नया कदम

ठीक से कह नही सकती कि मैंने यूँ लिखना क्यूँ पसंद किया । शायद अपनी इस तलाश के सफ़र में एक और पन्ना खोल दिया । अपने आस पास घट रहे जीवन के कुछ पलों को अपनों से बाँटने की चाह में ये कदम उठाया । कुछ ऐसे भी साधारण लोग होते हैं कि उनके पास से गुज़रो तो न भूलने वाला एहसास छोड़ जाते हैं । सोचा उनके बारे में लिख दूँ क्योंकि मेरे लिए वे असाधारण हैं और प्रेरणा के स्त्रोत भी । कुछ ऐसी घटनाएँ भी लिखने की चाह मन में थी कि जिन्हें पढ़ कर शायद कहीं कोई बदलाव की उम्मीद जागे । अब मैं कोई नेता या उपदेशक नही हूँ और न बनना चाहती हूँ । मेरे जैसे कई होंगे जिनके पास बहुत कुछ होगा कहने को , बस उन्हीं की बातें लिखूँगी । इस श्रृंखला की शुरूआत मैं अपने गाँव के ऐसे व्यक्ति के संघर्षमय जीवन की कहानी से कर रही हूँ जिसने मुझ पर गहरा असर डाला । उसने सिखाया कि जीवन सिर उठा कर जीने का नाम है । हालात जैसे भी हों सुधारे जा सकते हैं । कहानी में थोड़ी काल्पनिकता डालने के लिए रवी भाई क्षमा । यह उनकी अधूरी कहानी है , उनकी दिवंगत आत्मा को शत-शत प्रणाम ।

गुमशुदा ख़्वाब

गाँव की तंग , हथेली की रेखाओं सी फैली गलियों में रवी की ट्रायसाईकिल अनोखी सी आवाज़ वाला हॉर्न बजाती हर रोज़ घूमती थी । ये हॉर्न भी शायद रवी की ही इजात थी , और बच्चे घरों से निकल , रवी भैया….. रवी भैया……., करते हुए उसके पीछे भागते…….कारण , उसकी ट्रायसाइकिल के पीछे , टोकरी में भरी रंगबिरंगी पतंगें थीं । बैटमैन , स्पाइडर मैन , सूपरमैन और न जाने क्या – क्या उसकी पतंगों में बना होता । दशहरे के दिनों में वे पतंगें रावण , रामचंद्र जी , हनुमान जी आदि का रूप ले लेती और दिसंबर के महीने में सांता बन जातीं………। बच्चे उसकी पतंगों के दीवाने थे , वैसे बड़े भी पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी के दिनों में ऑर्डर पर उससे पतंगें बनवाते थे । रवी के हाथों की कलाकारी उन पतंगों पर निखर कर आती । उस ऊपर वाले ने उसे जनम से पैर तो नही दिए थे लेकिन उसके हाथों में कला का जादू भर दिया था । मिट्टी के खिलौनों में ऐसे – ऐसे रंग भरता कि लोग हैरान हो जाते , उसकी सारी कल्पनाएँ उन रंग बिरंगे कागज़ों और मिट्टी के खिलौनों में उतर जाती । घर में माँ , दो भाई और एक बहन थी , बहन जो जीवन भर बच्ची ही रही , कभी बड़ी हुई ही नही , दोनों छोटे भाई स्कूल में पढ़ते थे । पिता गाँव में पंडिताई कर के घर चलाया करते थे लेकिन एक दिन लंबी बीमारी के बाद उन्होंने भी आँखें मूँद लीं…………, तब से रवी ,घर का बड़ा बन गया था । दसवीं के बाद उसे स्कूल छोड़ना पड़ा । ये ट्राईसाईकिल रवि के पैर बन गई थी , कौन सा काम था जो रवी नही कर सकता था । सारे गाँव के बिजली के बिल , टेलीफ़ोन के बिल शहर जा कर वही तो भरता था । काम करते – करते अपने फ़ेवरेट मन्ना डे के गीत गुनगुनाता । कोई भजन – कीर्तन का समय हो , तो रवी  को सबसे पहले याद किया जाता , और वो भी ऐसे भजन गाता कि लोगों की आँखों से आँसू बहते । रामलीला के दिनों में रामचंद्र जी के सभी संवाद रवी की आवाज़ में होते । गाँव वाले उसे प्यार से नरसिंह भगत कह कर बुलाते । लेकिन इस नरसिंह भगत को उस नरसिंह भगत की तरह हुंडी नही मिली थी , घर में पैसे की तंगी बनी ही रहती ।

रवी दिन – रात पतंगें और मिट्टी के खिलौने बनाता लेकिन पतंग और मिट्टी का मोल बड़ी मुश्किल से कोई देता……….

