काठमांडू कॉलिंग

एक समय ऐसा आता है कि आप सबकी खुशी और सबके मन की सोचते-सोचते अपने मन की सुनना और समझना भूल जाते हो । कभी वो बोलता भी है तो उसे हँस कर पागल समझने लगते हैं । कभी अंजानी गहरी उदासी घेर कर उसे इतना डुबो देती है कि हाथ-पाँव मार कर वो साँस लेने ऊपर आना चाहता है ।
मेरा भी मन हाथ-पाँव मार रहा था , साँस लेना चाहता था । बचपन की यादें रह-रह के एक टीस उठातीं । पता था कि वो बहुत पीछे छूट गया था फिर भी वो धुंधले चेहरे आँखों के पानी में तैरते रहते थे । हॉस्टल में हर पल साथ रहने वाले , खेलने वाले वो साथी एक हवा के झोंके से बुझे दीए की तरह एक दिन अचानक छूट गए । उनके अचानक छूटने का दर्द भीतर ही भीतर पल रहा था ये एहसास भी कभी सिर नही उठाता था । पता नही कब और कैसे चालीस वर्षों बाद चमत्कार सा हुआ , बढ़ती तकनीक के कारण किस्मत ने ज़ोर मारा और बिछुड़े साथी मिलने लगे । कुछ मिले , कुछ गुमशुदा ही हैं , शायद कभी मंज़िल पर चलते-चलते वो भी मिल जाएँ । इतने सालों बाद मिली मेरी बचपन की सहेलियों ने काठमांडू जाने का प्रोग्राम बना डाला । तब नेपाल से कई संपन्न परिवारों की लड़कियाँ पढ़ने भारत आया करती थीं । उनमें से कुछ हमारी क्लास में थीं । साथियों को जोड़ने में अहम भूमिका निभाने वाली हमारी साथी रेनू वहीं की थी । बस मेरी बेचैनी शुरू हो गई । कैसे जा पाऊँगी ? सब कुछ कैसे छोड़ पाऊँगी ? इस बीच जीवन में बहुत कुछ चल रहा था , पालमपुर छोड़ना , पति की तबीयत , बेटी के जीवन में बदलाव आदि-आदि । अब ये सब छोड़ कर सहेलियों के साथ काठमांडू निकल जाना बड़ा मुश्किल लग रहा था । पति क्या सोचेंगे , बेटी क्या सोचेगी , घरवाले क्या सोचेंगे , सोचते – सोचते दिल की धड़कनें बेचैनी में बदल गईं । मन में कहीं एक विचार कौंध जाता , इससे अच्छा है कि ये ट्रिप कैंसिल ही हो जाता , लेकिन हज़ारों रुपयों का नुकसान जो पहले ही बुकिंग में लग चुके थे । ऐसी दुविधा कि पूछो मत , मन कहीं गहराईयों में डूब कर छिप जाना चाहता था । कछुए की तरह बाहरी सख़्त आवरण ओढ़ कर पड़ा रहना चाहता था । काठमांडु में बैठी हमारी सहेली रेनू सारी बुकिंग करा चुकी थी । दरअसल वो वहीं रहती थी , जब हम हॉस्टल में थे तब भी वो नेपाल से आया करती थी । उससे मिलने और सब के साथ एक बार फिर जीने की उत्सुकता तो बहुत थी लेकिन जैसे-जैसे जाने के दिन पास आ रहे थे पता नही क्यों दिल बैठा जा रहा था । घर , परिवार को छोड़ कर जाना बड़ा अजीब सा लग रहा था । चालीस वर्षों में कभी ऐसा नही हुआ कि परिवार को छोड़कर अकेली घूमने गई हूँ । कभी बच्चों का दिल टटोलती तो कभी पति का कि कहीं उन्हें मेरा जाना बुरा तो नही लग रहा ? अपना ही मन चोर हो रहा था । नातिन को छोड़कर जाने में दिल भारी हो रहा था , आँखें बार-बार नम हो रही थीं ।
