सज़ा-ए-मौत

सज़ा-ए-मौत

वो सलाखों के पीछे ज़मीन पर नंगे पाँव , घुटनों को समेटे बैठा था । कानों को ढकते , माथे पर आए उसके उल्झे , घने , मटमैले बाल बिखरे हुए थे , पता नही वे काले थे या भूरे थे । हाँ…समय की धूल से कुछ-कुछ सफ़ेदी भी लिए थे । टखनों से ऊपर तक आती चुस्त पैंट धूल से सनी थी । लंबे कॉलर वाली छींट की , पूरी बाज़ू की मैली कमीज़ के कुछ बटन टूटे थे तो कुछ लापरवाही से खुले थे जिसमें से उसकी चौड़ी छाती झाँक रही थी । उसकी तीखी नाक और बड़ी-बड़ी काली आँखों के ऊपर घनी भँवें तनी हुई थीं उसका रंग शायद गोरा होगा । उम्र लगभग बाईस – तेईस साल की रही होगी । बाहर डंडे खड़काता पुलिसवाला पहरा दे रहा था । उसकी कोठरी में मध्यिम रोशनी का बल्ब जल रहा था । कोठरी के ऊपर छोटा सा सलाखों वाला रोशनदान था जहाँ से धूप तो नही आती थी लेकिन कभी-कभी चक्कर लगाता चाँद ज़रुर दिख जाता था । आज उसने भी उसका साथ छोड़ दिया था और न जाने कहाँ छिप गया बिल्कुल उसके अपनों की तरह , शायद आमावस थी । उसके जीवन में भी तो अमावस का अंधकार छा गया था , तभी हवलदार ने उसकी कोठरी की सलाखों पर डंडा खड़काया ,

ओए , सो जा , कल तेरी कोर्ट में तारीख़ है , सज़ा सुनाई जागी , जल्दी उठणा है ।

ये सुनते ही उसके सिर की नसों में खिंचाव आ गया , अगर उसके बाऊजी ने पुलिस को ख़बर न की होती तो आज वो आज़ाद होता । यही सोचकर तो वो घर गया था कि बाऊजी उसे बचा लेंगे , बीजी उसे कुछ नही होने देंगी , आखिर मैं उनका बेटा हूँ । वो अभागी रात याद आ रही थी जब वो रात को खाना खाने के बाद रोज़ की तरह अपने यार-दोस्तों के साथ कॉलोनी के नुक्कड़ वाली पान की दुकान पर सुट्टा मारने गया था , ये उसका रोज़ का नियम था । घरवालों को क्या पता था कि वो किन-किन आदतों का आदि होता जा रहा था । बाऊजी ने उस दिन चलते हुए उससे कहा था ,

देख शुभ , तेरी बहनें शादी लायक हो रही हैं , अब तू ये आवारा लड़कों के साथ नुक्कड़ पर मत खड़ा हुआ कर । पुत्त संगत अच्छी रखणीं चाईदी है ।

बाऊजी की ये बातें हर रोज़ की थीं , कोई नई बात तो नही थी । वो पाँच बहन-भाईयों में सबसे बड़ा था । नंदकिशोर शर्मा नंगल के रहने वाले थे और जवानी में सुभाषचंद्र बोस से प्रभावित हो आज़ाद हिंद फ़ौज में भरती हो गए थे । बर्मा जाने से पहले माँ-बाप ने शादी करदी । नई नवेली दुल्हन को छोड़ देश के लिए बोस की पुकार से खून में उबाल आ गया । चौदह साल तक उनका कोई पता नही था । देश आज़ाद हो गया लेकिन वो लौट कर नही आए , घर वालों ने मान लिया कि अब वो कभी वापस नही आएगा । दुल्हन ने विधवा का रुप धार लिया । बहू को देख कर सास – ससुर आज़ादी का जश्न न मना सके , बेटा जो आज़ादी की भेंट चढ़ चुका था ।

तभी अचानक एक तार ने सब कुछ बदल दिया , नंदकिशोर ज़िंदा है और घर आ रहा है ये सुनकर पिता सारे गाँव में ख़बर दे आए । उनका राम चौदह साल बाद घर लौट रहा था । सास ने बहू का फिर से श्रृंगार किया , पिता बैंड-बाजा लेकर बेटे को लेने स्टेशन पहुँचे । ट्रेन से उतरते बेटे को देखकर पिता दिल पर काबू न रख पाए और धड़कनें थम गईं ।

बेटा घर तो आया लेकिन पिता की अर्थी के साथ । माँ और बहू समझ नही पा रहे थे कि आँसू किसके लिए बह रहे थे ।

