मन

रात इतनी ख़ामोशी से चली आती है ,

ख़्यालों की पोटली बगल में दबा लाती है ,

जल-थल सब सो जाता है ,

मन पंछी बन उड़ जाता है ,

न जाने कहाँ-कहाँ दौड़ लगाता है ,

खुली आँख सपने दिखलाता है ,

रात दबे पाँव चली जाती है ,

भोर अपने रंग बिखराती है ,

परिंदे-चरिंदे शोर मचाते हैं ,

मन गुमनामी की चादर तान सो जाता है ।

जय माता की

जय माता की , जय माता की , जयकार मची थी

माँ की भक्ति में डूबे सब , रोली कुमकुम उड़ा रहे थे

गली-गली में नेता , संस्कृति का डंका बजा रहे थे

वहीं किसी नुक्कड़ पर एक बेटी माँ को पुकार रही थी

संस्कृति भक्त बने कुछ उसकी चुन्नी उड़ा रहे थे ।

उसके नाज़ुक , कोमल तन को गिद्द बने वो नोच रहे थे ,

इस पर भी उन्हें चैन न आया ,

कोमल तन को मोम बनाया ,

आग्नि से उपजी द्रौपदी को , आग्नि को ही सौंप रहे थे !

माँ की भक्ति में डूबे सब , रोली कुमकुम उड़ा रहे थे

माता क्रुद्ध आँखों से , झूठे भक्तों की झूठी भक्ति देख रही थी

अपनी बेटी की तड़पन पर सागर को भी जला रही थी ,

सोच रही थी , कैसे भक्त हुए ये मेरे !

दीप जला कर मुझे जलाते !

पत्थर को चुन्नी हैं चढ़ाते , अक्स को मेरे वस्त्रहीन हैं करते !

गौ को माता कहते जाते , कन्या को ये नोच जलाते !

इंसानों का खून बहाते , मिट्टी की मूरत को रोज़ सजाते !

एक बार मैं यज्ञ में कूदी , ये अब तक मुझे जला रहे हैं !

कहाँ गया वो शिव का तांडव ?

अपमान मेरा जो सह न पाया , आज नही वो लौट के आया ,

झूठे जग की झूठी भक्ति देख के उसने जग बिसराया ।

माला जोशी शर्मा

बाबू

boy riding bicycle
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गीता संकरी गलियों में भागती बाबू को ढूँढ रही थी । अंधेरा होने को था लेकिन उस शैतान का कहीं कोई पता नही था । छोटा सा छ: साल का बच्चा , कहाँ चला गया ? उसका गला सूख रहा था , सिर चक्कर खा रहा था कि तभी उसने बाबू को दूर तालाब की ओर जाते हुए देखा । वो बेतहाशा उसके पीछे भागने लगी , बाबू तालाब तक पहुँच गया था , कहीं वो डूब ना जाए , वो डर कर चिल्लाई ,

बाबू….बाबू…..

लेकिन सूखे गले में आवाज़ दब गई , वो फिर भी बाबू को पकड़ने के लिए भागती रही और चिल्लाती रही , तभी किसी ने उसे ज़ोर – ज़ोर से पुकार कर हिलाया ,

गीता…गीता…..

हड़बड़ा कर गीता उठ बैठी….घबराकर उठी तो दिनेश को सामने पाया , दिनेश उसे हिला रहा था । उसने सोच कर चैन की साँस ली कि चलो ये सपना ही था , हक़ीक़त नही । दिनेश उसकी ओर पानी का गिलास बढ़ाते हुए बोला ,

फिर वही सपना देखा !

