मशकली

 

पुरानी दिल्ली की गलियाँ….., एक एहसास हैं । हर गली की अपनी एक खास बात है। हर गली , मुहल्ला अपना इतिहास लिए है । उसी में बल्लीमरान मोहल्ला भी एक इतिहास लिए है । इसी मुहल्ले की गली  क़ासिम जान में ग़ालिब की हवेली है , शायद इस ग़ली की हवा में ही इंकलाब है । आज भी यहाँ गली में दीनदयाल जी के घर में इंकलाब आया , उनकी बेटी गायत्री ने आज ग़ज़ब कर दिया । लड़के वाले उसे देखने आए थे , लड़के की माँ ने गायत्री का सिर दुपट्टे से ढकते हुए कहा ,

हमें ऐसी ही पढ़ी-लिखी , सुंदर , सुशील और घरेलू लड़की चाहिए ।

लड़के ने गायत्री को पसंद कर लिया था , वो मुस्कुराता गायत्री को नीची निगाहों से देख रहा था। तभी गायत्री सिर से चुन्नी खींचते हुए खड़ी हो गई और माँ को घूरती हुई भीतर कमरे में भाग गई । अम्मा दनदनाती हुई पीछे भागीं , भला ये कैसी बदतमीज़ी करी लड़के वालों के सामने । अम्मा को देखते ही गायत्री फट पड़ी ,

नही करनी मुझे यहाँ शादी ।

आवाज़ इतनी तेज़ थी कि बैठक में बैठे सबने सुनी ।

दीनदयाल जी और लड़के वाले सभी सन्न रह गए । गायत्री माँ की ओर देखती हुई बोली ,

सुंदर , सुशील , पढ़ी-लिखी और घरेलू लड़की चाहिए !! कह दो इनसे , ये दुकान नही जहाँ डिज़ाइनर बहू मिलती हो ।

अम्मा…..आँखें बड़ी – बड़ी कर हैरानी से उसे देखती रहीं । ऐसा तो उन्होंने कभी सुना ही नही कि लड़की , लड़के को रिजैक्ट कर रही है !! वो भी उनकी अपनी बेटी…!! क्या जवाब देंगी अपनी बहन को जिसने ये रिश्ता भेजा था । अम्मा ने माथा ठोक लिया , दीनदयाल जी मुँह लटकाए बैठे थे । लड़के वाले मुँह बाए , आँखें फाड़े , कभी बैठक के बाहर देखते जहाँ से आवाज़ आ रही थी तो कभी एक-दूसरे का मुँह । अब गुस्सा दिखाना तो उनका जन्मसिद्ध अधिकार था , गुस्से से पैर पटकते घर से निकल गए । गायत्री सीधी छत पर पहुँची जहाँ पड़ौस के रिफ़त चाचा की बेटी , उसकी बचपन की सहेली फ़िरदौस कब से खड़ी उसके ज़िंदगी के रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रही थी । वो गायत्री को देखते ही मुंडेर पर लटक कर ऐसे रहस्यमयी ढंग से बोली मानो किसी प्रेम कथा की पहली मुलाकात में क्या हुआ जानना हो ,

क्या हुआ….मेरी बन्नो…..!! कैसी रही मुलाकात ?

गायत्री आँखें तरेरती बोली ,

चूल्हे में गई मुलाकात । मरों को बीवी नही , शो केस में रखी गुड़िया चाहिए । मेरी जूती करेगी ऐसों से ब्याह ।

ये कहती हुई फ़िरदौस के पास मुंडेर पर कूद कर बैठ गई । फ़िरदौस उसे हताश नज़रों से देखती हुई बोली ,

एक और बेचारे ने मुँह की खाई ।

तुझे वो घोंचू , अपनी अम्मा की पूँछ , बेचारा लगता है ?