जब शुभ पैदा हुआ तो बाऊजी ने बड़े लाड़ से उसका नाम रखा था ‘शुभ’ । उन्हीं बाऊजी ने उसे पुलिस के हवाले करते हुए एक बार नही सोचा । उसने सब सच बता दिया था उन्हें , वो उस दिन बहुत डर गया था जब उनके साथियों में से एक साथी राजेश का कत्ल हो गया था । वो तो सिर्फ़ उनके बीच किसी लड़की को लेकर हुई लड़ाई को रोक रहा था कि भीमा और शंकर ने कब उसके पेट में छुरा घोंप दिया और राजेश ने उसके हाथों में दम तोड़ दिया था । ये देखते ही सब भाग खड़े हुए तो घबराकर वो भी राजेश को वहीं छोड़ कर भाग गया । सब फ़रार घोषित कर दिए गए और नंदकिशोर शर्मा जी को छोटे बेटे रवि के साथ सारी रात थाने में बिठाए रखा था । रवि अभी स्कूल में पढ़ रहा था लेकिन पुलिस ने कुछ नही देखा और पूछताछ करते रहे । नंदकिशोर जी ने पुलिस को आश्वासन दिया कि वो सच्चे देशभक्त हैं , धोखा नही देंगे , जैसे ही शुभ उन्हें मिलेगा वो ख़ुद उसे पुलिस के हवाले कर देंगे । उन्होंने वही किया जब एक रात किसी ने घर का दरवाज़ा खटखटाया तो नंदकिशोर जी ने ही दरवाज़ा खोला , सामने शुभ खड़ा था । वो घबराया हुआ था , उसने सारी वारदात बाऊजी को सुनाई थी । बाऊजी ने कहा था ,

देख , अगर तू बेकसूर है तो क्यों डरता है ? पुलिस को सब बता देना ।

ये कहते हुए उन्होंने पुलिस को फ़ोन कर दिया था । वो बहुत गिड़गिड़ाया था , बाऊजी के पैरों में पड़कर माफ़ी माँगी थी । जब वो नही माने तो शुभ ने भागने की कोशिश भी की थी लेकिन बाऊजी ने पुलिस के आने तक उसे कमरे में बंद कर दिया था । बहनें , माँ सब रोते रहे लेकिन बाऊजी ख़ामोश खड़े थे ।

बाकी दो फ़रार अभियुक्त अभी तक हाथ नही आए थे । पुलिस के डंडे उसकी कमर तोड़ रहे थे , टाँगे बेजान हो रही थीं लेकिन वो यही कहता रहा कि उसने कुछ नही किया , उसने किसी को नही मारा । लेकिन उसकी किसी ने नही सुनी । बाऊजी की देशभक्ति ने उसे क्या दिया ? उनके लिए तो कानून , सच का साथ देगा , यही सच था । उसे बाऊजी की देशभक्ति पर गुस्सा आता था , उसका दिल बागी बन जाता था , जो बाऊजी कहते उसका उल्टा करता था । फिर भी बाऊजी ने उसे बेगुनाह मान लिया लेकिन उसके पास कोई गवाह नही था जो उसे बेगुनाह साबित कर सके ।

तभी कांस्टेबल ने दरवाज़ा खोलकर एक बाल्टी पानी का रख दिया । उसने सिर उठाकर देखा उसके हाथ में सफ़ेद , नीली धारीदार कपड़े थे । कपड़े एक ओर फेंकता हुआ बोला ,

, हीरो , अपना थोबड़ा धोले , अर यो कपड़े पहर ले , आज कोर्ट में हाज़िर होणा है ।

उसे पता नही कि आज कोर्ट में क्या फ़ैसला सुनाया जाएगा । पंद्रह दिन हो गए थे उसे पुलिस रिमांड में , न वो खाता था , न वो सोता था । मन-मस्तिष्क दर्द से टूट रहे थे । उसे याद आ रहा था जब एक दिन स्कूल में उसकी कुछ लड़कों से लड़ाई हो गई थी । दरअसल एक लड़के ने उसकी छोटी बहन माणों को पटाखा कह दिया था । बस वो टूट पड़ा था उस लड़के पर , इस मारा-पीटी में उसकी भी खूब पिटाई हुई थी । माणों उसकी लाडली बहन , उसे कोई कुछ कह दे , वो कैसे बरदाश्त कर सकता था । जब घर आया तो बीजी देखकर कितना रोई थीं । दूध हल्दी पिलाया और सिर पर हाथ फिराते हुए कितनी बार उसे चूमकर कहती रहीं ,

पुत्त , एंज नहीं किया कर , तेरा गुस्सा कम कर । गल्ल नाल बात बणाया कर , मार-पिटाई चंगे बच्चेयाँ दा काम नही ।

दिल में टीस सी उठी और गला भारी होने लगा कि तभी सलाखों पर फिर डंडा खड़का ,

चल बाहर निकल , भाई….टैम हो गया कचहरी का ।

हवलदार ने पुकारा तो बोझिल आँखों से उसकी धुंधली सी छाया देख कर वो डगमगाते कदमों से कोठरी के बाहर आ गया । उसकी लंबी काया पर सफ़ेद धारीदार पायजामा टखनों से ऊपर चढ़ा हुआ था , कमीज़ उसके चौड़े कंधों पर कसी हुई थी । उसकी धीमी चाल देख पुलिसवाला उसे धक्का देकर चिल्लाया…

तेरे पाँह ना उठते के , भैंण….. ।

ये सुनते ही शुभ एक मिनट ठहरा और हवलदार को अपनी लाल आँखों से घूर कर देखा । तभी एक ज़ोर का ठुड्डा लगाते हुए हवलदार ने एक और गाली फैंकी…..

देखिए…किसे दिद्दे पाड़ै… , साल्ड़े…खा गा मनै ?

