बेटी

बुल्लेशा गल ताईंयों मुकदी , जद मैंनूँ दिलों मुकाईये………

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में एक गाँव है कलोल । इस दूर दराज़ गाँव में बेटियों के लिए जो मुहीम चलाई जा रही है वो देखकर मैं नतमस्तक हो गई , उन लोगों के प्रति जिन्होंने इसे शुरू किया । मन चाहा कि इसे आप सब तक पहुँचाऊँ , शायद देश के किसी कोने में किसी ज़रूरतमंद बेटी के लिए हम भी कुछ कर सकें।

आज से तीन साल पहले कर्नल यशवंत सिंह चंदेल ने जब अपनी जवान बेटी मंजुषा को बीमारी में खोया तो दोनों पति – पत्नी टूट गए । इस दुख ने उन्हें गहरा घाव दिया था । खेत के हर पत्ते और बाग़ के हर फूल में मंजुषा का चेहरा दिखता था । जीवन बोझ लगने लगा था । गाँव में अपने आस – पास कई बेटियाँ या मंजुषा की सखियाँ दिखतीं तो उसकी याद और गहरा जाती । तभी उनके दिल में विचार आया , हर बेटी में अपनी बेटी देखने का और इस तरह शुरू हुआ “मंजुषा सहायता केंद्र” । उन्होंने अपनी पेंशन और अपने दूसरे बच्चों की सहायता से ज़रूरतमंद लड़कियों को आर्थिक सहायता देकर पढ़ाने का काम शुरू किया । इन तीन वर्षो में वे गाँव – गाँव घूमकर ऐसे परिवार को ढूँढते हैं जिनके बेटी है लेकिन आर्थिक अभाव के कारण स्कूल नही जा रहीं । वे उन्हें स्कूल में दाख़िला दिलवाकर उनकी पूरी शिक्षा की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं । अभावों में रह रहे ऐसे परिवार जिन्होंने एक या दो बेटियों के बाद कोई और संतान नही की उन्हें सम्मानित कर आर्थिक सहायता पहुँचाते हैं । एक परिवार की ऐसी बच्ची जो न सुन सकती थी और न बोल सकती थी को उन्होंने कई साल पढाया , नौकरी लगवाई और फिर शादी करवाई । आज वो सुखी पारीवारिक जीवन न्यतीत कर रही है ।

कर्नल साहब कुछ ग़रीब प्रतिभाशाली लड़कों की भी परवरिश कर रहे हैं । यही नही पति – पत्नी गाँव के लोगों की हर प्रकार से सहायता करते रहते हैं । कोई भी गाँव का व्यक्ति आर्थिक अभाव के कारण इलाज के बिना न रहे , उसकी जान ना जाए इस बात का वो पूरा ध्यान रखते हैं । ख़ुद आज के इस “और मिल जाए” के युग में दोनों पति-पत्नी सादगी भरा जीवन व्यतीत करते हैं । कबीर , नानक और बुल्लेशा के प्रशंसक हैं , उन्हीं को अपना पथप्रदर्शक मानते हैं ।

एक म्हाको फूल प्यारो , अधखिलो कुम्हला गयो ।

सोग बीतो , हरख छायो , फूल बाग लगा गयो ।

क्या खोया , क्या पाया

कुछ खोया सा है ,

मन कुछ ढूँढ रहा है ,

आँखों में कुछ इंतज़ार सा है ,

धड़कनें क्यूँ बेहिसाब सी हैं ?

यूँही भटक जाना ,

सब कुछ भूल जाना चाहता है दिल ।

किसी को कुछ समझाना ,

कुछ बतलाना ,

कुछ भी तो नही चाहता है ये मन !

फिर भी क्या खोया और क्या ढूँढ रहा है ये मन ?

चल छोड़ , चल दे यूँही , कहीं भी ,

किसी अंजान की मुस्कान बन ,

किसी बेनाम की आँखों में तैरते आँसू को ऊँगली पर उतार ले ,

कुछ उलझते दिलों को सुलझा दे ।

पाया-खोया का हिसाब छोड़ ,

अपनी धड़कनों को विराम दे ।

 

रुद्राक्ष

 

धौलाधार की चोटियों पर बर्फ़ गिरते ही पालमपुर में बारिश शुरू हो गई थी । अब बारिश हुई तो घर के बरामदे में बैठे प्रोफ़ेसर साहब अपनी पत्नी के साथ सूजी का हलवा खाने का इंतज़ार कर रहे थे । उन्हें गरम – गरम चाय की तलब भी हो रही थी । हलवे की खुशबू नाक से होती हुई दिल तक पहुँच रही थी कि तभी संध्या टेबल पर ट्रे रखकर पास ही बैठ गई ,

तुम बिन कहे सब कुछ कैसे समझ जाती हो ?