आखिर चौदह नवंबर के दिन हमें निकलना था । हमने दिल्ली एयरपोर्ट पर मिलने का समय निश्चित किया । बेटी एक दिन पहले ऑस्ट्रेलिया चली गई और मुझे अगले दिन काठमांडू के लिए निकलना था । रातभर नींद मुझसे भागती रही , सुबह की इंतज़ार नही करनी पड़ी । मन में चोर सा लिए एयरपोर्ट के लिए निकली तो यही लगता रहा जैसे कोई अपराध कर रही हूँ । मुझे यूँ अकेले सब छोड़कर नही आना चाहिए था , ज़िम्मेदारियाँ दिल पर हावी हो रही थीं । पता नही ये क्या है कि घर से अकेले निकलने में एक अपराधभाव सा घेरे रहता है ? मुझे एयरपोर्ट छोड़ने बेटा जा रहा था , शायद वो मेरे भाव समझ रहा था , केवल माँ ही बच्चों को नही समझती , बच्चे भी माँ को समझते हैं । वो मुझे समझाता रहा कि मस्त हो कर जाओ और मस्ती करो , सब कुछ ठीक है । सुनकर दिल को ऊपरी तसल्ली हुई ।
एयरपोर्ट पर सखियों को देख कर दिल कुछ हल्का होने लगा था । सब भुलाकर केवल उस पल में जीने का प्रयास कर रही थी । हँसी मज़ाक शुरु हो गया था , अब साठ साल की उम्र में हम बचपन की सखियाँ पुराने पलों को जीने चली थीं । राधा , जसबीर , नीरु , मनजीत , नसीब दी , लीला और मैं । लीला से हमारा परिचय पहले नही था वो जसबीर को पहले से जानती थी । इस बीच किसी को व्हील चेयर पर भी लाया गया , तन में तकलीफ़ थी लेकिन दिल जीने को आतुर था । एक केंसर से लड़ रही थी लेकिन हार नही मानी थी । कोई अभी नौकरी में थी तो आत्मविश्वास भरपूर था और बाकियों में वो विश्वास भर रही थी । सामान किसी का कम तो किसी का ज़्यादा पर मिल-मिला कर हो गया बराबर । अभी हम सिक्योरिटी चैक करवा ही रहे थे कि पता चला जसबीर जो पैरों की तकलीफ़ के कारण व्हील चेयर पर थी , को सिक्योरिटी पर रोक लिया गया है । हलचल मच गई , समझ नही आया कि ये क्या हुआ । उसका फ़ोन भी नही चल रहा था , हम अब बाहर नही जा सकते थे । मनजीत जो हम सब में सबसे अधिक आवेग में रहती थी इधर-उधर भाग रही थी उसने किसी तरह अपना फ़ोन जसबीर तक पहुँचा दिया तब जाकर हमें पता चला कि वो ग़लती से अपना नया पासपोर्ट लाने की बजाए पुराना ले आई । अब क्या होगा का सवाल सबके चेहरे पर था । यात्रा शुरु होने से पहले ही आसार गड़बड़ाने लगे थे । काफ़ी इमोशनल ड्रामें और कन्फ़्यूजन के बाद यही हो पाया कि सबके पैसे क्यों खराब किए जाएँ ! बाकी सब अपनी यात्रा जारी रखें और जसबीर एक दिन पासपोर्ट के आने का इंतज़ार करे और अगले दिन की फ़्लाइट पकड़े । पैसे तो ज़ाया हुए लेकिन अब मनसूबे तो ज़ाया न जाएँ । कहीं , दोस्त-दोस्त न रहा , वाला गाना हमें अच्छा नही लग रहा था , हम कुछ दुखी कुछ आशावादी होते हुए , गहरी साँसें लेते , उँगली पर उँगली चढ़ाए कि अब सब सही सलामत काठमांडु पहुँच जाएँ , चल दिए।
काठमांडू पहुँचते ही एयरपोर्ट पर रेनू को देख कर हमारे चेहरे पर कान से कान तक की मुस्कुराहट फैल गई । बाहर रेनू का बड़ा बेटा और बहू हमारा स्वागत करने खड़े थे जो ह्रदयस्पर्शी था । सारे संशय , सारे भय मिट गए और हम खुली ताज़ा हवा में साँस ले रहे थे । छोटा सा देश नेपाल जिसके किस्से या तो पर्वतारोहियों के लिखे हुए , पढ़े थे या कुछ अपने मित्र पर्वतारोहियों के मुख से सुने थे । हाँ अपनी माँ से बहुत कुछ सुनती आई थी , वो बड़ी चमकती आँखों से काठमांडू को याद करती हैं । मेरे दादा जी जो विदेश मंत्रालय में थे , माँ की शादी के समय नेपाल में थे । माँ शादी के बाद प्लेन से काठमांडू गईं थीं वहाँ उनका ऐम्बैसी में भव्य रिसैप्शन हुआ था । ये बातें हम कई बार सुन चुके थे जिसमें वहाँ के राज परिवार के किस्से भी शामिल थे । बच्चों को पढ़ाते समय बछेन्द्री पाल के लिखे वो शब्द बहुत सुंदर लगते थे जब उन्होंने पहली बार काठमांडू से ऐवरेस्ट की चोटी को दूर से निहारा था तो वे उसकी ओर कितनी आकर्षित हुई थीं । अब सब प्रत्यक्ष देखने की लालसा मेरे भी दिल में जाग्रत हो रही थी । दूसरा बड़ा आकर्षण था पशुपतिनाथ मंदिर जिसकी भव्यता और महत्वता के बारे में सुना था , उसे महसूस करना चाहती थी । अब तक मैं घर और घर से जुड़ी सारी परेशानियाँ और तनाव से परे होती जा रही थी , अगर कुछ था तो वो था वर्तमान में दोहराता हुआ बचपन और बचपन के साथी ।
रेनू ने हमारे ठहरने का इंतज़ाम अपने एक तीन बैडरुम के बेहद खूबसूरत , हर चीज़ बड़ी तनमयता से सजा कर रखे अपार्टमैंट में कर रखा था । अपने परिवार के साथ प्रतिदिन का प्रोग्राम तय कर के रखा था । परिवार के प्यार और मेहमान नवाज़ी से हम गदगद हुए जा रहे थे । पहले ही दिन हम रेनू के परिवार से मिले दोनों बेटे और बेहद प्यारी बहुएँ और ज़मीन पर पैर रख कर चलने वाले उसके पति । उनके साथ बिताया वो दिन बहुत सुंदर था । कोई दिखावा नही , कोई ग़ुरुर नही , काश दुनिया में सभी ऐसे होते । अगले दिन हमें चंद्रगिरी हिल जाना था । रेनू ने हमें अच्छी तरह गर्म कपड़े पहनने की हिदायत दे दी थी । गाड़ियों से हम सब रेनू और उसके बड़े बेटे प्रतीक और बहू निकिता के साथ चल दिए ।
चंद्रगिरि पर ऊपर जाने के लिए हमें ट्रॉली से जाना था । ट्रॉली से चढ़ाई लंबी और एकदम सीधी यानि लंब में थी जो काफ़ी घबराहट पैदा कर रही थी । ऐसी सीधी चढ़ाई और नीचे बेहद मनभावक दृश्य मुझे स्विटज़रलैंड के माऊंट पिलाटस की याद दिला रहा था । ये नज़ारे उससे ज़रा भी कम नही थे , हम मानों उड़ रहे थे उन वादियों में । ऊपर पहुँच कर ठंडी – ठंडी हवा के झोंको ने हमारा स्वागत किया । मंदिर की घंटियाँ और शंखनाद हो रहा था , सच पूछो तो मुझे स्वर्गिक अनुभव होने लगा । आगे बढ़े तो पता चला कि वहाँ एक प्रसिद्ध भालेश्वर महादेव मंदिर है । सामने एवरेस्ट , अन्नपूर्णा और अद्भुत फ़िश टेल माऊंटेन दिखाई दे रहे थे । प्रतीत हो रहा था मानो महादेव यहीं-कहीं से चल कर इस मंदिर तक आ गए हों । अद्भुत , अनोखा , स्वर्गिक आनंद का अनुभव हो रहा था । सोच रही थी कि हमें दूर से देख कर ऐसा अनुभव हो रहा है तो बछेन्द्री पाल , तेनसिंग और हिलेरी को कैसा अनुभव हुआ होगा उस पर्वत पर पहुँच कर । दूर-दूर तक फैली बर्फ़ से ढकी पर्वतों की चोटियों से घिरा ये प्रदेश संभवत: भोले बाबा की उपस्थिति का एहसास कराता है ।
वो दिन प्रकृति की अजूबी रचना में डूबा बीत रहा था और हम अपार्टमेंट में पहुँच कर जसबीर से मिलने के उत्साह से भरे थे । रेनू के पति जिन्हें हम सब जीजू – जीजू कह कर परेशान कर रहे थे , जसबीर को एयरपोर्ट से लेकर घर पहुँचाने का इंतज़ाम कर रहे थे । साठ साल की सात सालियों के बीच उनकी मुस्कुराहट बता रही थी कि अब जीजू कहो या भैया क्या फ़र्क पड़ता है । उनसे क्या तो ठिठोली करेंगे भला !!
