जय माता की

जय माता की , जय माता की , जयकार मची थी

माँ की भक्ति में डूबे सब , रोली कुमकुम उड़ा रहे थे

गली-गली में नेता , संस्कृति का डंका बजा रहे थे

वहीं किसी नुक्कड़ पर एक बेटी माँ को पुकार रही थी

संस्कृति भक्त बने कुछ उसकी चुन्नी उड़ा रहे थे ।

उसके नाज़ुक , कोमल तन को गिद्द बने वो नोच रहे थे ,

इस पर भी उन्हें चैन न आया ,

कोमल तन को मोम बनाया ,

आग्नि से उपजी द्रौपदी को , आग्नि को ही सौंप रहे थे !

माँ की भक्ति में डूबे सब , रोली कुमकुम उड़ा रहे थे

माता क्रुद्ध आँखों से , झूठे भक्तों की झूठी भक्ति देख रही थी

अपनी बेटी की तड़पन पर सागर को भी जला रही थी ,

सोच रही थी , कैसे भक्त हुए ये मेरे !

दीप जला कर मुझे जलाते !

पत्थर को चुन्नी हैं चढ़ाते , अक्स को मेरे वस्त्रहीन हैं करते !

गौ को माता कहते जाते , कन्या को ये नोच जलाते !

इंसानों का खून बहाते , मिट्टी की मूरत को रोज़ सजाते !

एक बार मैं यज्ञ में कूदी , ये अब तक मुझे जला रहे हैं !

कहाँ गया वो शिव का तांडव ?

अपमान मेरा जो सह न पाया , आज नही वो लौट के आया ,

झूठे जग की झूठी भक्ति देख के उसने जग बिसराया ।

माला जोशी शर्मा

3 thoughts on “जय माता की

  1. कविता का भाव स्पष्ट है ….समाज में व्याप्त विसंगतियों पर गहरा प्रहार करती हुई रचना …
    समय के साथ साथ हम सब समाजिक स्तर पर और भी कमजोर होते जा रहे हैं …

    GDP sensex , percentage marks me उलझे हुए हैं पीछे से समाज खोखला हैं.. 🌻

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