मां

 
माँ का एक दिन कहाँ होता है !
वो तो हरदम होता है ।
पहला प्यार हुआ था माँ से
पहला गुरु मिला था माँ में
उंगली पकड़ चलाया माँ ने ।
गोदी भर जीभर प्यार जताया माँ ने
मुझको डाँटा , फिर ख़ुद रोकर अपना दर्द छिपाया माँ ने
शिक्षक को अपना हिस्सेदार बनाया माँ ने
क्या मैं लेख लिखूँगा माँ पर
जब मुझको ख़ुद लिखा है माँ ने ।

2)

आज स्कूल से निकला तो था ज़रा थका हुआ मैं 
निकला तो एक सुगंध सी आई
गुलाब थी या थी वो चमेली
नहीं , थी वो कुछ अजब नवेली
केवड़ा चंपा उसमें सब समा गए थे
सब मिल मुझे ज्यूँ बुला रहे थे
चलते-चलते घर था आया
दरवाज़े पर माँ को पाया
थका देख उसने फिर मुझको झट से गले लगाया
मैं हैराँ था , माँ का आँचल उस अजब सुगंध से महक रहा था ।

चुप्पी


क्लास में वंदना की हंसी से सब वाकिफ़ थे । कितनी बार बाहर से गुजरती प्रिंसिपल साहिबा उसे टोक चुकी थीं ,
वंदना , बिहेव योर सेल्फ़ ।
लेकिन बदले में उसकी खी खी की ‌आवाज़ गूंज ही जाती । उसका हंसना और हंसाना चलता रहता । यही हाल घर में भी था , वो चुप हो जाती तो मां – बाबा परेशान हो जाते कि लड़की को क्या हो गया ? तबीयत तो ख़राब नहीं हो गई कहीं ? वंदना की शादी तय हुई तो उसके बाबा ने यही कहा था ,
जी हमारी बेटी बड़ी हंसमुख है , घर की रौनक है । जहां जाएगी खुशियां बिखेर देगी ।
शादी हुई और वंदना तो वही रही , खिलखिला कर हंसती । लेकिन जब वो हंसती तो घर वाले ख़ामोश हो उसका मुंह ताकने लगते जैसे कुछ अजीब हरकत की हो उसने । एक बार सासू मां ने उससे बहुत गंभीर हो कर कहा ,
वंदना , यूं जाहिलों की तरह हंसना तुम्हें शोभा नहीं देता । लड़कियों को कायदे में हंसना बोलना चाहिए ।
पति भी टोकते ,
क्या , तुम मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों में जंगलियों की तरह हंसती हो ! मुझे शर्म आती है तुम्हारी ऐसी हरकतों पर ।
वंदना ने धीरे धीरे चुप्पी ओढ़ ली , जब अपने घर भी जाती तो वहीं चुप्पी ओढ़े बैठी शून्य में ताकती रहती । उसके मां बाबा उसकी चुप्पी से चिंता में हो जाते लेकिन अब ससुराल में किसी को कोई शिकायत नहीं थी । उन्हें उसकी चुप्पी में तहज़ीब लगती थी , वंदना अब वंदना नहीं रही थी ।

जुर्म


जेल की सलाखों के पीछे बैठा राज नम आंखों से अपनी कोठरी के छोटे से झरोखे से झांकता चांद देख रहा था । लगता है आज पूर्णमासी है , लेकिन उसके जीवन में अब कभी पूर्णिमा नहीं आएगी । वो जानता था कि उसकी एक भूल उसके जीवन में अमावस्या बन गई थी । क्या उसकी भूल उसकी अकेले की थी ? वो सोच रहा था वो मां जिसे वो पूज्य मानता था , वही नहीं जिसे संसार पूज्य मानता है , क्या वो मां कभी अपनी संतान को अंधकार में ढकेल सकती है ? लेकिन उसके साथ उसकी मां ने ऐसा क्यों किया ? जब उसे पहली बार किसी ने दफ़्तर में काम करवाने के बदले चुपचाप मिठाई के डिब्बे में पैसे दिए थे और उसने घर आकर जब डिब्बा खोला तो वो घबरा गया था । अगले दिन उसके पैसे लौटाकर उस आदमी की शिकायत करेगा ये कहा था तो मां ने उससे कहा था ,
पागल है क्या ? घर आई लक्ष्मी को भी भला कोई ठुकराता है ? ये तो कमीशन है तेरे काम की ।
उसने ना चाहते हुए भी मां की बात मान ली थी और फिर ये सिलसिला शुरू हो गया था । मां हर बार पैसे देख कर खुश हो जाती थी । फिर एक दिन उसे घूसखोरी के इल्ज़ाम में रंगे हाथों पकड़ लिया गया । क्या यह जुर्म अकेले उसका था ?

