कर्मफल

आज बैठे बैठे एक विचार मन में आ रहा है । जिन परिस्थितियों से आज हम गुज़र रहे हैं ऐसे में इस तरह के विचार आना स्वाभाविक है । हम अक्सर कर्मों की बात करते हैं लेकिन उसका प्रत्यक्ष प्रमाण अब मिला । कुछ बड़ी विकट स्थिति में फंसे हैं तो कुछ सुरक्षित और कुशल हैं । मन में विचार आया कि क्या ये सब कर्मफल नहीं है ? कहीं कुछ तो हमने ऐसे कर्म किए होंगे जो आज ईश्वर ने हमें ऐसी स्थिति में रखा । हम परिस्थितिवश घरों में कैद होने पर मजबूर हो गए हैं ।  ऐसा लगता है कि जैसे वो ऊपरवाला हमें बहुत कुछ सिखाना चाहता है । इंसान जो अपने को सर्वशक्तिमान , बुद्धिमान और चांद-सूरज को वश में करने का दम भरता है ,एक वायरस के वश में फंसा है और राह नहीं सूझ रही है ! क्या हैं हम इस सृष्टि में ? निमित्त मात्र ! समझा दिया कि इंसान तू सर्वज्ञ नहीं । अभी बहुत कुछ है जो तू नहीं जानता , जो तुझे जानना बाकी है । हम सब अभी आधे-अधूरे हैं ।

पीपल

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न जाने कब से दिल में ये ख़त लिख रही थी लेकिन जीवन में कभी कोई मिल जाता है और दिल को ज़ुबान मिल जाती है । प्रतीक्षा ने सुंदर बना दिया , उसका आभार । सुनिए मेरी ये कहानी ।

चारू चंद्र की चंचल किरणें

चारू चंद्र की चंचल किरणें , खेल रही हैैं जल थल में ,
स्वच्छ चांदनी बिछी हुई है , अवनी और अंबरतल में
पुलक प्रकट करती है धरती , हरित तृणों की नोकों से
मानों झूम रहे हैं तरू भी , मन्द पवन के झोंको से।


कवि मैथिलीशरण गुप्त के काव्य ‘पंचवटी’ की इन पंक्तियां ने साहित्य में इतिहास रच दिया । इनका चमत्कार व्याकरण में अद्भुत उदाहरण है । बचपन से पढ़ते आए कि ये अनुप्रास अलंकार है । बस मज़े लेकर पढ़ते थे इन पंक्तियों को । लेकिन कहीं कवि के भाव सौंदर्य को समझने से वंचित रह गए थे। बहुत सी बातें समय के साथ ही समझ में आती हैं , खास कर साहित्य की गहराई ।
मुझे भी इन पंक्तियों का भाव सौंदर्य तब समझ में आया जब मेरी नातिन ऋष्वा पैदा हुई । जब मैंने उसे बढ़ते देखा , खेलते देखा , उसे प्यारी निर्मल बातें करते देखा , उसकी स्वच्छंद हंसी को देखा तो ये पंक्तियां जीवंत हो उठीं । ऐसा लगा मानों ये पंक्तियां कवि ने जैसे उसी के लिए लिखी हों ! फिर मुझे उसमें भाव सौंदर्य नज़र आया । ये भाव की ही बात है , किसी भी रचना के भाव को जानने के लिए समझना नहीं महसूस करना बहुत ज़रूरी है । मुझे ये बात समझने में बहुत समय लगा । अब हर रचना को आनंद से पढ़ती हूं ।

मेरी नातिन

मेरी नातिन के जन्मदिन पर मेरे उद्गार ।

अक्सर सोचती हूं मैं

तुमसे पहले कैसी थी ज़िन्दगी ?

जैसे पुराने थेगली लगे कपड़ों सी

स्वाद जैसे बिन नमक का अधपका खाना सा

हवाएं यूं ही मौसम सी बस बदलती रहीं

महसूस जैसे कुछ होती थी ही नहीं !

फिर अचानक तेरे आने की आहट मिली

मौसम कुछ बदला , लेकिन बेख़बर सा

एहसास कुछ बदला लेकिन बेहिसाब सा

फिर दबे पांव , घर के दरवाज़े से बासंती हवा सी तू भीतर आई ,

आंखों में तारे टिमटिमाती तू , घर की मुस्कान लाई ,

ज़िन्दगी भी नया रुप ले , रंग बिखराती आई ,

जैसे पकवानों की थाल हर स्वाद भर लाई

अब सोचती नहीं हूं मैं ,

बस तेरी एक मुस्कान से प्याला भर -भर पीती है ज़िन्दगी ।

सवेरा

किसने कहा कि बस अब गहरी अंधियारी रात है ?
इसकी न सुबह , न मदमाती किरण की आस है !
न भोर का तारा है , न उन्मुक्त आसमां की उड़ान है!
ये सांझ आई तो ज़रुर है साथ लंबी रात भी लाई तो ज़रुर है ।
क्या सूरज की आदत को नहीं जानती ?
उसके तेज़ दमकते स्वभाव को नहीं पहचानती ?
हर कण को चमका कर सोना बना दे ,
बिजली की तरंगें बन हैरां बना दे ।
हर रात को अपनी किरणों में नहला सवेरा बना दे ।
फिर कितनी ही लंबी क्यों न हो ये रात ,
इसके सामने कब तक ख़ैर मनाएगी ,
एक न एक दिन उल्टे पांव भागती नज़र आएगी ।
आखिर रात ही तो है ! भोर की किरण अपने आगे पाएगी ।
माला जोशी शर्मा

मेरा शहर , मेरी गली

 

 