गीता ने नम आँखों से दिनेश को देखते हुए सिर हिला दिया , ये दर्द उसका दर्द था । दिनेश उसके बालों को सहलाते हुए बोला ,

बाबू अब पच्चीस साल का हो गया है । उसकी फ़िक्र करना छोड़ दो , सब ठीक है ।

दिनेश ने तो कहने को कह दिया लेकिन वो अपने दिल को कैसे समझाए । वो दिन उसे कभी चैन से सोने ही नही देता , कैसे उन्होंने छ: साल के बाबू को अकेले प्लेन में बैठा कर विदेश भेज दिया था । वो उसे एयरपोर्ट छोड़ने तक भी नही जा सकी थी , नन्हा सा बच्चा क्या सोचता होगा ? अकेला कितना डर गया होगा । लेकिन वो क्या करती , अचानक ख़बर आई थी कि गाँव में दिनेश के पिता जी की तबीयत बहुत ख़राब है और उसे बाबू को माँ के पास छोड़ कर पीकू , आदी को लेकर जाना पड़ा था । बाबू को इसलिए छोड़ना पड़ा क्योंकि एक हफ़्ते में उसकी लंदन की फ़्लाइट थी । वो पहली बार अपने मम्मी-पापा के पास जा रहा था । उसे गीता और दिनेश ने कितना समझाया था कि उसके असली मम्मी-पापा वही हैं और उसे अब उनके पास जाना होगा । बाबू की हज़ार सवाल उठाती मासूम आँखों से वो भीतर तक टूट रही थी । उसने सोचा था कि पिता जी को देख कर वापस आ जाएगी , बाबू को एयरपोर्ट तक छोड़ने जाएगी , उसे प्यार से सब समझा देगी लेकिन वो नही आ पाई थी । दो दिन बाद पिता जी गुज़र गए और उसे वहीं रहना पड़ा था । चाह कर भी वो किसी से अपने मन की बात नही कह पाई थी कि बाबू बहुत छोटा बच्चा है , वो उसे अपनी माँ समझता है , उसे पास नही देखेगा तो डर जाएगा , गीता के दिल पर भारी पत्थर रखा था । उसने न जाने कितनी रातें अपने अपराधी मन के साथ जागते बिताई थीं । आज तक वो ख़ुद से नाराज़ है कि अपने मन के लिए आवाज़ क्यों नही उठा पाई थी ? क्यों डरती रही अपने एहसासों को ज़ाहिर करने में ? क्यों भाग कर उसके पास नही गई थी ? बाबू अकेला कैसे गया होगा उसे बार-बार टॉयलेट जाने की आदत थी , उसने कैसे चलते प्लेन में सहायता ली होगी ? अंजान लोगों में अकेला इतने घंटे , भूख लगेगी या प्यास लगेगी तो कैसे कहा होगा ?  वो तो हर एक घंटे में कुछ खाने को मचल उठता था , पढ़ते-पढ़ते भी थोड़ी-थोड़ी देर में उठता और कुछ नई खाने की चीज़ ढूँढने के लिए फ़्रिज खोल कर खड़ा हो जाता था । कितनी डाँट पड़ती थी उसे कि फ़्रिज यूँ मत खोलकर खड़ा हुआ कर , पर नही उसे तो अपनी दादी को सताने में मज़ा आता था । हाँलाकि उसने पहले अपनी दादी को कभी दादी नही कहा था । पीकू और आदी नानी कहते थे तो वो भी नानी ही कहता था । माँ साथ रहती थीं इसलिए तीनों बच्चों की परवरिश गीता के लिए आसान हो गई थी । आस-पास , नाते – रिश्तेदार यही समझते थे कि गीता और दिनेश के तीन बच्चे हैं ।