अरे मिट्टी के इतने दाम ……. , और ये पतंग ही तो हैं , इसमें क्या है……..

सब यही कहते और ले दे के थोड़े बहुत पैसे मिल जाते……..मन में विचार आता कि आगे पढ़ लेता तो कोई नौकरी ही कर लेता……..ऐसा कब तक चलेगा ?  वो अपने परिवार को , खुद को इस बेचारगी के जीवन से बाहर निकालना चाहता था………..

पैर नही दिए ईश्वर ने तो क्या हुआ ? जो मिला है ,ये क्या कम है……..?  यही सोचता और फिर काम में लग जाता।

हर रोज़ नियम से भानसिंह की दुकान पर जाकर अख़बार पढ़ना उसका शौक था , गाँव के पढ़े – लिखे लोगों से , देश – विदेश पर चर्चा भी करता । प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की फ़ोटो अख़बार में देख कहता……….

एक दिन मैं भी इनके साथ फ़ोटो खिंचवाऊँगा…….

लोग हँस कर कहते………..

भगत जी सपने बहुत देखते हो….

और वो मुस्कुरा कर कहता……….

सपने देखने में क्या जाता है……

एक सपना उसकी आँखों में हमेशा तैरता रहता , एक सुखी जीवन का सपना……..अपने ईंटों के अधबने घर को पक्का करने का सपना , अपनी माँ , बहन और भाईयों के लिए खुशियों का सपना । कुछ करने की आग मन में भर जाती , लेकिन राह नही सूझ रही थी ।  उदासी और निराशा के बादल कभी घिर जाते तो कभी छंट जाते । आज कल एक नया गाना उसकी ज़बान पर चढ़ गया था जो दिनभर गुनगुनाता……….

अभी – अभी हुआ यकीं कि आग है मुझ में कहीं………

बात ये थी कि एक दिन उसने अख़बार में पढ़ा कि दिल्ली में विकलांगों की एक रेस होने वाली है , उसके लिए अपना नाम इस पते पर भेजें……..इनाम में अच्छी धनराशी और दिल्ली में एक टेलीफ़ोन बूथ मिलेगा । उसने वह ख़बर काट ली और इरादा कर लिया कि वो इसमें हिस्सा लेकर रहेगा , हो सकता है यही रास्ता उसके ख़्वाबों को ताबीर में बदल दे । उसने ख़बर ध्यान से पढ़ी और दिया गया फ़ार्म भर कर भेज दिया । बस फिर क्या था वो रेस जीतने की पूरी तैयारी में जुट गया……..हर रोज़ अपनी ट्रायसाईकिल को शहर ले जाता तो समय देखता और दिन ब दिन अपनी स्पीड तेज़ करता…….उसकी साईकिल उसे हाथ से चलानी होती……कुछ ही दिनों में उसके हाथों में छाले पड़ गए , पर वो रूका नही । हाथों पर पट्टी बाँधी और हर रोज़ चलता रहा…….

ट्रायसाईकिल चलाते – चलाते हाथ इतने घायल हो गए कि पतंग बनानी भी मुश्किल हो गई थी । माँ उसकी हालत देख दुखी हो जाती , लेकिन पतंग नही बनाएगा तो घर खर्च कैसे चलेगा……..यही सोच कर माँ से कहता……..

इतना भी दर्द नही है कि पतंग ना बना सकूँ……..।

घर में सब पतंग बनाने में उसकी सहायता करते । गाँव वाले इसे पागलपन कहते……

ऐसी पुरानी साईकिल पर भला कहीं रेस जीती जाती है…..