पुरु हाईराईज़ बिल्डिंग की सबसे ऊपरी मंज़िल पर अपने ऑफ़िस के कैबिन में खड़ा खिड़की से स्क्रीन हटा कर नीचे देख रहा था । उसे लग रहा था मानो दुनिया उसके क़दमों में हो । उसने लंबी गहरी साँस लेकर अपनी कॉफ़ी की चुस्की ली तभी किसी ने उसके कैबिन का दरवाज़ा ज़ोर से खट-खटाया , एक झटके से उसके हाथ का कप छूटकर ज़मीन पर गिरा और खटाक की आवाज़ से कप टूटा । खटाक की तेज़ आवाज़ के साथ ही पुरु की आँख खुल गई , उफ़….फिर सपना ! ऐसा पहली बार नही हुआ था कि उसका सपना यूँ टूटा हो । बाहर उसके घर के आँगन में गली के बच्चे इसी तरह हंगामा करते थे , ज़रुर कोई गमला तोड़ा होगा । उन्हें उसके घर के जाल पर बैठे बंदरों की सेना के साथ मस्ती करनी होती थी क्योंकि किसी और के आँगन में ऐसा पुराना जाल नही था । पुरु को इस गली की , इस शहर की यही बात खलती थी कि ना समय देखते हैं और ना दूसरों का सोचते हैं । मुँह उठाए अपना घर समझ कर किसी के भी घर में चले आते हैं ! दिन भर गली में आंटियों की कटोरियाँ इस घर से उस घर में घूमती रहती हैं । कोई प्राइवेसी नाम का शब्द इनकी डिक्शनरी में है ही नही ! पता नही कब उसके सपने पूरे होंगे , कब वो इस गली और इस शहर से दूर जाएगा जहाँ उसकी अपनी ज़िंदगी होगी ! मम्मी – पापा की तो पूरी कोशिश है कि वो यहीं-कहीं नौकरी करे और घर में रहे । इंजीनियरिंग करने के बाद से पापा कितनी जान-पहचान से उसे यहीं नौकरी दिलवाने की कोशिश करते रहते हैं और वो बड़े शहरों की बड़ी कंपनियों में अपलाई करता रहता है । उसे पूरी उम्मीद है कि आज नही तो कल वो इस शहर को अलविदा कहेगा । उसे याद आया कि कल उसे दिल्ली जाना है एक इन्टरव्यू के लिए । मम्मी – पापा को अभी तक बताया भी नही है । पापा ऑफ़िस जाएँ इससे पहले वो जल्दी से उठ कर बाहर आया और बच्चों को आँखें दिखाता हुआ बोला , तुम्हारा स्कूल नही है क्या आज ?

टिंकू ने आँखें मटकाते हुए जवाब दिया , अरे भैया , आपको इतना भी नही पता , कोरोना वायरस फैला है इसलिए स्कूल की छुट्टी हो गई है ।

अरे , छुट्टी हुई है तो क्या सारा दिन इन बंदरों के साथ बंदर बने रहोगे ? चलो , अपने घर में बैठ कर पढ़ाई करो । कहते हुए पुरु ने उन्हें भगाया ।

मम्मी को ढूँढते हुए पुरु किचन में आया , मम्मी , पापा ऑफ़िस गए क्या ?

नहीं आज उनकी तबीयत कुछ ठीक नही इसलिए छुट्टी ली है । नाश्ता टेबल पर रखते हुए मम्मी ने चिंता से कहा , और सुन तू जल्दी से तैयार हो जा अपने पापा को डॉक्टर के ले जाना ।

क्या हो गया पापा की तबीयत को ? पुरु ने हैरानी से पूछा । मम्मी के जवाब से पहले ही  पीछे से पापा की आवाज़ आई , तुझे तैयार होने में देर लगेगी तो मैं खुद हो आऊँगा , मुझे आता है स्कूटर चलाना ।

नही पापा , मैं चलता हूँ ना , मैं दो मिनट में तैयार हो कर आया । आपकी तबीयत खराब है तो आप क्यूँ चलाएँगे स्कूटर ? कहते हुए वो तैयार होने भागा । वो जानता था कि उसके पापा कभी उससे किसी काम के लिए नही कहते थे और अपनी तबीयत तो कभी किसी को बताते ही नही थे । अगर उन्होंने कहा है कि तबीयत खराब है तो ज़रुर ज़्यादा ख़राब होगी । वो तैयार होकर स्कूटर निकालने लगा तो मम्मी ने आवाज़ लगाई , पुरु…, नाश्ता तो करले बेटा ।

नहीं मम्मी मैं आकर करता हूँ , पापा चलिए । कहते हुए उसने स्कूटर स्टार्ट किया और पापा ने उसके हाथ में हैल्मेट थमाया , इसके बिना स्कूटर नही चला सकता था , उसे इसी शर्त पर स्कूटर मिला था । पापा को सरकारी अस्पताल ही जाना होगा फिर भी उसने पूछ लिया , पापा कौन से डॉक्टर के जाना है ?

अपने गवर्मेंट हॉस्पिटल ही चलना है , हमारे परिवार का कार्ड बना हुआ है वहीं का । उन्होंने बड़े विश्वास से कहा लेकिन पुरु को पापा की ये बात ज़रा पसंद नही थी । भला कोई सरकारी अस्पताल में भी इलाज करवाता है ? वहाँ कौन डॉक्टर पेशेंट को सीरियसली लेता है ? लेकिन नही इन्हें तो वहीं जाना होता है , पता नही किसने कह दिया इन्हें कि सरकारी अस्पताल में डॉक्टर बहुत काबिल होते हैं , बेकार की बात । वो रास्ते में यही सोचता रहा तभी अस्पताल आ गया , तू स्कूटर पार्क कर मैं लॉबी में मिलता हूँ । कहते हुए पापा अंदर चले गए थे , पुरु पापा को देख रहा था कि आज उनकी चाल में वो तेज़ी नही थी । उसे पापा की फ़िक्र हो रही थी , उस पर ये सरकारी अस्पताल । वो जल्दी से पार्किंग से निकल कर लॉबी में पहुँचा । पापा लाईन में डॉक्टर का इंतज़ार कर रहे थे । बारी आई तो डॉक्टर ने जाँच कर बताया , शर्मा जी आपका बीपी बहुत बढ़ गया है , आप दवाईयाँ समय पर ले रहे हैं ना ? कुछ और टैस्ट करेंगे लेकिन आज आप ये दवाईयाँ शुरु कीजिए और कुछ दिन आराम करिए ।    

पुरु को पता था कि उन्हें बीपी की शिकायत रहती है लेकिन उसकी नज़र में सब ठीक ही था । रास्ते में पुरु ने कुछ अटकते हुए अपना मश्वरा दिया , पापा मुझे लगता है आपको किसी और प्राईवेट अस्पताल में भी दिखा लेना चाहिए । पता नही इन डॉक्टरों पर मुझे विश्वास सा नही होता , आप कहें तो पता करुँ कहीं दिल्ली में ?  

ऐसा कुछ नही है पुरु , यहाँ सब बढिया है , तुझे तो यूँही वहम है । पापा ने उसे झिड़की दीगली में घुसते ही पुरु समझ गया कि समाचार घर से बाहर आ चुका था , घर के बाहर गुप्ता अंकल , चौधरी अंकल पहरा दे रहे थे , अब हो जाएगी शुरु पूछताछ , शर्मा जी सब ठीक तो है ? कुछ परेशानी तो नही ना ? आपने बताया नही कि तबीयत ठीक नही ?

