नया सवेरा

जैसा बीता गया साल , मत पूछो बस क्या हुआ हाल
हर दिल में एक कहानी है , आशा हर दिन ही हारी है।
दीवारों में बंद अकेलापन‌ ,अनारकली का दर्द सुनाती सी ।
हर घर में सन्नाटा सुनता था , पड़ौसी ही पड़ौसी से घबराता था ।
मां-बाप अकेले डरते थे जो कभी बच्चों को निडर बनाते थे ।
कितने ही अकेले गुज़र गए , इस महामारी ने निगल लिए ।
हे प्रभु करो अब ऐसी कृपा , सब अंधकार अब मिट जाए ।

नया साल है आया लेकर नई आशा की नई किरण
कोई उदास न अकेला हो , नए जीवन का अब सवेरा हो‌।

एक बार फिर आजा कबीर

माया महा ठगनी  हम जानी ।
तिरगुन फांस लिए कर डोलै ,बोलै मधुरी बानी ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो , यह सब अकथ कहानी ।
माया को छोड़ना कठिन है , बार बार लिपटती है । न जाने कितना कुछ कह गए तुम संत ।
स्कूल में जब तुम्हें पढ़ने लगी तो सबसे पहले तुम्हारे दोहे याद करने पड़े थे । हिंदी की टीचर ने तुम्हारे बारे में बहुत से किस्से सुनाए थे जो मेरी आंखों में किसी फ़िल्म की तरह तैरते रहते थे । तभी से मेरा तुम्हारे साथ एक अनजाना सा रिश्ता जुड़ गया था । मैं तुम्हारे सपने देखने लगी थी , तुम्हारे दोहों में जीवन ढूंढने लगी थी । तुम हर राह पर मुझे चलते – फिरते दिखाई देते थे , कभी आम लोगों के बीच में , कभी किसी साधु – संत के हाथ में फिरती माला में तो कभी गरीब की फिरती चक्की में । तुम्हारा वो दोहा , काल करे सो आज कर आज करे सो अब , पर में परलै होएगी बहुरी करेगा कब । ये मुझ से हर काम समय से पहले ही करवा देता था । पता है क्यूं ? क्योंकि मुझे सच में लगता था कि अगर दुनिया उलट-पुलट हो गई तो मेरा काम अधूरा रह जाएगा और मैं अपना काम ख़त्म करके ही चैन की सांस लेती । मज़े की बात तो ये है कि ये बात आज भी कहीं ज़हन में गुपचुप छिपी बैठी है । अक्सर चलते-चलते राह भटकी हूं पर तुमने मेरे मैं को ललकारा है । तुम्हारी आवाज़ जैसे दिमाग़ की खिड़की खटखटाती ,जब मैं था तब हरि नहीं , अब हरि हैं मैं नहीं । सब अंधियारा मिट गया , जब दीपक देखा माहीं । मेरा मैं शर्म से सिर झुका लेता और भीतर कहीं उजाले को तलाशता ।
आज मैं क्या सारी दुनिया एक भय और अनिश्चितता के काल से हिली हुई है । तुम क्या थे ? तुम आज न हो कर भी थे नहीं , तुम हो । तभी तो तुमने मनुष्य के मन को तह तक जाना । भली भई जु भै पडया , गई दशा सब भूलि । पाला गलि पांणी भया , ढुलि मिलिया उस कूलि । यानि , अच्छा हुआ जो मुझे भविष्य का भय हुआ । यमदंड का भय हुआ । जन्म-मृत्यु चक्र का भय हुआ । फलत: मैं संसार की छह दशाओं से मुक्त हो गया । क्योंकि ये दशाएं आत्म ज्ञानी को नहीं प्रभावित करती हैं । बर्फ़ जैसी जड़ता समाप्त हो गई है । परमात्मा का एहसास हुआ , वही संपूर्ण सृष्टि का किनारा है ।
तुमने हर क़दम पर राह दिखाई है , तुम अजर – अमर हो । हे संत , हे कबीर तू हवा बन मेरे देश में , इस सृष्टि में बह ताकि हम इस अंधकार से मुक्त हों ।