नया सवेरा

जैसा बीता गया साल , मत पूछो बस क्या हुआ हाल
हर दिल में एक कहानी है , आशा हर दिन ही हारी है।
दीवारों में बंद अकेलापन‌ ,अनारकली का दर्द सुनाती सी ।
हर घर में सन्नाटा सुनता था , पड़ौसी ही पड़ौसी से घबराता था ।
मां-बाप अकेले डरते थे जो कभी बच्चों को निडर बनाते थे ।
कितने ही अकेले गुज़र गए , इस महामारी ने निगल लिए ।
हे प्रभु करो अब ऐसी कृपा , सब अंधकार अब मिट जाए ।

नया साल है आया लेकर नई आशा की नई किरण
कोई उदास न अकेला हो , नए जीवन का अब सवेरा हो‌।

एक बार फिर आजा कबीर

माया महा ठगनी  हम जानी ।
तिरगुन फांस लिए कर डोलै ,बोलै मधुरी बानी ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो , यह सब अकथ कहानी ।
माया को छोड़ना कठिन है , बार बार लिपटती है । न जाने कितना कुछ कह गए तुम संत ।
स्कूल में जब तुम्हें पढ़ने लगी तो सबसे पहले तुम्हारे दोहे याद करने पड़े थे । हिंदी की टीचर ने तुम्हारे बारे में बहुत से किस्से सुनाए थे जो मेरी आंखों में किसी फ़िल्म की तरह तैरते रहते थे । तभी से मेरा तुम्हारे साथ एक अनजाना सा रिश्ता जुड़ गया था । मैं तुम्हारे सपने देखने लगी थी , तुम्हारे दोहों में जीवन ढूंढने लगी थी । तुम हर राह पर मुझे चलते – फिरते दिखाई देते थे , कभी आम लोगों के बीच में , कभी किसी साधु – संत के हाथ में फिरती माला में तो कभी गरीब की फिरती चक्की में । तुम्हारा वो दोहा , काल करे सो आज कर आज करे सो अब , पर में परलै होएगी बहुरी करेगा कब । ये मुझ से हर काम समय से पहले ही करवा देता था । पता है क्यूं ? क्योंकि मुझे सच में लगता था कि अगर दुनिया उलट-पुलट हो गई तो मेरा काम अधूरा रह जाएगा और मैं अपना काम ख़त्म करके ही चैन की सांस लेती । मज़े की बात तो ये है कि ये बात आज भी कहीं ज़हन में गुपचुप छिपी बैठी है । अक्सर चलते-चलते राह भटकी हूं पर तुमने मेरे मैं को ललकारा है । तुम्हारी आवाज़ जैसे दिमाग़ की खिड़की खटखटाती ,जब मैं था तब हरि नहीं , अब हरि हैं मैं नहीं । सब अंधियारा मिट गया , जब दीपक देखा माहीं । मेरा मैं शर्म से सिर झुका लेता और भीतर कहीं उजाले को तलाशता ।
आज मैं क्या सारी दुनिया एक भय और अनिश्चितता के काल से हिली हुई है । तुम क्या थे ? तुम आज न हो कर भी थे नहीं , तुम हो । तभी तो तुमने मनुष्य के मन को तह तक जाना । भली भई जु भै पडया , गई दशा सब भूलि । पाला गलि पांणी भया , ढुलि मिलिया उस कूलि । यानि , अच्छा हुआ जो मुझे भविष्य का भय हुआ । यमदंड का भय हुआ । जन्म-मृत्यु चक्र का भय हुआ । फलत: मैं संसार की छह दशाओं से मुक्त हो गया । क्योंकि ये दशाएं आत्म ज्ञानी को नहीं प्रभावित करती हैं । बर्फ़ जैसी जड़ता समाप्त हो गई है । परमात्मा का एहसास हुआ , वही संपूर्ण सृष्टि का किनारा है ।
तुमने हर क़दम पर राह दिखाई है , तुम अजर – अमर हो । हे संत , हे कबीर तू हवा बन मेरे देश में , इस सृष्टि में बह ताकि हम इस अंधकार से मुक्त हों ।