नहीं कुछ खास नही , थोड़ा , यूँही बीपी बढ़ गया था , दवाई ले ली है , एक-दो दिन में नॉरमल हो जाएगा । पापा ने बात को आई-गई करते हुए हँस कर कहा ।

चलिए टीवी खोल लीजिए प्रधानमंत्री जी कोई घोषणा करने वाले हैं कोरोना वायरस को लेकर । गुप्ता जी ने अपने घर में जाते हुए हाथ हिलाया ।

पापा के अंदर आने से पहले ही पुरु मम्मी को डॉक्टर की सारी रिपोर्ट दे चुका था । मम्मी पापा पर बरस पड़ीं , आप अपनी दवाईयाँ लेना भी भूल जाते हैं ? ये तो हद है , बस ऑफ़िस याद रहता है , अपनी सेहत नही ।

पापा ने मम्मी की बातों से बचने के लिए टीवी खोल लिया , उसपर ब्रेकिंग न्यूज़ थी कि आज रात से लॉकडाऊन शुरु हो रहा है जिसका पालन सख़्ती से किया जाएगा । बस फिर क्या था टॉपिक पापा की सेहत से बदल कर लॉकडाऊन पर आ गया था । पुरु के मन में अपने कल के इंटरव्यू को लेकर सवाल खड़े हो गए थे । मेल आ चुका था कि इंटरव्यू अनिश्चित समय के लिए आगे हो गया है । एक बार फिर उसका भविष्य इस लॉकडाउन के साथ अनिश्चितकाल के लिए लॉक हो गया था । वो अपने कमरे में मायूस बैठा अपने फ़ोन पर लगा था , उसे पता ही नही चला कि कब पापा उसके पीछे आकर खड़े हो गए थे , क्या हुआ पुरु ? आज तुम अपने कमरे से बाहर ही नही निकले ? सब ठीक तो है ?    

कुछ नही पापा , इस लॉकडाऊन के चक्कर में मैं दिल्ली नही जा पाऊँगा , मेरा इन्टरव्यू चला गया । पुरु ने उदास मन से कहा ।

तो क्या हुआ , यहाँ पानीपत में नौकरियों की कमी है क्या ? तूने टैक्सटाइल इंजीनियरिंग की है , यहाँ कमी नही तेरे लिए , कितनी बार कहा कि यहाँ अप्लाई कर । कहते हुए पापा बाहर चले गए लेकिन उन्होंने पुरु का जवाब नही सुना जो वो उनसे कभी नही कह पाया था ।

नही करनी मुझे यहाँ नौकरी , नही रहना मुझे यहाँ , इस गली में । वो सिर्फ़ बुदबुदाया था , पापा को सुनाना नही चाहता था ।

लॉकडाऊन को दो-तीन दिन हो गए थे , पुरु की नींद और सपनों में अब कोई बाधा नही थी , मम्मी , कितनी शांति है जीवन में ।

चल पागल , ऐसी शांति भी किस काम की ? ये पड़ौस , ये गली हमारा परिवार है । मम्मी ने उसे झिड़कते हुए कहा । पापा पूरी तरह से टीवी के सामने समय बिताते , मम्मी का गली परिवार शांत बैठा था , हर तरह की आवा-जाई पर विराम लग गया था । पुरु अपने दोस्तों से फ़ोन पर लगा रहता , उस दिन रात को खाना खा कर सब जल्दी सोने चले गए थे । पुरु सोया नही था , वो अपने दोस्तों के साथ चैट पर लगा हुआ था । क्या करते , मिलने पर पाबंदी थी , तभी मम्मी घबराई हुई उसके कमरे में आईं , पुरु , तेरे पापा की तबीयत ज़्यादा खराब है , उन्हें घबराहट हो रही है । जल्दी से डॉक्टर को फ़ोन लगा , लगता है हॉस्पिटल ले जाना पड़ेगा ।

पुरु ने हॉस्पिटल के पेपर्स से डॉक्टर का नंबर लेकर मिलाया , घंटी बज रही थी लेकिन नही उठाया तो पुरु की परेशानी बढ़ गई ,

कहा था किसी प्राईवेट डॉक्टर को दिखा लो , अब ये फ़ोन नही उठा रहे । मैं पापा को कहीं और लेकर जाता हूँ ।

मम्मी ने उसे शांत करते हुए कहा , पुरु , एक बार और लगा बेटा , वो पापा का इलाज कर रहे हैं , जानते हैं क्या करना है ।

पुरु टैंशन में था फिर भी मम्मी के कहने पर फिर फ़ोन मिलाया तो इस बार घंटी बजते ही डॉक्टर ने फ़ोन उठा लिया । बात सुनकर उसने तुरंत हॉस्पिटल पहुँचने को कहा । पापा को संभाला लेकिन ऐसी हालत में उन्हें स्कूटर पर नही ले जाया जा सकता था । वो परेशानी में कुछ समझ नही पा रहा था , मम्मी इस समय अगर एंबुलैंस बुलाएँगे तो देर हो जाएगी , पापा को जल्दी लेकर जाना होगा लेकिन कैसे ?

मम्मी ने ऐसे में एकदम से कहा , जा पुरु सामने गुप्ता अंकल की गाड़ी माँग ला जल्दी से , देर मत कर ।

पुरु पल भर को सोच में पड़ गया ,अपनी गाड़ी कोई कैसे देगा मुझे ?

पुरु सोच मत , जल्दी जा , मम्मी पापा को संभालते हुए बोलीं ।

पुरु ने तेज़ी से निकल कर गुप्ता अंकल के घर की घंटी बजाई , उसका हाथ घंटी पर ही था कि गुप्ता जी हैरान बाहर आए , क्या हुआ पुरु ?

अंकल पापा की तबीयत अचानक बहुत ख़राब हो गई है , उन्हें हॉस्पिटल लेकर जाना है , आपकी गाड़ी मिल सकती है ? पुरु घबराया हुआ , कुछ शंकित सा बोल रहा था । गुप्ता जी दौड़कर भीतर गए और चाबियों का गुच्छा उसे थमाते हुए बोले , बेटा मैं भी चलता हूँ साथ में , तू अकेला पड़ जाएगा ।

नही अंकल मम्मी हैं साथ में , फिर ज़्यादा लोग होंगे तो पुलिस भी रोकेगी । पुरु ये कहता हुआ निकल गया । हॉस्पिटल घर से अधिक दूर नही था , यूँ भी सड़कें खाली थीं वो जल्द ही पहुँच गए । डॉक्टर उनकी इंतज़ार कर रहा था , पापा को स्ट्रैचर पर लिटाया और तुरंत डॉक्टर उन्हें अंदर ले गए , मम्मी और पुरु को बाहर ही रोक दिया था । दोनों बाहर कॉरिडोर में बेचैनी से चक्कर लगा रहे थे , पुरु कभी – कभी कनखिंयों से मम्मी को देख लेता था । वो कभी बैठतीं फिर दो पल बाद उठकर इधर से उधर घूमते हुए जहाँ पुरु के पापा को लेगए थे उस कमरे की ओर नज़र उठा कर देख लेतीं थीं । पुरु बार-बार घड़ी देख रहा था , पूरा एक घंटा हो गया था पापा को अंदर गए हुए । उसका मन न जाने क्या-क्या सोच रहा था और दिल कितनी शंकाओं से घिरा , दिमाग़ में हलचल मचा रहा था , कदम उसी गति में घूम रहे थे । जब डॉक्टर बाहर आया तो पुरु दौड़ता हुआ उनके पास आया , डॉक्टर साहब पापा , कैसे हैं ?   