पर उसके पास एक ही जवाब होता……..

जीतूँ या हारूँ इससे क्या फ़रक पड़ता है , यहाँ से निकल कर एक कोशिश तो करूँगा……..।

अब समस्या ये थी कि दिल्ली जाएगा कैसे….इस ट्रायसाईकिल पर तो नही जाया जा सकता…..बस में ट्रायसाईकिल आएगी नही , तो एक ही रास्ता है कि ट्रेन से जाए । रेस की तारीख थी पच्चीस अक्टूबर और सभी प्रतिभागियों को एक दिन पहले पहुँच कर अपने नाम दर्ज़ कराने थे , बीस तारीख़ हो चुकी थी , स्टेशन कैसे पहुँचा जाएगा ये सवाल अभी भी सवाल ही था …… माँ ने समझाया……..

रहने दे , चढ़ने – उतरने में कहीं कोई ऊँच नीच हो गई , तो लेने के देने पड़ जाएँगे , क्यूँ अपनी जान जोखिम में डालता है……

लेकिन रवी का मन तो , अपनी बनाई पतंगों की तरह उड़ना चाहता था , ऊँचे बहुत ऊँचे…….आकाश को छूना चाहता था…..उसके ख़्वाबों की पतंग कट भी गई तो क्या हुआ , एक बार आकाश छू कर तो आएगा ना……..।

बेटा रहेगा कहाँ……….. ?

माँ ने चिंता जताई तो हँस कर कह दिया……

माँ इतना बड़ा रेलवे स्टेशन है , कहीं भी रात बिता लूँगा , तू फ़िकर मत कर……

और तेईस तारीख़ को उसने चलने का इरादा बना लिया , दो जोड़ी अपने सबसे अच्छे कपड़े एक थैले में डाले और स्टेशन की ओर चल दिया…..माँ को हिम्मत दी……….

चिंता मत कर , कुछ नही हुआ , तो घर वापस आ जाऊँगा ।

गाँव में कुछ ने हौसला बढ़ाया तो कुछ ने मज़ाक भी उड़ाया…….लेकिन वो बिना किसी बात का असर लिए चलता रहा…..स्टेशन पर दिल्ली की गाड़ी साढ़े बारह बजे आनी थी और वो ग्यारह बजे ही पहुँच गया था । मन में बस एक ही विचार चल रहा था कि ट्रेन में चढूँगा कैसे , मन में खुशी और उलझन दोनों चल रहे थे , वह पहली बार ट्रेन का सफ़र करने जा रहा था । इससे पहले उसे कभी बाहर जाने का मौका ही नही मिला था ।

रवी टिकट विन्डो पर जाकर टिकट ख़रीद ही रहा था कि इतने में तेज़ हॉर्न बजाती हुई ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आ गई थी । स्टेशन पर लोग अपना – अपना सामान लिए एक दूसरे से टकराते , बेतहाशा भागे जा रहे थे , इस भाग दौड़ में उसे अपना वजूद कुछ खोता सा लग रहा था । वह धीरे – धीरे आगे बढ़ा , समय कम था गाड़ी सिर्फ़ बीस मिनट रूकनी थी अब उसके पास केवल पाँच मिनट रह गए थे , या तो छोड़े या हिम्मत करे………स्टेशन पर लगी बड़ी घड़ी की ओर नज़र दौड़ाई और अपनी साईकिल को एक डब्बे के पास ला कर खड़ा कर दिया , अपने हाथों के सहारे उतर कर पास खड़े लोगों को मुस्कुरा कर देखा……..

