चुप्पी


क्लास में वंदना की हंसी से सब वाकिफ़ थे । कितनी बार बाहर से गुजरती प्रिंसिपल साहिबा उसे टोक चुकी थीं ,
वंदना , बिहेव योर सेल्फ़ ।
लेकिन बदले में उसकी खी खी की ‌आवाज़ गूंज ही जाती । उसका हंसना और हंसाना चलता रहता । यही हाल घर में भी था , वो चुप हो जाती तो मां – बाबा परेशान हो जाते कि लड़की को क्या हो गया ? तबीयत तो ख़राब नहीं हो गई कहीं ? वंदना की शादी तय हुई तो उसके बाबा ने यही कहा था ,
जी हमारी बेटी बड़ी हंसमुख है , घर की रौनक है । जहां जाएगी खुशियां बिखेर देगी ।
शादी हुई और वंदना तो वही रही , खिलखिला कर हंसती । लेकिन जब वो हंसती तो घर वाले ख़ामोश हो उसका मुंह ताकने लगते जैसे कुछ अजीब हरकत की हो उसने । एक बार सासू मां ने उससे बहुत गंभीर हो कर कहा ,
वंदना , यूं जाहिलों की तरह हंसना तुम्हें शोभा नहीं देता । लड़कियों को कायदे में हंसना बोलना चाहिए ।
पति भी टोकते ,
क्या , तुम मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों में जंगलियों की तरह हंसती हो ! मुझे शर्म आती है तुम्हारी ऐसी हरकतों पर ।
वंदना ने धीरे धीरे चुप्पी ओढ़ ली , जब अपने घर भी जाती तो वहीं चुप्पी ओढ़े बैठी शून्य में ताकती रहती । उसके मां बाबा उसकी चुप्पी से चिंता में हो जाते लेकिन अब ससुराल में किसी को कोई शिकायत नहीं थी । उन्हें उसकी चुप्पी में तहज़ीब लगती थी , वंदना अब वंदना नहीं रही थी ।

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