डॉक्टर ने लंबी साँस लेते हे पुरु की ओर देखकर कहा , बहुत समय पर ले आए , उन्हें माइल्ड हार्ट-अटैक आया था , अब स्टेबल हैं लेकिन आई सी यू में रखना पड़ेगा , कुछ घंटे नाज़ुक हैं । आप लोग अभी नही मिल सकते , उन्हें रैस्ट करने दें ।

डॉक्टर साहब ये कह कर चले गए लेकिन पुरु और मम्मी खड़े आई सी यू की ओर देखते रहे । ड्यूटी पर खड़ी नर्स ने पास आकर कहा , पेशेंट से तो आप नही मिल सकते , फिर इधर खड़े होकर क्या करने का है ? इधर ऑडर है कि किसी को हॉस्पिटल में रुकने नही देने का । आप लोग घर जाइए , हम हैं ना इधर पेशेंट के लिए ।

पुरु ने देखा मम्मी अभी भी आई सी यू वाले कमरे की ओर नज़रें टिकाए थीं । उसने उनका हाथ पकड़ कर कहा , मम्मी , चलते हैं , कल सुबह आएँगे । डॉक्टर ने बोला ना कि पापा अब ठीक हैं , वो तो उनके लिए ही हमें मिलने नही दे रहे , डिस्टर्ब होते हैं ना ।    

दोनों वापस घर आने लगे तो रास्ते में सन्नाटा पसरा था । जिस शहर का गाड़ियों के शोर और धुएँ से दम घुट रहा था वो अब गहरी साँसें ले रहा था । यदा-कदा पुलिस का सायरन दिल की धड़कनें बढ़ा रहा था । घर पहुँचे , रात काफ़ी हो चुकी थी लेकिन फिर भी गुप्ता जी खिड़की खोले बाहर झाँक रहे थे , शायद उन्हीं का इंतज़ार कर रहे थे । पुरु ने खिड़की से ही उन्हें चाबी पकड़ाना चाहा , अंकल , आप सोए नही ? गाड़ी की चाबी , थैंक्यू ।

अरे चाबी छोड़ , ये बता तेरे पापा कैसे हैं ? भला ऐसे में नींद किसको आती है ?  कहते हुए वो बाहर आ गए , बेटा तू गाड़ी की चाबी अपने पास रख , तुझे चाहिए होगी , अब लॉकडाउन में मैं कहाँ जा रहा हूँ !

पुरु बस इतना कह पाया , थैंक्यू अंकल ।

घर भी गुमसुम सा था , दोनों अपने-अपने बिस्तर पर चले गए , नींद अब अपनी कहाँ थी वो भी सुबह होने का इंतज़ार कर रही थी । सुबह वो कमरे से बाहर आया तो मम्मी किचन में दोनों की चाय बना रही थीं । टेबल पर डोंगे में पराँठे रखे थे , पुरु ने हैरान होकर पूछा , मम्मी ये सुबह-सुबह आपने पराँठे भी बना दिए ?  रहने देतीं , वैसे ही आप रातभर परेशान रही हैं , मैं कुछ भी हल्का खा लेता । 

मम्मी ने थकी सी आवाज़ में कहा , मैंने नही बनाए हैं , सामने चौधरी आंटी ने भिजवा दिए , बेटे के हाथ । आलू के पराँठे हैं , कह रही थीं कि पुरु को पसंद हैं , बच्चा भागदौड़ कर रहा है , ठीक से खाना तो खाए । 

पुरु सुनकर चुपचाप तैयार होने चला गया , उन्हें जल्दी हॉस्पिटल पहुँचना था । गुप्ता अंकल ने बहुत कहने पर भी कार वापस नही ली थी , मम्मी को हॉस्पिटल लेकर जाता है , रख अभी ।

आज हॉस्पिटल पहुँचने पर डॉक्टर साहब ने पुरु को बताया कि उसके पापा के हार्ट में छोटा सा ब्लॉकेज है जिसे खोलना होगा । जिसके लिए बड़े ऑपरेशन की ज़रुरत नही केवल एक स्टिंट की सहायता से ठीक हो जाएगा । पुरु ने पूछा था , डॉक्टर साहब इसके लिए हमें क्या करना होगा , कितने पैसे जमा कराने होंगे ?

डॉक्टर ने हँसते हुए जवाब दिया था , पुरु ये सरकारी हस्पताल है , आपको केवल दवाईयों का खर्चा देना होगा ।

उस दिन पापा का वो ऑपरेशन कर दिया गया था , वो ठीक थे लेकिन एहतियात के तौर पर मिलने की परमिशन नही मिली थी । डॉक्टर ने कहा था कि दो-तीन दिन में रिकवरी हो जाएगी और उन्हें डिस्चार्ज कर देंगे । हॉस्पिटल से वो मम्मी को लेकर घर पहुँचता तो कोई ना कोई गाड़ी की आवाज़ सुनकर घर के बाहर उन दोनों के लिए खाने का टिफ़िन लेकर खड़ा होता , कभी खन्ना अंकल के घर से तो कभी पंडित जी के घर से । खिड़की खोल कर आंटियाँ मम्मी से पापा का हाल-चाल लेती रहतीं । उस दिन जब वो देर से घर लौटे तो गली में ख़ामोशी बिखरी थी । उनके घर के बाहर एक बड़ा सा खाने का टिफ़िन थैले में रखा था । पुरु देख रहा था कि मम्मी कई दिन की मानसिक थकान से बहुत कमज़ोर हो गईं थीं लेकिन गलीवालों का ये साथ उनके चेहरे पर मुस्कान ला देता था । सुबह तैयार होने लगे तो चौधरी अंकल का बेटा अभिषेक दूध भर कर ले आया , पुरु भाई दूध पिया कर अपने घर की भैंस का है , और सुन कोई जरुरत हो तो एकदम बताइयो , मैं परमिशन ले कै एकदम पहुँचा पाऊँगा ।