अपार्टमेंट पर पहुँचे तो जसबीर को देख कर हम सबने इतना शोर मचाया जैसे हॉस्टल में मचाया करते थे । रेनू के घर नाश्ता करते या वहाँ से आ जाता , इस बीच रेनू के भाई भाभी ने भी हम सब को खाने पर बुला रखा था । वो भी एक उत्सव की तरह था , नेपाल में मारवाड़ी सभ्यता का निर्वाह करता ये परिवार आज के स्वार्थ परक जीवन में एक उदाहरण है । जहाँ करीबी रिश्तेदार अपने घर बुला कर खुश नही वहीं उस परिवार ने अपनी मेहमान नवाज़ी से हमें भावविभोर कर दिया । इतना प्यार और मान सम्मान किसी अंजान को देना एक उदाहरण है । उनकी प्यार भरी यादें लिए हम भावुक होते उनके घर से विदा हुए । अगले दिन हमें पोखरा की फ़्लाइट पकड़नी थी ।
पोखरा मेरे ख़्यालों में एक छोटा सा , सोता सा पहाड़ी कस्बा था जैसा कि हमारे हिमाचल या उत्तराखंड में होता है । वहाँ के लिए नेपाल की ही एयरलाइंस चलती हैं जो बहुत कुछ लोकल बस की तरह हैं । सच कहूँ तो बैठते हुए थोड़ा दिल में घबराहट सी थी कि ये ठीक-ठाक पहुँचा तो देगी या कहीं हमारी आत्मा इन विशाल हिमालय की बर्फ़ीली चोटियों में भोले बाबा को ढूँढती रहेगी अगला जन्म लेने के लिए ? प्यारी , गोल चेहरे वाली , नाज़ुक सी एयरहॉस्टेज ने मुस्कुरा कर नमस्ते किया तो दिल को राहत सी मिली कि जब ये मुस्कुरा रही हैं तो सब ठीक ही होगा । एक बात जो मैं इन दो – तीन दिन में देख रही थी वो थी हिंदी और हिंदू संस्कार , जो भारत में मुश्किल से देखने को मिलें लेकिन नेपाल में हर जगह देख कर अच्छा लगा । हर स्थान पर देवनागरी का प्रयोग था , नेपालियों को अपनी इस संस्कृति पर अब तक तो गर्व है , आगे वे आस-पास के देशों में फैलते संक्रमण से प्रभावित नही होंगे ये कह पाना मुश्किल है । खैर हमारी फ़्लाइट थोड़ी लेट थी पर चल दी ये क्या कम था । अभी उजाला था और हम हिमालय की चोटियों में बादलों के साथ थे । सौभाग्य से मैं प्लेन के दाहिनी ओर बैठी थी क्योंकि वहीं से दृष्टिगत हो रही थीं महान पर्वत श्रृंखलाएँ । मैं आँखें फैलाए मंत्रमुग्ध सी निहारती पायलेट को सुन रही थी जो श्रृंखलाओं के नाम बताता जा रहा था । अन्नपूर्णा , फ़िशटेल और अब आप देख रहे हैं ऐवरेस्ट….मैं दिल थामें आँखें गड़ाए उस महान , विशाल चोटी को निहार रही थी । शायद इससे करीब मैं उसे कभी नही देख पाऊँगी । कैसा अनोखा और रोएँ खड़े करने वाला नज़ारा था वो । बचपन से लेकर आज तक न जाने कितनी कविताएँ और गीत रटे थे इसके गौरव के । कहीं दिल का एक छोटा सा कोना जो अब तक बच्चा ही था , पार्वती और भोले को अनजाने में खोज रहा था । सच तो है , यदि ईश्वर है तो , यही तो है और यहीं तो है । ये रचना किसी साधारण की तो हो ही नही सकती । मैं साक्षात ईश्वर के दर्शन कर रही थी , मन शांत और स्थिर हो गया था , सारे भय नदारद हो गए थे । तभी लैंडिंग की घोषणा ने मुझे फिर धरती पर ला छोड़ा था लेकिन मैं कुछ-कुछ वहीं रह गई थी ।
पोखरा के छोटे से एयरपोर्ट से बाहर निकल कर हम रेनू के पति यानि जीजू के द्वारा किए गए व्यवस्थित इंतज़ाम के अनुसार पहले से तय की गई गाड़ियों में होटल की ओर चल दिए । खुली , साफ़ – सुथरी सड़कें , सुंदर एक मंज़िला या दो मंज़िला यूरोपियन झलक देती हुई इमारतें देख कर मैं हैरत में पड़ गई । एक बार को धोखा हो रहा था कि क्या हम उस छोटे से , आर्थिक रुप से पिछड़ा कहे जाने वाले देश में हैं या किसी विकसित देश में ? हरी-भरी पहाड़ियों से घिरी , नीले पानी वाली , दूर तक फैली झील , शहर के बीचें-बीच , शहर की सुंदरता में चार क्या कई चाँद लगा रही थी । सुंदर – सुज्जित होटल में हमने चैकइन किया , नीरु