कहते हुए गायत्री ने उसकी कमर पर एक धौल धर दिया । फ़रदौस ,

उई अम्मा……

चिल्लाई तो नीचे सहन में घूम रहे दीनदयाल जी ने सिर उठा कर गुस्से में ऊपर देखा । अम्मा खाट पर बैठी अपना गुस्सा जवों पर निकाल रही थीं , तोड़ तो जवें रही थीं लेकिन उनका बस चलता तो घरभर का सिर फोड़ देतीं । इस मुद्दे को लेकर दोनों पति-पत्नि के बीच अच्छा खासा विवाद हो कर चुका था । गायत्री नीचे घर के गरम माहौल से बच कर छत पर भाग आई थी। सबको पता था कि वो घर में कम और फ़िरदौस के साथ छत पर ज़्यादा रहती थी । खुली हवा में उसे सुकून मिलता था ।

आ….आ….आ….।

करती फ़िरदौस के साथ रिफ़त चाचा के कबूतरों को दाना खिलाती रही । उसे इन कबूतरों के साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता था । कबूतरों को वो पहले कई बार चुपके से आज़ाद भी कर चुकी थी , जिसकी शिकायत बाऊजी तक पहुँची थी । इससे पहले कि बाऊजी कुछ कहते , निशा ने रिफ़त चाचा से कान पकड़ कर माफ़ी माँग सब सुलटा लिया था । उसे इन कबूतरों के पैरों में पहनाई चूड़ियाँ अच्छी नही लगती थीं । इनके बोझ से बेचार ऊँची उड़ान ही नही भर पाते थे । वो तो बस इनकी चूड़ियाँ निकाल देती थी , उड़ान तो वो ख़ुद भर लेते थे । अब इसमें उसका क्या कसूर था ? इस ख़ुराफ़ात में उसे फ़िरदौस का हमेशा साथ मिलता था ।

कबूतरों को दाना खिलाते हुए उसका ध्यान नीचे अम्मा – बाऊजी में अटका था । जानती थी कि अम्मा बहुत नाराज़ होंगी और बाऊजी भी । उसने सोच लिया कि वो आज उन्हें साफ़ – साफ़ बता देगी कि वो क्या चाहती थी । नीचे आने लगी तो अम्मा की आवाज़ कानों में पड़ी । अम्मा तो नाराज़ क्या , उबल रही थीं और निशाने पर बाऊजी थे ,

इस लड़की को , तुमने बिगाड़ा है , चार किताबें क्या पढ़ लीं , इसे दिमाग़ हो गया है । यूँ रिश्ते मना कर के बिरादरी में नाक कटाएगी ये लड़की । अब पूछो ज़रा इससे कि आख़िर चाहती क्या है !!

दीनदयाल जी इस बात से परेशान नही थे कि गायत्री ने लड़के को मना क्यों कर दिया । वो तो सिर्फ़ ये सोच रहे थे कि वो शादी के लिए हर बार मना क्यूँ कर रही थी ? जब से उनकी तबीयत बिगड़ी थी उन्हें सिर्फ़ गायत्री की ही चिंता थी । चावड़ी बाज़ार में बाप-दादों के समय की किराने की दुकान से घर चलता था । बेटा हरीश दुकान पर बैठना नही चाहता , नौकरी कर रहा था । पुरानी दिल्ली के लोगों की सोच उसे पुरानी लगती थी इसलिए गुड़गाँव में रहता था । उसे तो अपना नाम तक पुराने टाईप का लगता था इसलिए हरीश से हैरी हो गया था । दीनदयाल जी तो अब बेटी के हाथ पीले कर निफ़राम होना चाहते थे फिर बेटा दुकान का जो चाहे करे । गायत्री नीचे आकर अम्मा – बाऊजी के सामने सिर झुकाए अपराधी सी खड़ी थी । उसे देख कर अम्मा का जवें तोड़ना और तेज़ हो गया था । बाऊजी पास आकर धीरे से उसके सिर पर हाथ रख कर बोले ,

तेरी अम्मा परेशान है कि लड़के में क्या खराबी थी जो तूने मना कर दिया ? कैसा लड़का चाहती है , बता दे अम्मा को , हम वैसा ही देखेंगे ।

अम्मा को समझ नही आ रहा था कि ये डाँट रहे हैं या उसकी साइड ले रहे हैं ? गायत्री ने हिम्मत जुटाकर कहा ,

