चारू चंद्र की चंचल किरणें

चारू चंद्र की चंचल किरणें , खेल रही हैैं जल थल में ,
स्वच्छ चांदनी बिछी हुई है , अवनी और अंबरतल में
पुलक प्रकट करती है धरती , हरित तृणों की नोकों से
मानों झूम रहे हैं तरू भी , मन्द पवन के झोंको से।


कवि मैथिलीशरण गुप्त के काव्य ‘पंचवटी’ की इन पंक्तियां ने साहित्य में इतिहास रच दिया । इनका चमत्कार व्याकरण में अद्भुत उदाहरण है । बचपन से पढ़ते आए कि ये अनुप्रास अलंकार है । बस मज़े लेकर पढ़ते थे इन पंक्तियों को । लेकिन कहीं कवि के भाव सौंदर्य को समझने से वंचित रह गए थे। बहुत सी बातें समय के साथ ही समझ में आती हैं , खास कर साहित्य की गहराई ।
मुझे भी इन पंक्तियों का भाव सौंदर्य तब समझ में आया जब मेरी नातिन ऋष्वा पैदा हुई । जब मैंने उसे बढ़ते देखा , खेलते देखा , उसे प्यारी निर्मल बातें करते देखा , उसकी स्वच्छंद हंसी को देखा तो ये पंक्तियां जीवंत हो उठीं । ऐसा लगा मानों ये पंक्तियां कवि ने जैसे उसी के लिए लिखी हों ! फिर मुझे उसमें भाव सौंदर्य नज़र आया । ये भाव की ही बात है , किसी भी रचना के भाव को जानने के लिए समझना नहीं महसूस करना बहुत ज़रूरी है । मुझे ये बात समझने में बहुत समय लगा । अब हर रचना को आनंद से पढ़ती हूं ।

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