बाबू का गीता के पास आना भी इत्तेफ़ाक ही था । भाई-भाभी विदेश में नौकरी कर रहे थे , उनका एक बेटा था , अचानक भाभी जल्दी ही फिर माँ बन रही थीं । ग्यारह महीने में दूसरा बच्चा हो गया , विदेश में दोनों नौकरी कर रहे थे ऐसे में नौकरी के साथ दो बच्चों की परवरिश मंहगी और मुश्किल थी । क्या करें , कैसे करें , समझ नही आ रहा था , माँ का वीज़ा नही मिल रहा था । अकेली माँ कहाँ रहेंगी सोच कर माँ गीता-दिनेश के साथ ही रहती थीं इसलिए सोचा विदेश में परेशान होने से अच्छा था कि एक बच्चा माँ और गीता के पास पल जाए । बस बीस दिन के बाबू को लेकर भाई-भाभी हिंदुस्तान आ गए , तब तक गीता के पास सिर्फ़ चार वर्ष की पीकू थी , आदी का जन्म नही हुआ था । पीकू छोटे , गोल-मटोल भाई को देख कर पागल हो गई । नाच-नाच कर सारा घर सिर पर उठा लिया , सारे मौहल्ले में ख़बर दे आई कि मेरा छोटा भाई आया है । छोटा सा बाबू कुछ ही दिनों में सबका दुलारा बन गया था । बड़ा बेटा साल भर का था , माँ को पहचानने लगा था इसलिए उसे छोड़ना मुश्किल था , बाबू अभी रिश्तों को नही जानता था इसलिए उसे वही हिंदुस्तान में रहना पड़ा । भाई-भाभी उसे गीता की गोद में देकर वापस चले गए । माँ दिन-रात बाबू की देखभाल में व्यस्त हो गईं । एक साल बाद गीता फिर माँ बनी और घर में आदी आ गया , बाबू डेढ़ साल का हो गया था । पीकू और बाबू को एक नया खिलौना मिल गया । तीनों बच्चे गीता और दिनेश के लिए बराबर थे लेकिन गीता कहीं दिल ही दिल में बाबू के लिए कमज़ोर थी । उसे अगर कुछ हो जाता या एक-दो दिन के लिए उसे छोड़ना पड़ता तो वो बेचैन हो जाती थी । बाबू क्या सोचता था गीता के लिए वो नही जानती थी लेकिन अगर कोई ये कह देता कि वो उसकी असली माँ नही तो बाबू उदास होकर उसके पास आता और पूछता ,

मम्मी , वो चाचा कहते हैं कि आप मेरी असली माँ नही , मेरी असली माँ विदेश में है । क्या आप मेरी माँ नही ?

ये सुन कर गीता का दिल बिखर जाता और उसे सीने से लगा कर कहती ,

नही बाबू , चाचा ग़लत कहते हैं , मैं ही तेरी माँ हूँ और विदेश वाली भी तेरी माँ हैं । अबकी कोई ऐसा कहे तो कहना कि कृष्ण की भी तो दो माँ थीं । अगर कृष्ण की दो माँ हो सकती हैं तो मेरी भी हो सकती हैं ।

ये सुनते ही बाबू की आँखों में चमक आ गई और भागता हुआ चाचा के पास जाकर बोला ,

आपको इतना भी नही पता ! कृष्ण जी की दो मम्मी थीं , मेरी भी वैसे ही दो मम्मी हैं ।

इसके बाद से वो बेफ़िक्र हो गया और सबको ये बात बताता । उसके छोटे से दिल में न जाने कब से ये उल्झन चल रही होगी जो उस दिन सुलझ गई थी । बाबू मस्त बच्चा था , उसे एक पल भी बैठाना मुश्किल काम था । उसके मन में हर वक्त कुछ चलता रहता था , स्कूल की टीचर की यही शिकायत रहती कि वो एक जगह टिक कर बैठता ही नही । गीता बहुत समझाती ,

देख बाबू , स्कूल में टीचर को परेशान मत किया कर , अपनी सीट पर टिक कर बैठना चाहिए , क्लास में ईधर-उधर नही भागते ।