शुभ का बस चलता तो वो सचमुच उसे खा जाता । बहन की गाली दी !! उसने अपने आप को पुलिस की गाड़ी में डाल दिया था । रास्ते में कई बार दिल में आया कि चलती गाड़ी से कूद जाए लेकिन दोनों ओर से दो पुलिसवालों ने उसे बाँधा हुआ था । आस-पास से गुज़रते लोग उसे खतरनाक खूनी की तरह भयभीत नज़रों से देख रहे थे !  उसे उनकी नज़रों से डर लग रहा था । एक विचार आता कि काश उस दिन उसने बाऊजी की बात सुनी होती और नुक्कड़ पर न गया होता तो उसे आज ये दिन न देखना पड़ता । बाऊजी या बीजी ने अपने बच्चों को मारना तो दूर कभी ऊँची आवाज़ में भी बात नही की थी । तीनों बहनें अपने वीरे पर जान छिड़कती थीं । छोटा भाई रवि कभी अपने बड़े भाई से आँख मिलाकर बात नही करता था । फिर वो ऐसा कब हो गया पता नही , कैसे देशभक्त बाऊजी और सीधी – सादी बीजी का बेटा कब ऐसा बन गया ? उसे पूरा विश्वास था कि आज कोर्ट में बाऊजी ज़रुर बोल देंगे कि उनका बेटा खून कर ही नही सकता , जज साहब उनकी बात मानेंगे , क्यूँ नहीं मानेंगे भला ? वो देश के लिए लड़े हैं , कितने कष्ट उठाए हैं ! वो फिर से घर जाएगा , इस बार वो बाऊजी की हर बात मानेगा ।

जीप एक झटके से रुकी और वो कोर्ट के अंदर था । वो बंधे हाथों से पुलिसवालों के बीच चल रहा था , उसकी निगाहें कोर्ट की भीड़ में बाऊजी को ढूँढ रही थीं । उसे एक कमरे के बाहर बैंच पर बैठा दिया गया था , वो अपनी पुकार का इंतज़ार कर रहा था । पसीने कान से होते हुए गरदन को भीगो रहे थे , गला सूख रहा था । उसने अपने पास खड़े पुलिसवाले को पुकारा जो अपने साथी से बतियाने में मस्त था ,

साहब , बहुत प्यास लगी है , थोड़ा पानी मिलेगा ?

पुलिसवालों की बातचीत में खलल आ गया था , उसने त्यौंरियाँ चढ़ा कर कुछ चिढ़ते हुए कहा ,

तू म्हारा साब , चाल , उठले , वो रा कूलर ।

वो उसे कूलर तक ले गया , बंधे हाथों से ओक बनाकर पानी पीया तो राहत मिली , थोड़ा पानी उसने अपने मुँह पर छिड़क लिया । फिर अपनी जगह ऊँगलियों को ज़ोर-ज़ोर से दबाता , चटकाता हुआ बैठ गया , उसकी नज़रे  भीड़ में बाऊजी को ढूँढती , उठतीं और गिरती रहीं । एक-एक पल भारी पत्थर सा उसके दिल को दबा रहा था और वो गहरे डूबता जा रहा था । तभी उसके नाम की पुकार हुई ,

शुभ शर्मा हाज़िर हों ।

अपना नाम सुनकर उसका दिल टप्पे खाती गेंद की तरह छाती को धकेल रहा था , पैर उठ नही रहे थे । पुलिसवाले लगभग धसीटते से उसे भीतर ले गए । आस-पास का शोर उसे सुन्न बना रहा था । सामने जज बैठा था और उसके बराबर में सरकारी वकील खड़ा था । इधर-उधर कुर्सियों पर लोग बैठे थे जिनके केस शायद उसके बाद लगे थे , भीड़ उनके साथ आए रिश्तेदारों ने बढ़ा दी थी , वो भीड़ शुभ के लिए बेगाने , अंजान चेहरों से भरी थी । सरकारी वकील ने उसका केस पढ़ा और कहा ,

मिलोर्ड , ये साफ़-साफ़ कोल्ड ब्लडेड मर्डर का केस है । इसके दो साथी शंकर और भीमा अभी भी फ़रार हैं , इसे पुलिस की मुस्तैदी के कारण पकड़ लिया गया । गली के इन गुंडों ने कॉलोनी में लड़कियों का आना-जाना दूभर कर रखा था । ये समाज के वो दीमक हैं जिनको अगर समय रहते नही रोका गया तो समाज की जड़ें कमज़ोर पड़ जाएँगी । इन्हें सख़्त से सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए । शुभ शर्मा जैसे मुजरिम समाज के लिए खतरा हैं ।

शुभ कुछ सुन रहा था , कुछ खोज रहा था कि तभी उसकी सफ़ाई पूछी गई , वो लड़खड़ाती ज़बान से भीड़ में खोए बच्चे की तरह अपने बाऊजी को ढूँढ रहा था , जो उसे कहीं नज़र नही आ रहे थे । वो रूँधे गले से बस इतना कह पाया ,

जज साहब मैंने कुछ नही किया मैं तो उसे संभाल रहा था । वो मेरा दोस्त था , मैंने उसे नही मारा , मैंने उसे नहीं मारा……..