मेरी रुममेट थी । बचपन में उसे इतने करीब से जानने का अवसर नही मिला था लेकिन इन तीन दिनों में हम एक-दूसरे को काफ़ी पहचानने लगे थे । आदतों में शायद हम बहुत कुछ एक जैसे ही थे । हिंदी में पोखर तालाब को कहते हैं तो शायद इसीलिए इस शहर का नाम इतने बड़े पोखर से पोखरा पड़ गया होगा । विदेशी सैलानियों के चलते इस शहर में विदेशी कलचर की शुरुआत हो चुकी थी । कॉफ़ी शॉप्स , गिफ़्ट शॉप्स , पब्ज़ और फ़ूड के साथ लाइव सिंगिंग शोज़ बहुत दिखाई दे रहे थे । मुझे डर है कि कहीं इसका बढ़ता प्रचलन पोखरा की खूबसूरती को दाग़ी न कर दे । हाँलाकि इसे रोक पाना नामुमकिन सा है । खैर वर्तमान में भविष्य का सोच कर अपना आनंद नही बिगाड़ना चाहती थी । उस दिन हमने वहीं का मजा लिया और सबकी पसंद से थकाली यानि कि नेपाली खाने की थाली खाई । इतना खाना खा लिया कि पैदल चलना दूभर हो रहा था । पेट बेचारा पूरी तरह से पस्त हो चुका था और साथ में हम भी । दिनभर के थके हम सब होटल पहुँच कर सो गए ।
अगले दिन सुबह से ही मेरे मोबाइल की घंटी बज रही थी , बेटी ऑस्ट्रेलिया से फ़ोन कर रही थी । आज मेरा जन्मदिन था और मैं ये सबको बताने से कतरा रही थी क्योंकि ये जन्मदिन के हंगामे से बड़ी झेंप होती है लेकिन नीरु को पता चल गया था और उसने किसी को न बताने का वादा करते हुए कहा कि मैं तो नही बताऊँगी लेकिन ये फ़ेसबुक सब बता देगा । वही हुआ राधा ने सुबह-सुबह अपना फ़ोन देखा तो उसे ख़बर हो गई और हंगामा तो बरपाना ही था । मैंने ऐसा जन्मदिन शायद ही कभी जीवन में मनाया होगा । दिन में पोखरा की पोखर में सैर करनी थी । हम बोट में बैठे तो पुराने गानों का माहौल बन गया , अब तक हम सब में थोड़ी अपरीचित लीला के साथ हम काफ़ी घुलमिल गए थे । हम सब उसके साथ सहज हो गए थे , औपचारिकता का पर्दा हट गया था । उसके पास भी पुराने गानों का अच्छा खज़ाना था । मज़ेदार बात ये कि जीजू भी हमारे साथ गा रहे थे और तो और बोटवाला युवक भी हिंदी गानों का शौकीन निकला । अब वो भी हमें अपने पसंद के गानों की फ़रमाइश बता रहा था । नीली झील और हरियाली से घिरा वो दृश्य शांति से आच्छादित था और हमारे गानों की गूँज आस-पास घूमते सैलानियों को प्रेरित कर रही थी । अब कई नावों से गाने की आवाज़ें आ रही थीं । हम बिंदास सुर-बेसुर से बेखबर बस गा रहे थे । गा क्या रहे थे , समय के साथ बहते जा रहे थे । दिल पर कोई वज़न नही था , दिमाग़ में कोई हलचल नही थी , हम अंतर्मुखी हो गए थे । होटल पहुँच कर केक की रीति भी निभाई गई , हमारे भीतर का बच्चा बाहर आ गया था , जहाँ किसी की नज़रें हमें हमारी उम्र का लिहाज़ रखने का संकेत नही दे रही थीं । हम हिंदुस्तानी औरतों के जीवन में ऐसा पल आता ही नही जहाँ हम अपने दायरों से मुक्त हो सकें । सीता की वो अदृश्य लक्षमण रेखा हर पल हमारे साथ चलती ही रहती है और हम घबराए से उसे पार करने में किसी रावण के भय से कदम बढ़ाते ही नही ।
रेनू के परिवार ने ख़ामोशी से मेरे लिए बाहर डिनर का प्रोग्राम बना लिया था । मैं बहुत झेंप रही थी लेकिन हम सब उसदिन बाहर गए । वहाँ खाने के साथ स्टेज पर नए जवान लड़के और लड़कियों का गाना चल रहा था जिसमें पश्चिमी लेटेस्ट नंबर गाए जा रहे थे , हाँ कभी-कभी बीच में कोई नया हिंदी पॉपुलर गीत भी गा रहे थे । नेपाली गीतों पर सब चहक उठते थे , नेपाली लोग गीत-संगीत के बड़े प्रेमी होते हैं । फ़्लोर पर युगल जोड़े थिरक रहे थे । कुल मिलाकर माहौल काफ़ी रंगीन था । खाने और गाने के बाद हमें थकान होने लगी थी , बिन नाचे ही हम थक गए थे । जन्मदिन का वो सुरुर सिर पर चढ़कर बोल रहा था । मज़ेदार बात तो ये रही कि यहाँ भी नीरु मेरी साथी निकली , उसका जन्मदिन दो दिन बाद था जिस दिन नीरु को काठमांडू से वापस दिल्ली के लिए रवाना होना था । बस फिर क्या था पोखरा से काठमांडू पहुँच कर उस दिन रात को नीरु का जन्मदिन मनाया गया जिसमें हमने जी भर कर अपार्टमेंट में शोर मचाया । मनजीत ने फ़ुल मस्ती करी और हम सब नाचना आए या ना आए लेकिन जीभर कर नाचे ।
