संस्कार

देहरादून की उत्सव विहार कॉलोनी सुबह शंखनाद और घंटी की आवाज़ से गूंज उठती थी । अपने घर में जोशी जी धर्म और संस्कारों के रक्षक थे , विवाह-रीति रिवाज़ों पर पुस्तक लिखी थी और समाज में सम्मानित भी किए गए थे । ऑस्ट्रेलिया प्रवासी पुत्र ने उनके तथाकथित संस्कारों को ताक पर रख विदेशी लड़की से विवाह किया तो उनके सम्मान को गहरा आघात लगा और उन्होंने देश से निकले पुत्र को दिल से भी निकाल दिया । उन्होंने तो बेटे से नाता तोड़ने की बात कह दी लेकिन माँ का दिल ये भला कैसे मानता इसलिए उनका नाता बेटे से बना रहा । उस दिन जोशी जी शाम की आरती के बाद ड्रॉइंगरुम में बैठे कोई किताब पढ़ रहे थे कि पत्नी ने प्लेट में लड्डू लाकर रख दिए । देखते ही पूछा , आज ये लड्डू किस खुशी में ?  

पत्नी ने कानों तक मुस्कुराते हुए कहा , बधाई हो आप दादा बन गए हैं । नितिन का फ़ोन आया था कि बेटी हुई है ।

जोशी जी ने धीरे से प्लेट आगे खिसकाते हुए कहा , आप मनाइए खुशियाँ , हमारा इससे कोई लेना देना नही ।

अब जो हो गया उसे ख़त्म भी कीजिए , अपनी पोती को नही देखना है क्या ? तुम्हें तो कितनी चाह थी बेटी की , चलो बेटी न हुई तो ईश्वर ने पोती देदी । नितिन ने टिकिट भेजी है हमें बुलाया है । मिसेज जोशी अपनी मन की बात पति से एक साँस में कह गईं । इस बार जोशी जी नाराज़गी से ऊँची आवाज़ में बोले , क्या कहा ? टिकिट भेज दी है ! लेकिन किस से पूछ कर ? हम कहीं नही जा रहे ।

अब इतना भी गुस्सा किस काम का , बेटा है अपना , हमें बुलाना चाहता है , मेरे लिए चलिए । मिसेज जोशी ने उन्हें मनाने की कोशिश नही छोड़ी । आखिर एक-दो दिनों में अपना वास्ता देकर उन्हें मना ही लिया लेकिन एक शर्त पर कि दो सप्ताह से अधिक नही रहेंगे और ये कहना नही भूले , देखो , मैं सिर्फ़ तुम्हारे लिए जा रहा हूँ , मुझसे और उम्मीद मत रखना ।

नहीं रखूँगी , आप मेरे लिए चल रहे हैं , यही बहुत है । कहते हुए मिसेज जोशी जाने की तैयारी में लग गईं । बहु के लिए साड़ी , पोती के लिए कपड़े रखना नही भूलीं थीं , लड्डू ले जा नही सकते तो सोचा वहीं बना दूँगी । मिसेज जोशी सारे रास्ते पोती का सोच कर मन गुदगुदाती रहीं तो कभी आँखों के पानी में उसका चेहरा देखती रहीं । बहु और पोती दोनों को पहली बार जो मिल रही थीं । मैलबर्न एयरपोर्ट पर पहुँचे तो चैकिंग में बहुत समय लग गया क्योंकि कोरोना वायरस के चलते सख़्ती बढ़ रही थी । नितिन उन्हें लेने आया था , वहाँ के शनिवार की सुबह थी । बेटे को देखते ही माँ का दिल सारी नाराज़गी भूल गया था वो बेटे से पूरे तीन साल बाद मिल रहे थे । जोशी जी ने अधिक उत्साह नही दिखाया , नितिन ने पैर छूए तो , ठीक है , ठीक है , कह कर आगे बढ़ गए थे । गाड़ी में जोशी जी पीछे ही बैठे , नितिन रास्ते में गाड़ी चलाते हुए साथ बैठी माँ को देखता और मुस्कुरा देता । रास्ते की जानकारी देते हुए कहता , पापा , ये देखिए ये यहाँ की सी बी डी है यानि सैंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट , आएँगे हम घूमने यहाँ । अपना घर GLEN WAVERLY में है वो थोड़ा बाहर निकल कर है ।