वो कहता रहा और रोता रहा , थोड़ी देर बाद उसे पुलिसवाले पकड़ कर बाहर ले जा रहे थे , वो चल कहाँ रहा था , उसे तो वो धकेल रहे थे । तभी उसकी नज़र एक धुंधली सी छाया पर पड़ी , कुछ साफ़ हुई…… वो उसके बाऊजी थे , थके हुए , उदास । वो एक पल रुका उसकी नज़रें उनसे मिलीं , और वो मुड़कर मंद गति से आगे चले गए । बगल में चलते पुलिसवाले की कमर में लगी पिस्टल निकाल कर अपने को ख़त्म करने का दिल किया , लेकिन उसके भीतर कुछ भी करने की ताकत नही थी , मरने की भी नही । उसे दूसरी जेल में ले जाया जा रहा था , जहाँ और भी अनगिनत सलाखों के पीछे अपनी किस्मत के फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे थे । अब वो भी उनमें से एक नंबर बन गया था , शुभ बहुत पीछे छूट गया था । शाम को मिलने के समय में बहुत से कैदियों के रिश्तेदार उनसे मिलने आ रहे थे । उसे पता था कि उससे मिलने कोई नही आने वाला । हवलदार ने उससे चुटकी ली थी ,

क्यूँ रे हीरो तेरा कोई रिश्तेदार ना है के ?

उसने अपना सिर झुका लिया था , खोया सा सलाखों को घूरता रहा , जहाँ उसे शायद अब जीवन भर रहना होगा या उसे फ़ाँसी की सज़ा हो जाएगी । कितना अच्छा होता जो उसे आज ही फ़ाँसी की सज़ा सुना दी जाती । तभी हवलदार ने उसकी कोठरी पर डंडा खड़काया ,

चाल भाई तेरा छोटा भाई तेरे तै मिलण आया है , राजी होजा ईब ।

शुभ को विश्वास नही हो रहा था , उसे लगा वो उसके साथ मज़ाक कर रहा था । रवि भला यहाँ , इस जगह मुझसे मिलने कैसे आ सकता था ? वो तो अभी स्कूल में , बारहवीं में पढ़ रहा था , उसे बाऊजी यहाँ कभी नही भेजेंगे । वो अभी अपने सवालों में उल्झा हुआ था कि उसके सामने रवि खड़ा था । उसका छोटा भाई , रवि ! दिल किया उससे लिपट जाए , लेकिन नही ! रवि ने हकलाते हुए , कुछ डरते हुए कहा…

भैया , मुझे बाऊजी ने आपसे मिलने भेजा है । आप चिंता ना करना , बाऊजी कोई वकील करेंगे और आपको छुड़ा लेंगे ।

ये कहते हुए एक टिफ़िन उसने आगे करते हुए कहा ,

ये बीजी ने आपके लिए भेजा है ।

शुभ की आँखों की कोर से गरम , गीला पानी ढुलक रहा था । उसने काँपते हाथों से टिफ़िन पकड़ लिया । उसे अपना वकील करने का मौका दिया गया था । बाऊजी उस दिन कोर्ट में मौजूद थे फिर भी मिले क्यों नही । ये सोचकर उसके दिल में एक चुभन सी हुई और पलट कर रवि को देखते हुए सख़्ती से बोला ,

तू जा यहाँ से , ये जगह तेरे लिए नही है ।   

रवि अपने बड़े भाई की बात सुनकर धीरे से मुड़ा तो शुभ की आवाज़ फिर आई ,

और सुन , अब कभी मत आना यहाँ , अब जा तू , दिल लगा के पढ़ना । अच्छा !

ये बड़े भाई की आवाज़ थी , रवि ने मुड़कर भाई को देखा और हाँ में सिर हिलाते हुए तेज़ी से बाहर निकलने लगा । बाहर आकर उसने गहरी , लंबी साँस ली । वो क्यूँ डर रहा था , उसे पता नही , पर वो डर रहा था । क्या भैया कभी वापस नही आएँगे ? ये लोग कहते हैं कि उन्होंने अपने दोस्त को जान से मार डाला ! नही , भाई कभी किसी को नही मार सकते । वो तेज़ कदमों से बस स्टॉप पर पहुँच गया ।

शुभ , ने बीजी का भेजा हुआ डिब्बा खोला , उसकी पसंद की दाल मखनी , पालक पनीर और आटे का हलवा देख कर उसने अपना मुँह घुटनों में दे दिया । रोते-रोते आवाज़ रोक नही पाया और बच्चों की तरह बिलखने लगा । उसकी आवाज़ सुनकर गालियाँ देने वाला हवलदार भी नर्म होकर बोला ,

ओए , तू किस्मत वाला है कि घरवाले रोटी भेज रहे हैं वरना यहाँ कौन किसको याद करता है ? तू भले घर का बंदा लगता है नही तो घरवाले भी दूर भागते हैं , रो मत , चल खाले रोटी ।

बीजी के हाथ की नरम-नरम रोटियाँ बिल्कुल उनके हाथों सी नरम होती थीं । आज कितने दिनों बाद उनके हाथ की रोटियाँ खाने को मिली थीं , उनसे देसी घी की सुगंध उसे बीजी की और याद दिला रही थी । हमेशा खाना खाते हुए रसोई में उनके पास बैठ जाता था और बीजी प्यार से एक – एक गरम फ़ुल्का उसकी थाली में डालतीं ,

