अजनबी मन

अजनबी मन

कभी सोचती हूँ मैं कि मैं क्या हूँ ?

कौन हूँ मैं ?

क्या हैं मेरी मंज़िलें ?

कहाँ जाना चाहती हूँ मैं ?

इस उल्झन में उलझ जाती हूँ अक्सर ,

कितने ही ऐसे सवालों से घिर जाती हूँ अक्सर ,

ना तय होती है मंज़िल ,

ना तय हो पाता है रास्ता ,

चल रही हूँ बस ,

जैसे , गुम , अकेली ,

न जाने कहाँ !

पाँव थकते नही , मन ठहरता नही ,

कैसी मंज़िल है ये ,

जो आती नही , राह का किनारा कहीं दिखता ही नही ।

ख़ुद को पाती नही , पहचानती नही , अजनबी सा मन , ख़ुद से मेल खाता ही नही

सिद्धांत और व्यवहार

सिद्धांत और व्यवहार

कुछ दिन से एक विचार ज़ोर-ज़ोर से मस्तिष्क का दरवाज़ा खटखटा रहा था । सोते-जागते बस वही विचार हावी हो रहा था । सोचा उसे लिख डालूँ तो कुछ राहत मिलेगी । ये विचार यूँही बेमतलब मस्तिष्क में नहीं आ रहा था । आस-पास ऐसी घटनाएँ घट रही थीं कि कुछ सवाल स्वभाविक तौर पर कुलबुला रहे थे ।

ये आदर्शवाद और सिद्धांत क्या हैं ? इनका औचित्य किसके लिए है और क्या है ? हमारे देश में नारी के लिए आदर्शों की लंबी लिस्ट है । पुरातनकाल से ही नारी सिद्धांतों और आदर्शों का बोझा अपने सिर पर ढोती आ रही है । समाज के बनाए इन सिद्धांतों को वो अपना जीवन मान बैठी है । उस पर थोपे गए ये आदर्श और सिद्धांत व्यवहार से कोसों दूर हैं और वो व्यवहारिक जीवन से कट गई है।

अक्सर हम सोचते हैं कि हमारा देश पुरानी सभ्यता के होते हुए भी पिछड़ा क्यों है ? इसका कारण क्या है ? मैंने इन सवालों के चलते महादेवी वर्मा जी का “जीने की कला” निबंध का अंश पढ़ा । पढ़ने पर लगा कि ये पूरी किताब पढ़नी पड़ेगी । इन सवालों के जवाब में वो कहती हैं , भारतीय संसार में क्यों पिछड़े और उनका जीवन कष्टमय क्यों है ? इसका उत्तर देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है कि हमारे सिद्धांत और व्यवहार में अंतर है । हम भारतीय सदियों से अर्जित ज्ञान के भंडार से निर्मित आदर्शों का गट्ठर अपने सिर पर लादे रहते हैं । परंतु व्यवहार शून्य है । हमारे विचार और आचार में , चिंतन और कर्म में , कथनी और करनी में गहरी खाई है , दूरी है । भारतीय जीवन की यही दरार हमारे जीवन के पिछड़ेपन का मूल कारण है । हमें ये दरार भरनी होगी । नारी के उत्थान के लिए भरनी होगी । स्त्री किस प्रकार अपने ह्रदय को चूर-चूर कर पत्थर की देव प्रतिमा बन जाती है । अपने ह्रदय की प्रिय इच्छाएँ कुचल कर निर्मूल कर देती है ।

मुझे एक सुकून मिल रहा है BE के माध्यम से , आकृति , दिव्या और अनगिनत साझीदारों के साथ मिलकर हम ये दरार , खाई भरने का कार्य कर रहे हैं और करते रहेंगे ।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: ।।

जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं । जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती , उनका सम्मान नही होता , वहाँ किए गए समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं ।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।

न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।।

जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं , वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती हैं वह कुल सदैव फलता – फूलता और समृद्ध रहता है ।