नितिन ने अपना कहा था मेरा नही , जोशी जी खामोश बैठे कोई जवाब नही दे रहे थे वो खिड़की से बाहर नज़रें टिकाए थे । बेटा जानता था कि उनकी नाराज़गी बेवजह नही थी उसने सोचा था कि शादी कर लूँगा तो बाद में सब ठीक हो जाएगा । वो शादी के बाद क्रिस्टीन को लेकर मम्मी-पापा से मिलवाना चाहता था लेकिन पापा ने साफ़ मना कर दिया था कि उसे यहाँ लाने की कोई ज़रुरत नही है । थोड़ी देर में वो घर पहुँच गए थे । छोटा सा घर , आगे छोटा सा लॉन , जिसमें सुंदर रंग-बिरंगे गुलाब खिले थे , वरांडे में लटकते गमलों से फूलों की लड़ियाँ झूल रही थीं । गाड़ी की आवाज़ सुनते ही पजामा और टीशर्ट पहने , सुनहरी बालों की लंबी सी चोटी बाँधे एक प्यारी सी लड़की भाग कर आई । उसने आते ही झुक कर जोशी जी के पैर छुए तो जोशी जी बिदक कर दो कदम पीछे सरक गए । शायद ये उनकी आशा के विपरीत था , लड़की थोड़ी सहम गई । मिसेज जोशी के पैर छूने लगी तो उन्होंने उसे गले से लगा लिया । नितिन बोला , ये क्रिस्टीन है , आपकी बहू ।

तीन बैडरुम वाला घर , ड्रॉइंगरुम से जुड़ी किचन , सब कुछ बड़े सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया था । दोनों की नज़रें चारों ओर घूमी तो देखा कोने पर रखी एक टेबल पर उन दोनों की तसवीर रखी थी जिसमें छोटा सा नितिन जोशी जी की गोदी में था । जोशी जी उस तसवीर को देखते हुए कहीं खो गए थे । नितिन ने आवाज़ लगाई , पापा , मम्मी आपका कमरा ये है , आप पहले फ़्रैश हो जाइए फिर कुछ खा कर आराम कीजिए ।  

नितिन उन्हें उनके कमरे में ले गया , दोनों नहा धो कर बाहर आए तो क्रिसटीन की रसोई से आवाज़ आई , पापा-मम्मी आपकी चाय ।

जोशी जी और पत्नी ने हैरानी से उसे देखा तो वो मुस्कुरा दी , नितिन हँस कर बोला , शादी के बाद से इसने मुझसे हिंदी सीख ली है , बहुत नही पर थोड़ी समझ-बोल लेती है ।

लंबे सफ़र के बाद चाय की तलब तो उन्हें हो रही थी लेकिन अपनी तरह की चाय । मिसेज जोशी की नज़रें कुछ और ही ढूँढ रही थीं । क्रिसटीन ने टेबल पर चाय – बिस्कुट रखे और अंदर चली गई । जोशी जी ने चाय को घूरते हुए एक घूँट भरी तो उनकी सिकुड़ी आँखें फैल गईं लेकिन न बोलने की जैसे वो ठान कर आए थे । मिसेज जोशी चाय की खुशबू लेते हुए बोलीं , अरे , नितिन इसने हमारे जैसी चाय बनानी भी सीख ली ?  

