ज़िंदगी

ज़िंदगी एक दिन मिली थी राह में

मैंने कहा , आ बातें करें तनहाई में

बेवफ़ा है तू बड़ी हर बात में ,

चलती कहाँ है तू मेरे जज़्बात में !!

छोड़ दिया था साथ मेरा , बीच राह में !!

थक गया हूँ , मैं तेरी हर चाल में

कैसे फँस गया हूँ , तेरे जाल में !!

ज़िंदगी मुस्कुराती रही बैठी साथ में ,

जल रहा था दिल मेरा इस बात में ,

थाम कर बाँहें मेरी वो चल पड़ी थी साथ में ,

चल आज को लेकर तू मेरे साथ में ,

मुड़ता है क्यूँ पीछे को लेकर साथ में !!

पानी हूँ मैं , समय की रेत में ,

मुड़ती नहीं फिर रब्त की उस लहर में ।

 

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