पुरु को , थैंक्यू भैया , कहने के अलावा फिर कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या कहे ? ये उसके कौन लगते थे , वो नही जानता था लेकिन जब से पैदा हुआ था तब से उन्हें देख रहा था । उसी गली में गिर-पड़ कर बड़ा हुआ था , हमेशा उसे उठाने मम्मी-पापा नही आते थे , उनमें से कोई भी आ जाता था । यही सोचता हुआ पुरु हॉस्पिटल पहुँच गया था , आज पापा से मिलने का दिन था । हॉस्पिटल के सैनेटाईज़ड कपड़े पहन कर पहले मम्मी गईं फिर पुरु , पुरु पापा को देखकर पल भर को दरवाज़े पर रुका , पापा का हाथ धीरे से उसे पास बुलाने के लिए उठा । वो स्टूल खैंचकर पापा के पास बैठ गया , मन उनसे बहुत कुछ कहने को कर रहा था लेकिन मौन था । डॉक्टर साहब ने बताया कि अब उसके पापा खतरे से बाहर हैं वो दो दिन में उन्हें घर ले जा सकते हैं । पुरु बस उनका चेहरा देखता रहा और वही दो शब्द निकले , थैंक्यू , डॉक्टर साहब ।

डॉक्टर ने मुस्कुरा कर कहा था , आई हैव डन माई ड्यूटी , यंग मैन ।

आज पुरु घर लौटते हुए बहुत हल्का महसूस कर रहा था । रात देर तक वो गली का दरवाज़ा खोलकर खड़ा रहा , आँखें बंद कर पिछले दिनों को टटोलता रहा । टिंकू के घर की खिड़की को मुस्कुरा कर देखता रहा ।

आज पापा को घर लाना था , पुरु के दिल में जैसे नई उर्जा आ गई थी । मम्मी ने उनका कमरा साफ़ कर दिया था । दोपहर में पापा को गुप्ता अंकल की गाड़ी से घर लाया तो गली के हर घर की खिड़की से मुस्कुराते चेहरे नज़र आ रहे थे । टिंकू ताली बजाता , दादा जी , दादा जी पुकार रहा था । पुरु की नम आँखें अपने शहर , अपनी गली , अपने परिवार को देख रही थीं , आज उसका सपना टूटा नही था ।

 

संस्कार

देहरादून की उत्सव विहार कॉलोनी सुबह शंखनाद और घंटी की आवाज़ से गूंज उठती थी । अपने घर में जोशी जी धर्म और संस्कारों के रक्षक थे , विवाह-रीति रिवाज़ों पर पुस्तक लिखी थी और समाज में सम्मानित भी किए गए थे । ऑस्ट्रेलिया प्रवासी पुत्र ने उनके तथाकथित संस्कारों को ताक पर रख विदेशी लड़की से विवाह किया तो उनके सम्मान को गहरा आघात लगा और उन्होंने देश से निकले पुत्र को दिल से भी निकाल दिया । उन्होंने तो बेटे से नाता तोड़ने की बात कह दी लेकिन माँ का दिल ये भला कैसे मानता इसलिए उनका नाता बेटे से बना रहा । उस दिन जोशी जी शाम की आरती के बाद ड्रॉइंगरुम में बैठे कोई किताब पढ़ रहे थे कि पत्नी ने प्लेट में लड्डू लाकर रख दिए । देखते ही पूछा , आज ये लड्डू किस खुशी में ?  

पत्नी ने कानों तक मुस्कुराते हुए कहा , बधाई हो आप दादा बन गए हैं । नितिन का फ़ोन आया था कि बेटी हुई है ।

जोशी जी ने धीरे से प्लेट आगे खिसकाते हुए कहा , आप मनाइए खुशियाँ , हमारा इससे कोई लेना देना नही ।

अब जो हो गया उसे ख़त्म भी कीजिए , अपनी पोती को नही देखना है क्या ? तुम्हें तो कितनी चाह थी बेटी की , चलो बेटी न हुई तो ईश्वर ने पोती देदी । नितिन ने टिकिट भेजी है हमें बुलाया है । मिसेज जोशी अपनी मन की बात पति से एक साँस में कह गईं । इस बार जोशी जी नाराज़गी से ऊँची आवाज़ में बोले , क्या कहा ? टिकिट भेज दी है ! लेकिन किस से पूछ कर ? हम कहीं नही जा रहे ।

अब इतना भी गुस्सा किस काम का , बेटा है अपना , हमें बुलाना चाहता है , मेरे लिए चलिए । मिसेज जोशी ने उन्हें मनाने की कोशिश नही छोड़ी । आखिर एक-दो दिनों में अपना वास्ता देकर उन्हें मना ही लिया लेकिन एक शर्त पर कि दो सप्ताह से अधिक नही रहेंगे और ये कहना नही भूले , देखो , मैं सिर्फ़ तुम्हारे लिए जा रहा हूँ , मुझसे और उम्मीद मत रखना ।

नहीं रखूँगी , आप मेरे लिए चल रहे हैं , यही बहुत है । कहते हुए मिसेज जोशी जाने की तैयारी में लग गईं । बहु के लिए साड़ी , पोती के लिए कपड़े रखना नही भूलीं थीं , लड्डू ले जा नही सकते तो सोचा वहीं बना दूँगी । मिसेज जोशी सारे रास्ते पोती का सोच कर मन गुदगुदाती रहीं तो कभी आँखों के पानी में उसका चेहरा देखती रहीं । बहु और पोती दोनों को पहली बार जो मिल रही थीं । मैलबर्न एयरपोर्ट पर पहुँचे तो चैकिंग में बहुत समय लग गया क्योंकि कोरोना वायरस के चलते सख़्ती बढ़ रही थी । नितिन उन्हें लेने आया था , वहाँ के शनिवार की सुबह थी । बेटे को देखते ही माँ का दिल सारी नाराज़गी भूल गया था वो बेटे से पूरे तीन साल बाद मिल रहे थे । जोशी जी ने अधिक उत्साह नही दिखाया , नितिन ने पैर छूए तो , ठीक है , ठीक है , कह कर आगे बढ़ गए थे । गाड़ी में जोशी जी पीछे ही बैठे , नितिन रास्ते में गाड़ी चलाते हुए साथ बैठी माँ को देखता और मुस्कुरा देता । रास्ते की जानकारी देते हुए कहता , पापा , ये देखिए ये यहाँ की सी बी डी है यानि सैंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट , आएँगे हम घूमने यहाँ । अपना घर GLEN WAVERLY में है वो थोड़ा बाहर निकल कर है ।

नितिन ने अपना कहा था मेरा नही , जोशी जी खामोश बैठे कोई जवाब नही दे रहे थे वो खिड़की से बाहर नज़रें टिकाए थे । बेटा जानता था कि उनकी नाराज़गी बेवजह नही थी उसने सोचा था कि शादी कर लूँगा तो बाद में सब ठीक हो जाएगा । वो शादी के बाद क्रिस्टीन को लेकर मम्मी-पापा से मिलवाना चाहता था लेकिन पापा ने साफ़ मना कर दिया था कि उसे यहाँ लाने की कोई ज़रुरत नही है । थोड़ी देर में वो घर पहुँच गए थे । छोटा सा घर , आगे छोटा सा लॉन , जिसमें सुंदर रंग-बिरंगे गुलाब खिले थे , वरांडे में लटकते गमलों से फूलों की लड़ियाँ झूल रही थीं । गाड़ी की आवाज़ सुनते ही पजामा और टीशर्ट पहने , सुनहरी बालों की लंबी सी चोटी बाँधे एक प्यारी सी लड़की भाग कर आई । उसने आते ही झुक कर जोशी जी के पैर छुए तो जोशी जी बिदक कर दो कदम पीछे सरक गए । शायद ये उनकी आशा के विपरीत था , लड़की थोड़ी सहम गई । मिसेज जोशी के पैर छूने लगी तो उन्होंने उसे गले से लगा लिया । नितिन बोला , ये क्रिस्टीन है , आपकी बहू ।

तीन बैडरुम वाला घर , ड्रॉइंगरुम से जुड़ी किचन , सब कुछ बड़े सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया था । दोनों की नज़रें चारों ओर घूमी तो देखा कोने पर रखी एक टेबल पर उन दोनों की तसवीर रखी थी जिसमें छोटा सा नितिन जोशी जी की गोदी में था । जोशी जी उस तसवीर को देखते हुए कहीं खो गए थे । नितिन ने आवाज़ लगाई , पापा , मम्मी आपका कमरा ये है , आप पहले फ़्रैश हो जाइए फिर कुछ खा कर आराम कीजिए ।  

नितिन उन्हें उनके कमरे में ले गया , दोनों नहा धो कर बाहर आए तो क्रिसटीन की रसोई से आवाज़ आई , पापा-मम्मी आपकी चाय ।

जोशी जी और पत्नी ने हैरानी से उसे देखा तो वो मुस्कुरा दी , नितिन हँस कर बोला , शादी के बाद से इसने मुझसे हिंदी सीख ली है , बहुत नही पर थोड़ी समझ-बोल लेती है ।

लंबे सफ़र के बाद चाय की तलब तो उन्हें हो रही थी लेकिन अपनी तरह की चाय । मिसेज जोशी की नज़रें कुछ और ही ढूँढ रही थीं । क्रिसटीन ने टेबल पर चाय – बिस्कुट रखे और अंदर चली गई । जोशी जी ने चाय को घूरते हुए एक घूँट भरी तो उनकी सिकुड़ी आँखें फैल गईं लेकिन न बोलने की जैसे वो ठान कर आए थे । मिसेज जोशी चाय की खुशबू लेते हुए बोलीं , अरे , नितिन इसने हमारे जैसी चाय बनानी भी सीख ली ?  

नितिन मुस्कुरा कर रह गया , तभी अंदर से आती मीठी सी किलकारी की आवाज़ उनके कानों में पड़ी तो उनकी नज़रें उस ओर घूम गईं । क्रिस्टीन छोटी सी हिलती-डुलती कपड़े की पोटली को लेकर उनके पास आई और मिसेज़ जोशी की गोद में देते हुए बोली , दादी , आपकी पोती ।

दादी तो जैसे गंगा में डुबकी लगा गईं थीं , मुस्कुराते होठों को उसके माथे पर रख कर दो बूँद से उसे भी नहला दिया था । जोशी जी तिरछी निगाहों से उस नन्हीं सी पोटली को और पत्नी के प्रेम को देख रहे थे । मिसेज़ जोशी ने स्नेह से उसकी नन्हीं उंगलियों को छूते हुए पूछा , इसका नाम क्या रखा ?

नितिन ने जवाब दिया , वो तो आप का इंतज़ार कर रही थी कि कब उसके दादा-दादी आएँगे और इसका नाम रखेंगे । अब आराम से सोच कर रखिए इसका नाम , हम तो हर रोज़ कुछ भी कह कर पुकारते रहते हैं ।

क्रिस्टीन ने बच्ची को लेते हुए कहा , आप , रैस्ट करें ।

मार्च का महीना था , हल्की-हल्की ठंड शुरु हो गई थी । उनके लिए कमरे में हर सुविधा की चीज़ रखी थी , यहाँ तक कि साइड टेबल पर एक ट्रांज़िस्टर भी रखा था । जोशी जी रेडियो के शौकीन थे उन्होंने उसे उलट-पलट कर देखा और वापस रख दिया । थके हुए थे , बिस्तर पर लेटते ही दोनों की आँख लग गई । उठे तो दोपहर के दो बज रहे थे , मिसेज़ जोशी बाहर आईं तो देखा बेटा-बहू खाने की तैयारी कर टेबल लगा रहे थे , उन्हें देखते ही क्रिस्टीन बोली , , मम्मी , प्लीज़ कम , खाना खाइए ।

नितिन भी बोला , मम्मी , नींद आई अच्छे से कि नही ? पापा उठ गए क्या ?

नींद तो ऐसी आई कि पता ही नही चला कि दिन है कि रात , तेरे पापा भी उठ ही गए हैं , कहते हुए वो , जोशी जी को बुला लाईं । जोशी जी बड़े अनमने से खाने की टेबल पर बैठे थे , सोच रहे थे कि पता नही क्या खिलाएँगे ये । देखा तो दाल , चावल और आलू गोभी की उनकी पसंद की सब्ज़ी बनी थी । उन्होंने पत्नी की तरफ़ देखा तो वो जानबूझ कर बोलीं , अरे नितिन तू तो बढ़िया खाना बनाने लगा बेटा ।

माँ मैंने तो सिर्फ़ चावल बोइलर में डाले थे बाकी तो आपकी बहू का ही कमाल है । नितिन ने शर्माती हुई क्रिस्टीन को देखकर कहा । बात इसी तरह माँ-बेटे की चलती रहती और जोशी जी इधर-उधर देख कर बातों को अनसुना करने की कोशिश करते रहते । वो सोच रहे थे कि किसी तरह ये दो हफ़्ते कट जाएँ और पीछा छूटे । उनका मंदिर उनके कमरे में अस्थाई रुप से स्थापित हो गया था । शिकायत से पत्नी को सुनाया , देख लिया तुमने , इस नास्तिक ने घर में देव स्थान का एक कोना तक नही बनाया । 

पत्नी उनकी सोच को बदलने के प्रयास में जुटी थीं , उसने ना बनाया तो ना सही , आपने बना दिया ना एक कोना देव स्थान का ।

जोशी जी ने माथा सिकोड़कर पत्नी की ओर देखा और पूजा में लग गए । नितिन ने कुछ दिन की छुट्टी ले ली थी , दादी अपनी पोती को खिलाने में लगी रहतीं , छुटकी रानी , आपका क्या नाम रखें हम । देख नितिन इसका माथा तेरे जैसा है और हल्की नीली आँखें अपनी माँ जैसी हैं । 

