चाँद

ओ चाँद !! तू कितना अकेला है !!

तारों से भरा आसमाँ है

पर चलता बिल्कुल अकेला है ।

वो ग्रहण भी आता है

तो तुझे ही सताता है !!

कभी लाल तो कभी काला कर जाता है ।

वो हल्के , रूई से बादल आते हैं

तुझ को ही ठग जाते हैं !!

अमावस तुझे अंधेरे में धकेल जाती है ।

फिर एक दिन पूर्णिमा आती है ,

बड़ा तरसा के आती है ,

तुझे दूध से नहला जाती है ।

अमावस आएगी ये सोचकर तू फिर घटता जाता है ,

मैं ताकती हूँ तुझे , मेरा दिल तेरे ही साथ चलता है ।

ऐ.., मेरे हमसफ़र , तेरी राह आसमाँ पे है ,

तुझे सारा जहाँ ताकता है ,

गीतों में ज़िक्र तेरा आता है ।

मेरी राह इस ज़मीं पे है ,

कहाँ बढ़ी , कहाँ घटी , कौन जानता है ,

कभी तू भी फ़लक से ज़मीं पे आ के तो देख ,

नज़रों का फेर ही यहाँ नज़र आता है ।

फिर भी ऐ…मेरे हमसफ़र , तेरा-मेरा एक सा रास्ता है ।

 

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