सुरंग

गहरी अंधेरी सुरंग में मैं अकेली चलती जा रही थी । हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था । दिल के धड़कने की आवाज़ थी , बाकी सन्नाटा था । हाथ-पैर छूट रहे थे लेकिन ये सुरंग ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी । मैं हांफ़ रही थी , थक गई थी , लगा अब और नहीं चल पाऊंगी । कोई साथ नहीं है , कोई पास नहीं है , अब क्या करूं ? कमज़ोर क़दम डगमगा रहे थे , ठोकर लगी और मैं मुंह के बल गिरी । आंख खुली तो अपने को बिस्तर के नीचे पाया । आवाज़ सुन कर पति ने आंखें खोली , क्या हुआ ? कहां हो ?
मैं कराहती हुई नीचे से उठी , यहीं हूं , सोते में गिर गई ।
चोट तो नहीं आई ? उठ कर मुझे सहारा देते हुए  उन्होंने पूछा ।
नहीं , मैं ठीक हूं और मैं फिर लेट गई थी । लेटी‌ थी पर सोई नहीं थी । जब नींद नहीं आती तो विचार चारों ओर से ऐसा धावा बोलते हैं कि दिलो-दिमाग में आंधी चलने लगती है । ये सपना अपनी हक़ीक़त की छाया थी । लगभग सौ दिन से ऊपर घर में बंद ,कोई पड़ौसी एक पल को अपने दरवाज़े से झांक कर घबराया सा देखता है और दरवाज़ा फिर बंद हो जाता है । साठ साल से ऊपर वाले हमारी सोसाइटी में काफ़ी लोग हैं । यही नहीं वो अकेले भी रह रहे हैं । उनके बच्चे या तो विदेश में हैं या दूसरे शहर में । हम भी उसी गिनती में हैं । कभी-कभी भय , सच कहूं तो काल का भय घेर लेता है । भई , साधू तो हैं नहीं जो हर समय परमानंद की स्थिति में रहें । डरते हैं , रोते हैं , negative thought भी आते हैं । कभी कभी ऐसा भी हो ही जाता है , हां अब उस भय से ऊपर उठने की कोशिश ज़रुर है । उठना ही पड़ेगा । कभी तो सुरंग ख़त्म होगी , पार हो ही जाएगी ।

कर्मफल

आज बैठे बैठे एक विचार मन में आ रहा है । जिन परिस्थितियों से आज हम गुज़र रहे हैं ऐसे में इस तरह के विचार आना स्वाभाविक है । हम अक्सर कर्मों की बात करते हैं लेकिन उसका प्रत्यक्ष प्रमाण अब मिला । कुछ बड़ी विकट स्थिति में फंसे हैं तो कुछ सुरक्षित और कुशल हैं । मन में विचार आया कि क्या ये सब कर्मफल नहीं है ? कहीं कुछ तो हमने ऐसे कर्म किए होंगे जो आज ईश्वर ने हमें ऐसी स्थिति में रखा । हम परिस्थितिवश घरों में कैद होने पर मजबूर हो गए हैं ।  ऐसा लगता है कि जैसे वो ऊपरवाला हमें बहुत कुछ सिखाना चाहता है । इंसान जो अपने को सर्वशक्तिमान , बुद्धिमान और चांद-सूरज को वश में करने का दम भरता है ,एक वायरस के वश में फंसा है और राह नहीं सूझ रही है ! क्या हैं हम इस सृष्टि में ? निमित्त मात्र ! समझा दिया कि इंसान तू सर्वज्ञ नहीं । अभी बहुत कुछ है जो तू नहीं जानता , जो तुझे जानना बाकी है । हम सब अभी आधे-अधूरे हैं ।

पीपल

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न जाने कब से दिल में ये ख़त लिख रही थी लेकिन जीवन में कभी कोई मिल जाता है और दिल को ज़ुबान मिल जाती है । प्रतीक्षा ने सुंदर बना दिया , उसका आभार । सुनिए मेरी ये कहानी ।

चारू चंद्र की चंचल किरणें

चारू चंद्र की चंचल किरणें , खेल रही हैैं जल थल में ,
स्वच्छ चांदनी बिछी हुई है , अवनी और अंबरतल में
पुलक प्रकट करती है धरती , हरित तृणों की नोकों से
मानों झूम रहे हैं तरू भी , मन्द पवन के झोंको से।


