अजनबी मन

अजनबी मन

कभी सोचती हूँ मैं कि मैं क्या हूँ ?

कौन हूँ मैं ?

क्या हैं मेरी मंज़िलें ?

कहाँ जाना चाहती हूँ मैं ?

इस उल्झन में उलझ जाती हूँ अक्सर ,

कितने ही ऐसे सवालों से घिर जाती हूँ अक्सर ,

ना तय होती है मंज़िल ,

ना तय हो पाता है रास्ता ,

चल रही हूँ बस ,

जैसे , गुम , अकेली ,

न जाने कहाँ !

पाँव थकते नही , मन ठहरता नही ,

कैसी मंज़िल है ये ,

जो आती नही , राह का किनारा कहीं दिखता ही नही ।

ख़ुद को पाती नही , पहचानती नही , अजनबी सा मन , ख़ुद से मेल खाता ही नही

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s