ये हैं हमारे सिद्धांत , हमारे आदर्श । हमारे व्यवहार में अभी गहरी दरार है ।

मैं न जाने क्या ढूंढ रही हूं

मैं न जाने क्या ढूँढ रही हूँ
वो गर्म रेत पर नंगे पाँव रखना
पैर जलने पर कूद-कूद कर चलना
चप्पल टूटने पर सेफ़्टी पिन से काम चलाना
पिन न चुभ जाए कहीं ये सोच कर सहेली का रुमाल से मेरी चप्पल बांध देना
उस रेत में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ।
बसंत में सबका पीले कपड़े पहनना
पीले फूलों की माला बनाकर मंदिर में चढ़ाना
घर से मेरी पीली फ़्रॉक न आने पर मेरा उदास होना
सहेलियों का रातों-रात सफ़ेद फ़्रॉक को ड्रॉइंग कलर से पीला रंग देना
उस बसंत में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।
सर्दियों की धूप में खेत से कच्ची मूंगफलियाँ खाना
तू लंबी है , कह कर मुझ से इमलियाँ तुड़वाना
आँवले तोड़ कर जेब में भर लेना
पैसे जोड़कर , चंदा-नंदा की दुकान से कुछ मुस्कुराहटें ले लेना
उन मस्ती भरे दिनों में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।
एग्ज़ाम से पहले मेरा बीमार हो जाना
फ़ेल होने के डर से मेरा रात-रात रोना
सहेलियों का बारी-बारी से मुझे पढ़ कर याद कराना
मेरे पास हो जाने पर उनका खुशियाँ मनाना
उस बेगर्ज़ ज़माने में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।
मिलकर रात-रात भर फ़िल्मी गीत गाना, डर में साथ सो जाना ,
तेरे–मेरे का कुछ पता न होना , साथ में खाना और रोटी चुराना , 
रुखा था या बेस्वादा था , स्वाद साथ का आना ,
न ऊँच – नीच का सोचना , न जात-पात का रोना ,
वो प्रेम-प्यार के मौसम थे , आज , मैं न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।
फ़िल्मों का कुछ और मज़ा होना , राजेश खन्ना क्रेज़ी होना ,
फूलों और पंखों को लेकर , डायरी के पन्नों में दबाना,
मौन प्रेम को आँखों के रस्ते से , कुछ शब्दों में उतार लेना,
डायरी के उन बंद पन्नों में , फूलों का रंग समा जाना,
उन महकते रंगों में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।
कहते हैं हम आगे बढ़े हैं , तकनीकी से जुड़ गए हैं
दूरी को हम भूल गए हैं , कंप्यूटर से नए आयाम को छूने चले हैं
सब अपने-अपने में मस्त हुए हैं , मंगल तक भी पहुँच रहे हैं
घर आना अब दूर बहुत है , कुशल मंगल ही पूछ रहे हैं
तकनीकी प्रेम के इस समय में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।
बचपन के उन दिनों में , मैं आज का ज़माना ढूँढ रही हूँ
या आज के ज़माने में , मैं तब का ज़माना ढूँढ रही हूँ ? 
मैं न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

माला जोशी शर्मा 

मां

 
माँ का एक दिन कहाँ होता है !
वो तो हरदम होता है ।
पहला प्यार हुआ था माँ से
पहला गुरु मिला था माँ में
उंगली पकड़ चलाया माँ ने ।
गोदी भर जीभर प्यार जताया माँ ने
मुझको डाँटा , फिर ख़ुद रोकर अपना दर्द छिपाया माँ ने
शिक्षक को अपना हिस्सेदार बनाया माँ ने
क्या मैं लेख लिखूँगा माँ पर
जब मुझको ख़ुद लिखा है माँ ने ।

2)

आज स्कूल से निकला तो था ज़रा थका हुआ मैं 
निकला तो एक सुगंध सी आई
गुलाब थी या थी वो चमेली
नहीं , थी वो कुछ अजब नवेली
केवड़ा चंपा उसमें सब समा गए थे
सब मिल मुझे ज्यूँ बुला रहे थे
चलते-चलते घर था आया
दरवाज़े पर माँ को पाया
थका देख उसने फिर मुझको झट से गले लगाया
मैं हैराँ था , माँ का आँचल उस अजब सुगंध से महक रहा था ।

