सिद्धांत और व्यवहार

सिद्धांत और व्यवहार

कुछ दिन से एक विचार ज़ोर-ज़ोर से मस्तिष्क का दरवाज़ा खटखटा रहा था । सोते-जागते बस वही विचार हावी हो रहा था । सोचा उसे लिख डालूँ तो कुछ राहत मिलेगी । ये विचार यूँही बेमतलब मस्तिष्क में नहीं आ रहा था । आस-पास ऐसी घटनाएँ घट रही थीं कि कुछ सवाल स्वभाविक तौर पर कुलबुला रहे थे ।

ये आदर्शवाद और सिद्धांत क्या हैं ? इनका औचित्य किसके लिए है और क्या है ? हमारे देश में नारी के लिए आदर्शों की लंबी लिस्ट है । पुरातनकाल से ही नारी सिद्धांतों और आदर्शों का बोझा अपने सिर पर ढोती आ रही है । समाज के बनाए इन सिद्धांतों को वो अपना जीवन मान बैठी है । उस पर थोपे गए ये आदर्श और सिद्धांत व्यवहार से कोसों दूर हैं और वो व्यवहारिक जीवन से कट गई है।

अक्सर हम सोचते हैं कि हमारा देश पुरानी सभ्यता के होते हुए भी पिछड़ा क्यों है ? इसका कारण क्या है ? मैंने इन सवालों के चलते महादेवी वर्मा जी का “जीने की कला” निबंध का अंश पढ़ा । पढ़ने पर लगा कि ये पूरी किताब पढ़नी पड़ेगी । इन सवालों के जवाब में वो कहती हैं , भारतीय संसार में क्यों पिछड़े और उनका जीवन कष्टमय क्यों है ? इसका उत्तर देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है कि हमारे सिद्धांत और व्यवहार में अंतर है । हम भारतीय सदियों से अर्जित ज्ञान के भंडार से निर्मित आदर्शों का गट्ठर अपने सिर पर लादे रहते हैं । परंतु व्यवहार शून्य है । हमारे विचार और आचार में , चिंतन और कर्म में , कथनी और करनी में गहरी खाई है , दूरी है । भारतीय जीवन की यही दरार हमारे जीवन के पिछड़ेपन का मूल कारण है । हमें ये दरार भरनी होगी । नारी के उत्थान के लिए भरनी होगी । स्त्री किस प्रकार अपने ह्रदय को चूर-चूर कर पत्थर की देव प्रतिमा बन जाती है । अपने ह्रदय की प्रिय इच्छाएँ कुचल कर निर्मूल कर देती है ।

मुझे एक सुकून मिल रहा है BE के माध्यम से , आकृति , दिव्या और अनगिनत साझीदारों के साथ मिलकर हम ये दरार , खाई भरने का कार्य कर रहे हैं और करते रहेंगे ।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: ।।

जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं । जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती , उनका सम्मान नही होता , वहाँ किए गए समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं ।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् ।

न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा ।।

जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं , वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती हैं वह कुल सदैव फलता – फूलता और समृद्ध रहता है ।

ये हैं हमारे सिद्धांत , हमारे आदर्श । हमारे व्यवहार में अभी गहरी दरार है ।

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