रायसाहबणी

 

बहुत दिनों से दिल पर रह-रह कर बचपन की कुछ पुरानी यादें दस्तक दे रही थीं । शहर की हापा-धापी में वो गाँव के पुराने दिन बहुत याद आ रहे थे । वे यादें एक ठंडी हवा के झोंकें की तरह दिल को गुदगुदा गई थीं , उन दिनों में फिर से जीने को मन मचल उठा और मैं चल पड़ी । मन बहुत खुश था कि मैं एक बार फिर उन लम्हों को जीने जा रही थी । घर के सामने पहुँचते ही दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं , किसी अनजाने भय का कुछ सूनापन सा उस बेरंगे दरवाज़े पर नज़र पड़ते ही महसूस हो रहा था । यादों और यथार्थ में बहुत अंतर होता है । मैंने जैसे ही गाँव की उस जरजर हुई हवेली के विशाल दरवाज़े को भीतर जाने के लिए धकेला तो उसमें लगे बड़े-बड़े पीतल के कुंडे और सांकलें खड़कने लगे और दरवाज़ा चरमराहट की तीखी आवाज़ से थोड़ा सा खुल गया वैसे ही जैसे किसी के लंबे समय के गहरे घावों को छू दिया हो और कराह निकल गई हो । उसकी हर आह , उसका हर दर्द मैं भीतर तक महसूस कर रही थी । दरवाज़ा थोड़ा सा खुलकर अटक गया जैसे अपने हालात छिपाना चाहता हो , कभी वो भी नीले रंग में चमकता , मधुमालती की लताओं से लिपटा , गर्व से खड़ा आने-जाने वालों के दिलों में भीतर की दुनिया को जानने के लिए कौतुहल पैदा करता था । भीतर प्रवेश के लिए लठ वाले दरबान से इजाज़त लेनी पड़ती थी । मैं टेढ़ी होकर भीतर घुस गई क्योंकि आज वहाँ कोई दरबान नही था और वैसे भी मुझे यहाँ प्रवेश के लिए कभी इजाज़त नही लेनी पड़ती थी । घुसते ही एक बड़ा नीम का पेड़ स्वागत करता था जिसके चारों ओर ऊँचा चबूतरा बना था । आज वहाँ टूटा चबूतरा तो है लेकिन नीम का पेड़ कटा पड़ा था , उसका सूखा , मोटा तना समय की दरारों से छिन्न-भिन्न हो चुका था । वो उम्र से नही मानवीय चोट से आहत था । याद आ रहा था कि कभी हम इसकी मज़बूत टहनियों पर झूला डाल कर दिनभर झूलते थे , जिसकी छाल को न जाने कितनी बार छील कर चबूतरे पर घिसा था अपने ज़ख़्म भरने के लिए लेकिन आज वो आहत मेरे सामने राख़ पड़ा था । कहाँ उसकी पीली मीठी निबौरियों को झोली में भरकर खाते थे वहीं आज एक बीज भी नही फूट रहा था । सामने रहट वाला कुआँ था , नज़र दौड़ाई तो टूटा रहट एक ओर पड़ा देखा और उसके डब्बे जंग खाए टेढ़े-मेढ़े लटक रहे थे । एक पल को लगा कि जैसे अभी पानी भर कर छनछनाते हुए चल पड़ेंगे । मेरे कानों में गाँव की गोरियों के छैल-कड़ूलों की आवाज़ गूँज रही थी , साथ ही गूँज रहे थे उनके कंठ से निकले लोकगीतों की आवाज़ें……..

मेरे सिर पे बंटा टोकणी ,

ओ मेरे हाथ में नेजू डोर ,

मैं पतली सी कामनी…….

