मैं न जाने क्या ढूँढ रही हूँ

मैं न जाने क्या ढूँढ रही हूँ

वो गर्म रेत पर नंगे पाँव रखना

पैर जलने पर कूद-कूद कर चलना

चप्पल टूटने पर सेफ़्टी पिन से काम चलाना

पिन न चुभ जाए कहीं ये सोच कर सहेली का रुमाल से मेरी चप्पल बांध देना

उस रेत में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ।

बसंत में सबका पीले कपड़े पहनना

पीले फूलों की माला बनाकर मंदिर में चढ़ाना

घर से मेरी पीली फ़्रॉक न आने पर मेरा उदास होना

सहेलियों का रातों-रात सफ़ेद फ़्रॉक को ड्रॉइंग कलर से पीला रंग देना

उस बसंत में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

सर्दियों की धूप में खेत से कच्ची मूंगफलियाँ खाना

तू लंबी है , कह कर मुझ से इमलियाँ तुड़वाना

आँवले तोड़ कर जेब में भर लेना

पैसे जोड़कर , चंदा-नंदा की दुकान से कुछ मुस्कुराहटें ले लेना

उन मस्ती भरे दिनों में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

एग्ज़ाम से पहले मेरा बीमार हो जाना

फ़ेल होने के डर से मेरा रात-रात रोना

सहेलियों का बारी-बारी से मुझे पढ़ कर याद कराना

मेरे पास हो जाने पर उनका खुशियाँ मनाना

उस बेगर्ज़ ज़माने में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

मिलकर गीत हम गाते थे , डर में साथ सो जाते थे

तेरा – मेरा पता न था , साथ में खाना खाते थे

रुखा था या बेस्वादा था , स्वाद साथ का आता था

न ऊँच – नीच का सोचा था , न जात-पात का रौला था

वो प्रेम-प्यार के मौसम थे , मैं उनमें आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

फ़िल्मों का कुछ और मज़ा था , राजेश खन्ना क्रेज़ बना था

फूलों और पंखों को लेकर , डायरी के पन्नों में दबा दिया था

मौन प्रेम को आँखों के रस्ते से , कुछ शब्दों में उतार लिया था

डायरी के उन बंद पन्नों में , फूलों का रंग समा गया था

उन महकते रंगों में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

कहते हैं हम आगे बढ़े गए हैं , तकनीकी से जुड़ गए हैं

दूरी को हम भूल गए हैं , कंप्यूटर से नए आयाम को छूने चले हैं

सब अपने-अपने में मस्त हुए हैं , मंगल तक भी पहुँच रहे हैं

घर आना अब दूर बहुत है , कुशल मंगल ही पूछ रहे हैं

तकनीकी प्रेम के इस समय में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

बचपन के उन दिनों में , मैं आज का ज़माना ढूँढ रही हूँ

या आज के ज़माने में , मैं तब का ज़माना ढूँढ रही हूँ ?

मैं न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

 

5 thoughts on “मैं न जाने क्या ढूँढ रही हूँ

  1. मैम कितना मार्मिक कविता लिखी है आपने 🙏♥️ पढ़ते हुए बचपन की तस्वीरें मन में कौंध गई😅😅

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    1. धन्यवाद ईशान , बचपन की यादें हमेशा प्यारी लगती हैं क्योंकि बचपन होता ही बड़ा प्यारा है ।

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