जोशी जी आस-पास मंडराते उसे दूर से देखते रहते लेकिन गोद में लेने से कतराते पास बैठे टीवी पर हिंदुस्तान की ख़बरें लगा कर सुनते रहते । समाचारों से पता चला कि पूरी तरह से लॉकडाउन हो गया है और हर देश ने इंटरनैशनल फ़्लाइट्स को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया है । ये सुनते ही जोशी जी की बेचैनी बढ़ गई , हे ईश्वर ये क्या मुसीबत आ गई ! अब तो वापस जाना मुश्किल हो गया !  उन्होंने पत्नी को ऐसे देखा मानों सारा दोष उन्हीं का हो । गुस्सा किस पर था पता नही लेकिन वो उठ कर अपने कमरे में चले गए । घर में तनाव का सा माहौल हो गया , नितिन और क्रिस्टीन पापा को देख कर परेशान दिखे तो मिसेज़ जोशी ने आँखें झपकाकर हाथ का इशारा किया कि चिंता मत करो । वो बेटे-बहू को अपने कारण परेशान होते देख छुटकी को उसकी माँ की गोद में दे अपने कमरे में गईं , पति के पास बैठ कर बोलीं , आप जानते हैं कि इस स्थिति पर हमारा वश नही है , ईश्वर की यही मरज़ी थी मान कर शांति से रहिए । क्यों परेशान होते हैं , हमारे ऐसा करने पर घर में तनाव हो जाता है , वो पराई लड़की क्या सोचेगी भला !

जोशी जी कुछ नही बोले , उनके भीतर सावन के बादलों की तरह सवाल उमड़ रहे थे जिनके जवाब सिर्फ़ उनके बेटे के पास थे लेकिन कैसे पूछें ? पिता का अहम् आड़े आ रहा था । जानते थे कि उस लड़की का कोई दोष नही लेकिन उसी के कारण बेटे ने उनका सम्मान ताक पर रख दिया था , सारे संस्कार भूल गया । पोती को देख कर उसे गोद में लेने को उनका भी दिल मचलता है फिर विचार आता है कि ऐसा करने पर उन्हें माफ़ कर देना होगा ! वो ऐसे हालात में फंस जोएँगे कि उन्हें इतने लंबे समय तक यहाँ रहना पड़ेगा ये तो उन्होंने सपने में भी नही सोचा था । ये समय उन्हें किसी सज़ा के समान लग रहा था ।

इधर नितिन के मन में भी शांति नही थी , उसे पल-पल पापा की ख़ामोशी तकलीफ़ दे रही थी । उसने अपने पापा को दुख पहुँचाया है , क्या करे कि उनका मन दुखी न हो । क्रिस्टीन भी अपने को उनकी नाराज़गी का कारण मान कर परेशान थी । उन दोनों ने सोचा था कि पोती को देख कर सब ठीक हो जाएगा लेकिन ऐसा नही हुआ था ।

नितिन के घर के सामने एक बहुत बड़ा मैदान था जहाँ अब महामारी के चलते लोग घूमने नही आ रहे थे । उस मैदान के चारों ओर बड़े-बड़े युकलिप्टिस के पेड़ थे , ये पेड़ ऑस्ट्रेलिया की खासियत भी हैं । जोशी जी एक दिन सुबह उठ कर सामने मैदान में घूमने निकल गए । ठंडी हवा के झोंके से पूरे वातावरण में युकलिप्टिस की महक फैल रही थी । सफ़ेद विशाल तने , हल्के हरे कोमल पत्तों की टहनियों के बीच छोटी-छोटी घंटियों जैसे लाल फूल अनोखे लग रहे थे । अलग-अलग रंगों ने मिलकर कितनी सुगंध फैला दी थी । जोशी जी के मन में वो सुगंध धीरे-धीरे उतर रही थी , वो वहीं बैंच पर बहुत देर तक बैठे रहे । घर पहुँचे तो पत्नी उठ कर चाय बना रहीं थीं , वो अब यहाँ की आदत में अपने को ढाल रही थीं और किचन में अपना योगदान देने लगीं थीं । जोशी जी को देखकर वो मुस्कुराते हुए बोलीं , आज आप सामने घूमने गए , बहुत अच्छा किया , कल से मैं भी चलूँगी ।  

वो अभी चाय बना ही रहीं थीं कि क्रिस्टीन भी छुटकी का दूध बनाने आ गई , उन्होंने उससे पूछ लिया , अरे क्रिस बेटा तुम उठ गईं ?

क्रिस्टीन उन्हें हल्की सी मुस्कान से देखकर बोली , योर पोती चुटकी वेक मी ।

चाय पीयोगी हमारी वाली ? देखो मैंने तुम्हारा नाम छोटा कर दिया तुम्हें बुरा तो नही लगा ? कहते हुए उन्होंने क्रिस्टीन के भाव जानने के लिए उसकी ओर देखा ।

क्रिस्टीन ने हँसते हुए कहा , नो , मम्मी , अच्छा है । मैं भी चाय पीयूँगी । यू नो , मेरी मम्मी मुझे यही कहती थीं । कहते हुए वो कुछ उदास हो गई थी ।

क्रिस्टीन अंदर छुटकी का दूध देकर बाहर आई और उन दोनों के साथ बैठकर चाय पीने लगी । जोशी जी ने आज पहली बार उसे नज़र उठा कर देखते हुए सवाल किया , कहाँ रहते हैं तुम्हारे मम्मी – पापा ?  

उसकी नीली बड़ी-बड़ी आँखों में पानी तैर गया और पल भर रुक कर बोली , अं…, दे आर नो मोर ।

सुनते ही एक पल को सब चुप हो गए फिर जोशी जी बोले , ओह , ओई एम सॉरी ।

जोशी जी उठकर अपने कमरे में चले गए , नितिन छुटकी को लेकर बाहर आया तो सब उसी में उलझ गए । नितिन ने मम्मी से पूछा , पापा आज बाहर सैर करने गए थे ?

हाँ , आज निकले हैं घर से , कल से मैं भी जाऊँगी उनके साथ । मिसेज़ जोशी ने कहा ।

बस सामने ही घूमना , कहीं दूर मत जाना । नितिन मम्मी को समझा रहा था जैसे वो कभी बचपन में उससे कहा करती थीं । मम्मी ने भी हाँमी में सिर हिलाया । तभी उसने कुछ सोचकर फिर कहा , वैसे मैं भी चलूँगा आपके साथ कल ।

क्रिस्टीन उसका चेहरा देख रही थी वो जानती थी कि उसके पापा नाराज़ हैं लेकिन ये सब कैसे ठीक होगा ये उसकी समझ में नही आ रहा था । उसने नितिन से कहा था , why don’t you talk to your father and say sorry !