कवि मैथिलीशरण गुप्त के काव्य ‘पंचवटी’ की इन पंक्तियां ने साहित्य में इतिहास रच दिया । इनका चमत्कार व्याकरण में अद्भुत उदाहरण है । बचपन से पढ़ते आए कि ये अनुप्रास अलंकार है । बस मज़े लेकर पढ़ते थे इन पंक्तियों को । लेकिन कहीं कवि के भाव सौंदर्य को समझने से वंचित रह गए थे। बहुत सी बातें समय के साथ ही समझ में आती हैं , खास कर साहित्य की गहराई ।
मुझे भी इन पंक्तियों का भाव सौंदर्य तब समझ में आया जब मेरी नातिन ऋष्वा पैदा हुई । जब मैंने उसे बढ़ते देखा , खेलते देखा , उसे प्यारी निर्मल बातें करते देखा , उसकी स्वच्छंद हंसी को देखा तो ये पंक्तियां जीवंत हो उठीं । ऐसा लगा मानों ये पंक्तियां कवि ने जैसे उसी के लिए लिखी हों ! फिर मुझे उसमें भाव सौंदर्य नज़र आया । ये भाव की ही बात है , किसी भी रचना के भाव को जानने के लिए समझना नहीं महसूस करना बहुत ज़रूरी है । मुझे ये बात समझने में बहुत समय लगा । अब हर रचना को आनंद से पढ़ती हूं ।

मेरी नातिन

मेरी नातिन के जन्मदिन पर मेरे उद्गार ।

अक्सर सोचती हूं मैं

तुमसे पहले कैसी थी ज़िन्दगी ?

जैसे पुराने थेगली लगे कपड़ों सी

स्वाद जैसे बिन नमक का अधपका खाना सा

हवाएं यूं ही मौसम सी बस बदलती रहीं

महसूस जैसे कुछ होती थी ही नहीं !

फिर अचानक तेरे आने की आहट मिली

मौसम कुछ बदला , लेकिन बेख़बर सा

एहसास कुछ बदला लेकिन बेहिसाब सा

फिर दबे पांव , घर के दरवाज़े से बासंती हवा सी तू भीतर आई ,

आंखों में तारे टिमटिमाती तू , घर की मुस्कान लाई ,

ज़िन्दगी भी नया रुप ले , रंग बिखराती आई ,

जैसे पकवानों की थाल हर स्वाद भर लाई

अब सोचती नहीं हूं मैं ,

बस तेरी एक मुस्कान से प्याला भर -भर पीती है ज़िन्दगी ।

सवेरा

किसने कहा कि बस अब गहरी अंधियारी रात है ?
इसकी न सुबह , न मदमाती किरण की आस है !
न भोर का तारा है , न उन्मुक्त आसमां की उड़ान है!
ये सांझ आई तो ज़रुर है साथ लंबी रात भी लाई तो ज़रुर है ।
क्या सूरज की आदत को नहीं जानती ?
उसके तेज़ दमकते स्वभाव को नहीं पहचानती ?
हर कण को चमका कर सोना बना दे ,
बिजली की तरंगें बन हैरां बना दे ।
हर रात को अपनी किरणों में नहला सवेरा बना दे ।
फिर कितनी ही लंबी क्यों न हो ये रात ,
इसके सामने कब तक ख़ैर मनाएगी ,
एक न एक दिन उल्टे पांव भागती नज़र आएगी ।
आखिर रात ही तो है ! भोर की किरण अपने आगे पाएगी ।
माला जोशी शर्मा

मेरा शहर , मेरी गली

 

 

