पानी

 

पानी तो बरसा , बहुत बरसा ,

आसमान के नदी-नाले तोड़ कर बरसा ,

मानो पूर्वजों के सारे दर्द बूँदों में बदल गए !

ईश्वर ने सोचा ,

कोई भागीरथ फिर नही आया तो क्या ,

बच्चा मेरा घरती पर प्यासा क्यों तरस रहा ?

फिर बरसा , बहुत बरसा

लेकिन ये क्या ,

सारा पानी यूँही बिखर गया ?

कहीं गटर में तो कहीं बाढ़ में बदल गया !

समंदर और नदियों का किनारा छोटा पड़ गया !

बावलियाँ और जोहड़ को सीमेंट से भर दिया !

मेरा भेजा पानी तबाही बन गया !

ये बच्चा तो बड़ा लापरवाह निकला !

धन सहेज रखा और जीवन बेकार बहा दिया !

ये मैंने इसमें लालच का पुर्ज़ा कब लगा दिया ?

 

 

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