नितिन मुस्कुरा कर रह गया , तभी अंदर से आती मीठी सी किलकारी की आवाज़ उनके कानों में पड़ी तो उनकी नज़रें उस ओर घूम गईं । क्रिस्टीन छोटी सी हिलती-डुलती कपड़े की पोटली को लेकर उनके पास आई और मिसेज़ जोशी की गोद में देते हुए बोली , दादी , आपकी पोती ।

दादी तो जैसे गंगा में डुबकी लगा गईं थीं , मुस्कुराते होठों को उसके माथे पर रख कर दो बूँद से उसे भी नहला दिया था । जोशी जी तिरछी निगाहों से उस नन्हीं सी पोटली को और पत्नी के प्रेम को देख रहे थे । मिसेज़ जोशी ने स्नेह से उसकी नन्हीं उंगलियों को छूते हुए पूछा , इसका नाम क्या रखा ?

नितिन ने जवाब दिया , वो तो आप का इंतज़ार कर रही थी कि कब उसके दादा-दादी आएँगे और इसका नाम रखेंगे । अब आराम से सोच कर रखिए इसका नाम , हम तो हर रोज़ कुछ भी कह कर पुकारते रहते हैं ।

क्रिस्टीन ने बच्ची को लेते हुए कहा , आप , रैस्ट करें ।

मार्च का महीना था , हल्की-हल्की ठंड शुरु हो गई थी । उनके लिए कमरे में हर सुविधा की चीज़ रखी थी , यहाँ तक कि साइड टेबल पर एक ट्रांज़िस्टर भी रखा था । जोशी जी रेडियो के शौकीन थे उन्होंने उसे उलट-पलट कर देखा और वापस रख दिया । थके हुए थे , बिस्तर पर लेटते ही दोनों की आँख लग गई । उठे तो दोपहर के दो बज रहे थे , मिसेज़ जोशी बाहर आईं तो देखा बेटा-बहू खाने की तैयारी कर टेबल लगा रहे थे , उन्हें देखते ही क्रिस्टीन बोली , , मम्मी , प्लीज़ कम , खाना खाइए ।

नितिन भी बोला , मम्मी , नींद आई अच्छे से कि नही ? पापा उठ गए क्या ?

नींद तो ऐसी आई कि पता ही नही चला कि दिन है कि रात , तेरे पापा भी उठ ही गए हैं , कहते हुए वो , जोशी जी को बुला लाईं । जोशी जी बड़े अनमने से खाने की टेबल पर बैठे थे , सोच रहे थे कि पता नही क्या खिलाएँगे ये । देखा तो दाल , चावल और आलू गोभी की उनकी पसंद की सब्ज़ी बनी थी । उन्होंने पत्नी की तरफ़ देखा तो वो जानबूझ कर बोलीं , अरे नितिन तू तो बढ़िया खाना बनाने लगा बेटा ।

माँ मैंने तो सिर्फ़ चावल बोइलर में डाले थे बाकी तो आपकी बहू का ही कमाल है । नितिन ने शर्माती हुई क्रिस्टीन को देखकर कहा । बात इसी तरह माँ-बेटे की चलती रहती और जोशी जी इधर-उधर देख कर बातों को अनसुना करने की कोशिश करते रहते । वो सोच रहे थे कि किसी तरह ये दो हफ़्ते कट जाएँ और पीछा छूटे । उनका मंदिर उनके कमरे में अस्थाई रुप से स्थापित हो गया था । शिकायत से पत्नी को सुनाया , देख लिया तुमने , इस नास्तिक ने घर में देव स्थान का एक कोना तक नही बनाया । 

पत्नी उनकी सोच को बदलने के प्रयास में जुटी थीं , उसने ना बनाया तो ना सही , आपने बना दिया ना एक कोना देव स्थान का ।

जोशी जी ने माथा सिकोड़कर पत्नी की ओर देखा और पूजा में लग गए । नितिन ने कुछ दिन की छुट्टी ले ली थी , दादी अपनी पोती को खिलाने में लगी रहतीं , छुटकी रानी , आपका क्या नाम रखें हम । देख नितिन इसका माथा तेरे जैसा है और हल्की नीली आँखें अपनी माँ जैसी हैं । 