ये कहते हुए प्रोफ़ेसर साहब आँखें मूँदे , हलवे का मज़ा लेने लगे । कुछ देर बाद अजीब सी ख़ामोशी महसूस हुई तो आँखें खोल कर उन्होंने संध्या को देखा। वो कुछ कुछ खोई  सी पहाड़ियों पर जमी बर्फ़ को एकटक देख रही थी ।

क्या हुआ ? क्या सोचने लगीं ?

प्रोफ़ेसर साहब के कहने पर संध्या का ध्यान टूटा…..वो चाय का कप होठों से लगाते हुए बोली ,

क्या पैंतीस साल बाद , आप….मेरे मन की बात बिन कहे…समझते हैं ?

इस बार चौंकने की बारी प्रोफ़ेसर साहब की थी , संध्या गंभीर थी !! वो कुछ अटकते हुए से बोले ,

हाँ……अब साईंस वालों को…..इतना भी इनसैंसीटिव मत समझो ।

तुम कहीं जाना चाहती हो ।

इतना कह वे संध्या की ओर देख  ,  मुस्कुरा दिए , पर उसकी नज़र अब भी बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों पर थी । वो बिना पलक झपकाते हुए बोली ,

मैं ऋषिकेश जाना चाहती हूँ ।

हाँ तो चलते हैं ना….मैंने तो कितनी बार कहा तुमसे , पर तुम बच्चों को छोड़ना ही नही चाहती थीं । अब तो बच्चे सैटल हो गए हैं , तुम फ़्री हो ।

प्रोफ़ेसर साहब ने संध्या का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा , तो संध्या पहाड़ से अपनी नज़रें  हटाकर बोली ,

हमेशा के लिए चलेंगे सब कुछ छोड़ कर…?

प्रोफ़ेसर साहब के हाथ की पकड़ कस गई ,

अरे…..संध्या जी आपके साथ हम कहीं भी चलेंगे…..तू जहाँ जहाँ चलेगा मेरा साया साथ होगा…..

गाते हुए प्रोफ़ेसर साहब हँस दिए ।

ये मज़ाक नही , मैं सीरियस हूँ….

संध्या ने उनकी आँखों की गहराई को नापते हुए कहा ,

तुम हमेशा वो फूलचट्टी आश्रम की बात करते हो , वहाँ वृद्धाश्रम में हर महीने कुछ भेजते भी हो ।वहीं चलते हैं , मुझे गंगा के पास रहने का बहुत मन है।

बारिश थम गई थी , बादलों से चमकते सूरज की गुनगुनी धूप अब चोटियों पर पड़ रही थी जैसे किसी ने चाँदी का वर्क उढ़ा दिया हो।

बच्चों से बात करलें ।

प्रोफ़ेसर साहब ने कहा तो संध्या ने उनकी ओर देखा ,

बच्चों से क्या पूछना…? उन्हें क्या प्रॉबलम होगी ? वैसे भी हम उनके मम्मी पापा हैं , वो हमारे नही !!   

पहली बार संध्या को अपने फ़ैसले पर अटल देख कर उन्हें अच्छा लगा । शायद उन्होंने अभी तक उसे ठीक से पहचाना ही नही था….दोनों गृहस्थी में ऐसे उलझे कि एक – दूसरे के मन से अंजान हो गए !!