मनजीत से याद आया कि उस दिन हमारा पशुपतिनाथ जी के दर्शन का कार्यक्रम था । ये घटना पोखरा जाने से पहले दिन की है । मैं बड़ी उत्साहित थी क्योंकि बहुत सुना और पढ़ा था मंदिर के बारे में । अभी तक हमने भुकंप के कुछ चिह्न ही देखे थे जो समय की मरहम लगा रहे थे । मंदिर की इस भुकंप में एक ईंट भी नही हिली ये सुनकर उसे देखने की जिज्ञासा तीव्र हो गई थी । मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करते ही लगा कि ये निश्चित ही मेरी कल्पना से परे है । परिक्रमा कर रेनू ने पूछा भीतर दर्शन करना चाहोगी ? मैंने बिना सोचे-समझे बड़ी सी हाँ कह दी क्योंकि हर हाल में मैं ये अवसर खोना नही चाहती थी । कुछ ने भीड़ देख कर हथियार डाल दिए थे । मैं , रेनू और राधा दर्शन करने की लाईन में लग गए । कोई प्रसाद या नारियल नही चढ़ाना , केवल दर्शन करना था । जैसे-जैसे सूरज अपनी गरिमा खो रहा था वैसे-वैसे श्रृद्धालुओं की भीड़ बढ़ रही थी । धक्के तो लग रहे थे लेकिन न जाने क्यों बुरे नही लग रहे थे । जब तक कि हम भोले के दर्शन को पहुँचते सूरज अपनी कांति खो चुका था । मैं उस अंधकार में भी मंदिर की विशालता को निहार रही थी , चाँद हमारा साथ दे रहा था । मंदिर में प्रवेश करते ही शब्द मूक हो चुके थे , बस मेरी दृष्टि उस विचित्र सौंदर्य पर टिकी रह गई । मैं नहीं चल रही थी , भीड़ मुझे चला रही थी । कब और कैसे बाहर आई पता नही , सीढ़ी उतरते ही गणपति विराजमान थे अपने पिता के भव्य रुप को नमन करते । हम भी विघ्नहर्ता के समक्ष नतमस्तक हो गए । मैंने सिर उठाया तो पंडित जी ने मेरे गले में रुद्राक्ष की एक माला डाल दी । मैं भावविभोर सी अश्रु पूरित आँखों से उस भोले के प्रति एक बार फिर नतमस्तक थी । परिक्रमा करने लगे तो रेनू हमें आरती के लिए एक ओर ले गई , नीचे गंगा कही जाने वाली नदी की धार बह रही थी । असंख्य दीपों से आरती की तैयारी हो रही थी , तभी मेरी नज़र एक जलती चिता पर पड़ी । स्वभाविक तौर से मैं हैरान देख रही थी कि मंदिर में चिता ? मैंने प्रश्न भरी नज़र रेनू पर डाली तो वो समझ गई और पूरा विस्तार से बताने लगी कि वो देख दो और मुर्दे लाईन में लगे हैं । उसने बताया कि कई बार मरने वाला ये इच्छा व्यक्त करता है कि मुझे यहाँ लाया जाए और अंतिम समय में उसके मुख में वही गंगाजल डाला जाता है और वहीं उसकी अंत्येष्टी कर दी जाती है । ऐसा लगा कि ये तो “तेरा तुझ को सौंप दिया वाला भाव हुआ !” वाह !! जीवन भी तूने दिया तो मृत्यु भी तेरी ही दी हुई , तुझे मैं सब समर्पित करता हूँ । भीड़ आरती गा रही थी , असंख्य दीप जल रहे थे और आत्मा-परमात्मा में लीन हो रही थी । कैसा अद्भुत दृश्य था । मेरे सारे शब्द मौन थे , कदम हवा हो रहे थे । खोए से हम बाहर आकर गाड़ी में बैठे कि रेनू का फ़ोन बज उठा और वो परेशान दिखाई दी । जब उसने बताया कि सब घर पहुँच गए हैं लेकिन मनजीत नही है , वो जानना चाहते थे कि क्या वो हमारे साथ थी । अब हमारे हाथ-पाँव ठंडे पड़ रहे थे क्योंकि मंदिर से सब बाहर आ चुके थे । रेनू ने अपने ड्राइवर से कहा कि जा कर अंदर मनजीत आंटी , मनजीत आंटी की आवाज़ लगाना । बेचारा