सुरंग

गहरी अंधेरी सुरंग में मैं अकेली चलती जा रही थी । हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था । दिल के धड़कने की आवाज़ थी , बाकी सन्नाटा था । हाथ-पैर छूट रहे थे लेकिन ये सुरंग ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी । मैं हांफ़ रही थी , थक गई थी , लगा अब और नहीं चल पाऊंगी । कोई साथ नहीं है , कोई पास नहीं है , अब क्या करूं ? कमज़ोर क़दम डगमगा रहे थे , ठोकर लगी और मैं मुंह के बल गिरी । आंख खुली तो अपने को बिस्तर के नीचे पाया । आवाज़ सुन कर पति ने आंखें खोली , क्या हुआ ? कहां हो ?
मैं कराहती हुई नीचे से उठी , यहीं हूं , सोते में गिर गई ।
चोट तो नहीं आई ? उठ कर मुझे सहारा देते हुए  उन्होंने पूछा ।
नहीं , मैं ठीक हूं और मैं फिर लेट गई थी । लेटी‌ थी पर सोई नहीं थी । जब नींद नहीं आती तो विचार चारों ओर से ऐसा धावा बोलते हैं कि दिलो-दिमाग में आंधी चलने लगती है । ये सपना अपनी हक़ीक़त की छाया थी । लगभग सौ दिन से ऊपर घर में बंद ,कोई पड़ौसी एक पल को अपने दरवाज़े से झांक कर घबराया सा देखता है और दरवाज़ा फिर बंद हो जाता है । साठ साल से ऊपर वाले हमारी सोसाइटी में काफ़ी लोग हैं । यही नहीं वो अकेले भी रह रहे हैं । उनके बच्चे या तो विदेश में हैं या दूसरे शहर में । हम भी उसी गिनती में हैं । कभी-कभी भय , सच कहूं तो काल का भय घेर लेता है । भई , साधू तो हैं नहीं जो हर समय परमानंद की स्थिति में रहें । डरते हैं , रोते हैं , negative thought भी आते हैं । कभी कभी ऐसा भी हो ही जाता है , हां अब उस भय से ऊपर उठने की कोशिश ज़रुर है । उठना ही पड़ेगा । कभी तो सुरंग ख़त्म होगी , पार हो ही जाएगी ।

कर्मफल

आज बैठे बैठे एक विचार मन में आ रहा है । जिन परिस्थितियों से आज हम गुज़र रहे हैं ऐसे में इस तरह के विचार आना स्वाभाविक है । हम अक्सर कर्मों की बात करते हैं लेकिन उसका प्रत्यक्ष प्रमाण अब मिला । कुछ बड़ी विकट स्थिति में फंसे हैं तो कुछ सुरक्षित और कुशल हैं । मन में विचार आया कि क्या ये सब कर्मफल नहीं है ? कहीं कुछ तो हमने ऐसे कर्म किए होंगे जो आज ईश्वर ने हमें ऐसी स्थिति में रखा । हम परिस्थितिवश घरों में कैद होने पर मजबूर हो गए हैं ।  ऐसा लगता है कि जैसे वो ऊपरवाला हमें बहुत कुछ सिखाना चाहता है । इंसान जो अपने को सर्वशक्तिमान , बुद्धिमान और चांद-सूरज को वश में करने का दम भरता है ,एक वायरस के वश में फंसा है और राह नहीं सूझ रही है ! क्या हैं हम इस सृष्टि में ? निमित्त मात्र ! समझा दिया कि इंसान तू सर्वज्ञ नहीं । अभी बहुत कुछ है जो तू नहीं जानता , जो तुझे जानना बाकी है । हम सब अभी आधे-अधूरे हैं ।

पीपल

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2506583916271370&id=100007593581540&sfnsn=wiwspmo&extid=Yp59IYAAARGq4qHS

न जाने कब से दिल में ये ख़त लिख रही थी लेकिन जीवन में कभी कोई मिल जाता है और दिल को ज़ुबान मिल जाती है । प्रतीक्षा ने सुंदर बना दिया , उसका आभार । सुनिए मेरी ये कहानी ।

चारू चंद्र की चंचल किरणें

चारू चंद्र की चंचल किरणें , खेल रही हैैं जल थल में ,
स्वच्छ चांदनी बिछी हुई है , अवनी और अंबरतल में
पुलक प्रकट करती है धरती , हरित तृणों की नोकों से
मानों झूम रहे हैं तरू भी , मन्द पवन के झोंको से।


कवि मैथिलीशरण गुप्त के काव्य ‘पंचवटी’ की इन पंक्तियां ने साहित्य में इतिहास रच दिया । इनका चमत्कार व्याकरण में अद्भुत उदाहरण है । बचपन से पढ़ते आए कि ये अनुप्रास अलंकार है । बस मज़े लेकर पढ़ते थे इन पंक्तियों को । लेकिन कहीं कवि के भाव सौंदर्य को समझने से वंचित रह गए थे। बहुत सी बातें समय के साथ ही समझ में आती हैं , खास कर साहित्य की गहराई ।
मुझे भी इन पंक्तियों का भाव सौंदर्य तब समझ में आया जब मेरी नातिन ऋष्वा पैदा हुई । जब मैंने उसे बढ़ते देखा , खेलते देखा , उसे प्यारी निर्मल बातें करते देखा , उसकी स्वच्छंद हंसी को देखा तो ये पंक्तियां जीवंत हो उठीं । ऐसा लगा मानों ये पंक्तियां कवि ने जैसे उसी के लिए लिखी हों ! फिर मुझे उसमें भाव सौंदर्य नज़र आया । ये भाव की ही बात है , किसी भी रचना के भाव को जानने के लिए समझना नहीं महसूस करना बहुत ज़रूरी है । मुझे ये बात समझने में बहुत समय लगा । अब हर रचना को आनंद से पढ़ती हूं ।