पुत्त घ्यो खाया कर , जवान बच्चे नूँ तगड़ा होणा चाईदा है ।

कहती हुई वो उसकी दाल में चम्मच भर कर घी डाल देतीं । यादों के साथ , रुँधे गले से हर कौर धीरे-धीरे गले से उतर रहा था । अगले दिन सुबह दस बजे के करीब एक वकील उससे मिलने आया ,

मैं तुम्हारा वकील हूँ , मुझे शर्मा जी ने सब बताया लेकिन मैं अब तुमसे सच्चाई जानना चाहता हूँ । मुझे सब सच बताओगे तो मेरे लिए केस लड़ना आसान होगा ।

शुभ ने एक बार फिर सारी कहानी वकील साहब को सुनाई कि किस तरह वो पास खड़ा था जब राजेश और शंकर में बहस हो गई , भीमा भी शंकर का साथ दे रहा था । बहस होते – होते झगड़े में बदल गई थी , बात किसी शिवानी नाम की लड़की को लेकर थी । वो दोनों एक ही लड़की को चाहते थे , लड़की शायद राजेश को पसंद करती थी । बस बात बढ़ते-बढ़ते हाथा-पाई तक आ गई और शंकर ने पलभर में ही जेब से चाकू निकाल कर उसके पेट में घोंप दिया । शंकर के दोस्त भीमा ने राजेश को पकड़ रखा था , मैं उन्हें रोकना चाहता था लेकिन वो दोनों भाग गए और राजेश वहीं गिर गया , मेरी बाँहों में । मैं उसे उठाने लगा कि तभी किसी ने पुलिस को ख़बर कर दी थी , मैं बहुत डर गया था । बिना सोचे – समझे मैं भी वहाँ से भाग गया । पूरी बात सुनाकर उसने एक लंबी , गहरी साँस ली मानों कई दिन से उठाया बोझ सिर से उतार दिया था । वकील साहब की ओर उम्मीद से देखता हुआ बोला ,

बस वकील साहब यही मेरी ग़लती थी ।

वकील उसे लगातार घूर रहा था जिससे वो थोड़ा सकुचा कर इधर-उधर देखने लगा । अचानक वकील ने अपना फोल्डर उठाया और खड़ा हो गया ,

आई होप , तुमने मुझसे कुछ छिपाया नही होगा । अपनी बातों पर डटे रहना , किसी से घबराना नही , मैं फिर मिलता हूँ ।

वकील साहब चले गए और शुभ के भीतर एक उम्मीद छोड़ गए । आज वो हल्का महसूस कर रहा था , कोठरी के भीतर थोड़ा सा दिखता चाँद भी उसकी कोठरी को ऱोशन कर रहा था । बीजी के हाथ की खाई रोटियों के बाद दो-तीन दिन तक उसे भूख ही नही लगी , जेल का खाना देखते ही जी भर जाता ।

उसके मना करने पर भी रवि कभी-कभी उससे मिलने आता रहा और बीजी के हाथ का खाना भी लाता रहा । वकील साहब से उसकी मुलाकातें होतीं , वो उसे केस के बारे में समझाते , उसे कोर्ट में कैसे और क्या बोलना है सब बतलाते । केस चलता रहा , कई महीने गुज़र गए । पता चला कि फ़रार शंकर और भीमा पकड़े गए , अगली सुनवाई में उनका भी बयान होना था जो शुभ की किस्मत का फ़ैसला बदल सकता था । उसे जेल में लगभग साल होने को था लेकिन अभी तक कुछ फ़ैसला नही हो पाया था । केवल तारीख़ें थीं और लोगों के बयान थे , वकीलों की बहस थी । फिर एक दिन वकील साहब ने बताया कि उसकी अगली तारीख़ में उसकी सज़ा सुनाई जाएगी । उस दिन जब वो कोर्ट में आया तो भीड़ में उसने अपने बाऊजी को देखा , वो थके हुए , उदास और पहले से अधिक उम्र के लगने लगे थे । पता नही आज क्या होने वाला था , बाऊजी को उसकी चिंता थी तभी तो वो आए थे । वकील की फ़ीस पता नही वो कैसे दे रहे होंगे , कहाँ से इंतज़ाम किया होगा ? ये सब सोचते हुए उसका दिल गहरी उदासी से भर गया । उसे आज बाऊजी पर नाराज़गी नही थी , बल्कि वो शर्मसार हो रहा था , बाऊजी की इस उम्र में ऐसी हालत के लिए ख़ुद को कसूरवार मान रहा था । वो उनसे नज़रें चुराता रहा और बाऊजी भीड़ में गरदन उचका कर उसे ताकते रहे ।

वकीलों की दलीलें और बहस देर तक चलती रही फिर अचानक शंकर और भीमा को पेश किया गया उनके बयान हुए । उन्होंने एक नज़र शुभ पर डाली और वकील साहब की ओर देखकर पहले शंकर बोला ,