ज़्यादा पहचानता नही था क्योंकि हमें आए अभी दो ही दिन हुए थे । मन ही मन मनजीत पर बड़ा गुस्सा भी आ रहा था , अंजान शहर , अंजान लोगों के बीच कहाँ चली गई , कोई बच्ची तो है नही । हम तीनों की नज़रें मंदिर के रास्ते पर थीं । तभी ड्राईवर को मनजीत के साथ आते देखा , बस हम तीनों टूट पड़े उस पर । वो अपनी सफ़ाई देती रही और हम अपनी दलीलें देते रहे । अंत में फ़ैसला हुआ कि मनजीत पर अब कड़ी नज़र रखी जाए क्योंकि उसे इधर-उधर भागने की आदत है , उसने अपनी चंचलता को खोया नही था । तभी तो कैंसर जैसी बीमारी से बड़ी सामान्य और स्वाभाविक हो कर लड़ रही थी ।
पोखरा से अगले दिन अपने जन्मदिन को नीरु दिल्ली के लिए रवाना हो गई थी । हमें उसके जाने से बहुत खाली-खाली सा लग रहा था । अभी हमारे जाने में दो दिन बाकी थे , एक दिन शॉपिंग के लिए रखा गया था । एक दिन रेनू हमें भक्तपुर ले गई , ये जगह हाँलाकि भुकंप ने पूरी तरह से तबाह कर दी थी लेकिन फिर भी कुछ वास्तुकला के नमूनों के चिह्न अभी बाकी बचे हैं । यहाँ की वास्तुकला अजूबी और आश्चर्यचकित करने वाली है । आपदा के बाद भी बचे चिह्न यहाँ के वैभव की कथा सुनाते हैं । ये शायद विश्व में एक अनोखी वास्तुकला का नमूना होगी जो दर्शनीय है । वापसी में रेनू को अचानक हमारी एक और नेपाली क्लासमेट का ध्यान आया , शारदा परांजुले । जिससे वो भी अब तक मिल नही पाई थी । इधर – उधर फ़ोन कर उसने उसे चौंकाने का फ़ैसला किया । उसे नही बताया कि हम सब इंडिया से आए हुए हैं । बचपन की वो पतली – दुबली नेपाली लहज़े में हिंदी बोलती शारदा आँखों के समक्ष आ गई । जब हम उसके घर अचानक पहुँचे तो वो हम सब को एक साथ देख कर इतनी हैरान और उत्साहित हो गई कि भाषा में गफ़लत खा गई । कभी हम से नेपाली में बात करती और पति से हिंदी में । हमारे चेहरे ताकती वो फटी आँखों से हमें देखती और हँसती रही । उसके साथ हमने दो – तीन घंटे बिताए , इस बीच पुरानी यादों पर हँसते रहे और उसके हिंदी भूल जाने पर भी शारदा हिंदी में बात करने की कोशिश करती रही । रात हो चुकी थी , हम दिनभर घूमकर काफ़ी थक गए थे इसलिए अपार्टमैंट पर आकर आराम किया और सो गए । अगला दिन हमारी इस यात्रा का अंतिम चरण था ।
सुबह की चाय हमें अक्सर मनजीत ही बना कर पिलाती थी , उसे सबके स्वाद का अंदाज़ा हो गया था । उस दिन हमें शॉपिंग और पाटन स्क्वायर या जिसे काठमांडू स्क्वायर भी कहा जाता है , जाना था जहाँ भूकंप के कारण बहुत नुकसान हुआ था । वहाँ जाकर पता चला कि किस तरह से बड़ी-बड़ी इमारतें मिट्टी में मिल गईं थीं । कितना भयानक रहा होगा वो समय इसका अंदाज़ा लगाना वाकई में मुश्किल है । ये वही जानते हैं जिन्होंने उसे सहा है । वहाँ के मंदिर और पुरानी इमारतें खंडहर में बदल गई हैं । कुछ को संभालने का प्रयास किया जा रहा है । उन्हीं में एक है बेहद खूबसूरत वास्तुकला को दर्शाता मंदिर और जीवित कुमारी का स्थान , जहाँ वो रहती हैं । लाल रंग के पर्दों से पहली मंज़िल के झरोखे ढके हुए थे लेकिन कौतुहल से सभी की दृष्टि जीवित देवी की एक झलक पाना चाहती थीं । मैं भी हर ओर से प्रयास कर रही थी कि शायद कहीं एक झलक मिल जाए । हमारी नेपाल की गार्जियन और गाईड बनी रेनू ने बताया कि वो एक खास निश्चित दिन और समय होता है जब हम उनके दर्शन कर सकते हैं । मैं मायूस नज़रों से ऊपर देखती केवल वास्तुकला को निहारती रही जो निश्चित रुप से अनूठी है । यहाँ आकर कुछ मिलेजुले से भाव आ रहे थे , आपदा के विनाश का दुख जो शायद कभी पुन: अपने पूर्व रुप में न आ सके और बची हुई धरोहर का सुख कि चलो कुछ तो है जो अब भी सुरक्षित है । इत्तेफ़ाक से ये ट्रिप जन्मदिन से भरपूर था क्योंकि आज रेनू की बेटी बनी का जन्मदिन था । उसदिन मेन बाज़ार में हमें उससे भी मिलना था ।
