे वश में था इसलिए जो वश में था वो कर रहे थे । वॉर्डन भी कच्ची नही थीं , शक्ल देख कर समझ जाती थीं कि माजरा क्या है । उस समय तो उन्होंने हमें सोने भेज दिया और हम रोते-रोते अपने-अपने बिस्तर पर लेट गए । उसके बाद मेरे मन के कोने में भी विद्रोह की भावना जाग उठी , मैंने सुनीता को हिदायत देदी कि अगर आज के बाद वो मेरा कान कुरेदने आएगी तो मैं सबको उसके अंगूठा चूसने वाली बात बता दूँगी । उसके बाद वो मेरे पास नही आई , उसका उसने क्या विकल्प ढूँढा मुझे नही पता । अगले दिन पिछली रात का हॉस्टल में थोड़ा हंगामा रहा और हम शर्मसार से घूमते रहे पर मुँह नही खोला , अब इतने भी विद्रोही नही हो पाए थे । उस दिन कुछ हमारी सीनियर लड़कियाँ हमारे साथ काफ़ी नर्म और हमारी हमदर्द बन कर आईं । वो भी अपने तरह की दादा थीं लेकिन सब की सहायता करने वाली , ये बात हमें पता चल गई थी । उन्होंने हम दोनों से किसी तरह उस गुंडा लड़की का नाम निकलवा लिया इस आश्वासन पर कि हमें कुछ नही होगा और वो हमारी हर तरह से रक्षा करेंगी । बस उसके बाद तो उस गुंडा लड़की को उन्होंने बहुत धमकाया और उसकी शिकायत वॉर्डन से की , वॉर्डन तो पहले से ही हमें इस लायक नही समझती थीं । कुछ दिनों बाद वो लड़की हॉस्टल से चली गई तो हमने राहत की साँस ली । अब हमारी ख़ैरख़्वाह हमारी सीनियर्स थीं , हम मस्त होकर घूमने लगे थे ।

माला जोशी शर्मा

स्कूल की यादों की कड़ी

स्कूल की यादों की कड़ी में मुझे वो प्रकृति को अपनी सखी सहेली समझना सबसे प्यारा लगता था , शायद तभी से प्रकृति से गहरा प्रेम हो गया था । हमारे बोर्डिंग स्कूल का दायरा बहुत बड़ा था , वह कई किलोमीटर तक फैला था । उसी में हमारी सारी दुनिया थी , एक छोटा सा एयरपोर्ट , एक छोटी नदी जिसमें कभी कभी नाव चलाने जाते थे । थोड़ी दूर एक टीले पर  ब्रह्म मंदिर था जो बेल के और इमली के पेड़ों से घिरा हुआ था । हम समय मिलने पर अक्सर वहाँ जाया करते थे , वहाँ जाना हम सबको बहुत अच्छा लगता था । सबसे मेरा मतलब मुझे और मेरी सहेलियों को । पेड़ से तोड़ कर इमली खाने का मज़ा ही कुछ और था । मैं अपनी सहेलियों में सबसे लंबी थी तो पेड़ पर चढ़ कर तोड़ने का काम मेरा होता । हॉस्टल से स्कूल की ओर जाते-आते आँवले के पेड़ थे , उनके टेढे-मेढ़े तनों पर बंदर की तरह चढ़ कर आँवले तोड़ना बेहद ज़रूरी होता । उसमें भी खेल मिल गया था , एक आँवला खाते और फिर पानी पीते तो पानी मीठा लगता , बस यही करते रहते । आप भी आज़मा कर देखिये , सच में बड़ा मज़ा आएगा !

हॉस्टल के आस-पास कचनार के पेड़ थे जब उनके खिलने का मौसम आता तो वो गुलाबी फूल इतने सुहाते कि बकरी की तरह तोड़ – तोड़ कर चबा जाते । लाल-लाल माणिक से झाड़ियों में लटकते बेर के गुच्छे देख कर मुह में पानी आ जाता और अपने हाथों का छिलना – कटना सब भूल कर झाड़ियों में मधुमक्खियों की तरह चिपटे रहते और अपनी जेबें भर लेते । फिर इत्मिनान से बैठ कर खाते तो उसी में जीवन का सबसे बड़ा सुख मिलता । अब सोचते हैं तो पाते हैं कि बड़े-बड़े गैजेट्स पाकर भी बच्चे खुश नही हो पाते ।

सुबह आँख खुलती तो मोरों की पीकू पीकू की आवाज़ से । वो हमारे इर्द-गिर्द ऐसे बेख़ौफ़ होकर घूमते थे जैसे हम में से एक हों । हम उनके उपहार स्वरूप छोड़े गए पंखों को अपनी जायदाद समझ कर बीनते रहते ।