जी ये भी हमारे साथ ही था , झगड़ा हम सब का ही हुआ था ।

शुभ हैरान उसका मुँह देख रहा था , वो झूठ क्यों बोल रहा था ? उसका तो किसी से झगड़ा नही हुआ था । भीमा ने भी यही कहा कि वो झगड़े में उनके साथ ही था और उसने ही राजेश को पकड़ रखा था । शुभ के वकील और दूसरे वकीलों के साथ पब्लिक प्रोस्यिक्यूटर की बहस के बाद जज साहब के फ़ैसले का इंतज़ार था । शुभ के लिए एक-एक पल भारी था , तभी जज साहब की आवाज़ से कोर्ट रुम में सन्नाटा छा गया ,

सभी बयानों और चश्मदीद गवाहों के आधार पर शुभ , शंकर और भीमा को उम्र क़ैद की सज़ा दी जाती है ।

ये सुनते ही शुभ के भीतर इतने दिन से दबा तूफ़ान बाहर आ गया वो वहीं ज़मीन पर बैठ कर रोता रहा और कहता रहा ,

बाऊजी मैं सच कह रहा हूँ , मैंने कुछ नही किया , मैंने किसी को नही मारा । ये मेरी बात क्यों नही मान रहे ?

कोर्ट रुम खाली हो गया था , उसे पकड़ कर पुलिस की गाड़ी में बैठा दिया । दूर एक पेड़ के नीचे उसने अपने बाऊजी को सिर झुकाए बैठे देखा था । शायद अब वो कभी बाहर नही आ पाएगा , कभी आज़ाद नही हो पाएगा । उसे उस ज़ुर्म की सज़ा भुगतनी होगी जो उसने किया ही नही । इससे अच्छा होता कि उसे फ़ाँसी की सज़ा हो जाती , एक ही बार में किस्सा ख़त्म होता । बाऊजी को ये ज़िल्लत तो न सहनी पड़ती , अब मेरी बहनों की शादी कैसे होगी , एक मुजरिम की बहनों से कौन शादी करेगा ?

अगले दिन वकील साहब फिर उससे मिलने आए थे । उन्होंने उसे आश्वासन दिया था कि वो ऊपर कोर्ट में जाएँगे , अपील करेंगे । शुभ को अब कोई उम्मीद नज़र नही आ रही थी , वो ख़ामोश उनकी बातें सुनता रहता । एक दिन उसने वकील साहब से बड़ी मायूसी से पूछा ,

वकील साहब आज आप एक बात मुझे सच-सच बताएँगे ?

हाँ पूछो ,

कहते हुए उन्होंने शुभ को सवालिया नज़रों से देखा ।

मेरे बाऊजी , आपकी फ़ीस का इंतज़ाम और घर का खर्च कैसे कर रहे हैं , क्या आप को पता है ? मेरी बहनें , मेरी बीजी , मेरा भाई कैसे हैं ? मैं ये सब किसी से नही पूछ सकता लेकिन ये सवाल मुझे खाए जा रहे हैं । प्लीज़ बताइए ।

कहते हुए शुभ ने उनके पैरों को हाथ लगाया तो वकील साहब ने उसे उठाते हुए कहा ,

मैं सब बताऊँगा तुम्हें । शर्मा जी मेरे लिए पिता समान हैं , मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ । तुम्हारा भाई रवि पढ़ाई के साथ-साथ एक पार्ट टाईम जॉब करता है , तुम्हारी बड़ी बहन को सरकारी नौकरी मिल गई है । छोटी बहन कॉलेज के बाद ट्यूशन पढ़ाती है । चिंता मत करो मैं अपनी फ़ीस उतनी ही लूँगा जितनी शर्मा जी दे पाएँगे , तुम उसकी चिंता मत करो ।

शुभ ख़ामोश सिर नीचे किए बैठा रहा , उसकी एक भूल की सज़ा सारा परिवार भोग रहा था , बस फ़र्क सिर्फ़ जगह का था । वकील साहब जाने लगे तो शुभ ने एक बार फिर उनके पैरों को हाथ लगाया और जल्दी से मुड़ कर अपनी कोठरी की ओर चल दिया । वो जो नही दिखाना चाहता था वकील साहब से छिपा नही था ।

रवि एक दिन इतवार को आया था उसी तरह टिफ़िन लेकर । शुभ ने उसे देखा अब वो गोल-मटोल , लाल गाल वाला रवि नही रहा था । वो बहुत पतला हो गया था आँखों पर मोटा चश्मा चढ़ गया था , उन आँखों में एक गहरी सोच समा गई थी जो साफ़ दिखाई दे रही थी , रंग गहरा गया था । वो एक टक उसे देखते हुए बोला ,

रवि ये क्या हो गया तुझे ? तू कितना कमज़ोर हो गया है । बहुत मेहनत करता है ना ? मैं बहुत बुरा हूँ , तुम सबको सिर्फ़ दुख दे रहा हूँ । बाऊजी को मना कर दे केस लड़ने के लिए , मुझे यहीं रहने दो । 

रवि ने बड़े प्यार से फीकी सी मुस्कान से कहा ,

नही भैया हम केस जीतेंगे , आप चिंता मत करो , आप घर आओगे । मैं भी अब वकालत पढ़ रहा हूँ , कुछ तो समझ रहा हूँ । आप फ़िक्र मत करो , सब ठीक हो जाएगा ।