पुरु हाईराईज़ बिल्डिंग की सबसे ऊपरी मंज़िल पर अपने ऑफ़िस के कैबिन में खड़ा खिड़की से स्क्रीन हटा कर नीचे देख रहा था । उसे लग रहा था मानो दुनिया उसके क़दमों में हो । उसने लंबी गहरी साँस लेकर अपनी कॉफ़ी की चुस्की ली तभी किसी ने उसके कैबिन का दरवाज़ा ज़ोर से खट-खटाया , एक झटके से उसके हाथ का कप छूटकर ज़मीन पर गिरा और खटाक की आवाज़ से कप टूटा । खटाक की तेज़ आवाज़ के साथ ही पुरु की आँख खुल गई , उफ़….फिर सपना ! ऐसा पहली बार नही हुआ था कि उसका सपना यूँ टूटा हो । बाहर उसके घर के आँगन में गली के बच्चे इसी तरह हंगामा करते थे , ज़रुर कोई गमला तोड़ा होगा । उन्हें उसके घर के जाल पर बैठे बंदरों की सेना के साथ मस्ती करनी होती थी क्योंकि किसी और के आँगन में ऐसा पुराना जाल नही था । पुरु को इस गली की , इस शहर की यही बात खलती थी कि ना समय देखते हैं और ना दूसरों का सोचते हैं । मुँह उठाए अपना घर समझ कर किसी के भी घर में चले आते हैं ! दिन भर गली में आंटियों की कटोरियाँ इस घर से उस घर में घूमती रहती हैं । कोई प्राइवेसी नाम का शब्द इनकी डिक्शनरी में है ही नही ! पता नही कब उसके सपने पूरे होंगे , कब वो इस गली और इस शहर से दूर जाएगा जहाँ उसकी अपनी ज़िंदगी होगी ! मम्मी – पापा की तो पूरी कोशिश है कि वो यहीं-कहीं नौकरी करे और घर में रहे । इंजीनियरिंग करने के बाद से पापा कितनी जान-पहचान से उसे यहीं नौकरी दिलवाने की कोशिश करते रहते हैं और वो बड़े शहरों की बड़ी कंपनियों में अपलाई करता रहता है । उसे पूरी उम्मीद है कि आज नही तो कल वो इस शहर को अलविदा कहेगा । उसे याद आया कि कल उसे दिल्ली जाना है एक इन्टरव्यू के लिए । मम्मी – पापा को अभी तक बताया भी नही है । पापा ऑफ़िस जाएँ इससे पहले वो जल्दी से उठ कर बाहर आया और बच्चों को आँखें दिखाता हुआ बोला , तुम्हारा स्कूल नही है क्या आज ?

टिंकू ने आँखें मटकाते हुए जवाब दिया , अरे भैया , आपको इतना भी नही पता , कोरोना वायरस फैला है इसलिए स्कूल की छुट्टी हो गई है ।

अरे , छुट्टी हुई है तो क्या सारा दिन इन बंदरों के साथ बंदर बने रहोगे ? चलो , अपने घर में बैठ कर पढ़ाई करो । कहते हुए पुरु ने उन्हें भगाया ।

मम्मी को ढूँढते हुए पुरु किचन में आया , मम्मी , पापा ऑफ़िस गए क्या ?

नहीं आज उनकी तबीयत कुछ ठीक नही इसलिए छुट्टी ली है । नाश्ता टेबल पर रखते हुए मम्मी ने चिंता से कहा , और सुन तू जल्दी से तैयार हो जा अपने पापा को डॉक्टर के ले जाना ।

क्या हो गया पापा की तबीयत को ? पुरु ने हैरानी से पूछा । मम्मी के जवाब से पहले ही  पीछे से पापा की आवाज़ आई , तुझे तैयार होने में देर लगेगी तो मैं खुद हो आऊँगा , मुझे आता है स्कूटर चलाना ।

नही पापा , मैं चलता हूँ ना , मैं दो मिनट में तैयार हो कर आया । आपकी तबीयत खराब है तो आप क्यूँ चलाएँगे स्कूटर ? कहते हुए वो तैयार होने भागा । वो जानता था कि उसके पापा कभी उससे किसी काम के लिए नही कहते थे और अपनी तबीयत तो कभी किसी को बताते ही नही थे । अगर उन्होंने कहा है कि तबीयत खराब है तो ज़रुर ज़्यादा ख़राब होगी । वो तैयार होकर स्कूटर निकालने लगा तो मम्मी ने आवाज़ लगाई , पुरु…, नाश्ता तो करले बेटा ।

नहीं मम्मी मैं आकर करता हूँ , पापा चलिए । कहते हुए उसने स्कूटर स्टार्ट किया और पापा ने उसके हाथ में हैल्मेट थमाया , इसके बिना स्कूटर नही चला सकता था , उसे इसी शर्त पर स्कूटर मिला था । पापा को सरकारी अस्पताल ही जाना होगा फिर भी उसने पूछ लिया , पापा कौन से डॉक्टर के जाना है ?

