घर

ये तेरा घर , ये मेरा घर ये ईंट-पत्थरों का घर फिर भी है ये मेरा घर । बड़े-बड़े ये महल , शानों-शौकतों से भरे , चले गए , बना के सब , सिर्फ़ नाम रह गए । गुमनाम सा है ये महल , कोई नही जो कह रहा , ये मेरा घर , ये… Continue reading घर

मैं नूँ दिलों मुकाइए

बुल्लेशा गल ताईंयों मुकदी , जद “मैं” नूँ दिलों मुकाईये……… हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में एक गाँव है कलोल । इस दूर दराज़ गाँव में बेटियों के लिए जो मुहीम चलाई जा रही है वो देखकर मैं नतमस्तक हो गई , उन लोगों के प्रति जिन्होंने इसे शुरू किया । मन चाहा कि इसे… Continue reading मैं नूँ दिलों मुकाइए

मन बाँवरा

मन बाँवरा उड़ चला ना जानू मैं ये कहाँ चला था जो बंधा पिंजरे में , साँसें थी पहरे में कंठ था सूखा , गीत नही थे , गूँगे मन , सूनी आँखों में मैं खोई थी सपनों में मन बाँवरा……… झोंका हवा का ऐसा आया मन पिंजरे को तोड़ के भागा पर , पंख… Continue reading मन बाँवरा

लोरी

जब छोटे थे तो लोरी सुन कर सोते थे । जब माँ बनी तो लोरी गा कर बच्चों को सुलाती थी । बिना लोरी सुने उन्हें नींद ही नही आती थी । तब फ़िल्मों में भी लोरी ज़रूर होती थी । “मैं गाऊँ तुम सो जाओ ” , “नन्ही परी सोने चली हवा धीरे आना”… Continue reading लोरी

कुछ चाह

मैं क्यूँ चाहूँ ज़िंदगी से कुछ ? मैं क्यूँ चाहूँ मेरे अपनों से कुछ ? मैं क्यूँ चाहूँ अपने से कुछ ? इस चाहत ने , क्या दिया है , मुझको कुछ ? यह मन लगता है पागल मुझको कुछ ? न पाए तो होता है परेशाँ कुछ-कुछ ? पाए तो भी होता है परेशाँ… Continue reading कुछ चाह

पीपल की छाँव

पीपल की छाँव बचपन की है याद सुहानी मस्त हवा से दौड़े भागे सर्दी – गर्मी न धूप थी आगे पीपल था एक घर के आगे घने पेड़ की ठंडी हवा सुहानी छाँव में उसकी करते दिनभर मनमानी डाल के झूला डाली पर , पींगे भरते ऊँची – ऊँची वहाँ से दुनिया लगती थी फिर… Continue reading पीपल की छाँव

अस्मिता

औरत का जीवन इतना आसान नही होता जितना वो दिखता है । मेरी एक सहेली ने जब मुझसे ये कहा कि मैं माँ के बारे में कुछ लिखूँ तो मैं सोच में पड़ गई , मन की गहराइयों में अचानक अनगिनत ऐसी औरतों की शक्लें उभर आईं जिनका जीवन अदभुत रहा है । जिन्होंने जीवन… Continue reading अस्मिता