बाऊजी….मुझे अभी नही करनी शादी । मेरी पढ़ाई पूरी हो जाए तो मैं दुकान पर आपका हाथ बटाऊँगी । अपनी दुकान को बढ़िया स्टोर बनाऊँगी , बिलकुल मॉड्रन स्टाईस का ।

उसकी बात सुनते ही बाऊजी उसे हैरत से देखने लगे और अम्मा जवें पटक खाट से खड़ी हो गईं । चाऊड़ी बाज़ार में किराने की दुकान पर उनकी बेटी बैठेगी…!! ये लड़की कहाँ से इतनी सिरफिरी हो गई , गली कासिम जान की लड़की दुकानदारी करेगी ? ये सुनते ही उनका तो दिमाग़ भिन्ना गया ,

तुम पगला तो नही गई हो ? हमारे यहाँ लड़कियाँ दुकानदारी नही करतीं और वो भी चावड़ी बाज़ार में !!

गायत्री बड़े इत्मिनान से बोली ,

नही किया तो क्या ? अब करेगी । ऐसा थोड़े ही होता है कि जो अभी तक नही हुआ वो कभी नही होगा ।

उसकी बेबाकी पर अम्मा गुस्से से दाँत पीस रही थीं और बाऊजी मुँह बाए हैरत से देख रहे थे कि बल्लीमरान के मोहल्ले में पली – बढ़ी उनकी लड़की के दिमाग़ में ये आज़ादी कहाँ से आ गई थी ! गायत्री जानती थी कि यही होगा , लेकिन वो तैयार थी । बाऊजी बड़े प्यार से समझाते हुए बोले ,

बेटा , ये क्या कह रही है तू । तू मेरे साथ दुकान पर बैठेगी ? ये काम लड़कियों का नही होता । तू पढ़ना चाहती है तो पढ़ ना , कोई नही रोकेगा तुझे लेकिन ये दुकान-वुकान की बात दिमाग़ से निकाल दे ।

इस बार गायत्री झल्लाकर बोली ,

बाऊजी , लड़कियाँ फ़ौज में भरती होने लगी हैं , चाँद पर जाने लगी हैं , मैट्रो ट्रेन चला रही हैं और मैं दुकान पर नही बैठ सकती !

बाऊजी ठहरे ठंडे दिमाग़ के , उसकी बात को फ़िलहाल बदल कर घर का माहौल बदलने लगे , हँसकर बोले ,

अच्छा चल बैठ जाईयो , पहले पढ़ाई तो पूरी कर ले ।

ये सुनकर अम्मा का तो पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया ,

तुम और तुम्हारी बेटी एक दिन मोहल्ले में जीना मुश्किल कर दोगे । मैं तो घर छोड़कर हरिद्वार चली जाऊँगी ।

इसके बाद अम्मा के पास एक ही अस्त्र बचता था और वो था कमरे में जाकर खाटपर पड़ जाना । बाप-बेटी ने एक दूसरे को देखा और दबी मुस्कान से बात आई-गई कर दी लेकिन वो नही जानते थे कि इस बार अम्मा ब्रह्मास्त्र लिए बैठी हैं । वो तो खाना-पीना त्याग कोप भवन में पड़ी रहीं । बाऊजी ने , गायत्री ने बहुत मनाया लेकिन वो थीं कि टस से मस नही हुईं । आज उसे अपनी अम्मा कम और केकैई ज़्यादा लग रही थीं । केकैई की ज़िद के आगे हारे राजा दशरथ भी थे और राम भी । इस युग में भी वही हुआ , परेशान हो कर बाऊजी ने बेटी को समझाया कि हाँ कह दे , माँ की मान जा , उसे डायबिटीज़ है , खाएगी नही तो बीमार हो जाएगी । जहाँ तू हाँ कहेगी शादी वहीं करेंगे पर अभी मान जा ।

मरती क्या न करती , बेचारी गायत्री ने बाऊजी का मुँह देखकर न चाहते हुए भी वो कहा जो वो नही करने वाली थी , अम्मा से माफ़ी माँगी और कह दिया,

अच्छा अम्मा , तुम जीतीं , मैं हारी । वही होगा जो आप कहोगी लेकिन अब उठो और खाना खालो ।

ये सुनते ही अम्मा उठकर बैठ गईं और तिरछी आँखें करके बोलीं ,

देख , कहे देती हूँ कि अब कोई लड़का देखने आए तो तू अपना मुँह बंद रखेगी । हम कोई तेरे दुश्मन हैं जो किसी से भी ब्याह देंगे ?