नितिन ने कहा था कि ये सब इतना आसान नही है , वो बात तक करने को तैयार नही , ऐसे में मैं कैसे समझाऊँ उन्हें ।

उस दिन मिसेज़ जोशी दिनभर किचन में बहू के लिए गूँद के लड्डू बनाने में लगी रहीं । क्रिस्टीन ने पूछा तो उन्होंने बताया कि इंडिया में ये लड्डू बच्चा होने के बाद माँ को खिलाए जाते हैं उसकी अच्छी सेहत के लिए । ये सुन कर उसने मम्मी को एकटक देखते हुए उनके हाथ चूम लिए , मिसेज़ जोशी का मन कैसा भीग गया था । जोशी जी ने देखकर ताना मारा था , जिसके लिए इतनी मेहनत कर रही हो वो खाएगी भी तुम्होरे लड्डू ?

खाएगी , खाएगी क्यों नही , देखना तुम , वो ज़रुर खाएगी , उन्होंने विश्वास से जवाब दिया था ।

जोशी जी सिर झटक कर टीवी देखने लगे थे , तभी क्रिस्टीन ने आकर उनके हाथ में एक USB flash drive पकड़ाते हुए कहा , papa this is for you .  और उसे टीवी में लगा दिया । जोशी जी देखकर हैरान हो गए कि उसमें हिंदी पुरानी फ़िल्मों का collection था । कहना तो बहुत कुछ चाहते थे लेकिन सिर्फ़ , थैंक्यू कह कर चुप हो गए थे । क्रिस्टीन मुस्कुराती हुई चली गई थी । जोशी जी उस दिन देर रात तक असली-नकली फ़िल्म देखते रहे थे , देवानंद उनका फ़ेवरेट था ।

अगले दिन सुबह उठ कर बाहर सैर के लिए निकलने लगे तो पत्नी भी साथ चलीं । बाहर आते ही उसी सुगंध ने जोशी जी का मन हल्का कर दिया , पत्नी से बोले , देखो ये युक्लिप्टिस के फूल कितने सुंदर लग रहे हैं और इसकी खुशबू कैसे चारों ओर फैली है ।

पति का मन देखकर आज मिसेज़ जोशी को अपने छोटे से परिवार में ठंडी हवा का झोंका आता दिखाई दे रहा था । वो आँखें मूंदकर बैंच पर बैठ ईश्वर से प्रार्थना कर रही थीं कि हे ईश्वर किसी तरह इन बाप-बेटे के बीच की इस ख़ामोशी को तोड़ दे । जोशी जी भी उनके पास आकर बैठ गए । थोड़ी देर में उन्होंने देखा कि नितिन भी अपने पापा के पास आकर बैठ गया । उसके पास बैठने से जोशी जी भीतर ही भीतर थोड़े असहज हो रहे थे । एक मुद्दत के बाद बेटे से इतने करीब हुए थे । कुछ देर की ख़ामोशी के बाद नितिन ने ख़ामोशी तोड़ी , पापा क्या आप मुझे माफ़ नही कर सकते ?

जोशी जी मौन विशाल फैले आसमान की ओर देखते रहे । नितिन ने फिर आगे बात बढ़ाई , पापा , प्लीज़ कुछ तो बोलिए , बचपन में मैं ग़लती करता था तो आप डाँटते थे , गुस्सा करते थे लेकिन फिर माफ़ भी कर देते थे । मैं अब भी आपका वही नितिन हूँ , मैंने ग़लती की है कि आपको बिना बताए क्रिस्टीन से शादी करली । पापा मैं बहुत डर गया था , मुझे लगा आप कभी इस शादी के लिए नही मानेंगे । क्रिस्टीन बहुत अच्छी लड़की है पापा , उसका और छुटकी का कोई दोष नही है फिर आप उन्हें अपने प्यार से दूर क्यों रख रहे हैं ? मुझे डाँटिए , मुझे सज़ा दीजिए पर प्लीज़ मुझसे बात कीजिए । कहते हुए उसकी आँखों से बूँदे टपक रही थीं लेकिन जोशी जी आसमान को घूरे जा रहे थे । ऊपर से मौन दिख रहा उनका दिल लहरों की तरह किनारे पर आकर शांत हो रहा था । पत्नी चुपचाप उन्हें देख रही थी , वो उठकर नितिन के पास आईं और उसके सिर पर हाथ रख दिया । जोशी जी उठकर घर की ओर चल दिए । नितिन नीचा सिर किए सुबक रहा था । मिसेज़ जोशी ने उसे उठाया और दोनों घर की ओर चल दिए । घर के दरवाज़े पर भीतर से आवाज़ें आ रही थीं अंदर गए तो देखा जोशी जी छुटकी को गोद में लिए उससे बातें कर रहे थे , तो छुटकी रानी अब से आप छुटकी नही , मीरा हैं । क्रिस्टीन पास खड़ी मुस्कुरा रही थी ।

आसमां

ऐ आसमां तू यूं ही इतराता है !
सारे जहां पे छाया रहता है ,
तुझमें जो रंग समाए हैं ,
सारे तूने सूरज से चुराए हैं ,
चांद – तारों ने तुझे अंधेरी – काली रात से बचाया है ,
बादलों ने भर-भर तेरी प्यास को बुझाया है ,
सारे नक्षत्रों ने तेरा मान बढ़ाया है ,
फिर तू क्यों इतराया है ,
तू बता , क्या तू ही सबका सरमाया है ?
तू ही बता , क्या सूरज , चांद, तारों , बादल , नक्षत्रों के बिना तेरा कहीं गुज़ारा है ? 
माला जोशी शर्मा

धड़कता दिल

धड़कता तो दिल पहले भी था ,

हर नए क़दम पर धड़कता था ,

कभी किसी की निगाह पर धड़कता था

तो कभी किसी ख़्याल पर धड़कता था ,

शायद जवानी के जज़्बात पे धड़कता था !

धड़कता तो दिल आज भी है !

हर उठते क़दम पर धड़कता है ,

तारीक़ नज़र पर धड़कता है ,

जज़्बातों को दफ़्न करने पर धड़कता है ,

धड़कनें तो वही हैं जनाब पर वक्त की धड़कनें अब ख़िलाफ़ हैं ।

माला जोशी शर्मा

अपना आसमाँ

सब अपना – अपना आसमाँ चाहते हैं ,

समय की बालू पर अपने क़दमों के निशाँ बनाना चाहते हैं ,

कभी अकेले तो कभी कारवाँ साथ चाहते हैं ,

साथ जो चला उसका साथ चाहते हैं ,

लेकिन आसमाँ अपना जुदा चाहते हैं ।