जोशी जी आस-पास मंडराते उसे दूर से देखते रहते लेकिन गोद में लेने से कतराते पास बैठे टीवी पर हिंदुस्तान की ख़बरें लगा कर सुनते रहते । समाचारों से पता चला कि पूरी तरह से लॉकडाउन हो गया है और हर देश ने इंटरनैशनल फ़्लाइट्स को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया है । ये सुनते ही जोशी जी की बेचैनी बढ़ गई , हे ईश्वर ये क्या मुसीबत आ गई ! अब तो वापस जाना मुश्किल हो गया !  उन्होंने पत्नी को ऐसे देखा मानों सारा दोष उन्हीं का हो । गुस्सा किस पर था पता नही लेकिन वो उठ कर अपने कमरे में चले गए । घर में तनाव का सा माहौल हो गया , नितिन और क्रिस्टीन पापा को देख कर परेशान दिखे तो मिसेज़ जोशी ने आँखें झपकाकर हाथ का इशारा किया कि चिंता मत करो । वो बेटे-बहू को अपने कारण परेशान होते देख छुटकी को उसकी माँ की गोद में दे अपने कमरे में गईं , पति के पास बैठ कर बोलीं , आप जानते हैं कि इस स्थिति पर हमारा वश नही है , ईश्वर की यही मरज़ी थी मान कर शांति से रहिए । क्यों परेशान होते हैं , हमारे ऐसा करने पर घर में तनाव हो जाता है , वो पराई लड़की क्या सोचेगी भला !

जोशी जी कुछ नही बोले , उनके भीतर सावन के बादलों की तरह सवाल उमड़ रहे थे जिनके जवाब सिर्फ़ उनके बेटे के पास थे लेकिन कैसे पूछें ? पिता का अहम् आड़े आ रहा था । जानते थे कि उस लड़की का कोई दोष नही लेकिन उसी के कारण बेटे ने उनका सम्मान ताक पर रख दिया था , सारे संस्कार भूल गया । पोती को देख कर उसे गोद में लेने को उनका भी दिल मचलता है फिर विचार आता है कि ऐसा करने पर उन्हें माफ़ कर देना होगा ! वो ऐसे हालात में फंस जोएँगे कि उन्हें इतने लंबे समय तक यहाँ रहना पड़ेगा ये तो उन्होंने सपने में भी नही सोचा था । ये समय उन्हें किसी सज़ा के समान लग रहा था ।

इधर नितिन के मन में भी शांति नही थी , उसे पल-पल पापा की ख़ामोशी तकलीफ़ दे रही थी । उसने अपने पापा को दुख पहुँचाया है , क्या करे कि उनका मन दुखी न हो । क्रिस्टीन भी अपने को उनकी नाराज़गी का कारण मान कर परेशान थी । उन दोनों ने सोचा था कि पोती को देख कर सब ठीक हो जाएगा लेकिन ऐसा नही हुआ था ।

नितिन के घर के सामने एक बहुत बड़ा मैदान था जहाँ अब महामारी के चलते लोग घूमने नही आ रहे थे । उस मैदान के चारों ओर बड़े-बड़े युकलिप्टिस के पेड़ थे , ये पेड़ ऑस्ट्रेलिया की खासियत भी हैं । जोशी जी एक दिन सुबह उठ कर सामने मैदान में घूमने निकल गए । ठंडी हवा के झोंके से पूरे वातावरण में युकलिप्टिस की महक फैल रही थी । सफ़ेद विशाल तने , हल्के हरे कोमल पत्तों की टहनियों के बीच छोटी-छोटी घंटियों जैसे लाल फूल अनोखे लग रहे थे । अलग-अलग रंगों ने मिलकर कितनी सुगंध फैला दी थी । जोशी जी के मन में वो सुगंध धीरे-धीरे उतर रही थी , वो वहीं बैंच पर बहुत देर तक बैठे रहे । घर पहुँचे तो पत्नी उठ कर चाय बना रहीं थीं , वो अब यहाँ की आदत में अपने को ढाल रही थीं और किचन में अपना योगदान देने लगीं थीं । जोशी जी को देखकर वो मुस्कुराते हुए बोलीं , आज आप सामने घूमने गए , बहुत अच्छा किया , कल से मैं भी चलूँगी ।  

वो अभी चाय बना ही रहीं थीं कि क्रिस्टीन भी छुटकी का दूध बनाने आ गई , उन्होंने उससे पूछ लिया , अरे क्रिस बेटा तुम उठ गईं ?

