प्रेम सुधा

 

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नारी को लेकर उठते सवाल-जवाबों में मन के भीतर मंथन चलता ही रहता है । सबके ही चलता होगा शायद ! जिन पात्रों को हम अपना संबल मानते हैं उनसे हम कितने और क्यों प्रेरित होते हैं , ये सवाल भी मन में आता है । यदि नारी उनसे प्रत्यक्ष मिलती तो क्या कहती और क्या सुनती , ये जिज्ञासा भी जागी और कुछ यूँ बन गया ।

प्रेमसुधा

(पहला दृश्य)

नारी – मैं , बेटी हूँ , बहन हूँ , पत्नी हूँ , बहू हूँ , या माँ हूँ ? क्या मेरी पहचान है ?

संसार , देखता यही मेरा रुप है ,  समझता यही मेरा अस्तित्व है ।

कभी घर की लाज हूँ तो कभी घर की साज हूँ ।

इस घूँघट की परतों के पीछे मैं भी इक इंसान हूँ ।

स्त्री हूँ मैं , नदिया की मीठी धार सी , बहती हूँ अपनी चाल से , डिगती नही किसी बाधा , तूफ़ान से ।

निश्च्छल हूँ मैं , दृढ़ हूँ अपने विचार से , जानती हूँ कि मिलना है मुझे सागर के उस उन्माद में ।

करलूँ इरादा तो पार कर जाती हूँ हर बाधा , दुनिया देख कर हैरान है , कैसे है मोती ,ये सीप के उर श्वास में ।

 

सती – तप से मैंने शिव को पाया , शिव को अपना मान बनाया ।

कोमल तन को यूँ पिघलाया , तभी तो जग ने सती बनाया ।

शक्ति कोई मुझको रोक ना पाई , पर्वत पर यूँ धूनी रमाए , बैठे थे शिव ध्यान लगाए , ठान लिया था अपने मन में , तप हो , जप हो , करके पर्वत सा यूँ मन को , शंकर को ही पति बनाऊँ ।

 

राधा – मैं राधा , कृष्ण बिना था मेरा जीवन आधा , यमुना तट संग रास रचाता था वो ।

प्यार मेरा केवल वो कान्हा था लेकिन उसने प्यार में जग को बाँधा था । दुनिया टोके , चाहे रोके , बंसीधर की बंसी बन कर , हरदम उसकी धुन में घुलकर , बाँस बनी ज्यों मधुर बाँसुरी , बन जाऊँ कान्हा की रागिनी ।

(दूसरा दृश्य)

( आधी सती , आधी राधा )

वही हूँ मैं , एक ही हूँ मैं । एक ने प्रेम से अपने प्रिय को पाया , उसकी हो कर जग बिसराया ।

दूजी ने तप से प्रियतम को पाया , सब कुछ त्यागा , तब जाकर मन को मन से मिलाया ।

 

राधा – कान्हा , तू गोपियों के संग यमुना तट पर रास रचाता , धुन पे लुभाता पीपल छैंया ,

मेरा मन है जल – जल जाता , मोहन बस तू मेरा मन-मोहन , तेरी हर धुन मेरे ही हिय की छैंया ।

कृष्ण समझ कर मंद-मंद हैं मुस्काते , राधा को फिर यूँ समझाते –

तुम हो मेरी प्यारी राधा , तुम्हारा प्यार नही है साझा । तुम मेरे प्रेम की हो परिभाषा , तुम को नही है जग से बाँटा । व्यर्थ गोपियों से जलती हो , मेरे जीवन में तो केवल एक ही राधा ।

 

सती – हे , शिव , भोले भंडारी , तुम त्यागे बैठे हो ये दुनिया सारी , कैलाश बना है तपोवन सारा ,

मैंने भी है जग को त्यागा , बनी अपर्णा , पार्वती ये , पति रुप में केवल तुझको माना ।

शिव – हे , पार्वती तू , मेरी शक्ति है , तेरे बिन ये आधी भक्ति है ,

आदिकाल से तू मेरी ही पत्नी है , नाम हैं बदले तेरे पर तू मेरे भीतर ही बसती है ।

 

(तीसरा दृश्य)

सती शिव की अराधना करते हुए कहती हैं  — हे शिव , तुम्हे ही मैंने पति है माना , हर जन्म में तुम्हें ही है पाना । तप , त्याग से एक रुप ही हृदय बसाना ।

( सती हिमालय की ओर चल पड़ती हैं , इस पर शिव कहते हैं )

शिव – हे सती , तुमसे प्रकृति , तुम हो प्रकृति । उमा , रमा , ब्रह्माणी तुम हो , तुम से ही कहलाया मैं अर्धनारीश्वर । होता कैसे पूर्ण मैं रम कर , यदि न करतीं तुम इतना तप ?  तुम जग – जननी , जगत की माता , तुम से ही तो पूर्ण हुआ था ।

 

(चौथा दृश्य)

सती , राधा , औरत तीनों मिलती हैं और आपस में वार्तालाप होती है –

राधा – कृष्ण से मेरी लगन लगी है , वृंदावन मेरी प्रेम गली है ,

मेरे प्राण आधार वही हैं , गति – पति , विहार वही हैं , जीवन की रस भरी वीणा के तार वही हैं ।

सती – शिव तो हैं एक रमता जोगी , हर युग में जिनको पाने मैं बनी योगिनी , कभी तप में थी मैं जग को भूली ।

जैसे भस्म रमाई शिव ने , मैंने उनकी भक्ति रमाई , हर युग उनको पाने की ऐसी शक्ति फिर मैंने पाई ।

औरत – राधा तुम तो धन्य हुई थीं , कान्हा के मन बसी हुई थीं , प्रेम में मोक्ष की शक्ति मिली थी ।

सती हो तुम , तुम हो शक्ति आपारा , भक्ति से संसार उबारा , कैसी कठिन तपस्या करके , शिव को आसन से था उतारा , अर्धनारीश्वर रुप धराया ।

संसार तुम्हारे हाथों में है , मैं संसार के हाथों में हूँ । मुझ में तुम सी शक्ति कहाँ है ? मेरे साथ वो कृष्ण कहाँ है ?  पार्वती का शिव भी कहाँ है ?

बिक जाती हूँ बाज़ारों में , गिर जाती हूँ दहलीज़ों में , बंध जाती हूँ जंज़ीरों में , ढूँढ रही हूँ मान वही मैं , कान्हा के उस प्रेम वचन को , सती का मान बचाने वाले , शिव के उस तांडव को ।

राधा और सती उसके पास आती हैं —

तू भिन्न कहाँ है हम दोनों से ? हम दोनों तो तुझ में ही हैं । तुझ में प्रेम की धारा बहती , राधा सी है सहनशील सी , पार्वती की भक्ति तुझ में , शक्ति अपार छिपी है तुझमें । प्रेम है तुझमें , ममता तुझमें , भवसागर से पार उतरने , पाई है हर शक्ति तूने ।

(औरत जाग उठती है , दृढ़ हो जाती है) —

औरत – नही क्षीण , हीन मैं नारी , निठुर जगत की हर एक चुभन में ,

फूलों पर रेणु की चमक बन , अस्मि बनी मैं , अस्मि हूँ मैं ।

 

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