सुरंग

गहरी अंधेरी सुरंग में मैं अकेली चलती जा रही थी । हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था । दिल के धड़कने की आवाज़ थी , बाकी सन्नाटा था । हाथ-पैर छूट रहे थे लेकिन ये सुरंग ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी । मैं हांफ़ रही थी , थक गई थी , लगा अब और नहीं चल पाऊंगी । कोई साथ नहीं है , कोई पास नहीं है , अब क्या करूं ? कमज़ोर क़दम डगमगा रहे थे , ठोकर लगी और मैं मुंह के बल गिरी । आंख खुली तो अपने को बिस्तर के नीचे पाया । आवाज़ सुन कर पति ने आंखें खोली , क्या हुआ ? कहां हो ?
मैं कराहती हुई नीचे से उठी , यहीं हूं , सोते में गिर गई ।
चोट तो नहीं आई ? उठ कर मुझे सहारा देते हुए  उन्होंने पूछा ।
नहीं , मैं ठीक हूं और मैं फिर लेट गई थी । लेटी‌ थी पर सोई नहीं थी । जब नींद नहीं आती तो विचार चारों ओर से ऐसा धावा बोलते हैं कि दिलो-दिमाग में आंधी चलने लगती है । ये सपना अपनी हक़ीक़त की छाया थी । लगभग सौ दिन से ऊपर घर में बंद ,कोई पड़ौसी एक पल को अपने दरवाज़े से झांक कर घबराया सा देखता है और दरवाज़ा फिर बंद हो जाता है । साठ साल से ऊपर वाले हमारी सोसाइटी में काफ़ी लोग हैं । यही नहीं वो अकेले भी रह रहे हैं । उनके बच्चे या तो विदेश में हैं या दूसरे शहर में । हम भी उसी गिनती में हैं । कभी-कभी भय , सच कहूं तो काल का भय घेर लेता है । भई , साधू तो हैं नहीं जो हर समय परमानंद की स्थिति में रहें । डरते हैं , रोते हैं , negative thought भी आते हैं । कभी कभी ऐसा भी हो ही जाता है , हां अब उस भय से ऊपर उठने की कोशिश ज़रुर है । उठना ही पड़ेगा । कभी तो सुरंग ख़त्म होगी , पार हो ही जाएगी ।

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