बसंत पंचमी के दिन पीले ही कपड़े पहनते और हमें खाने में पीले मीठे चावल मिलते । इससे जुड़ा एक किस्सा याद आता है ,जब मैं छटी-सातवीं में रही होंगी । बसंत पंचमी पर उस बार माँ किसी कारणवश मुझे पीली फ्रॉक नही भेज पाईं । अब मुझ से अधिक मेरी सहेलियों को फिक्र थी कि मैं क्या पहनूँगी ? अगले दिन बसंत था , मैं उदास बैठी थी , मेरा उतरा मुँह देख कर मेरी सखियाँ परेशान थीं । तभी मेरी सहेलियों ने हॉस्टल में सबसे पीले ड्रॉइंग कलर इकट्ठा कर लिए और एक बाल्टी में घोल दिए । मेरी एक सफ़ेद फ्रॉक थी , बस फिर क्या था उसे उसमें डुबो दिया गया । एक घंटे बाद निकाल कर उसे सुखाया गया और प्रेस करने के लिए बिस्तर पर गद्दे के नीचे दबा दिया । सुबह जब निकाला तो पीली फ्रॉक तैयार थी , हाँ , परफ़ेक्ट नही थी लेकिन बुरी भी नही थी । मैं खुश थी कि आखिरकार मैंने पीली फ्रॉक पहनी , मेरी खुशी में मेरी सहेलियां भी खुश थीं । आखिर हमने पूरे उल्लास के साथ बसंत मना ही लिया  ।

माला जोशी शर्मा

स्कूल की यादें

बचपन की यादें एक ठंडी हवा के झोंके की तरह होती है जो तन-मन को ताज़ा कर जाती हैं । विशेषकर स्कूल में बिताए दिन हमारे व्यक्तित्व पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं । वो टीचर हमारा व्यक्तित्व बनाते हैं , वो मित्र दिल के सबसे करीब होते हैं ।
मेरी स्कूली शिक्षा बोर्डिंग स्कूल में हुई इसलिए शायद उसकी छाप भी बहुत गहरी है । याद करती हूँ तो पाती हूँ कि आज ऐसा वातावरण मिलना मुश्किल ही नही नामुमकिन सा है । हमारा स्कूल गाँधी जी की विचारधारा का स्कूल था (अब भी है )। खादी पहनना आवश्यक था जो अब तक है क्योंकि हमारे स्कूल के प्रमोटर पंडित हीरालाल शास्त्री जी स्वतंत्रता सेनानी थे ।
2 अक्टूबर और 30 जनवरी हमारे लिए बड़ा खास दिन होता था । 30 जनवरी हम श्रम दिवस के रूप में मनाते थे । उस दिन अपने हॉस्टल , स्कूल की सफ़ाई के साथ-साथ और भी काम करते थे जैसे एक बार हमने एक तालाब बनाने का काम शुरू किया था आज वहाँ पिकनिक स्पॉट है । तभी से अपना काम स्वयं करने की आदत और स्वच्छता का महत्त्व भी सीखा । वो शिक्षा किताबों से बाहर की थी जो जीवनभर काम आई । आज हमारे स्कूल केवल किताबी ज्ञान की ओर भाग रहे हैं बच्चे का बहुमुखी विकास होता ही नही । उसके भीतर छिपी प्रतिभा छिपी ही रह जाती है और स्कूल केवल 90 प्रतिशत और उससे बेहतर की होड़ में बच्चों को धकेल रहे हैं ।
मैं वो दिन नही भूल पाती जब हमारी सामूहिक सर्वधर्म प्रार्थना हुआ करती थी जिसमें हम हर धर्म की प्रार्थना पढ़ा करते थे । बाइबिल , कुरान , जैन धर्म , बोद्ध धर्म ,गुरुग्रंथ साहब , गीता , रामायण आदि सभी धर्मों से अंश पढ़ते थे । अंत में रघुपति राघव राजा राम से समापन करते थे । यही नींव थी जिसने हमें हर धर्म का सम्मान करना सिखाया था । कहाँ हैं आज वो संस्कार जो स्कूल को देने चाहिए ?
यही नही स्कूल के ऐसे अनगिनत किस्से हैं जिसने हमारी सोच को पंख लगाए और हमें एक अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास किया , देशभक्ति का सही मायने समझाया ।

माला जोशी शर्मा

तेरे मेरे सपने

हम दिल पर बोझ ढोए चले जाते हैं

अपना बोझ दूसरों पर डाले चले जाते हैं

बचपन अच्छा था , दिल बड़ा हल्का था

दूसरों के सपनों का बोझ कहाँ अपना था ?

अब घरों में सपने समाते नही , अपने बच्चों में बाँट देते हैं हम

उनके सपनों पर अपने रंग चढ़ा देते हैं हम

लाल रंग लाल है , नीला नही , पीला चमकदार है , काला नही

क्यों , हम ये समझ पाते नही ?

क्यों उनके सपनों को बेरंग बना देते हैं हम ?

मेरे सपने क्यों मेरे नही , उसके सपने क्यों उसके नही ?

सफ़ेद रंग में हर रंग चढ़ा देते हैं हम

दिल का बोझ यूँही बढ़ा देते हैं हम ।

उसके सपनों पर उसका हक है , उसमें केवल उसका वजूद है

क्यों उसके वजूद को हिलाए जाते हैं हम

अपनी परझाई क्यों उसमें देखना चाहते हैं हम ?

क्यों अपना बोझ उसके कांधे पर डाले चले जाते हैं हम ?