जी मेरी साईकिल और मुझे चढ़ाने में…..मेरी सहायता करेंगे……फ्लीज़ ।

पास खड़ी बुज़ुर्ग महिला ने चढ़ रहे दो जवान लड़कों की ओर देखते हुए कहा…. देखते क्या हैं……चढ़ाइए इनको जल्दी , ट्रेन चलने वाली है……।

लड़कों ने फ़रमाबरदार बच्चों की तरह रवी और उसकी साईकिल को ट्रेन में चढ़ा दिया और ट्रेन खिसकने लगी , रवी ने एक गहरी , लंबी सुकून की साँस लेते हुए उस महिला और लड़कों का शुक्रिया अदा किया………

भैया , थैंक्यू , आंटी जी थैंक्यू , आप मदद न करते तो आज मेरी ट्रेन निकल जाती…..।

वो लड़के मुस्कुरा दिए……

आप फ़िक्र ना करें , हम आपकी उतरने में भी हैल्प कर देंगे ।

राह में उन हमसफ़र साथियों से उसकी अच्छी दोस्ती भी हो गई थी । भागती ट्रेन हवा से बातें करती , गाँव , शहर को पीछे छोड़ती जा रही थी और रवी का मन भी उसके साथ भाग रहा था……….अपने सपनों की दुनिया की ओर ।

उसे लग रहा था जैसे वो हवा में उड़ रहा हो , दिल्ली वो भानसिंह के टेलिवीज़न पर खबरों में कई बार देख चुका था , शहर तो वो हर रोज़ जाता था लेकिन दिल्ली जाने का मौका कभी नही मिला था । मन में थोड़ी घबराहट थी पर थोड़ा रोमांचित भी…..कुछ नया देखने और कुछ नया करने का रोमांच । जेब में रखा पर्स टटोला कि ठीक हैं कि नही , कुछ पैसे माँ को घर खर्च के देने के बाद जो बचे वो ले आया था , अब आगे ईश्वर मालिक होगा यही सोच रहा था । मौका मिला तो दिल्ली में कुछ काम भी ढूँढ लूँगा , गाँव के मास्टर जी का लड़का विनोद , वहाँ अच्छे बड़े ओहदे पर लगा है , उसका नंबर भी ले लिया था कोई मुश्किल होगी तो उसे फ़ोन कर लेगा………स्कूल में उसी के साथ तो पढ़ता था….फिर रवी ने घर के हालात के कारण स्कूल छोड़ दिया और विनोद पढ़ गया ।

यही सब सोचता रवी दिल्ली पहुँच गया था । हमसफ़र साथियों ने उतरने में सहायता की । नई दिल्ली स्टेशन पर उतर पहले उस जगह जाना चाहता था जहाँ उसे अपना नाम दर्ज़ कराना था । पता अख़बार पर लिखा था लोगों से पूछता हुआ चल दिया , अब तो साईकिल ही उसकी सवारी थी । दिल्ली की सड़कों पर दौड़ता ट्रैफ़िक , भागते लोग , उँची – उँची इमारतें जैसे महासागर में डूब रहा था वो , रास्ते में आते – जाते लोगों के अनमने मन से बताए गए रास्तों पर चला जा रहा था । टाईम ज़्यादा हो गया था , दिन भी छिपने लगा था , मंज़िल कहाँ थी उसे कुछ पता नही था । थोड़ी देर साँस लेने को वहीं बैठ गया और अंजान चेहरों को देखता रहा ,  पास ही एक खोमचे वाला चने बेच रहा था , देख कर भूख लग आई , अजनवी शहर में दो अजनवी कुछ ही पलों में अपने से हो गए , भैया जी नए हो शहर में….. ?  खोमचे वाले ने पूछा ।

हूँ…..रास्ता ढूँढ रहा था , लगता है भटक गया हूँ , भैया आप ही बता दें ये नैशनल स्टेडियम कहाँ होगा……

रवी की थकी आवाज़ सुनकर खोमचे वाले ने एक दोने में चने भर कर उसकी ओर किए……

पहले ये खाओ……आप इंडिया गेट पर हैं और ये रहा सामने ही स्टेडियम ।

जब भूख लगी हो तो चने भी पकवान लगते हैं……, इंडियागेट के नाम से आँखों में चमक आ गई , मन देशभक्ति से भर गया……

वाह , भैया , जवान ज्योति….. !!

रवी ने चने के पैसे खोमचे वाले की ओर बढ़ाते हुए कहा तो अजनवी मित्र ने पैसे नही लिए……..

ये क्या बात हुई भैया , कल मिल जाएँगे , एसी क्या जल्दी है….