प्रोफ़ेसर साहब और संध्या विचार कर रहे थे कि अब तक तो बस सिर्फ़ अपने और अपनों के लिए ही जीते रहे । सभी ये करते हैं…!! सोचते थे कि बाकी बचे जीवन को कुछ मायने दे दें । आज तक के फ़ैसले भी उन्होंने मिल कर ही लिए थे फिर ये तो उनकी ज़िंदगी का अहम फ़ैसला था । सोच – विचार के बाद दोनों ने फ़ैसला लिया कि यहाँ से दूर जाएँ , जहाँ “मेरा” कुछ न हो । प्रोफ़ेसर साहब , संध्या को देख मुस्कुरा दिए , जैसे पहली बार उन्हें देख कर मुस्कुराए थे। तब भी नई ज़िंदगी में कदम रख रहे थे और आज भी….. दोनों ने “मैं” और “मेरा” से दूर जाने का फ़ैसला कर लिया…..ऋषिकेश आश्रम में जाने का फ़ैसला ।

सारे इंतज़ाम हो गए हैं , बच्चों को भी ख़बर कर दी है । एक हफ़्ते बाद की बुकिंग मिली है , तब तक मैं बाकी बचे काम भी निपटा लेता हूँ।

प्रोफ़ेसर साहब ने कहा तो संध्या सामान समटने में लगी थी । सिर हिला कर हाँमी भरती  रही , उसके भीतर न जाने क्या-क्या सिमट रहा था । सालों इस घर को समेटने में लगे थे और अब उसमें से कुछ सामान समेटना आसान नही था । तभी घर के बाहर गाड़ी के रूकने की आवाज़ आई , उनका बेटा सिद्धार्थ था। बड़ा हो गया , पर वही आदतें , बेसब्रों की तरह घंटी बजाना , जब तक कि दरवाज़ा खुल नही जाता ।

तू क्या अंधेरे में ही चल दिया , जो इतनी सुबह पहुँच गया ?

प्रोफ़ेसर साहब ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा तो सिद्धार्थ भरे गुब्बारे की तरह फूट पड़ा ,

क्या करता , आपका फ़ैसला सुनकर बेचैनी बहुत बढ़ गई थी ।    

उसकी बेचैनी , परेशानी चेहरे पर साफ़ झलक रही थी । संध्या उसके लिए किचन में कुछ बनाने चल दी ,

भूख लगी होगी , पहले कुछ खा ले , भूखे पेट तुझे बहुत गुस्सा आता है । फिर आराम से बात करते हैं ना ।

सिड , सिर झटकते हुए , माथे पर त्यैंरियाँ बिखेरे , डायनिंग टेबल पर बैठते हुए बोला ,

मेरी फ़िक्र भी है…..और छोड़कर भी जा रहे हो , क्यूँ जा रहे हो…? यहाँ मन नही लगता तो कुछ दिन सोनल के पास और कुछ दिन मेरे पास आकर रहो ना ।

उसकी आवाज़ में कहीं  परेशानी के साथ खीज भी थी । दोनों उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे कि सन्यास नही ले रहे वो , सिर्फ़ मोह के धागों को सुलझाना है , अपने जीवन को कुछ मायने देना चाहते हैं । सिद्धार्थ कितना समझा पता नही लेकिन थक कर माँ की गोद में सो ज़रुर गया ।

मोह के धागे भला इतनी आसानी से कहाँ सुलझते हैं ? सुबह तो आई थी पर कई सवाल ले कर । सूरज आज कुछ घबराया सा पहाड़ के पीछे से निकला ही नही । सिड तैयार हो रहा था उसे आज जाना था ,

पापा ये टिकट वगैरह कैंसिल कराइए । कहीं नही जा रहे आप ।

रिटायर होने पर कौन ऐसा करता है ? सोनल कह रही थी कि वो बहुत बिज़ी चल रही है , लेकिन मम्मी – पापा नही मानते तो मैं आती हूँ ।

सिड ने बड़ी समझदारी दिखाते हुए कहा था ,

आप दोनों को अब आराम करना चाहिए वरना लोग कहेंगे कि बच्चे नालायक हैं इसलिए दुखी हो कर माँ – बाप घर छोड़ कर ऋषिकेश चले गए ।   

अब तक सब का ही तो सोचा था उन्होंने आज कुछ अपने मन का सोचने चले थे । बच्चों और पालमपुर को छोड़कर कैसे रह पाएँगें ? संध्या तो कभी पालमपुर छोड़कर निकली ही नही थी । बेगाने लोगों में कैसे रहेंगे ? कितने सवाल सामने खड़े थे । फिर सिद्धार्थ ने माँ के पास आकर धीरे से कहा ,