रवि , शुभ को तसल्ली देने के लिए कह रहा था कि सब ठीक हो जाएगा लेकिन वो ख़ुद नही जानता था कि सब कुछ कैसे ठीक होगा । उधर से राजेश की ओर का वकील कोल्डब्लडेड मर्डर के अपराध में उन्हें फ़ाँसी की सज़ा दिलवाने को तैयार बैठा था । रवि दिन – रात मेहनत कर बड़े से बड़ा वकील कर रहा था । बड़ी बहन सोना की उम्र बढ़ रही थी और साथ ही उसकी खूबसूरती भी । एक ओर तो शुभ को बरी कराने के लिए दौड़-धूप हो रही थी तो दूसरी ओर सोना के लिए एक शरीफ़ लड़के की तलाश । जहाँ भी जाते कोई शरीफ़ घर शुभ का ज़िक्र आते ही पीछे हट जाता और ख़ामोश हो जाते । शुभ की रिहाई से सोना की विदाई का गहरा रिश्ता था , बहन-भाई जो थे । तारीख़ पर रवि जाता और कहीं लड़का देखना होता तो भी बाऊजी के साथ रवि जाता क्योंकि बाऊजी अब बहुत कमज़ोर होते जा रहे थे , अकेले सफ़र नही कर सकते थे । काम का स्ट्रैस भी कम नही हो सकता था , वरना पैसा कहाँ से आएगा ? रवि पच्चीस साल की उम्र में बुज़ुर्ग हो गया था ।

आखिरकार रवि की मेहनत रंग लाई और शुभ को बेकसूर साबित करने में सफ़लता मिली । शुभ घर आया तो सोना की विदाई भी किसी तरह हो गई । सरला और माणों भाई को देख कर सहमी सी रहतीं । शुभ भी एब पहले वाला शुभ कहाँ था , वो खोया-खो सा कमरे में बंद बैठा रहता । उसे आँखों के सामने सिर्फ़ सलाखें दिखतीं , सोता तो कई बार नींद में चौंक कर उठ जाता । जेल में बीजी के हाथ का खाने को तरसता था लेकिन अब न जाने क्यों भूख मर गई थी । एक अपराधबोध दिलो-दिमाग़ पर काले – घने बादलों सा छाया रहता । घर में हाथ बंटाने के लिए काम ढूँढना चाहता था , एक इज़्ज़तदार ज़िंदगी बिताने के लिए काम चाहिए था लेकिन उसका माज़ी उसका पीछा नही छोड़ रहा था । बाऊजी के सामने आने से कतराता , बाऊजी उसकी शर्म समझ रहे थे ।  एक दिन शाम को जब सैर के बाद वो घर लौटे तो शुभ को पुकारा ,

शुभ , यहाँ आ ।

उनकी आवाज़ सुनकर उसके शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई थी । न जाने कितने दिनों बाद बाऊजी के मुख से अपना नाम सुन रहा था । कई बार उसका जी चाहा था कि उनसे लिपट कर खूब रोए लेकिन केवल तनहाई में रोता था । वो आँसू उसके दिल से निकले पश्चाताप के होते थे , अपने बाऊजी को दिए दुख के होते थे , उसके लिए बीजी के बहाए आँसुओं के लिए होते थे , रवि का बचपन छीनने के होते थे , अपनी बहनों को शर्मसार करने के होते थे । बाऊजी की एक और पुकार पर वो बाहर आकर उनके पीछे खड़ा हो गया था । बाऊजी ने महसूस कर लिया था ,

कल ओखला चला जाना , मेरे दोस्त हैं जोशी जी उन्होंने तेरे लिए काम तलाशा है एक एक्सपोर्ट कंपनी में । जाकर मिल लेना उनसे , वो जानते हैं तुझे ।

उसने सिर हिलाकर हामी भर दी थी , बाऊजी समझ गए थे । अगले दिन सुबह जल्दी उठकर तैयार होने लगा तो बाऊजी ने उसके पलंग पर एक नई कमीज़ और पैंट रख दी और साथ में सौ रुपए भी रखे थे । जिस पिता की देशभक्ति से उसे नफ़रत थी और जिनकी हर बात के उलट करने की उसकी आदत बन गई थी , आज वो उनके लिए हर वो काम करना चाहता था जो उन्हें खुशी दे ।

एक्सपोर्ट हाऊस पहुँचा तो वहाँ उसकी मुलाकात उस लड़की शिवानी से हुई जिसकी वजह से राजेश का खून हुआ था । शुभ उसकी नज़र से छिपता रहा लेकिन वो उसका पीछा तब से कर रही थी जब से वो रिहा हुआ था । वो उसी एक्सपोर्ट हाऊस में काम करती थी । शुभ को काम की सख़्त ज़रुरत थी वो अब घरवालों पर और बोझ नही बनना चाहता था इसलिए उसने कुछ नही सोचा और काम पकड़ लिया । शिवानी हर रोज़ खाने के समय उसके पास आ जाती , कुछ दिन तो शुभ ने ज़्यादा बात नही की लेकिन हर रोज़ वही होता , वो बात करने की कोशिश करती ,