रवी उसकी मेहमान नवाज़ी पर मुस्कुरा दिया , फिर कुछ सोच कर गोपाल मास्टर जी के लड़के विनोद को फ़ोन मिला दिया , एक दो बार के बाद उसने फ़ोन उठा लिया……

भाई विनोद मैं यहाँ दिल्ली आया हुआ हूँ रेस में हिस्सा लेने , पच्चीस तारीख़ को रेस है , तू आएगा ना देखने….भाई आइयो ज़रूर , मुझे अच्छा लगेगा । एक तस्सली हुई , चलो कोई तो होगा जो उसकी हिम्मत बढ़ाने आएगा । भानसिंह की दुकान पर फ़ोन कर दिया कि माँ को ख़बर देदे मैं ठीक हूँ । कुछ देर इंडिया गेट पर आराम कर , जवान ज्योति को निहारता हुआ वापस स्टेशन आ गया ,  मन में विचार आया कि विनोद ने उससे एक बार भी ये नही पूछा कि वो कहाँ रहेगा लेकिन फिर उस बात को झटक कर निकाल दिया , जानता था कि विनोद बड़ा आदमी है भला उस जैसे को वह अपने घर क्यूँ बुलाएगा ।

अगले दिन सुबह उठ स्टेडियम अपना नाम दर्ज़ कराने चला गया , पच्चीस तारीख़ में पूरा एक दिन बाकी था , वो आराम नही कर सकता था उसे अपनी साईकिल की मरम्मत करनी थी । आज उसे वो साईकिल , सिर्फ़ साईकिल नही लग रही थी , उसे तो वो अपने ख़्वाबों की वो पतंग लग रही थी जो उसे आसमान में बादलों के पार ले जाएगी जिन बादलों के पार उसकी बनाई न जाने कितनी पतंगें हज़ारों बार हो आईं थीं । वो सोच रहा था कि कितना साथ निभाया है इस साईकिल ने उसका , उसे ये साईकिल स्कूल के हैडमास्टर जी ने दिलवाई थी । उससे पहले तो उसे अपना हाथ जगन्नाथ का मुहावरा ही पता था लेकिन साईकिल मिलने के बाद पता चला कि चलती का नाम गाड़ी होता है । आज भी उसी साईकिल पर वो कुछ ख़्वाब ले कर चला था । रेस सुबह आठ बजे इंडियागेट के पास शुरू होनी थी । सात बजे तक वो इंडिया गेट पर खड़ा था , वो देख रहा था कि सभी की साईकिलें देखने में छोटी और नई तरह की थीं । मन में एक पल को कुछ खटका लेकिन फिर अपनी साईकिल की ओर देखकर मुस्कुरा दिया…..भीड़ जमा हो गई थी , लेकिन उसके लिए वो सभी अजनवी थे , मन घबरा रहा था , पता नही क्या होगा……… एक लाईन से सभी प्रतिभागी खड़े हो गए और हरी झंडी दिखाते ही सब की साईकिलें दौड़ने लगीं……रवी की साईकिल कुछ चली और फिर रूक गई…..उसका दिल जैसे रूक गया…..पूरी ताकत से पैडल घुमाया तो घर्र की आवाज़ के साथ साईकिल एक झटके से चल पड़ी……….पर वो पीछे छूट गया था , बहुत पीछे…..उसके सपने कभी पूरे नही हो पाएँगे ,  आँखों में पानी भर आया और फिर पूरी ताकत से पैडल घूमाने लगा , उसे ये होश नही था कि उसके आगे या पीछे कितने लोग थे , बस वो बेतहाशा पैडल घुमा रहा था , सारे तन की ताकत उसके हाथों में समा गई थी , तभी एक शोर हुआ और उसने देखा कि एक प्रतिभागी सीमा तक पहुँच चुका था , दूसरा पहुँच रहा था……वो रूका नही , मुड़कर देखा भी नही , शोर बढ़ता जा रहा था । उसके हाथ भर गए थे और हथेलियाँ फड़क रही थीं , रवी अंतिम चरण पर पहुँच , निढाल हो अपनी साईकिल पर गिर गया , वो फूट फूट कर रो रहा था । अगले दिन अख़बार में तीन विजेताओं में रवी की फ़ोटो प्रधानमंत्री जी के साथ छपी थी ।

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