चुप्पी


क्लास में वंदना की हंसी से सब वाकिफ़ थे । कितनी बार बाहर से गुजरती प्रिंसिपल साहिबा उसे टोक चुकी थीं ,
वंदना , बिहेव योर सेल्फ़ ।
लेकिन बदले में उसकी खी खी की ‌आवाज़ गूंज ही जाती । उसका हंसना और हंसाना चलता रहता । यही हाल घर में भी था , वो चुप हो जाती तो मां – बाबा परेशान हो जाते कि लड़की को क्या हो गया ? तबीयत तो ख़राब नहीं हो गई कहीं ? वंदना की शादी तय हुई तो उसके बाबा ने यही कहा था ,
जी हमारी बेटी बड़ी हंसमुख है , घर की रौनक है । जहां जाएगी खुशियां बिखेर देगी ।
शादी हुई और वंदना तो वही रही , खिलखिला कर हंसती । लेकिन जब वो हंसती तो घर वाले ख़ामोश हो उसका मुंह ताकने लगते जैसे कुछ अजीब हरकत की हो उसने । एक बार सासू मां ने उससे बहुत गंभीर हो कर कहा ,
वंदना , यूं जाहिलों की तरह हंसना तुम्हें शोभा नहीं देता । लड़कियों को कायदे में हंसना बोलना चाहिए ।
पति भी टोकते ,
क्या , तुम मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों में जंगलियों की तरह हंसती हो ! मुझे शर्म आती है तुम्हारी ऐसी हरकतों पर ।
वंदना ने धीरे धीरे चुप्पी ओढ़ ली , जब अपने घर भी जाती तो वहीं चुप्पी ओढ़े बैठी शून्य में ताकती रहती । उसके मां बाबा उसकी चुप्पी से चिंता में हो जाते लेकिन अब ससुराल में किसी को कोई शिकायत नहीं थी । उन्हें उसकी चुप्पी में तहज़ीब लगती थी , वंदना अब वंदना नहीं रही थी ।

जुर्म


जेल की सलाखों के पीछे बैठा राज नम आंखों से अपनी कोठरी के छोटे से झरोखे से झांकता चांद देख रहा था । लगता है आज पूर्णमासी है , लेकिन उसके जीवन में अब कभी पूर्णिमा नहीं आएगी । वो जानता था कि उसकी एक भूल उसके जीवन में अमावस्या बन गई थी । क्या उसकी भूल उसकी अकेले की थी ? वो सोच रहा था वो मां जिसे वो पूज्य मानता था , वही नहीं जिसे संसार पूज्य मानता है , क्या वो मां कभी अपनी संतान को अंधकार में ढकेल सकती है ? लेकिन उसके साथ उसकी मां ने ऐसा क्यों किया ? जब उसे पहली बार किसी ने दफ़्तर में काम करवाने के बदले चुपचाप मिठाई के डिब्बे में पैसे दिए थे और उसने घर आकर जब डिब्बा खोला तो वो घबरा गया था । अगले दिन उसके पैसे लौटाकर उस आदमी की शिकायत करेगा ये कहा था तो मां ने उससे कहा था ,
पागल है क्या ? घर आई लक्ष्मी को भी भला कोई ठुकराता है ? ये तो कमीशन है तेरे काम की ।
उसने ना चाहते हुए भी मां की बात मान ली थी और फिर ये सिलसिला शुरू हो गया था । मां हर बार पैसे देख कर खुश हो जाती थी । फिर एक दिन उसे घूसखोरी के इल्ज़ाम में रंगे हाथों पकड़ लिया गया । क्या यह जुर्म अकेले उसका था ?

नया सवेरा

जैसा बीता गया साल , मत पूछो बस क्या हुआ हाल
हर दिल में एक कहानी है , आशा हर दिन ही हारी है।
दीवारों में बंद अकेलापन‌ ,अनारकली का दर्द सुनाती सी ।
हर घर में सन्नाटा सुनता था , पड़ौसी ही पड़ौसी से घबराता था ।
मां-बाप अकेले डरते थे जो कभी बच्चों को निडर बनाते थे ।
कितने ही अकेले गुज़र गए , इस महामारी ने निगल लिए ।
हे प्रभु करो अब ऐसी कृपा , सब अंधकार अब मिट जाए ।

नया साल है आया लेकर नई आशा की नई किरण
कोई उदास न अकेला हो , नए जीवन का अब सवेरा हो‌।