रात के साए

शहर में भटकते वो रात के साए

है कहीं उनका भी कोई गाँव में ।

फ़ुटपाथ पर सोते हुए

झलती है पंखा आती-जाती गाड़ियाँ ।

लिपटा है वो भी इंच भर की मौत में ,

चला आया यहाँ रोटी की खोज में ।

चूल्हा है ठंडा आज माँ का

अपने बेटे की सोच में ।

सुबह मिली थी लाश एक लावारिस यहाँ

हँह!! न जाने क्यों इन्हें है सोना यहाँ !!

है फ़ुटपाथ भी कहीं सोने की जगह ??

गाड़ी सड़क से आ गई फ़ुटपाथ पर

गाड़ी बड़ी थी क्या करे

था बड़ा वो आदमी

होती हैं उनकी रातें भी बड़ी ।

मर गया तो क्या हुआ ?

है बोझ वो धरती पर बड़ा ।

जीने का हक़ उनको नही

ग़रीबी हटाने का है हमने नारा लिया ।

 

4 thoughts on “रात के साए

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