मन

रात इतनी ख़ामोशी से चली आती है ,

ख़्यालों की पोटली बगल में दबा लाती है ,

जल-थल सब सो जाता है ,

मन पंछी बन उड़ जाता है ,

न जाने कहाँ-कहाँ दौड़ लगाता है ,

खुली आँख सपने दिखलाता है ,

रात दबे पाँव चली जाती है ,

भोर अपने रंग बिखराती है ,

परिंदे-चरिंदे शोर मचाते हैं ,

मन गुमनामी की चादर तान सो जाता है ।

4 thoughts on “मन

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s