अपने गवर्मेंट हॉस्पिटल ही चलना है , हमारे परिवार का कार्ड बना हुआ है वहीं का । उन्होंने बड़े विश्वास से कहा लेकिन पुरु को पापा की ये बात ज़रा पसंद नही थी । भला कोई सरकारी अस्पताल में भी इलाज करवाता है ? वहाँ कौन डॉक्टर पेशेंट को सीरियसली लेता है ? लेकिन नही इन्हें तो वहीं जाना होता है , पता नही किसने कह दिया इन्हें कि सरकारी अस्पताल में डॉक्टर बहुत काबिल होते हैं , बेकार की बात । वो रास्ते में यही सोचता रहा तभी अस्पताल आ गया , तू स्कूटर पार्क कर मैं लॉबी में मिलता हूँ । कहते हुए पापा अंदर चले गए थे , पुरु पापा को देख रहा था कि आज उनकी चाल में वो तेज़ी नही थी । उसे पापा की फ़िक्र हो रही थी , उस पर ये सरकारी अस्पताल । वो जल्दी से पार्किंग से निकल कर लॉबी में पहुँचा । पापा लाईन में डॉक्टर का इंतज़ार कर रहे थे । बारी आई तो डॉक्टर ने जाँच कर बताया , शर्मा जी आपका बीपी बहुत बढ़ गया है , आप दवाईयाँ समय पर ले रहे हैं ना ? कुछ और टैस्ट करेंगे लेकिन आज आप ये दवाईयाँ शुरु कीजिए और कुछ दिन आराम करिए ।    

पुरु को पता था कि उन्हें बीपी की शिकायत रहती है लेकिन उसकी नज़र में सब ठीक ही था । रास्ते में पुरु ने कुछ अटकते हुए अपना मश्वरा दिया , पापा मुझे लगता है आपको किसी और प्राईवेट अस्पताल में भी दिखा लेना चाहिए । पता नही इन डॉक्टरों पर मुझे विश्वास सा नही होता , आप कहें तो पता करुँ कहीं दिल्ली में ?  

ऐसा कुछ नही है पुरु , यहाँ सब बढिया है , तुझे तो यूँही वहम है । पापा ने उसे झिड़की दीगली में घुसते ही पुरु समझ गया कि समाचार घर से बाहर आ चुका था , घर के बाहर गुप्ता अंकल , चौधरी अंकल पहरा दे रहे थे , अब हो जाएगी शुरु पूछताछ , शर्मा जी सब ठीक तो है ? कुछ परेशानी तो नही ना ? आपने बताया नही कि तबीयत ठीक नही ?

नहीं कुछ खास नही , थोड़ा , यूँही बीपी बढ़ गया था , दवाई ले ली है , एक-दो दिन में नॉरमल हो जाएगा । पापा ने बात को आई-गई करते हुए हँस कर कहा ।

चलिए टीवी खोल लीजिए प्रधानमंत्री जी कोई घोषणा करने वाले हैं कोरोना वायरस को लेकर । गुप्ता जी ने अपने घर में जाते हुए हाथ हिलाया ।

पापा के अंदर आने से पहले ही पुरु मम्मी को डॉक्टर की सारी रिपोर्ट दे चुका था । मम्मी पापा पर बरस पड़ीं , आप अपनी दवाईयाँ लेना भी भूल जाते हैं ? ये तो हद है , बस ऑफ़िस याद रहता है , अपनी सेहत नही ।

पापा ने मम्मी की बातों से बचने के लिए टीवी खोल लिया , उसपर ब्रेकिंग न्यूज़ थी कि आज रात से लॉकडाऊन शुरु हो रहा है जिसका पालन सख़्ती से किया जाएगा । बस फिर क्या था टॉपिक पापा की सेहत से बदल कर लॉकडाऊन पर आ गया था । पुरु के मन में अपने कल के इंटरव्यू को लेकर सवाल खड़े हो गए थे । मेल आ चुका था कि इंटरव्यू अनिश्चित समय के लिए आगे हो गया है । एक बार फिर उसका भविष्य इस लॉकडाउन के साथ अनिश्चितकाल के लिए लॉक हो गया था । वो अपने कमरे में मायूस बैठा अपने फ़ोन पर लगा था , उसे पता ही नही चला कि कब पापा उसके पीछे आकर खड़े हो गए थे , क्या हुआ पुरु ? आज तुम अपने कमरे से बाहर ही नही निकले ? सब ठीक तो है ?    

कुछ नही पापा , इस लॉकडाऊन के चक्कर में मैं दिल्ली नही जा पाऊँगा , मेरा इन्टरव्यू चला गया । पुरु ने उदास मन से कहा ।

तो क्या हुआ , यहाँ पानीपत में नौकरियों की कमी है क्या ? तूने टैक्सटाइल इंजीनियरिंग की है , यहाँ कमी नही तेरे लिए , कितनी बार कहा कि यहाँ अप्लाई कर । कहते हुए पापा बाहर चले गए लेकिन उन्होंने पुरु का जवाब नही सुना जो वो उनसे कभी नही कह पाया था ।

