तेरे मेरे सपने

हम दिल पर बोझ ढोए चले जाते हैं

अपना बोझ दूसरों पर डाले चले जाते हैं

बचपन अच्छा था , दिल बड़ा हल्का था

दूसरों के सपनों का बोझ कहाँ अपना था ?

अब घरों में सपने समाते नही , अपने बच्चों में बाँट देते हैं हम

उनके सपनों पर अपने रंग चढ़ा देते हैं हम

लाल रंग लाल है , नीला नही , पीला चमकदार है , काला नही

क्यों , हम ये समझ पाते नही ?

क्यों उनके सपनों को बेरंग बना देते हैं हम ?

मेरे सपने क्यों मेरे नही , उसके सपने क्यों उसके नही ?

सफ़ेद रंग में हर रंग चढ़ा देते हैं हम

दिल का बोझ यूँही बढ़ा देते हैं हम ।

उसके सपनों पर उसका हक है , उसमें केवल उसका वजूद है

क्यों उसके वजूद को हिलाए जाते हैं हम

अपनी परझाई क्यों उसमें देखना चाहते हैं हम ?

क्यों अपना बोझ उसके कांधे पर डाले चले जाते हैं हम ?

 

8 thoughts on “तेरे मेरे सपने

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