मम्मी…..आप भी पापा का साथ दे रही हैं ! निकाल दो मन से ये बेकार की बात और पापा को समझाओ , प्रैक्टिकल होकर सोचो । अगर आप गए ना….तो मैं वहीं पहुँच जाऊँगा आपके पीछे ।

संध्या ने प्यार से उसका सिर सहलाते हुए कहा था ,

देख , तुम दोनों बहन-भाई अब इंडिपैंडैंट हो , हम बहुत खुश हैं तुम्हारे लिए । हमारा मन अब अपने जीवन का अर्थ ढूँढना चाहता है , अपने आप को तलाशना चाहता है । हम तुम से नाराज़ होकर नही जा रहे ।

लेकिन सिड अपना फ़ैसला सुना कर कि आप कहीं नही जा रहे , चला गया । ज़िंदगी चलती रहे तो कितनी खूबसूरत है रूक जाए तो थमी हवा सी घुटन भर देती है । वही घुटन शायद वे दोनों भी मेहसूस कर रहे थे । प्रैक्टिकल होकर सोचो ? क्या ज़िंदगी यहीं थम कर रह जाने दें ! क्या यहीं जीवन को विराम लगा दें ? लेकिन बच्चों के मन का क्या होगा ! विचारों में उलझे दोनों सामान वापस अलमारी में रखने लगे । बच्चों का दिल कैसे तोड़ दें !! सोनल और सिद्धार्थ बहुत खुश थे कि उन्होंने जाना रद्द कर दिया । लेकिन उन दोनों का मन ?

संध्या और प्रोफ़ेसर साहब आँखें खोले छत ताक रहे थे । दोनों के मन में एक सी हवा बह रही थी , ख़ामोश , मगर आस पास ।

दोनों ने हसरत से आसमान को देखा बादल सूरज को कहाँ रोक पाए , धूप सिर्फ़ उनके आँगन में नही थी दूर तक फैल गई थी। दोनों ने एक दूसरे को देखा प्रोफ़ेसर साहब आर्मचेयर पर बैठे डूबे से बोले ,

संध्या जीवन के अंत का इंतज़ार करें या इंतज़ार का अंत करें ?

पति के सवाल के जवाब में वो खुद भी उलझी थी ,

संध्या और प्रोफ़ेसर साहब के दिलों में भावनाओं का कुरूक्षेत्र बना हुआ था । सोनल का फ़ोन आया तो भावनाएँ भँवर बन गई ,

ये संयास – वंयास सब किताबों में अच्छे लगते हैं , कितना मुश्किल होगा अचानक अंजान लोगों के साथ रहना ! सिड ठीक कह रहा था छ: महीने मेरे पास और छ : महीने सिड के पास अच्छा टाईम पास हो जाएगा आपका ।

ज़िम्मेदारी बाँट ली थी दोनों बच्चों ने । लेकिन क्या , अब टाईम पास करना जीवन का मक़सद बन जाएगा ! मन ने पूछा , कहाँ जा रही है ? जवाब मिला ज़िंदगी को तलाशने , ख़ुद को ख़ुद से मिलवाने ! पर ये मोह छोड़ता ही नही ! कैसा मकड़जाल है ये ! दिन-दिन मोम सा गलता जीवन….ये मन पतंगा , रोशनी की मोह में ख़त्म हो गया ! किसी के काम न आया…ख़ुद ने भी क्या पाया ?  सिर्फ़ अंत ! संध्या का मन जकड़ गया , वो छूटने की कोशिश करने लगी ।

धीरे – धीरे भावनाएँ युद्ध में हारे कौरवों की तरह पस्त होने लगीं । जकड़न ढीली पड़ने लगी । संध्या ने एक गहरी साँस ली , दोनों एक बार फिर उठे । संध्या बच्चों का कमरा बंद करने लगी तो  दीवारों को देखा जिन पर अब कोई निशान नही थे पर उनके बचपन की गूँज अब भी वहाँ थी जो उसके दिल में भी थी । उनके नाम की प्लेट वैसे ही लटक रही थी “सोनल” , “सिद्धार्थ”। किचन को देख चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई अपनी कलाई पर जले निशान को देखा और दरवाज़ा बंद कर दिया । पालमपुर से चंडीगढ़ के सफ़र ने काफ़ी थका दिया था उन्हें । प्रोफ़ेसर साहब की नज़र संध्या पर पड़ी तो देखा वो सिर बैग से टिकाए ऊँघ रही थी । वो पहली बार ट्रेन से इतना लंबा सफ़र कर रही थी । उन्होंने धीरे से संध्या के सिर के नीचे से बैग हटा कर तकिया लगाया तो उसकी आँख खुल गई । उसे चादर उढ़ाते हुए बोले ,