ये सुनकर बाबू की शैतान आँखें मुस्कुरा देती और हाँ में सिर हिला देता लेकिन बाबू तो बाबू था अगर एक जगह टिक कर बैठ गया तो वो बाबू कहाँ रहा । ये समझने – समझाने का सिलसिला यूँ ही चलता रहा लेकिन वो तो वही रहा । सब टी वी देखते और वो उल्टा बैठ कर सबको देखता , पता नही उसे सबके चेहरे पढ़ने में क्या मज़ा आता था । अगर बाबू को माँ अपने साथ दो-चार दिन को कहीं ले जातीं तो घर में सन्नाटा सा छा जाता , पीकू और आदी उदास उसके आने का इंतज़ार करते । उसके घर में घुसते ही खुशी की लहर उठ जाती , वे शावक के बच्चों की तरह एक-दूसरे के पीछे भागते , लोटपोट होते । हर संभव पागलपन करते वे बड़े होने लगे और वो दिन आ गया जब बाबू को अपने मम्मी-पापा और भाई के पास जाना था । पीकू सुनकर बहुत रोई लेकिन आदी इतना नही समझ पाया कि वो कितनी दूर और कहाँ जा रहा था । उसके लिए बाबू उसका बड़ा भाई था जो उसे गली के दादा की तरह सारी मुश्किलों से बचाता रहता था । शायद ये समझ बाबू को भी नही थी कि वो उन सबसे कितनी दूर और कहाँ जा रहा था । उसके छोटे से दिल-ओ-दिमाग़ में दुनिया और लोगों की दूरियों का अंदाज़ा नही था । उसके लिए ये सब कुछ साईकिल की राईड का सा था जो उसने ख़ुद सीखी थी लेकिन उसे ब्रेक लगाने नही आते थे । वो तो जब रुकना होता तो बस कूद जाता था फिर चाहे जो भी हो । वो बचपन से ही ऐसा था , गीता उसकी इन हरकतों से डर कर उसके पीछे भागती रहती थी । वो अब तक अपने सपनों में उसके पीछे ही भागती रहती है । बाबू बड़ा हो गया , उसने डरना तो जैसे सीखा ही नही था , शायद सारे डर को उसने छ साल की उम्र में पीछे छोड़ दिया था । समुद्र की गहराई से लेकर आसमान की ऊँचाईयों को वो आसानी से नाप देता था । उसका वो भागता मन गीता के मन को भारी कर देता था , मन की वो चुभन जाती ही नही थी कि उसने छोटे से बाबू को अकेला छोड़ दिया था । कुछ सालों बाद भाई-भाभी , बच्चों को लेकर हिंदुस्तान वापस लौट आए थे और वो उसी शहर में थे । बाबू कभी-कभी छिप कर स्कूल से गीता के पास आ जाता और उससे लिपट कर मम्मी कहता । वो कुछ खोया-खोया सा रहता था उसका चेहरा देख गीता भी कहीं डूबने लगती थी लेकिन दोनों मूक रहते थे । दुनिया के सामने अब बाबू उसे बुआ कहने लगा था , यही उसे समझाया गया था । उसने भी दुनिया को दिखाने के कई मुखौटे ओढ़ लिए थे । जब भी गीता उससे मिलती तो उसे लगता कि वो जो है वो दिखता नही और जो दिखता है वो है नही । अब भी वो एक पल टिक कर नही बैठता , उसके भीतर बहुत कुछ भरा था । कुछ था जिसकी उसे अब भी तलाश थी । लोगों की नज़रों में उसे अपनी ज़िंदगी का संतुलन बैठाना नही आता लेकिन गीता को लगता है कि वो अपनी सारी ऊर्जा उस संतुलन को बैठाने में ही लगाता है । उसे लगता है कि वो अब भी अकेला बढ़ रहा है वैसे ही जैसे छ साल का अकेला जा रहा था और बीच में अचानक मुड़कर देख लेता है कि कोई उसके साथ है या नही ।

 

माला जोशी शर्मा

तलाश

अपने से कहीं दूर भाग जाना चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ,

हर सुबह कहीं भटक जाती हूं ,

ढलते सूरज के साथ डूब जाती हूं ,

रात के अंधेरे में खो जाती हूं ,

ख़ुद को ढूंढती रह जाती हूं ,

अपने से कहीं दूर भाग जाना चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ।