गायत्री सिर नीचा किए अम्मा की सुनती रही , मौका ही ऐसा था । उस दिन गायत्री ने खाना बनाया और सबने साथ बैठकर खाना खाया । खाना खाते ही गायत्री भागी छत पर खुली हवा में साँस लेने के लिए । आज पूर्णिमा थी , पूरी छत पर चाँदनी छिटकी हुई थी । वो मुंडेर पर बैठी चाँदनी में नहाती , जामामस्जिद और लाल किले की गुंबद निहार रही थी । इतनी पुरानी इमारतें आज भी नई इमारतों को मुँह चिढ़ाती अपनी विशालता लिए खड़ी थीं । वो सोच रही थी कि इन इमारतों की क्या खास बात रही होगी जो आज भी इतनी आपदाओं के बाद भी अटल खड़ी हैं ? कितनी अलग हैं ये इमारतें और इमारतों से ,  इनकी नींव कितनी मज़बूत रही होगी । न होती तो कब की ढह गई होतीं । बिल्कुल हमारे वजूद की तरह , हमारी सोच की तरह । उसे भी भीड़ में चलना अच्छा नही लगता लेकिन अलग वजूद बनाने के लिए नींव मज़बूत करनी होगी । तभी एक ज़ोर का धक्का उसकी पीठ पर लगा , वो चौंक कर गिरते-गिरते बची । ये फ़िरदौस थी ,

, मेरी लेडी ग़ालिब , किस सोच में डूबी हो !

गायत्री कूदकर उसके पीछे भागी ,

लेडी ग़ालिब की बच्ची , ठहर अभी बताती हूँ तुझे , अभी मैं गिरती तो सारा थोबड़ा फूट जाता मेरा ।

थोड़ी देर भागम-भाग के बाद दोनों के साँस चढ़ गए और एक साथ मुंडेर पर बैठकर ज़ोर – ज़ोर से हँसनें लगीं । उसके बाद गायत्री ने फ़िरदौस को आज का सारा किस्सा सुनाया । फ़िरदौस कुछ गंभीर होते हुए बोली ,

तो अब क्या करेगी तू ? चचीजान जिससे कहेंगी उससे शादी कर लेगी ?

गायत्री ने उसके सिर पर धौल जमाते हुए फुसफुसाते हुए कहा ,

पागल है क्या ? वो तो बाऊजी का मुँह देखकर मैंने हाँ कह दी । मैं नही करने वाली किसी भी ऐरे-गैरे से शादी । हालात आसानी से नही बदले जाते लाडो , लड़ना पड़ता है , अपने से , अपनों से और बाहर वालों से भी ।

एक लंबी , गहरी साँस छोड़ते हुए उसने फ़िरदौस के कंधे पर अपना सिर टिकाते हुए कहा,

फ़िरदौस , क्या लड़की होना कोई गुनाह है ? हम अपने मन की क्यों नही कर सकते ? अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से क्यों नही जी सकते ?

फ़िरदौस ने उसे अपनी दोनों बाहों में प्यार से समेटते हुए कहा ,

मेरी पगली सहेली , अरे , अल्ला मियाँ ने बड़े सोच कर लड़की की ज़ात को इजात किया होगा । बस उसे उड़ने को पर भी दे देता तो कितना अच्छा होता । हम भी इन कबूतरों की तरह पैरों की चूड़ियाँ निकाल फुर्र से उड़ जातीं ।

इस बात पर दोनों सहेलियाँ खिलखिलाकर बहुत देर तक हँसती रहीं । तभी अम्मा की पुकार ने उसमें विध्न डाल दिया ,

अरी , बेशर्मों , कोई लाज – लिहाज़ है कि नही ? बे लगाम घोड़ियों की तरह इतनी रात को छत पर बैठी हँसी-ठट्ठा कर रही हैं , चलो उतरो नीचे ।