नही करनी मुझे यहाँ नौकरी , नही रहना मुझे यहाँ , इस गली में । वो सिर्फ़ बुदबुदाया था , पापा को सुनाना नही चाहता था ।

लॉकडाऊन को दो-तीन दिन हो गए थे , पुरु की नींद और सपनों में अब कोई बाधा नही थी , मम्मी , कितनी शांति है जीवन में ।

चल पागल , ऐसी शांति भी किस काम की ? ये पड़ौस , ये गली हमारा परिवार है । मम्मी ने उसे झिड़कते हुए कहा । पापा पूरी तरह से टीवी के सामने समय बिताते , मम्मी का गली परिवार शांत बैठा था , हर तरह की आवा-जाई पर विराम लग गया था । पुरु अपने दोस्तों से फ़ोन पर लगा रहता , उस दिन रात को खाना खा कर सब जल्दी सोने चले गए थे । पुरु सोया नही था , वो अपने दोस्तों के साथ चैट पर लगा हुआ था । क्या करते , मिलने पर पाबंदी थी , तभी मम्मी घबराई हुई उसके कमरे में आईं , पुरु , तेरे पापा की तबीयत ज़्यादा खराब है , उन्हें घबराहट हो रही है । जल्दी से डॉक्टर को फ़ोन लगा , लगता है हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा ।

पुरु ने हॉस्पिटल के पेपर्स से डॉक्टर का नंबर लेकर मिलाया , घंटी बज रही थी लेकिन नही उठाया तो पुरु की परेशानी बढ़ गई ,

कहा था किसी प्राईवेट डॉक्टर को दिखा लो , अब ये फ़ोन नही उठा रहे । मैं पापा को कहीं और लेकर जाता हूँ ।

मम्मी ने उसे शांत करते हुए कहा , पुरु , एक बार और लगा बेटा , वो पापा का इलाज कर रहे हैं , जानते हैं क्या करना है ।

पुरु टैंशन में था फिर भी मम्मी के कहने पर फिर फ़ोन मिलाया तो इस बार घंटी बजते ही डॉक्टर ने फ़ोन उठा लिया । बात सुनकर उसने तुरंत हॉस्पिटल पहुँचने को कहा । पापा को संभाला लेकिन ऐसी हालत में उन्हें स्कूटर पर नही ले जाया जा सकता था । वो परेशानी में कुछ समझ नही पा रहा था , मम्मी इस समय अगर एंबुलैंस बुलाएँगे तो देर हो जाएगी , पापा को जल्दी लेकर जाना होगा लेकिन कैसे ?

मम्मी ने ऐसे में एकदम से कहा , जा पुरु सामने गुप्ता अंकल की गाड़ी माँग ला जल्दी से , देर मत कर ।

पुरु पल भर को सोच में पड़ गया ,अपनी गाड़ी कोई कैसे देगा मुझे ?

पुरु सोच मत , जल्दी जा , मम्मी पापा को संभालते हुए बोलीं ।

पुरु ने तेज़ी से निकल कर गुप्ता अंकल के घर की घंटी बजाई , उसका हाथ घंटी पर ही था कि गुप्ता जी हैरान बाहर आए , क्या हुआ पुरु ?

अंकल पापा की तबीयत अचानक बहुत ख़राब हो गई है , उन्हें हॉस्पिटल लेकर जाना है , आपकी गाड़ी मिल सकती है ? पुरु घबराया हुआ , कुछ शंकित सा बोल रहा था । गुप्ता जी दौड़कर भीतर गए और चाबियों का गुच्छा उसे थमाते हुए बोले , बेटा मैं भी चलता हूँ साथ में , तू अकेला पड़ जाएगा ।

नही अंकल मम्मी हैं साथ में , फिर ज़्यादा लोग होंगे तो पुलिस भी रोकेगी । पुरु ये कहता हुआ निकल गया । हॉस्पिटल घर से अधिक दूर नही था , यूँ भी सड़कें खाली थीं वो जल्द ही पहुँच गए । डॉक्टर उनकी इंतज़ार कर रहा था , पापा को स्ट्रैचर पर लिटाया और तुरंत डॉक्टर उन्हें अंदर ले गए , मम्मी और पुरु को बाहर ही रोक दिया था । दोनों बाहर कॉरिडोर में बेचैनी से चक्कर लगा रहे थे , पुरु कभी – कभी कनखिंयों से मम्मी को देख लेता था । वो कभी बैठतीं फिर दो पल बाद उठकर इधर से उधर घूमते हुए जहाँ पुरु के पापा को लेगए थे उस कमरे की ओर नज़र उठा कर देख लेतीं थीं । पुरु बार-बार घड़ी देख रहा था , पूरा एक घंटा हो गया था पापा को अंदर गए हुए । उसका मन न जाने क्या-क्या सोच रहा था और दिल कितनी शंकाओं से घिरा , दिमाग़ में हलचल मचा रहा था , कदम उसी गति में घूम रहे थे । जब डॉक्टर बाहर आया तो पुरु दौड़ता हुआ उनके पास आया , डॉक्टर साहब पापा , कैसे हैं ?   

