तलाश

अपने से कहीं दूर भाग जाना चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ,

हर सुबह कहीं भटक जाती हूं ,

ढलते सूरज के साथ डूब जाती हूं ,

रात के अंधेरे में खो जाती हूं ,

ख़ुद को ढूंढती रह जाती हूं ,

अपने से कहीं दूर भाग जाना चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ।

हर गली , हर राह में जाती हूं ,

पेड़ों की शाखों में अटक जाती हूं ,

घने फूलों में मन को उलझाती हूं ,

फिर उलझन को सुलझाती हूं ,

अपने से कहीं दूर भाग जाना चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ।

अधूरे गीत की कड़ी बन जाती हूं ,

सुर – ताल कहीं से उधार लाती हूं ,

बिखरे पन्नों को क्रम से लगाती हूं ,

काग़ज़ के टुकड़ों को यादों की गोंद लगाती हूं ,

अपने से कहीं दूर भाग जाना ‌ चाहती हूं ,

न जाने मैं कहां जाना चाहती हूं ।

माला जोशी शर्मा

 

 

 

 

 

7 thoughts on “तलाश

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