एक बार फिर आजा कबीर

माया महा ठगनी  हम जानी ।
तिरगुन फांस लिए कर डोलै ,बोलै मधुरी बानी ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो , यह सब अकथ कहानी ।
माया को छोड़ना कठिन है , बार बार लिपटती है । न जाने कितना कुछ कह गए तुम संत ।
स्कूल में जब तुम्हें पढ़ने लगी तो सबसे पहले तुम्हारे दोहे याद करने पड़े थे । हिंदी की टीचर ने तुम्हारे बारे में बहुत से किस्से सुनाए थे जो मेरी आंखों में किसी फ़िल्म की तरह तैरते रहते थे । तभी से मेरा तुम्हारे साथ एक अनजाना सा रिश्ता जुड़ गया था । मैं तुम्हारे सपने देखने लगी थी , तुम्हारे दोहों में जीवन ढूंढने लगी थी । तुम हर राह पर मुझे चलते – फिरते दिखाई देते थे , कभी आम लोगों के बीच में , कभी किसी साधु – संत के हाथ में फिरती माला में तो कभी गरीब की फिरती चक्की में । तुम्हारा वो दोहा , काल करे सो आज कर आज करे सो अब , पर में परलै होएगी बहुरी करेगा कब । ये मुझ से हर काम समय से पहले ही करवा देता था । पता है क्यूं ? क्योंकि मुझे सच में लगता था कि अगर दुनिया उलट-पुलट हो गई तो मेरा काम अधूरा रह जाएगा और मैं अपना काम ख़त्म करके ही चैन की सांस लेती । मज़े की बात तो ये है कि ये बात आज भी कहीं ज़हन में गुपचुप छिपी बैठी है । अक्सर चलते-चलते राह भटकी हूं पर तुमने मेरे मैं को ललकारा है । तुम्हारी आवाज़ जैसे दिमाग़ की खिड़की खटखटाती ,जब मैं था तब हरि नहीं , अब हरि हैं मैं नहीं । सब अंधियारा मिट गया , जब दीपक देखा माहीं । मेरा मैं शर्म से सिर झुका लेता और भीतर कहीं उजाले को तलाशता ।
आज मैं क्या सारी दुनिया एक भय और अनिश्चितता के काल से हिली हुई है । तुम क्या थे ? तुम आज न हो कर भी थे नहीं , तुम हो । तभी तो तुमने मनुष्य के मन को तह तक जाना । भली भई जु भै पडया , गई दशा सब भूलि । पाला गलि पांणी भया , ढुलि मिलिया उस कूलि । यानि , अच्छा हुआ जो मुझे भविष्य का भय हुआ । यमदंड का भय हुआ । जन्म-मृत्यु चक्र का भय हुआ । फलत: मैं संसार की छह दशाओं से मुक्त हो गया । क्योंकि ये दशाएं आत्म ज्ञानी को नहीं प्रभावित करती हैं । बर्फ़ जैसी जड़ता समाप्त हो गई है । परमात्मा का एहसास हुआ , वही संपूर्ण सृष्टि का किनारा है ।
तुमने हर क़दम पर राह दिखाई है , तुम अजर – अमर हो । हे संत , हे कबीर तू हवा बन मेरे देश में , इस सृष्टि में बह ताकि हम इस अंधकार से मुक्त हों ।

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