उनके लहराते , रंग-बिरंगे , छत्तीस कली के घाघरे एक लय में मेरी आँखों के सामने घूम रहे थे । धीरे-धीरे गुम होते वो गीत न जाने कहाँ चले गए और कुएँ के चारों ओर फैला सन्नाटा बोलने लगा । दूर से कहीं मुझे जीजी की खनकती मीठी आवाज़ आ रही थी ,

बेबड़….ओ बेबड़ , कहाँ मर गई ! सारा दिन चबूतरे पे बैठी इन लुगाईयों के गीत सुणती रहेगी या कुछ खाएगी भी , चल भीतर आजा अब ।

जीजी यानि मेरी नानी , जिन्हें घर में सब प्यार से जीजी ही कहते थे । मेरे कदम एक-एक कर पीछे के दरवाज़े से अंदर जाने लगे । अब वहाँ दरवाज़ा नही था और ना ही कोई पूरी दीवार , बस कच्ची-पक्की ईंटों का ढेर था । मैं संभल-संभल कर कदम रखती अंदर चली गई । छोटा सा गलियारा पार कर मैं आगे बढ़ी , सब कुछ तो मुझे पता था , वो सामने चूल्हे के पास मथनी रखी थी जहाँ जीजी हर सुबह , मुँह अंधेरे उठकर दूध मथती थीं । उनकी मथनी की आवाज़ आज भी कानों में साफ़ आ रही थी , घर्र…घर्र…घर्र और मैं आँखें मलती उनके पास बैठ जाती थी । वो अपने गोरे गुलाबी चेहरे पे मुस्कान लिए मुझे प्यार से देखतीं और मक्खन निकालते हुए मेरे मुँह में ताज़ा मक्खन डाल देतीं , काम ख़त्म हो जाने पर अपने मक्खन से भरे हाथों को मेरे मुँह पर लपेट देतीं , थोड़ी देर में ही छाछ लेने वालों की लाईन लग जाती । जीजी के पतले , गुलाबी होंठ मुस्कुरा उठते और मुझ से कहतीं ,

लाडो , जा छाछ देदे सबको ।

मैं गर्व से जीजी की गद्दी पर बैठ कर छाछ बाँटती तो ऐसा लगता मानो राजा की गद्दी पर बैठी प्रजा को इनाम बाँट रही हूँ । बस जीजी का दिन शुरु हो जाता , गाँव की औरतें , जिनमें अधिकतर गरीब और उपेक्षित समाज की होती थीं , अपने-अपने बच्चों को लेकर खड़ी हो जातीं । किसी के पेट में दर्द होता , किसी का हाथ उतर जाता तो किसी के फोड़े – फुन्सी निकल आते । जीजी के पास सब मर्ज़ की दवा थी , पता नही कैसे । बच्चे को इतने प्यार से गोद में लेकर सहलातीं और बच्चा रोता-बिलखता उनकी गोद में आते ही चुप हो जाता । लोग उन्हें प्यार से रायसाबणी दादी कहते । अब रायसाहब की पत्नी गाँव में रायसाहबणी हो गई थीं । कई बार तो लोग उन्हें रात को किसी भी समय बुलाने आ जाते ,

दादी , रायसाबणी दादी , बच्चा बहुत रो रहा है , पता ना के हो गया ।

और वो एकदम चल देतीं थीं फिर चाहे वो कोई भी क्यों न हो । उन्होंने उस समय में कभी भी जाति-धर्म का भेद नही किया था । यूँ तो उच्चकोटि की ब्राह्मण कुल की थीं लेकिन गाँधी जी के उस युग में वो पक्की गाँधीवादी थीं , वैष्णव जन तो तैने कहिए और रधुपति राघव राजा राम बड़े मन से गाती थीं लेकिन अपनी ही धुन में ।

बात देश की हो या समाज की वो बेहद जागरुक थीं , ये बात आज़ादी के बाद की थी जब हिंदुस्तान को आज़ादी के कुछ वर्षों बाद ही सन् 1962 में एक दर्दनाक युद्ध का सामना करना पड़ा था । चीन से जुड़ी सीमाओं पर ख़तरनाक परिस्थितियों में , युद्ध और विपरीत तापमान से लड़ने के लिए सैना के पास अभाव थे ऐसे में सैनिक सीमा पर जान गवाँ रहे थे । उस समय अरुणांचल प्रदेश को नेफ़ा कहा जाता था । घर-घर में लोग सैनिकों के लिए खाने का सामान , कपड़े और धन इकट्ठा कर रहे थे । मैं बहुत छोटी थी पर फिर भी पता नही कैसे मुझे जीजी का वो गीत याद है जिसमें उस समय का पता चलता है ,

