बूंद बूंद ज़िंदगी

blade of grass blur bright close up
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बूंद-बूंद यूँ ज़िंदगी भरती जा रही है ,

हर दिन वो बदलती जा रही है ,

बच्चे थे तो बड़े होने के सपने देखा करते थे ,

माँ-बाप भी हमारे सपनों का घट बूंद-बूंद भरा करते थे ,

कब माँ-बाप बिछड़ गए और ज़िंदगी यूँ ही बूंद-बूंद भरती रही ,

हम परिवार वाले हो गए और हमारे बच्चे भी शामिल हो गए ,

वही किस्सा हम भी दोहराते रहे , अपने साथ उनके सपनों का घड़ा भी भरते रहे ,

फिर बच्चे छूटते रहे और हम अपना घड़ा बूंद-बूंद यूँ ही भरते रहे ,

ज़िंदगी बूंद-बूंद यूँ ही भरती जा रही है , हर दिन वो बदलती जा रही है ।

समझ नही आ रहा कहाँ जा रही है ?

पहले मैं मन की करती थी , मन से चलती थी

अब मैं मन की कब करती हूँ ? मन से कम चलती हूँ ।

मन की कम सुनती हूँ और इग्नोर करती हूँ ,

चलती हूँ तो दवाईयाँ साथ रखती हूँ ।

बस बूंद-बूंद यूँ ज़िंदगी भरती जा रही है ,

कब छलक जाएगी पता नही लेकिन मैं फिर भी उसे बूंद-बूंद भरती जा हूँ ,

हर दिन वो बदलती जा रही है ।

माला जोशी शर्मा

One thought on “बूंद बूंद ज़िंदगी

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