शॉपिंग के नाम पर सच पूछो तो मैं बहुत बेकार हूँ , ये काम मुझे सबसे कठिन लगता है तो मेरा स्पष्ट था कि कुछ नही लेना । हाँ अपनी नातिन के लिए छोटे-छोटे उपहार अवश्य ले लिए थे , उसमें भी मैं पूरी तरह से निकीता पर ही विश्वस्त थी । उसने कुछ बड़ी प्यारी-प्यारी लड़कियों की पसंद की चीज़ें दिलवाईं जो मेरी नातिन को बेहद अच्छी लगीं । बाकी बनी ने सबको दिन में शॉपिंग में बहुत सहायता करी ।
उस दिन का समापन करने से पहले एक बार फिर थकाली खाना ज़रुरी था जो हमने किया , चाहे पेट बेचारा त्राही-त्राही करता रहा लेकिन उस दिन उस पर तरस खाना नामुमकिन था । वो रात हमारी वहाँ की अंतिम रात थी और अगले दिन सुबह दिल्ली के लिए निकलना था । दिनभर के बाज़ारों में घूमते हमने एक इटैलियन रैस्टराँ में इटैलियन खाना खाया और अपार्टमैंट पर पहुँच गए , थके-माँदे पछाड़ का कर सो गए । सुबह जल्दी थी पैकिंग और तैयार होने की । राधा और रेनू हमारा ढेर नाश्ता लेकर हाज़िर थीं । अब विदाई का समय था जो दिल भारी कर रहा था लेकिन मेहमान नवाज़ी की भी कोई हद होती है भई !! मुझे परसाई जी का “अतिथि तुम कब जाओगे” प्रसंग याद आ रहा था । हाँलाकि रेनू और उसके परिवार से ऐसा आभास नही मिला था फिर भी ये तो मेहमान का फ़र्ज़ था सोचना ।
सबको बड़ी गाड़ी में रवाना कर मैं रेनू और राधा के साथ बाकी बचा सामान लेकर एयरपोर्ट पहुँची । हमारे अनुसार उन्हें हम से पहले पहुँच जाना था लेकिन बाहर कोई नज़र नही आया , हमने कुछ देर इंतज़ार किया और सोचा कि समय दो रहा है ज़रुर वो लोग अंदर चले गए होंगे । अब मैं बड़े-बड़े चार सूटकेस ले कर कैसे जाऊँ ? साथ में मेरा अपना भी सामान । मैंने रेनू राधा से भावभीनी विदा ली और सामान ट्रॉली पर लाद कर भीतर पहुँची . इधर-उधर देखा लेकिन सब नदारद । भीतर ही भीतर काफ़ी भुनभुनाई कि इतना सामान कोई अकेला कैसे मैनेज कर सकता है ? हाय-तौबा करते किसी तरह सामान चैक करा लिया तभी मेरी नज़र उन सब पर पड़ी और उन्हें अंदर आते देखा तो मेरी जान में जान आई । पता चला कि वे कहीं दूसरे गेट पर हमारा इंतज़ार कर रहे थे । कोठमांडू एयरपोर्ट थोड़ा निराशाजनक रहा । फ़्लाईट तीन घंटे देरी से चलने वाली थी . रेनू के बाँधे गए आलू के पराँठे बड़े काम आए ।
दिल्ली पहुँचे और राहत की साँस ली कि चलो सब ठीक-ठाक पहुँच गए लेकिन क्या पता था कि अभी क्लाइमैक्स बाकी है । सब अपना-अपना सामान बैल्ट से उटा कर चलने की तैयारी करने लगे कि मनजीत हाँफ़ती हुई आई कि उसका सूटकेस नही मिल रहा । बहुत कोशिश की लेकिन सफ़लता नही मिली , एयरलाइन वालों से शिकायत करी तो पता चला कि ग़लती से कोई और पैसेंजर उसका सूटकेस लेकर चला गया है !! हे ईश्वर अब क्या होगा !! मुझे अकेले नौएडा जाना था , लीला को उसका भांजा लेने आ गया था । जसबीर का बेटा उसे लेने आ गया था । जसबीर के साथ , नसीब दी जा रही थीं और मनजीत को भी उन्हीं के साथ जाना था । मनजीत का सूटकेस वो पैसेंजर लेकर वापस चल दिया था लेकिन इंतज़ार करना था । मैंने और लीला ने विदा ली और न चाहते हुए भी उनको छोड़ कर जाना पड़ा वो भी इसलिए क्योंकि जसबीर का बेटा उन सब के साथ था । तो हुआ यूँ कि मनजीत ना सही उसका सूटकेस ही अंत में गुम हो गया !! शुक्र है मनजीत नही गुमी थी !!
ये थी मेरी अविस्मरणीय यात्रा ।

One thought on “काठमांडू कॉलिंग

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