उमड़-घुमड़ दूध बिलोवै ,

जाटनी का छोरा रोवै ,

रोवै है तो रोवण दे ,

माखन नेफ़ा जावण दे ।

वो गीत याद आते ही आज भी मेरे रोएँ खड़े हो जाते हैं ।

मिजाज़ की बड़ी शौकीन थीं जीजी , उनका गोल्डन फ्रेम का चश्मा , सफ़ेद मलमल की या शिफ़ोन की साड़ी बड़ी करीने से पहनी होती थी , ऊँचे-लंबे कद , दूधिया रंग और हल्की नीली आँखों में वो किसी महारानी सी लगती थीं । उनका हर काम बड़ा अनोखा होता था । माली हर रोज़ बाग से फलों के साथ मोतिये के फूल भी लाता था और वो मोतिए के फूल जीजी , गीले , मलमल के कपड़े में लपेट कर घर के बीचों-बीच रखी बड़ी सी लकड़ी की घड़ौंची पर रखे हर मटके के ऊपर रख दिया करती थीं । उन फूलों की महक से सारा दिन घर महकता रहता था । अब वहाँ केवल टूटा चूल्हा और टूटी घड़ौंची उजड़े खंडहर में पड़ी थीं । वहाँ से मेरे कदम ख़ुद-ब-ख़ुद जीजी के कमरे की ओर चल पड़े , कमरे के बाहर कदम ठिठक गए क्योंकि कमरे की छत से शहतीर नीचे लटक रहे थे जो कभी भी थोड़ी सी हलचल से नीचे गिर सकते थे । जीजी का हाथीनुमा निवाड़ का पलंग जो हमेशा उस कमरे की शोभा बना रहता था और हम सब भाई-बहनों के दरबार की तरह था , जहाँ जीजी सबसे दिनभर की ख़बरें जाना करती थीं । आज उस पलंग की जगह मिट्टी का ठेर था जो शायद छतों और दीवारों से गिरी होगी । उस पलंग के पाए उस समय हमारे कद से ऊँचे होते थे और हमें उस पर चढ़ने के लिए स्टूल का सहारा लेना पड़ता था । उसके पावों पर चाँदी के ढक्कन लगे थे , सिरहाने रंग-बिरंगे लकड़ी के नक्काशी के काम के साथ एक बड़ा सा आईना था जिसमें हम टेढ़ी-मेढ़ी शक्लें बना अपने को निहारा करते थे ।

वो ज़माना बिजली का ज़माना नही था , लालटेन , लैंप , दीए और हाथ से झलने वाले पंखे होते थे । ठंडक के लिए दरवाज़ों , खिड़कियों पर खसखस की चिकें लगी होती थीं । जीजी हम सबको उस पलंग पर घेर कर दोपहर की नींद लेती थीं , उनके हाथ का पंखा चलता रहता , जैसे ही पंखा उनकी पकड़ से छूट कर उनके पेट पर आता हम समझ जाते कि वो गहरी नींद में हैं । बस मौका देखकर हम चुपके से उस हाथी से उतरते और बाहर नीम पर पड़े झूले पर झूलते या हारे में पक रहे दूध से मलाई चुरा कर खा जाते । कटी हुई मलाई का हिस्सा देखकर जीजी पूछतीं तो एक सुर में कहते ,

जीजी हमने देखा एक बिल्ली को मलाई खाते

जीजी हँस कर कह देतीं ,

हाँ , मनै पता है उन बिल्लियों का ।

और हम सोचते उन्हें कुछ नही पता चला । वो हमें ऐसी बातों के लिए कभी नही डाँटती थीं जबकि नियम – कायदों के मामले में वो बड़ी सख़्त मानी जाती थीं जिसका आभास तब मुझे कभी नही हुआ था । हाँ !! दरअसल , मैं बात उनके पलंग की कर रही थी , सिंहासन बत्तीसी का सा वो पलंग !! मुझे उस पलंग से जुड़ी वो बात याद आ रही थी जो बड़ी अजूबा सी लगती थी । बात सर्दियों की थी , उस दिन अच्छी धूप निकली थी , जीजी ने घर के नौकर-चाकरों से कहा कि