डॉक्टर ने लंबी साँस लेते हे पुरु की ओर देखकर कहा , बहुत समय पर ले आए , उन्हें माइल्ड हार्ट-अटैक आया था , अब स्टेबल हैं लेकिन आई सी यू में रखना पड़ेगा , कुछ घंटे नाज़ुक हैं । आप लोग अभी नही मिल सकते , उन्हें रैस्ट करने दें ।

डॉक्टर साहब ये कह कर चले गए लेकिन पुरु और मम्मी खड़े आई सी यू की ओर देखते रहे । ड्यूटी पर खड़ी नर्स ने पास आकर कहा , पेशेंट से तो आप नही मिल सकते , फिर इधर खड़े होकर क्या करने का है ? इधर ऑडर है कि किसी को हॉस्पिटल में रुकने नही देने का । आप लोग घर जाइए , हम हैं ना इधर पेशेंट के लिए ।

पुरु ने देखा मम्मी अभी भी आई सी यू वाले कमरे की ओर नज़रें टिकाए थीं । उसने उनका हाथ पकड़ कर कहा , मम्मी , चलते हैं , कल सुबह आएँगे । डॉक्टर ने बोला ना कि पापा अब ठीक हैं , वो तो उनके लिए ही हमें मिलने नही दे रहे , डिस्टर्ब होते हैं ना ।    

दोनों वापस घर आने लगे तो रास्ते में सन्नाटा पसरा था । जिस शहर का गाड़ियों के शोर और धुएँ से दम घुट रहा था वो अब गहरी साँसें ले रहा था । यदा-कदा पुलिस का सायरन दिल की धड़कनें बढ़ा रहा था । घर पहुँचे , रात काफ़ी हो चुकी थी लेकिन फिर भी गुप्ता जी खिड़की खोले बाहर झाँक रहे थे , शायद उन्हीं का इंतज़ार कर रहे थे । पुरु ने खिड़की से ही उन्हें चाबी पकड़ाना चाहा , अंकल , आप सोए नही ? गाड़ी की चाबी , थैंक्यू ।

अरे चाबी छोड़ , ये बता तेरे पापा कैसे हैं ? भला ऐसे में नींद किसको आती है ?  कहते हुए वो बाहर आ गए , बेटा तू गाड़ी की चाबी अपने पास रख , तुझे चाहिए होगी , अब लॉकडाउन में मैं कहाँ जा रहा हूँ !

पुरु बस इतना कह पाया , थैंक्यू अंकल ।

घर भी गुमसुम सा था , दोनों अपने-अपने बिस्तर पर चले गए , नींद अब अपनी कहाँ थी वो भी सुबह होने का इंतज़ार कर रही थी । सुबह वो कमरे से बाहर आया तो मम्मी किचन में दोनों की चाय बना रही थीं । टेबल पर डोंगे में पराँठे रखे थे , पुरु ने हैरान होकर पूछा , मम्मी ये सुबह-सुबह आपने पराँठे भी बना दिए ?  रहने देतीं , वैसे ही आप रातभर परेशान रही हैं , मैं कुछ भी हल्का खा लेता । 

मम्मी ने थकी सी आवाज़ में कहा , मैंने नही बनाए हैं , सामने चौधरी आंटी ने भिजवा दिए , बेटे के हाथ । आलू के पराँठे हैं , कह रही थीं कि पुरु को पसंद हैं , बच्चा भागदौड़ कर रहा है , ठीक से खाना तो खाए । 

पुरु सुनकर चुपचाप तैयार होने चला गया , उन्हें जल्दी हॉस्पिटल पहुँचना था । गुप्ता अंकल ने बहुत कहने पर भी कार वापस नही ली थी , मम्मी को हॉस्पिटल लेकर जाता है , रख अभी ।

आज हॉस्पिटल पहुँचने पर डॉक्टर साहब ने पुरु को बताया कि उसके पापा के हार्ट में छोटा सा ब्लॉकेज है जिसे खोलना होगा । जिसके लिए बड़े ऑपरेशन की ज़रुरत नही केवल एक स्टिंट की सहायता से ठीक हो जाएगा । पुरु ने पूछा था , डॉक्टर साहब इसके लिए हमें क्या करना होगा , कितने पैसे जमा कराने होंगे ?