दोनों सहेलियाँ होंठ दबाए हँसती हुईं अपने-अपने घर की ओर भागीं ।

अगले दिन से गायत्री कॉलेज के अपने अंतिम वर्ष की पढ़ाई में जुट गई और अम्मा उसके लिए नया रिश्ता ढूँढने में । मैट्रो से उतर कर गायत्री अब हर रोज़ बाऊजी के पास दुकान पर पहुँच जाती थी । कभी उनका एकाउंट संभालती तो कभी ग्राहकों के आने वाले फ़ोन । दीनदयाल जी को बड़ा सहारा लग रहा था , लेकिन पत्नी को पता चला तो क्या होगा इसका अंदाज़ा था उन्हें । अम्मा से ये सब छिपा कर रखा गया था । आस-पास के दुकानदारों ने पहले-पहल तो खूब खुसर-फुसर की फिर दीनदयाल जी से पूछने भी लगे ,

क्या बात है बाऊ जी अब बेटे की जगह बेटी को दुकानदारी संभलवाने का इरादा है क्या ?

पहले तो दीनदयाल जी उनकी बातों पर सिर झुका कर कोई जवाब न देते थे और गायत्री को भी बोलने से रोकते रहते थे लेकिन एक दिन उनकी बर्दाश्त का बाँध टूट गया और दुकान के बाहर खड़े होकर ज़ोर से बोले ,

क्यूँ जी आपकी भी तो बेटियाँ हैं , उन्हें क्या पर्दे में रखने का इरादा है या , बेटी पढ़ाओ , बेटी बचाओ का नारा यूँही सरकार ने दे दिया है ? अपनी बेटियों के साथ तुम लोग जो जी में आए करो , मेरी बेटी वही करेगी जो वो चाहेगी । अगर बेटा दुकनदारी नही करना चाहता और बेटी करना चाहती है तो करे । मेरी बेटी में तो दम है वो कर के दिखाएगी दुकनदारी ।

सुनते ही सब चुपचाप अपनी – अपनी दुकानों में घुस गए । लेकिन अब ये बात यहीं तक तो रहनी नही थी , पहुँच गई बल्लीमरान की गली कासिम जान में और गली से होती हुई दीनदयाल जी के घर में । बस फिर क्या था , घर में पहुँचते ही भूडोल गई , अम्मा ने चंडी का रुप धर लिया ,

अब इसका ब्याह होना मुश्किल है , बिठाओ दुकान पे । सारी बिरादरी में बातें बन रही हैं , कौन रिश्ता आएगा इसके लिए !  

बाऊजी ने बड़े प्यार से अम्मा को बैठाया और समझाया कि तसल्ली रख सब ठीक हो जाएगा । पर अम्मा तो सिर बाँधकर पड़ गईं और रोती रहीं । दिन छिपने को आया लेकिन अम्मा ने बिस्तर नही छोड़ा । तभी किसी ने बाहर का दरवाज़ा खड़काया ,

कोई है क्या घर में ? दीनदयाल जी , घर में हैं क्या ?

दीनदयाल जी दालान में बैठे विचार कर रहे थे कि पत्नी को कैसे मनाएँ । उन्हें तो जैसे आए गए की कोई ख़बर ही नही थी । गायत्री ने दौड़कर दरवाज़ा खोला तो सामने एक भले से अजनबी को खड़े पाया ,

मैं अंदर आ जाऊँ क्या बेटी ? मुझे दीनदयाल जी से मिलना था ।

गायत्री ने तुरंत उन्हें अंदर बुलाकर बाऊजी को आवाज़ लगाई ,

आप आईए , बाऊजी कोई मिलने आया है आपसे ।

उन्हें बैठक में बैठा वो पानी लेने चली गई , अब घर में इतना तूफ़ान हो और कोई अजनबी आ जाए तो बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है । बाऊजी अपरिचित सा भाव लिए बैठक में पहुँचे तो अवाक रह गए । सामने मूलचंद मसालेवाले खड़े थे । बाज़ार में बड़ा नाम था उनका , नाम ही नही काम भी बड़ा था । इतना बड़ा व्यापारी उनके घर कैसे आया सोच ही रहे थे कि मूलचंद जी बोल पड़े ,

दीनदयाल जी मैं आपसे एक बड़ी ज़रुरी बात के लिए मिलने आया हूँ । बात कुछ पर्सनल थी तो सोचा घर ही चल पड़ूँ ।

बाऊजी हाथ जोड़ बोले ,

अजी धन्यभाग हमारे , बैठिए ना । अरी गायत्री , पानी ला बिटिया ।

गायत्री पानी लाई तो वो बोले ,

ये बिटिया है आपकी ? जो आजकल दुकान पर बैठती है आपके साथ ?