हर गली , हर राह में जाती हूं ,

पेड़ों की शाखों में अटक जाती हूं ,

घने फूलों में मन को उलझाती हूं ,

फिर उलझन को सुलझाती हूं ,

अपने से कहीं दूर भाग जाना चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ।

अधूरे गीत की कड़ी बन जाती हूं ,

सुर – ताल कहीं से उधार लाती हूं ,

बिखरे पन्नों को क्रम से लगाती हूं ,

काग़ज़ के टुकड़ों को यादों की गोंद लगाती हूं ,

अपने से कहीं दूर भाग जाना ‌ चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ।

माला जोशी शर्मा

 

 

 

 

 

मौन

दिल की बात कह देना , चैन से सो जाना

अच्छा होता है लेकिन कितना मुश्किल भी तो होता है !

उसने पहली बार मुझसे कहा था

मेरा हाथ लेकर दिल पर भी रखा था कि

तुम सा साथी मिल जाए तो जीवन संवर जाए ।

मेरा दिल एक बार को धड़का ज़रुर था

लेकिन उसने मुझसे कहा तो कुछ भी नही था ,

मेरा मौन था , उसने समझा ये हया में लिपटा इश्क था ।

कई बार ज़ुबां ने दिल के तारों की हरक़त महसूस कर कुछ कहना चाहा

लेकिन किसी के दिल को दुखाना मुझे कब मंज़ूर था ।

ठंडी बालू पर क़दमों के निशां पड़ते रहे और हम मौन चलते रहे , चलते रहे ।

मुझे रातों में सोना था , दिल की बात खुलकर किसी से कहना था ,

दिल की बात कह देना , चैन से सो जाना

अच्छा होता है लेकिन कितना मुश्किल भी तो होता है ।

 

 

बूंद बूंद ज़िंदगी

blade of grass blur bright close up
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बूंद-बूंद यूँ ज़िंदगी भरती जा रही है ,

हर दिन वो बदलती जा रही है ,

बच्चे थे तो बड़े होने के सपने देखा करते थे ,

माँ-बाप भी हमारे सपनों का घट बूंद-बूंद भरा करते थे ,

कब माँ-बाप बिछड़ गए और ज़िंदगी यूँ ही बूंद-बूंद भरती रही ,

हम परिवार वाले हो गए और हमारे बच्चे भी शामिल हो गए ,

वही किस्सा हम भी दोहराते रहे , अपने साथ उनके सपनों का घड़ा भी भरते रहे ,

फिर बच्चे छूटते रहे और हम अपना घड़ा बूंद-बूंद यूँ ही भरते रहे ,

ज़िंदगी बूंद-बूंद यूँ ही भरती जा रही है , हर दिन वो बदलती जा रही है ।

समझ नही आ रहा कहाँ जा रही है ?

पहले मैं मन की करती थी , मन से चलती थी

अब मैं मन की कब करती हूँ ? मन से कम चलती हूँ ।

मन की कम सुनती हूँ और इग्नोर करती हूँ ,

चलती हूँ तो दवाईयाँ साथ रखती हूँ ।

बस बूंद-बूंद यूँ ज़िंदगी भरती जा रही है ,

कब छलक जाएगी पता नही लेकिन मैं फिर भी उसे बूंद-बूंद भरती जा हूँ ,

हर दिन वो बदलती जा रही है ।

माला जोशी शर्मा

कितना है बदनसीब ज़फ़र

 

बहादुर शाह ज़फ़र हिंदुस्तान के आख़िरी बादशाह की ग़ज़ल ,

“लगता नहीं है दिल मेरा , उजड़े दयार में” सुन रही थी कि विचारों का सिलसिला शुरु हो गया । बादशाह को अंग्रेज़ी हुकुमत ने कैद कर बर्मा भेज दिया , ये अंग्रेज़ कुछ भी कर जाते थे ! वो उस , बूढ़े , लाचार बादशाह की बग़ावत से इतना घबरा गए कि इतने बड़े हिंदुस्तान में कहीं भी क़ैद करने की नही सोची । बेचारगी और अकेलेपन के अपने अंतिम दिनों में बादशाह कहते हैं ,

कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए

दो ग़ज़ ज़मीं भी ना मिली कू-ए-यार में

विचार कीजिए कि वो उस समय कितने दर्द और रुही कुल्फ़त से गुज़र रहे होंगे । ये दर्द शायद अंग्रेज़ी हुकूमत नही समझ पाई , समझती तो शायद उन्हें हिंदुस्तान में ही दफ़्न करने की इजाज़त दे देती लेकिन उन्हें भय किसी और बात का था । हुआ ये कि बादशाह ने बर्मा में ही आख़िरी साँस ली , उनकी रुह तड़पती रही और उन्हें वहीं दफ़्न कर दिया गया । उन्हें क्या पता था कि कभी ऐसा भी होगा या ऐसा भी ज़माना आएगा कि जहाँ दफ़्न करना या होना इतना दर्द भरा नही होगा । ऐसा मेरे ज़हन में तब आया जब मैं विदेश में रही । मेरी पहली प्रतिक्रिया तो हैरानी ही थी क्योंकि मैंने इससे पहले ऐसा कभी न सुना था और न पढ़ा था , हिंदुस्तानी जो ठहरी । एक दिन टी वी देखते हुए देखा कि अजीब विज्ञापन है , पहले तो मेरी समझ में नही आया लेकिन जब फिर से वही विज्ञापन आया तो ध्यान दिया कि फ़्यूनरल का विज्ञापन है । यहाँ दफ़्न करने के लिए विज्ञापन दिए जाते हैं जिनमें मरने को इतना ग्लैमरस बना कर दिखाते हैं कि पूछो मत । फ़्यूनरल के लिए कंपनियाँ चल रही हैं जो सुंदर कफ़न पसंद करने से लेकर आपकी पसंद के किन फूलों से आपको सजाया जाएगा तक की गारंटी लेती हैं । अब आप कहेंगे कि इसमें क्या बुराई है ? बिल्कुल कोई बुराई नही है , आप मरने के बाद क्या चाहते हैं ये आपका व्यक्तिगत मसला है । मैं केवल एक रिवाज़ की बात कर रही हूँ , संस्कारों की बात कर रही हूँ , संस्कारों की भिन्नता की बात कर रही हूँ जिसके कारण हिंदुस्तान के बादशाह ने रंजोग़म में दम तोड़ा । बेचारे बादशाह , आज के युग में पैदा हुए होते तो ! तो , वो भी किसी ऐसी कंपनी को हायर कर सकते थे और उनका जनाज़ा भी शान-ओ-शौकत से निकलता लेकिन जनाब , तब आपको शायद ये ग़ज़ल न सुनने को मिलती जो आपकी आँखें नम कर देती है ।

दरअसल , मैं थोड़ी कन्फ़्यूज़ हूँ , मुझे इन फ़्यूनरल के विज्ञापनों ने दुविधा में डाल दिया है । मेरे विचार कुछ गड्ड-मड्ड से हो रहे हैं , सच मानिए तो शुरु में मैं सकते में आ गई थी कि ये क्या विज्ञापन है ! हज़म होने में थोड़ा समय लगा और बुढ़ापे के अकेलेपन और असुरक्षा की भावना का अंदाज़ा भी हुआ और अंजाने में ही दो संस्कृतियों की तुलना भी हो गई । यानि ज़फ़र साहब को तो विदेशियों ने देश निकाला दे दिया था इसलिए उनकी रुह तड़पती रही लेकिन आप तो अपने ही देश में अपने जनाज़े के लिए अपनों के काँधे नही , अंजानों के काँधे ढूँढ रहे हैं ! दूसरी ओर एक विचार आता है कि जब मर ही गए तो कौन काँधा दे रहा है कौन नही  इससे मतलब ? लेकिन हिंदुस्तानी इस बात को समझने में थोड़ा समय लगाएगा , वो कहेगा कि ज़फ़र साहब का दर्द गहरा था , उनके साथ ज़्यादती हुई । मरने के बाद उनकी आखिरी इच्छा पूरी होनी चाहिए थी और उन्हें हिंदुस्तान में दफ़्न करने की इजाज़त मिलनी चाहिए थी , लेकिन मसला राजनैतिक था , बगावत का ख़तरा था इसलिए वो कहते हैं ,

