ज़िंदगी

ज़िंदगी एक दिन मिली थी राह में

मैंने कहा , आ बातें करें तनहाई में

बेवफ़ा है तू बड़ी हर बात में ,

चलती कहाँ है तू मेरे जज़्बात में !!

छोड़ दिया था साथ मेरा , बीच राह में !!

थक गया हूँ , मैं तेरी हर चाल में

कैसे फँस गया हूँ , तेरे जाल में !!

ज़िंदगी मुस्कुराती रही बैठी साथ में ,

जल रहा था दिल मेरा इस बात में ,

थाम कर बाँहें मेरी वो चल पड़ी थी साथ में ,

चल आज को लेकर तू मेरे साथ में ,

मुड़ता है क्यूँ पीछे को लेकर साथ में !!

पानी हूँ मैं , समय की रेत में ,

मुड़ती नहीं फिर रब्त की उस लहर में ।

 

22 thoughts on “ज़िंदगी

    1. समझाने के लिए धन्यवाद । आपका प्रयास निश्चय ही सराहनीय है । मैं अपनी अज्ञानता के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ ।

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      1. क्षमा की बात नहीं है!
        अनभिज्ञता से कौतूहल… से प्रश्न… से संभावना… से उत्तर…. से भिज्ञता … स्वाभाविक है!
        जानकारी (ज्ञान) कहीं से भी आये शुभाशुभ अनुसार ग्राह्य होना चाहिए!
        जब हम सब शिशु थे तो सभी समष्टि से पूर्ण अनभिज्ञ थे…. हम सबने जो जाना, पहचाना, माना, सीखा सब एक-दूसरे से यहीं, इसी संसार से सीखा और सीखने का यह क्रम निरंतर है!
        प्रश्न ही तो ज्ञान का बीज है!
        हम सब एक समान एक यात्रा के यात्री हैं!
        सहयोग बनाए रखियेगा!
        शुभकामनाएं!
        -सत्यार्चन

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      2. आपका हृदय से धन्यवाद । आशा है ये यात्रा प्रगति पथ पर आगे बढ़ती रहेगी और हम लिखते रहेंगे ।

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      3. अवश्य!
        आशायें और आशंकाएं दोनों ही पल्लवित पुष्पित होती हैं… बस आशाओं को खाद पानी भी चाहिए होता है और आशंकाएं खरपतवार की तरह अपने आप होती वर्षा से ही पोषित होती रहती हैं….

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    1. सत्यार्चन जी मैंने अपनी एक कहानी “सज़ा ए मौत” अभी पब्लिश की है । मैं आपसे उसके बारे में टिप्पणी चाहती हूँ । कृपया समय मिले तो पढ़िएगा ।

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  1. 1 और 1 दो ही नहीं ग्यारह भी होते हैं!
    आपका आभार!
    धन्यवाद्!
    प्रयास ही महत्वपूर्ण है… सद्भावी प्रयास का सुफल सुनिश्चित समझना ही श्रेयस्कर!

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    1. धन्यवाद आपका । आपके शब्द बहुत प्रेरणा देते हैं । हिंदी लेखक के पास प्रेरणा की बहुत कमी रहती है ।

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  2. क्योंकि हिंदी विपन्न है और होती जा रही है… क्योंकि हरिशंकर परसाई जी ने जिस बात पर लानत जताई थी पहले वही गर्व का कारण समझा जाने लगा…. फिर विवशता बन गई …. “अपनी मां को को नि:सहाय, निरुपाय और निर्धन दशा में छोड़ कर, दूसरे की मां की सेवा में रत हो; ऐसे अधम की कृतघ्नता का क्या कहना!” स्कूल में शायद “गद्यभारती” या निर्झरणी में कक्षा में जिस समय से पढ़ा सुना, छू गया , याद हो गया, कभी भूला नहीं…

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