क्रिस्टीन उन्हें हल्की सी मुस्कान से देखकर बोली , योर पोती चुटकी वेक मी ।

चाय पीयोगी हमारी वाली ? देखो मैंने तुम्हारा नाम छोटा कर दिया तुम्हें बुरा तो नही लगा ? कहते हुए उन्होंने क्रिस्टीन के भाव जानने के लिए उसकी ओर देखा ।

क्रिस्टीन ने हँसते हुए कहा , नो , मम्मी , अच्छा है । मैं भी चाय पीयूँगी । यू नो , मेरी मम्मी मुझे यही कहती थीं । कहते हुए वो कुछ उदास हो गई थी ।

क्रिस्टीन अंदर छुटकी का दूध देकर बाहर आई और उन दोनों के साथ बैठकर चाय पीने लगी । जोशी जी ने आज पहली बार उसे नज़र उठा कर देखते हुए सवाल किया , कहाँ रहते हैं तुम्हारे मम्मी – पापा ?  

उसकी नीली बड़ी-बड़ी आँखों में पानी तैर गया और पल भर रुक कर बोली , अं…, दे आर नो मोर ।

सुनते ही एक पल को सब चुप हो गए फिर जोशी जी बोले , ओह , ओई एम सॉरी ।

जोशी जी उठकर अपने कमरे में चले गए , नितिन छुटकी को लेकर बाहर आया तो सब उसी में उलझ गए । नितिन ने मम्मी से पूछा , पापा आज बाहर सैर करने गए थे ?

हाँ , आज निकले हैं घर से , कल से मैं भी जाऊँगी उनके साथ । मिसेज़ जोशी ने कहा ।

बस सामने ही घूमना , कहीं दूर मत जाना । नितिन मम्मी को समझा रहा था जैसे वो कभी बचपन में उससे कहा करती थीं । मम्मी ने भी हाँमी में सिर हिलाया । तभी उसने कुछ सोचकर फिर कहा , वैसे मैं भी चलूँगा आपके साथ कल ।

क्रिस्टीन उसका चेहरा देख रही थी वो जानती थी कि उसके पापा नाराज़ हैं लेकिन ये सब कैसे ठीक होगा ये उसकी समझ में नही आ रहा था । उसने नितिन से कहा था , why don’t you talk to your father and say sorry !

नितिन ने कहा था कि ये सब इतना आसान नही है , वो बात तक करने को तैयार नही , ऐसे में मैं कैसे समझाऊँ उन्हें ।

उस दिन मिसेज़ जोशी दिनभर किचन में बहू के लिए गूँद के लड्डू बनाने में लगी रहीं । क्रिस्टीन ने पूछा तो उन्होंने बताया कि इंडिया में ये लड्डू बच्चा होने के बाद माँ को खिलाए जाते हैं उसकी अच्छी सेहत के लिए । ये सुन कर उसने मम्मी को एकटक देखते हुए उनके हाथ चूम लिए , मिसेज़ जोशी का मन कैसा भीग गया था । जोशी जी ने देखकर ताना मारा था , जिसके लिए इतनी मेहनत कर रही हो वो खाएगी भी तुम्होरे लड्डू ?