ठीक से सो जाओ…तुम बहुत थक गई हो ।

वो मुस्कुरा दी , सब सो गए थे ,

तभी अंधेरे कूपे में एक पल को रोशनी आई , शायद कोई स्टेशन था । साथ की सीट पर लेटे प्रोफ़ेसर साहब की ओर उसकी नज़र गई । वही चेहरा जिसमें सिर्फ़ प्यार था ।

दोनों के बीच अगर कभी बहस हुई भी तो बच्चों को लेकर ही हुई , उसमें भी उनका प्यार ही था ,

तुम कुछ ज़्यादा नही करती हो इनके लिए !  हर वक्त इन्हीं में उल्झी रहती हो ! ताउम्र हम इनके साथ नही होंगे । अपने लिए भी समय निकाला करो ।

पर वो तो माँ बनने के बाद , सब कुछ भुला बैठी थी । उसकी सबसे प्यारी सहेली की शादी थी दिल्ली में , कितना मन था उसका जाने का ।  

पर उन्हीं दिनों सोनल और सिद्धार्थ के एग्ज़ाम थे ।

बच्चों का बहुत हर्ज़ होगा…..रहने दो….

और वो नही गई , दोनों बच्चों में ऐसी रमी कि माँ से मिलने भी कम जाती । कहीं बच्चों की पढ़ाई में ख़लल न हो , कहीं उन्हें खाने की परेशानी न हो , यही सोचती रहती । आज कैसे वो अपने बच्चों से दूर जा रही है उन्हें छोड़ कर !!

ट्रेन सब कुछ पीछे छोड़ती आगे भाग रही थी और संध्या आँखें मूँदे अपने पीछे छूटे हुए पलों में डूब रही थी ,

शादी करके जब वो शिमला से पालमपुर आई थी तो उसे पालमपुर गाँव सा लगा था । एक छोटा सा बाज़ार जिसमें शिमला सी चहल-पहल नही थी , कोई बड़ी बिल्डिंग नही , चारों ओर फैले टी गार्डन्ज़ । सूरज ढलते ही फैला सन्नाटा उसे बड़ा खलता था । फिर कब उस जगह से उसे प्यार हो गया पता नही।

वो मन ही मन मुस्कुरा दी ,

एक बार कैसे उसके मन में कांजीवरम पहनने की लालसा पैदा हुई और पैसे जमा करने लगी ,

सुनो , जब सोनल की शादी होगी ना , तो मैं कांजीवरम साड़ी और कुंदन का सैट पहनूँगी । वैसे ही जैसे रेखा पहनती है….कितनी एलीगैंट लगती है ना !!

पति ने भी हँस कर कहा ,

अजी आप किसी रेखा से कम हैं क्या…!!

वो भी हँस कर टाल गई। लेकिन जब सोनल के अमेरिका जाने में पैसे कम पड़े तो उसने वही जमा पैसे निकाल कर पति के सामने रख दिए ,

ये कुछ पैसे मेरे पास हैं , शायद काम आ जाएँ ।

पर ये तो तुमने अपने लिए जमा किए थे , ये नही लूँगा ।

प्रोफ़ेसर साहब ने कहा तो उसने कहा था ,

मेरे सपने तो मेरे बच्चे हैं , कांजीवरम और कुंदन का सैट नही !!

उसने बात हँसी में उड़ा दी थी । मन की संध्या ने कभी सुनी ही नही । समय पानी सा बह गया और वो बर्फ़ सी जमी रह गई ।

संध्या का मन भी समय के साथ बहना चाहता था । इसीलिए शायद अब वो गंगा के साथ जीना चाहती थी । रात के ग्यारह बज रहे थे , सोनल का फ़ोन अक्सर रात को ही आता , तब अमेरिका में सुबह होती थी । तभी फ़ोन बजा तो समझ गई कि सोनल का होगा उसकी आवाज़ आई ,

मम्मी….कहाँ हो आप ?