डॉक्टर ने हँसते हुए जवाब दिया था , पुरु ये सरकारी हस्पताल है , आपको केवल दवाईयों का खर्चा देना होगा ।

उस दिन पापा का वो ऑपरेशन कर दिया गया था , वो ठीक थे लेकिन एहतियात के तौर पर मिलने की परमिशन नही मिली थी । डॉक्टर ने कहा था कि दो-तीन दिन में रिकवरी हो जाएगी और उन्हें डिस्चार्ज कर देंगे । हॉस्पिटल से वो मम्मी को लेकर घर पहुँचता तो कोई ना कोई गाड़ी की आवाज़ सुनकर घर के बाहर उन दोनों के लिए खाने का टिफ़िन लेकर खड़ा होता , कभी खन्ना अंकल के घर से तो कभी पंडित जी के घर से । खिड़की खोल कर आंटियाँ मम्मी से पापा का हाल-चाल लेती रहतीं । उस दिन जब वो देर से घर लौटे तो गली में ख़ामोशी बिखरी थी । उनके घर के बाहर एक बड़ा सा खाने का टिफ़िन थैले में रखा था । पुरु देख रहा था कि मम्मी कई दिन की मानसिक थकान से बहुत कमज़ोर हो गईं थीं लेकिन गलीवालों का ये साथ उनके चेहरे पर मुस्कान ला देता था । सुबह तैयार होने लगे तो चौधरी अंकल का बेटा अभिषेक दूध भर कर ले आया , पुरु भाई दूध पिया कर अपने घर की भैंस का है , और सुन कोई जरुरत हो तो एकदम बताइयो , मैं परमिशन ले कै एकदम पहुँचा पाऊँगा ।

पुरु को , थैंक्यू भैया , कहने के अलावा फिर कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या कहे ? ये उसके कौन लगते थे , वो नही जानता था लेकिन जब से पैदा हुआ था तब से उन्हें देख रहा था । उसी गली में गिर-पड़ कर बड़ा हुआ था , हमेशा उसे उठाने मम्मी-पापा नही आते थे , उनमें से कोई भी आ जाता था । यही सोचता हुआ पुरु हॉस्पिटल पहुँच गया था , आज पापा से मिलने का दिन था । हॉस्पिटल के सैनेटाईज़ड कपड़े पहन कर पहले मम्मी गईं फिर पुरु , पुरु पापा को देखकर पल भर को दरवाज़े पर रुका , पापा का हाथ धीरे से उसे पास बुलाने के लिए उठा । वो स्टूल खैंचकर पापा के पास बैठ गया , मन उनसे बहुत कुछ कहने को कर रहा था लेकिन मौन था । डॉक्टर साहब ने बताया कि अब उसके पापा खतरे से बाहर हैं वो दो दिन में उन्हें घर ले जा सकते हैं । पुरु बस उनका चेहरा देखता रहा और वही दो शब्द निकले , थैंक्यू , डॉक्टर साहब ।

डॉक्टर ने मुस्कुरा कर कहा था , आई हैव डन माई ड्यूटी , यंग मैन ।

आज पुरु घर लौटते हुए बहुत हल्का महसूस कर रहा था । रात देर तक वो गली का दरवाज़ा खोलकर खड़ा रहा , आँखें बंद कर पिछले दिनों को टटोलता रहा । टिंकू के घर की खिड़की को मुस्कुरा कर देखता रहा ।

आज पापा को घर लाना था , पुरु के दिल में जैसे नई उर्जा आ गई थी । मम्मी ने उनका कमरा साफ़ कर दिया था । दोपहर में पापा को गुप्ता अंकल की गाड़ी से घर लाया तो गली के हर घर की खिड़की से मुस्कुराते चेहरे नज़र आ रहे थे । टिंकू ताली बजाता , दादा जी , दादा जी पुकार रहा था । पुरु की नम आँखें अपने शहर , अपनी गली , अपने परिवार को देख रही थीं , आज उसका सपना टूटा नही था ।