दीनदयाल जी थोड़े सकपका से गए ,

जी , इसकी ज़िद थी कि दुकान पर बैठकर मेरा हाथ बंटाएगी । कई बार बच्चों की ज़िद के सामने बड़ों को झुकना ही पड़ता है लेकिन इसकी अम्मा को ये सब बिल्कुल पसंद नही है ।

मूलचंद जी मुस्कुराते हुए गायत्री को देख रहे थे ,

बड़ी बहादुर है आपकी बिटिया और काबिल भी ।

इस बीच गायत्री चाय बनाने चली गई । अम्मा अभी भी जस की तस पड़ी थीं । मूलचंद जी ने कहा ,

अगर आप बुरा ना मानें तो एक बात कहनी थी ।

ये सुनते ही दीनदयाल जी का दिल धड़कने लगा , कहीं गायत्री का दुकान पर बैठना कोई मुसीबत खड़ी तो नही कर देगा । फिर भी दबी सी ज़बान से बोले ,

ना ना , बुरा क्या मानना , कहिए ना ।

आपकी बिटिया का हाथ अपने बेटे भास्कर के लिए माँगने आया था । ऐसी होनहार बेटी घर आ गई तो मेरे बिज़नस में चार चाँद लग जाएँगे ।

कहते हुए मूलचंद जी उनका चेहरा देखने लगे कि क्या भाव आते हैं । दीनदयाल जी के चेहरे पर तो इतने रंग आ रहे थे कि मूलचंद जी समझ ही नही पा रहे थे कि वो इस संबंध से खुश हैं या दुखी । इसी बीच गायत्री चाय ले आई थी , मूलचंद जी गायत्री को बड़े प्यार से निहार रहे थे । दीनदयाल जी ने मूलचंद जी का चेहरा देखते हुए खोई आवाज़ में बेटी से कहा ,

जा बेटा अपनी अम्मा को बुला ला ।

गायत्री के हाथ की ट्रे काँप गई , भला ये बाऊजी क्या कह रहे हैँ ? अम्मा तो कोप भवन में सिर बाँधे पड़ी थीं । ततैयों के छत्ते में कौन हाथ डालेगा ? कम से कम वो तो नही । क्या पड़ी थी बाऊजी को उन्हें आए – गए से मिलवाने की । जब वो नही हिली तो दीनदयाल जी ने थोड़ी संभली आवाज़ में कहा , शायद अब तक वो इस नए , अचानक हुए अप्रत्याशित घर में आई पुरवा हवा के झोंके का आनंद अनुभव कर रहे थे ,

अरे , देखती क्या है ? अच्छा ठहर मैं ही जाकर बुलाता हूँ ।

कुछ खिसयाते से बोले कहीं मूलचंद जी को थोड़ी देर पहले घर में आए भूचाल का आभास न हो जाए ,

दरअसल , गायत्री की अम्मा की कुछ तबीयत खराब थी सो लेटी हैं ।

इससे पहले कि मूलचंद जी कुछ कहते वे तेज़ी से निकल गए । जाकर मूँह ओढ़े लेटी पत्नी से बड़े प्यार से बोले ,

भागवान उठो , आज तो तुम्हारे मन की हो गई । मूलचंद जी मसाले वाले आए हैं अपनी गायत्री का रिश्ता लेकर ।

ये सुनते ही उनकी धर्मपत्नी को तो जैसे करंट लग गया , चादर दूर फैंक , खड़ी हो गईं । बड़ी-बड़ी आँखें फाड़े पति को देखती हुई बोलीं ,

क्या कहा ! मूलचंद जी मसाले वाले , अपनी गायत्री का रिश्ता माँगने आए हैं !