बुलबुल को बागबाँ से ना सैयाद से ग़िला ,

किस्मत में क़ैद लिखी थी फ़सल-ए-बहार में ।

यानि कि हालात तो आज भी वही हैं केवल परिस्थितियों का अंतर है । विचार करने की बात है कि क्या हमारे बुज़ुर्ग इस परिस्थिती की कगार पर खड़े हैं ! जिस दिन हिंदुस्तान में इस तरह के विज्ञापन आने लगेंगे उस दिन समझ लो कि क्या होगा । मेरे विचार से वो दिन दूर नही क्योंकि धीरे-धीरे एक संस्कृति लुप्त हो रही है । मैं कल्पना नही कर पा रही कि जिस दिन हिंदुस्तान में ऐसे विज्ञापन आने लगेंगे तो लोगों की प्रतिक्रिया क्या होगी क्योंकि हमारे लिए तो काँधा कौन देगा इस पर न जाने क्या-क्या कह दिया गया है और कहा जाता है । शायद इसीलिए बहादुर शाह ज़फ़र ने अपने आप को बदनसीब कहा होगा ।

समय बदल रहा है , सोच बदल रही है ,ये तो हमें मानना ही पड़ेगा , इस का प्रमाण मुझे हाल ही में मिला । हमारे अभिन्न मित्र हैं , उनके 96 साल के पिता जिन्हें मैं अपने गुरु समान मानती हूँ , बेहद प्रगतिशील व्यक्ति । तथाकथित उच्च ब्राहमण कुल में जन्में ,  उन्होंने अपना शरीर छोड़ने से पहले एक वसीयत लिखी कि जब उनकी आत्मा शरीर त्याग दे तो उनका शरीर आर्मी हॉस्पिटल वालों को दान कर दिया जाए जहाँ उनका शरीर शोध कार्य के काम आ सके ।  उन्होंने पहले ही आँखों के अस्पताल में अपनी आँखों को दान के लिए लिख दिया था । जिस दिन उन्होंने अपने प्राण त्यागे तो उनके पुत्र ने उनकी इच्छानुसार उनका शरीर दान कर दिया । उन्होंने तो उपरोक्त सारे विवाद ही समाप्त कर डाले ! उन्होंने , काँधा देना , दफ़्न करना , मुखाग्नि देना जैसी औपचारिकताओं को समाप्त कर आत्मा और परमात्मा की बात सोची और इस शरीर को नश्वर ही माना , मिट्टी ही माना । ये बात हम कहते-सुनते तो हैं लेकिन मानते नही । कबीर को पढ़ते हैं लेकिन समझते नही , कबीर कह गए ,

माटी कहे कुम्हार से , तू क्या रौंदे मोए ,

एक दिन ऐसा आएगा , मैं रौंदूँगी तोए ।

शरीर की नश्वरता पर उन्होंने अनगिनत बातें , अलग-अलग तरह से उदाहरण दे कर कहीं ,

उड़ जाएगा , हंस अकेला , जग दरशन का मेला……

जिस दिन हम इस सोच को अपना लेंगे तो अपने को दफ़्न के लिए बदनसीब नही कहेंगे ।

चलिए सोच बदलते हैं ।

माला जोशी शर्मा