शुभ जो भी हुआ मैं उसके लिए कसूरवार नही हूँ । केवल तुम ही नही हो जिसने सज़ा भोगी , मैंने भी भोगी है । समाज में मेरा चलना मुश्किल हो गया था , मेरे परिवार से सब रिश्तेदार दूर हो गए थे ।

उसकी बोतें सुनकर उसका दिल पसीज गया था , उससे सहानुभूति होने लगी थी । धीरे-धीरे वो खुलने लगा लेकिन अपने माज़ी की बात नही करना चाहता था । दोनों साथ खाना खाते , शिवानी उसका इंतज़ार करती , दोनों साथ-साथ बस पकड़ कर घर जाते । दोस्ती गहराने लगी थी , घर में जब ये पता चला तो बाऊजी ने एतराज़ उठाया और उसे अब अलग घर लेकर रहने की सलाह दी क्योंकि बाऊजी अब शुभ को ज़िम्मेदारियों का एहसास कराना चाहते थे और रवि के जीवन को ज़िम्मेदारियों के बोझ से मुक्त कराना चाहते थे । शुभ अलग रहने लगा , एक दिन शिवानी के साथ घर आया तो शिवानी की माँग में सिंदूर था । बाऊजी उसके इस फ़ैसले से बेहद नाराज़ हुए थे पर बोले कुछ नही , बस ख़ामोशी से उसके सिर पर हाथ रख उठ कर बाहर चले गए । बीजी ने भी बहू के हाथ में शगुन के ग्यारह रुपए रखे और अपनी आँखों को भींचकर , फड़फड़ाते होठों से चुप बैठी रहीं । उसके बाद शुभ कभी-कभी अकेला आ जाता था लेकिन शिवानी नही आती थी । शिवानी का कहना था कि उसे यूँही बीच में घसीटा गया , उसकी और उसके परिवार की बदनामी हुई सो अलग । शंकर और भीमा अभी रिहा नही हुए थे इसलिए शिवानी आज़ाद थी । दोनों की गृहस्ति चलने लगी और अब बढ़ने भी वाली थी । शिवानी माँ बनने वाली थी , जब ये बात बीजी को पता चली तो खुशी से पास वाले मंदिर में जाकर माता रानी के चरणों में पाँच रुपए का प्रसाद बोल आईं । अब उनका दिल बहू को पास रखने को ललकने लगा था लेकिन बाऊजी पता नही क्यों इस बात को टाल जाते थे , उनसे कोई ज़िद तो कर नही सकता था । उनकी उन बढ़ती उम्र की हड्डियों में कहीं अभी भी आज़ादहिंद फौज का अंश ज़िंदा था , अपनी बात पर अडिग । चोरी – चुपके से बीजी छोटे-छोटे टोपी , मोज़े और स्वेटर बुनती रहती थीं । शिवानी के लिए कुछ-कुछ खाने का बना कर भेजतीं । उनकी आँखों में एक चमक आ गई थी , आखिर उनके शुभ की ज़िंदगी सँवरने जो लगी थी ।

पंद्रह अगस्त का दिन था , सरकार ने कई कैदियों को आज़ादी दे दी थी । मोहल्ले के लोगों ने शर्मा जी को हमेशा की तरह विशेष अतिथि बनाकर एक कार्यक्रम किया था । बाऊजी हर बार “कदम-कदम बढ़ाए जा” उसी जोश से गाते और मोहल्ले के बच्चे उनका साथ देते । आज भी शर्मा जी सुबह से तिरंगा लिए स्टेज पर चढ़े हुए बच्चों के साथ गा रहे थे ,

कदम-कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा

ये ज़िंदगी है कौम की तू कौम पे लुटाए जा ।

रवि भीड़ में खड़ा , उमस में पसीने से भीगा हुआ उन्हें एकटक भीगी आँखों से देख रहा था । वो उनका स्टेज से उतरने का इंतज़ार कर रहा था । उसने बाऊजी को हाथ पकड़ कर उतारा और गले लग गया । रवि आज टूट गया था उसके हाथ में आज का अख़बार था , बाऊजी ने कंधे से पकड़कर रवि का मुँह देखा तो चेहरा आँसुओं से भीगा था । रवि ने अख़बार आगे कर दिया । अख़बार के मुड़े पन्ने पर शुभ की फ़ोटो के साथ ख़बर छपी थी ,

“ एक युवक की दिन-दहाड़े गोली मार कर हत्या कर दी गई” हत्यारे फ़रार । ख़बर पढ़ते ही शर्मा जी के हाथ से अख़बार छूट गया । बस रवि से इतना कहा ,

जा पुत्त , शिवानी को घर ले आ ।  

रवि ने उन्हें बताया ,

शिवानी लापता है , पुलिस उसे ढूँढ रही है । बाऊजी हम शुभ को नहीं बचा पाए , उसे ये सज़ा क्यों मिली ?  

शर्मा जी ने रवि के कंधे का सहारा लिया और आसमान की ओर देखा फिर धीरे-धीरे पुलिस स्टेशन की ओर चल पड़े , अपने शुभ की इस आखिरी सुनवाई को अंजाम देने ।

 

माला जोशी शर्मा

 

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