साथ ही अपनी बिखरी हालत को संवारती हुई वो ऐसी फुरती से रसोई की ओर भागीं जैसे आज ही रिश्ता पक्का हो जाएगा ।

मूलचंद जी की उसदिन अम्मा ने खूब खातिरदारी की । गायत्री और बाऊजी ये देखकर हैरान थे कि इतनी फुर्ती उनमें अचानक कहाँ से आ गई । उनके जाने के बाद बाऊजी गायत्री से पूछने लगे ,

बोल बेटा क्या तुझे रिश्ता मंज़ूर होगा ? मैंने इनका लड़का देखा है , लंदन से पढ़कर आया है और विज़नेस में नए-नए तरीके अपना रहा है तभी तो इनका बिज़नेस इतना अच्छा हो गया ।

इससे पहले कि वो कुछ कहती अम्मा बिफर पड़ीं ,

अब इसकी एक नही चलेगी । ऐसा रिश्ता घर चल कर आया है तो इसे क्या ऐतराज़ होगा भला ।

पर गायत्री कब चुप रहने वाली थी ,

बाऊजी मैं लड़के से मिले बिना कोई फैसला नही करने वाली फिर चाहे वो मसाले वाले हों या घी-मक्खन वाले । लड़का बौड़मदास निकला तो ?

अम्मा ने बड़ी – बड़ी सुनाई लेकिन बाऊजी ने उसकी बात मान कर मूलचंद जी के यहाँ संदेश भिजवा दिया कि लड़की लड़के से मिलना चाहती है । बात उन्होंने तुरंत मान ली क्योंकि लड़का भी यही चाहता था । लड़का-लड़की की इच्छा अनुसार दोनों घर में नही , कहीं बाहर मिले । गायत्री ने लड़के का पूरा इंटरव्यू ले डाला ,

मेरे काम करने में आपको ऐतराज़ तो नहीं , आपकी माँ को सुंदर – सुशील कन्या तो नही चाहिए ? और न जाने क्या – क्या । भास्कर बड़ी शांती से उसके हर सवाल का जवाब देता रहा और मुस्कुराता रहा । आखिर में उसके बोलने की बारी आई ,

अब मैं कुछ पूछ सकता हूँ आपसे ?

गायत्री ने हाँ में सिर हिला दिया । भास्कर उसे देखते हुए बोला ,

अगर आपको अपने सवालों के जवाब मिल गए हों तो क्या मैं आपसे एक सवाल पूछ सकता हूँ कि क्या आप मुझसे शादी करना पसंद करेंगी ? मैं तुम्हें सॉरी आपको बहुत दिनों से आपके बाऊजी की दुकान पर काम करते देख रहा था और तभी सोच लिया था कि शादी करनी है तो बस ऐसी ही लड़की से ।

गायत्री ने शरारत से उसे देखते हुए कहा ,

अच्छा जी आप चुपके – चुपके नज़र रखे थे हम पर । 

गायत्री को भास्कर में अपने जीवन साथी के सपने दिखाई दे रहे थे । उस रात जब वो छत पर गई तो फ़िरदौस को सारी कहानी कह सुनाई । दोनों सखियाँ देर तक बातें करती रहीं । आज उसे घर में बड़ी शांति लग रही थी अम्मा बड़ी देर से बाऊजी के कानों में खुसर-फुसर करने में लगीं थीं । गायत्री का जवाब उन्हें मिल गया था कि लड़का उसे पसंद है । जब वो कबूतरों को दाना खिलाने लगी तो फ़िरदौस ने जाली में से एक सफ़ेद दूध जैसी पंख फैलाए मशकली को निकाल कर उसके सामने कर दिया । उसने बताया कि इसे उसके अब्बा कल ही ख़रीद कर लाए थे । पंख फैलाए , उड़ान को तैयार मशकली कितनी खूबसूरत लग रही थी । रिफ़त चाचा ने उसके पैरों में चूड़ियाँ भी नही पहनाई थीं ये देख कर निशा के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई । गली कासिम जान में एक बार फिर इंकलाब की हवा बह रही थी ।

 

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