बेग़ाना दिल

ऐ दिल तू क्यों अपनों में भी बेगाना सा फिरता है ,

क्यों कोई तेरा पहचाना सा नही लगता है ,

तू धड़कता तो है पर अनजाना सा धड़कता है ,

ऐ दिल तू क्यों अपनों में भी बेगाना सा फिरता है ।

सब अपनी ही धुन में चलते हैं ,

अपने सपनों में डूबे रहते हैं ,

तू उनकी धुन का तार नही बन पाता है ,

उन सपनों में अपने को नही तू पाता है ,

ऐ दिल तू क्यों अपनों में भी बेगाना सा फिरता है ।

उन आँखों में क्यों खोया सा कुछ लगता है ,

हर पेशानी पर धुंधला सा पसीना दिखता है ,

क्यों उन आँखों में फिर मुलाक़ात नही दिखती है ,

क्यों उस पेशानी पर सुकूँ का रंग नही आता है ,

ऐ दिल तू क्यों अपनों में भी बेगाना सा फिरता है ।

बहार है , रंग है , हर चेहरा फिर बेरंगा सा क्यों लगता है ,

भाग रहा वो झोंके से बस , मन खोया सा लगता है ,

लहरों पर बस नाव रखी है , पतवारों को भूल गया है ,

डूबेगा या पार करेगा , इसी फेर में लगा हुआ है ,

ऐ दिल तू क्यों अपनों में भी बेगाना सा फिरता है ।

 

 

6 thoughts on “बेग़ाना दिल

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