ट्रेन में हैं बेटा..ऋषिकेश जा रहे हैं ।

संध्या ने धीरे से कहा लेकिन उधर तो सोनल जैसे चिल्ला पड़ी ,

क्या कह रही हो ! क्यूँ मम्मी ? आप ऐसा नही करोगे । मैं आ रही हूँ ।

ये कह कर सोनल ने फ़ोन रख दिया । जानती थी कि उसे उनका ऋषिकेश जाना अच्छा नही लग रहा था । उनके लिए भी आसान कहाँ था ये बदलाव !! पता नही रह पाएँगे कि नही ? कितने अंजाने भय मन को मथते जा रहे थे ।

स्टेशन आया तो दोनों ने उतर कर ऋषिकेश की टैक्सी ले ली । पालमपुर पीछे छूट गया था , रह-रह कर सिड और सोनल की बातें याद आ रही थीं । दिल में कहीं घबराहट थी। नए लोगों में कैसे रहेंगे ! दिमाग़ ने कहा “ चल अब भी वापस मुड़ जा” !!  दिल कुछ भारी सा हुआ । संध्या ने पास बैठे पति का हाथ थाम लिया , कुछ राहत सी मिली । फूलचट्टी आश्रम आ गया था , दोनों ने एक दूसरे को देखा और आगे बढ़ गए । भीतर गए तो कुछ कमज़ोर , उम्र का लंबा सफ़र तय किए शरीर देख , एक बार को दोनों सहम से गए । इतनी सच्चाई से पहली बार सामना हो रहा था । संध्या सोच रही थी कि जीवन भर घर में सबका करती रही पर अब उसके कदम क्यूँ काँप रहे थे !  ”क्यूँकि वो तेरे अपने थे ? ये तेरे क्या लगते हैं ?” मन हँसा था “तू तो “मैं” और “मेरा” छोड़ कर आई थी ? “ काँपते हाथों से उसने अपने माथे का पसीना पौंछा । रातभर नींद नही आई , उसे अपने बिस्तर की आदत जो थी । सुबह गंगा किनारे जाने लगी तो एक और जोड़ी हाथ सहारा माँग रहे थे । उसने मुस्कुरा कर हाथ बढ़ाया और नपे कदमों से चलकर उनके साथ किनारे बैठ गई । कितनी चमक और खुशी थी उन आँखों में । संध्या के दिल को कैसा सुकून मिला था । प्रोफ़ेसर साहब एक कोने में व्हीलचेयर पर बैठे बुज़ुर्ग को अख़बार पढ़कर सुना रहे थे । बीच बीच में दोनों की मिलीजुली हँसी भी हवा में बह रही थी । कितना अनोखा एहसास था किसी और को अपने हाथों से खाना खिलाने का !! बच्चों का बचपन याद आ गया था । किसी को नहला कर कपड़े बदले तो वही सिड की ज़िद ! उसके चेहरे पर हँसी आ गई थी । नए एहसासों से जीवन भरने लगा । तभी एक दिन सिड और सोनल को आश्रम के दरवाज़े पर खड़े पाया था । पास आकर उन्होंने कहा था ,

हम आपको वापस लेने आए हैं…., प्लीज़ घर वापस चलिए ।

संध्या और प्रोफ़ेसर साहब ने एक दूसरे की ओर देखा , उनकी आँखों में कितना सुकून था , कितनी संतुष्टि थी । उनका दिल तो अब इन अपनों में रम गया था , यही उनका घर – संसार हो गया था । संध्या का हाथ एक बुज़ुर्ग महिला ने थाम रखा था और वो उन्हें न जाने किस उम्मीद से ताक रही थीं । एक बुज़ुर्ग बिस्तर पर लेटे टूटती सी आवाज़ में प्रोफ़ेसर साहब को पुकार रहे थे जिन्हें वो हर रोज़ अख़बार और किताब पढ़ कर सुनाते थे । दोनों ने एक नज़र अपने बच्चों पर डाली और फिर अपनी उम्मीदों की ओर देखा जो हसरत से उन्हें ताक रहे थे । प्रोफ़ेसर साहब ने बच्चों की ओर कदम बढ़ाया तो संध्या उन्हें अचरज से भीगी नज़रों से देखती रही । प्रोफ़ेसर साहब ने बच्चों को गले से लगाया और मुड़कर उन बुज़ुर्ग की ओर चल दिए जो उन्हें पुकार रहे थे । संध्या के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी , वो अपना हाथ थामे उस बुज़ुर्ग को लिए बच्चों की ओर बढ़ीं और दोनों के माथे को चूमते हुए बुज़ुर्ग महिला को प्यार से थामें गंगा की ओर बढ़ गईं । सोनल और सिद्धार्थ ने भीगी आँखों से अपने जन्मदाताओं के इस नए जीवन के उदय को नमन कर विदा ली ।

