सवेरा

किसने कहा कि बस अब गहरी अंधियारी रात है ?
इसकी न सुबह , न मदमाती किरण की आस है !
न भोर का तारा है , न उन्मुक्त आसमां की उड़ान है!
ये सांझ आई तो ज़रुर है साथ लंबी रात भी लाई तो ज़रुर है ।
क्या सूरज की आदत को नहीं जानती ?
उसके तेज़ दमकते स्वभाव को नहीं पहचानती ?
हर कण को चमका कर सोना बना दे ,
बिजली की तरंगें बन हैरां बना दे ।
हर रात को अपनी किरणों में नहला सवेरा बना दे ।
फिर कितनी ही लंबी क्यों न हो ये रात ,
इसके सामने कब तक ख़ैर मनाएगी ,
एक न एक दिन उल्टे पांव भागती नज़र आएगी ।
आखिर रात ही तो है ! भोर की किरण अपने आगे पाएगी ।
माला जोशी शर्मा

2 thoughts on “सवेरा

Leave a Reply to malajoshisharma Cancel reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s