आज मेरा पलंग बाहर निकालो और निवाड़ निकाल कर धो-दो

बस फिर क्या था हम बच्चों को तो दिन-भर का तमाशा मिल गया , हम सब ऐसे जुटे जैसे ये सारे काम हम ही को करने हों । ख़ैर , जैसे-तैसे करके उस सिंहासन बत्तीसी को बाहर निकाला गया , हमें पलंग पर कूदने की मनाही थी इसलिए मूक दर्शक बने देखते रहे । अब निवाड़ खोलने की बारी आई , निवाड़ की परतें दर परतें खुलती जा रही थीं जैसे ही आखिरी परत खुलने लगी कि एक काला बंडल नीचे धप्प से गिरा और अपने आप खुलने लगा । हमारे समेत , सब चीख मार कर पीछे हट गए । वो काले जीव , साँप के बच्चे थे !! सब हैरत से उन्हें इधर-उधर रेंगते देख रहे थे , एक उन्हें मारने के लिए लाठी ले आया तभी जीजी ने उसे रोक दिया ,

भाई मार मत , बच्चे हैं । आजतक इनकी माँ ने मुझे और मेरे बच्चों को कोई नुकसान नही पहुँचाया तो मैं भला उसके बच्चों को कैसे मार सकती हूँ ? भाई जा इन्हें पीछे जंगल में छोड़ आ । 

उन साँप के बच्चों को पीछे झाड़ियों में छोड़ दिया गया लेकिन हम डर कर कई दिन तक उस पलंग पर तो क्या उसके आस-पास भी नही गए थे । पर जीजी बाकायदा वहीं सोती थीं , उन्हें पूरा विश्वास था कि जिसने हमें आजतक नुक्सान नही पहुँचाया वो अब भी नही पहुँचाएगी । कुछ दिनों बाद हम भी वो बात भूल गए और फिर से वहीं जीजी के अगल-बगल उनकी दूध जी सफ़ेद मलमल की साड़ी में लिपटे पड़े रहते ।

मैं उन यादों में लिपटी आगे के कमरों में जाने की हिम्मत नही कर पाई । मैं बाहर की ओर निकल कर छत की ओर चल पड़ी जहाँ से हम पूरे गाँव का नज़ारा देख सकते थे । कहते हैं जब रायसाहब जी ने अचानक दिल का दौरा पड़ने पर इस दुनिया से विदा ली तो उनके पाँच बच्चों में सबसे बड़ी बेटी केवल बारह साल की थी और सबसे छोटा बेटा आठ महीने का था । जीजी यानि रायसाहबणी जवान और बला की खूबसूरत थीं ये बात आस-पास के कई गाँवों तक फैली हुई थी । रायसाहब की अनुपस्थिति में उनकी बेशुमार जायदाद की देखभाल के लिए उनके कई अनजाने रिश्तेदार अचानक पैदा हो गए थे । उन सब का एक ही उद्देश्य था और वो था किसी तरह रायसाहबणी को रास्ते से हटा कर उनकी जायदाद पर कब्ज़ा करना । माँ से सुना था कि एक बार इन रिश्तेदारों ने उन्हें छत से धक्का दे दिया था । वो बरसात के मौसम में छत की मोख यानि छत पर बने रोशनदान जो कमरों में रोशनी के लिए होते थे बंद करने गईं थीं बस मौका ताड़ कर किसी ने उन्हें नीचे धकेल दिया । वो तो ऊपर वाले का करम था कि उनकी हाथ-पैर की हड्डियाँ तो टूटीं लेकिन जान बच गई । उस हादसे के बाद एक बड़ा अजीब हादसा हुआ था , वो ज़माना डाकू-डकैतियों का था । एक दिन रात बारह बजे के बाद की बात होगी कि उनके दरवाज़े की साँकल ज़ोर से खड़की ,

रायसाहबणी……ओ रायसाहबणी , दरवाज़ा खोल ।   

अब उनके दरवाज़े पर तो गाँव वालों की गुहार लगती रहती थी । उन्होंने सोचा कि कोई ज़रुरतमंद होगा , नौकर से दरवाज़ा खोलने को कहा,

रामभरोसे , किवाड़ खोल दे ।

किवाड़ खुलते ही नौकर को धकेल कर हाथ में बंदूकें लिए , मुँह ढके डाकू भीतर घुस गए । जीजी उठ कर संभल ही रही थीं कि उनके सीने पर एक डाकू ने बंदूक तान कर कहा ,