खाएगी , खाएगी क्यों नही , देखना तुम , वो ज़रुर खाएगी , उन्होंने विश्वास से जवाब दिया था ।

जोशी जी सिर झटक कर टीवी देखने लगे थे , तभी क्रिस्टीन ने आकर उनके हाथ में एक USB flash drive पकड़ाते हुए कहा , papa this is for you .  और उसे टीवी में लगा दिया । जोशी जी देखकर हैरान हो गए कि उसमें हिंदी पुरानी फ़िल्मों का collection था । कहना तो बहुत कुछ चाहते थे लेकिन सिर्फ़ , थैंक्यू कह कर चुप हो गए थे । क्रिस्टीन मुस्कुराती हुई चली गई थी । जोशी जी उस दिन देर रात तक असली-नकली फ़िल्म देखते रहे थे , देवानंद उनका फ़ेवरेट था ।

अगले दिन सुबह उठ कर बाहर सैर के लिए निकलने लगे तो पत्नी भी साथ चलीं । बाहर आते ही उसी सुगंध ने जोशी जी का मन हल्का कर दिया , पत्नी से बोले , देखो ये युक्लिप्टिस के फूल कितने सुंदर लग रहे हैं और इसकी खुशबू कैसे चारों ओर फैली है ।

पति का मन देखकर आज मिसेज़ जोशी को अपने छोटे से परिवार में ठंडी हवा का झोंका आता दिखाई दे रहा था । वो आँखें मूंदकर बैंच पर बैठ ईश्वर से प्रार्थना कर रही थीं कि हे ईश्वर किसी तरह इन बाप-बेटे के बीच की इस ख़ामोशी को तोड़ दे । जोशी जी भी उनके पास आकर बैठ गए । थोड़ी देर में उन्होंने देखा कि नितिन भी अपने पापा के पास आकर बैठ गया । उसके पास बैठने से जोशी जी भीतर ही भीतर थोड़े असहज हो रहे थे । एक मुद्दत के बाद बेटे से इतने करीब हुए थे । कुछ देर की ख़ामोशी के बाद नितिन ने ख़ामोशी तोड़ी , पापा क्या आप मुझे माफ़ नही कर सकते ?

जोशी जी मौन विशाल फैले आसमान की ओर देखते रहे । नितिन ने फिर आगे बात बढ़ाई , पापा , प्लीज़ कुछ तो बोलिए , बचपन में मैं ग़लती करता था तो आप डाँटते थे , गुस्सा करते थे लेकिन फिर माफ़ भी कर देते थे । मैं अब भी आपका वही नितिन हूँ , मैंने ग़लती की है कि आपको बिना बताए क्रिस्टीन से शादी करली । पापा मैं बहुत डर गया था , मुझे लगा आप कभी इस शादी के लिए नही मानेंगे । क्रिस्टीन बहुत अच्छी लड़की है पापा , उसका और छुटकी का कोई दोष नही है फिर आप उन्हें अपने प्यार से दूर क्यों रख रहे हैं ? मुझे डाँटिए , मुझे सज़ा दीजिए पर प्लीज़ मुझसे बात कीजिए । कहते हुए उसकी आँखों से बूँदे टपक रही थीं लेकिन जोशी जी आसमान को घूरे जा रहे थे । ऊपर से मौन दिख रहा उनका दिल लहरों की तरह किनारे पर आकर शांत हो रहा था । पत्नी चुपचाप उन्हें देख रही थी , वो उठकर नितिन के पास आईं और उसके सिर पर हाथ रख दिया । जोशी जी उठकर घर की ओर चल दिए । नितिन नीचा सिर किए सुबक रहा था । मिसेज़ जोशी ने उसे उठाया और दोनों घर की ओर चल दिए । घर के दरवाज़े पर भीतर से आवाज़ें आ रही थीं अंदर गए तो देखा जोशी जी छुटकी को गोद में लिए उससे बातें कर रहे थे , तो छुटकी रानी अब से आप छुटकी नही , मीरा हैं । क्रिस्टीन पास खड़ी मुस्कुरा रही थी ।

7 thoughts on “संस्कार

  1. खूबसूरत कहानी। मां बाप बेटे जैसे भी हो उन्हें प्यार करते हैं। हां गुस्सा उनके भले के लिए करते हैं जिसका आभास नितिन को भी था। बढ़िया कहानी।

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  2. बहुत ही खुबसूरत एवं मर्मस्पर्शी कहानी है मैम दिल को छू गयी एकदम 👌👌👌
    शानदार कहानी है मैम 👌👌❤️❤️

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