लोरी

जब छोटे थे तो लोरी सुन कर सोते थे । जब माँ बनी तो लोरी गा कर बच्चों को सुलाती थी । बिना लोरी सुने उन्हें नींद ही नही आती थी । तब फ़िल्मों में भी लोरी ज़रूर होती थी । “मैं गाऊँ तुम सो जाओ ” , “नन्ही परी सोने चली हवा धीरे आना” , “राम करे ऐसा हो जाए मेरी निंदिया तोहे मिल जाए” ऐसी अनगिनत मधुर , सुरीली लोरियाँ गा कर माँओं ने बच्चों को थपकियाँ देकर सुलाया है । अफ़सोस! आज बच्चे लोरी जानते ही नही ! माँएँ लोरियाँ गाती नही ! इंसान की तरक्की ने कहीं बहुत ही मधुर पलों को भुला दिया जो माँ – बच्चों के मधुर संबंधों को गहरा करता था । वो पल जीवन भर साथ रहते हैं । हम कहते हैं कि अब समय बदल गया , संबंधों में वो गर्माहट नही रही । इसका ज़िम्मेदार कौन है ? सोचना होगा कि हम क्या छोड़े और क्या कभी न भूलें । मोबाइल और कंप्यूटर से समय निकाल कर उन प्यारे पलों को फिर से ज़िंदा करें । फ़ेसबुक पर नही  , टीवी पर कार्टून दिखा कर नही बल्कि बच्चों को बाहों मेें भरकर , लोरी गा कर सुलाएँ , देखिए बच्चा प्यारे सपने देखकर मुुुस्कुराता हुआ उठेगा । माँ के गले से निकली लोरी सीधी दिल को छू लेती है , वैसे पिता भी ये काम बखूबी कर सकते हैं ! चलिए लोरी को फिर ज़िंदा करते हैं ।

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