बैठी रह रासाबणी ।

जीजी वैसे भी हाथ-पैर में चोट के कारण खाट से उठ नही पाईं थीं । तभी एक और डाकू आगे बढ़ा और उनके सीने पर तनी बंदूक को हटा दिया ,

रहैण दे , इसकी जरुरत ना है ।

उसने अपने मुँह से कपड़ा हटाया तो जीजी यह देख कर अवाक रह गईं कि वो डाकू एक लड़की थी । वो उन पर लगभग झुक कर धीरे से बोली ,

रासाबणी , पता चला अक लोग तनै मारना चावै हैं , तेरी जमीन हथियाना चावै हैं ! मनैं पता है तेरे छोटे-छोटे बाड़क सैं । मैं तनै लूटण ना आई हूँ , बस तनै यो बताणा था अक तू डर मत , मेरे होते , तेरा अर तेरे बच्चाँ का कोई कुछ ना बिगाड़ सकैगा ।

एक बंदूक उनकी ओर बढ़ा कर बोली ,

यो रख , हाथ मैं राख्या कर इसनै , सब डरैंगे ।

ये कह कर वो सब गायब हो गए और जीजी हैरान सोचती रह गईं कि ये मेरी खैरख्वाह कहाँ से आ गई ! बच्चे सब सो रहे थे , उन्हें कुछ पता नही था कि रात को घर में क्या हो गया । बच्चों को क्या गाँव में किसी को भी ख़बर नही हो पाई । कहते हैं उसके बाद से जीजी बंदूक को आँगन में रख कर बैठती थीं , खेत में जातीं तो साथ लेकर जाती थीं । उसके बाद जीजी का एक भाई उनके पास आकर रहने लगा जो बहुत होशियार और ईमानदार था । उसके बाद से रिश्तेदार ख़ुद-ब-ख़ुद दूर हो गए । पढ़ी-लिखी न होते हुए भी उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाने में कोई कसर नही छोड़ी और हिम्मत से समाज का सामना करती रहीं ।

साँझ हो रही थी , आसमान पर तारे चमकने लगे थे । एक बार मुझे फिर जीजी की याद शिद्दत से आ रही थी । गर्मियों में उनका आँगन में सोना और हमें आसमान में बिछा सारा खगोलशास्त्र का ज्ञान दे देना । हवा के रुख से बारिश का बता देना ,

लगता है मोन-सोन आने वाले हैं ।

हम सोचते कोई रिश्तेदार आने वाले हैं , वो तो बड़े होने पर पता चला कि मोन-सोन तो मानसून था ।

बच्चे बड़े हुए तो उन्हें गाँव छोड़ कर शहर बच्चों के साथ जाना पड़ा क्योंकि उनकी उम्र हो चली थी । शायद ये उनकी ज़िंदगी का सबसे कठिन निर्णय रहा होगा , उनका जीवन गाँव के बिना सूना और एकाकी हो गया था । मैं जब हैदराबाद से उनसे मिलने आई तो मुझे विदा करते हुए वो बहुत रोई थीं । मैंने जीजी को ऐसे रोते हुए पहले कभी नही देखा था , मैंने कहा ,

जीजी आप रोइए मत मैं जल्दी ही आपसे फिर मिलने ज़रुर आऊँगी ।

लेकिन जीजी उस दिन मुझे गले लगा कर कहने लगीं ,

बस बेबड़ , मैं अब नही मिलूँगी , तू खुश रहना ।

मैं गाड़ी में बैठी तो जीजी देर तक हाथ हिलाती रहीं , मैं अपने आँसुओं को दुपट्टे में छिपाती रही । उसके बाद जीजी से मेरी मुलाकात कभी नही हो पाई । आज गाँव आ कर मैं अपनी उस अधूरी मुलाकात को विराम दे रही थी , जो शायद कई वर्षों से मेरा इंतज़ार कर रही थी । मैं अपने उसी दुपट्टे को साथ लाई थी जिसमें जीजी के आँसुओं के कुछ कतरे बाकी थे । गाड़ी में बैठ कर मैं पीछे मुड़कर देखती रही लेकिन अब वहाँ केवल सूनापन था , एक उजड़ा हुआ माज़ी और कुछ भी नही ।

माला जोशी शर्मा

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