मशकली

 

पुरानी दिल्ली की गलियाँ….., एक एहसास हैं । हर गली की अपनी एक खास बात है। हर गली , मुहल्ला अपना इतिहास लिए है । उसी में बल्लीमरान मोहल्ला भी एक इतिहास लिए है । इसी मुहल्ले की गली  क़ासिम जान में ग़ालिब की हवेली है , शायद इस ग़ली की हवा में ही इंकलाब है । आज भी यहाँ गली में दीनदयाल जी के घर में इंकलाब आया , उनकी बेटी गायत्री ने आज ग़ज़ब कर दिया । लड़के वाले उसे देखने आए थे , लड़के की माँ ने गायत्री का सिर दुपट्टे से ढकते हुए कहा ,

हमें ऐसी ही पढ़ी-लिखी , सुंदर , सुशील और घरेलू लड़की चाहिए ।

लड़के ने गायत्री को पसंद कर लिया था , वो मुस्कुराता गायत्री को नीची निगाहों से देख रहा था। तभी गायत्री सिर से चुन्नी खींचते हुए खड़ी हो गई और माँ को घूरती हुई भीतर कमरे में भाग गई । अम्मा दनदनाती हुई पीछे भागीं , भला ये कैसी बदतमीज़ी करी लड़के वालों के सामने । अम्मा को देखते ही गायत्री फट पड़ी ,

नही करनी मुझे यहाँ शादी ।

आवाज़ इतनी तेज़ थी कि बैठक में बैठे सबने सुनी ।

दीनदयाल जी और लड़के वाले सभी सन्न रह गए । गायत्री माँ की ओर देखती हुई बोली ,

सुंदर , सुशील , पढ़ी-लिखी और घरेलू लड़की चाहिए !! कह दो इनसे , ये दुकान नही जहाँ डिज़ाइनर बहू मिलती हो ।

अम्मा…..आँखें बड़ी – बड़ी कर हैरानी से उसे देखती रहीं । ऐसा तो उन्होंने कभी सुना ही नही कि लड़की , लड़के को रिजैक्ट कर रही है !! वो भी उनकी अपनी बेटी…!! क्या जवाब देंगी अपनी बहन को जिसने ये रिश्ता भेजा था । अम्मा ने माथा ठोक लिया , दीनदयाल जी मुँह लटकाए बैठे थे । लड़के वाले मुँह बाए , आँखें फाड़े , कभी बैठक के बाहर देखते जहाँ से आवाज़ आ रही थी तो कभी एक-दूसरे का मुँह । अब गुस्सा दिखाना तो उनका जन्मसिद्ध अधिकार था , गुस्से से पैर पटकते घर से निकल गए । गायत्री सीधी छत पर पहुँची जहाँ पड़ौस के रिफ़त चाचा की बेटी , उसकी बचपन की सहेली फ़िरदौस कब से खड़ी उसके ज़िंदगी के रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रही थी । वो गायत्री को देखते ही मुंडेर पर लटक कर ऐसे रहस्यमयी ढंग से बोली मानो किसी प्रेम कथा की पहली मुलाकात में क्या हुआ जानना हो ,

क्या हुआ….मेरी बन्नो…..!! कैसी रही मुलाकात ?

गायत्री आँखें तरेरती बोली ,

चूल्हे में गई मुलाकात । मरों को बीवी नही , शो केस में रखी गुड़िया चाहिए । मेरी जूती करेगी ऐसों से ब्याह ।

ये कहती हुई फ़िरदौस के पास मुंडेर पर कूद कर बैठ गई । फ़िरदौस उसे हताश नज़रों से देखती हुई बोली ,

एक और बेचारे ने मुँह की खाई ।

तुझे वो घोंचू , अपनी अम्मा की पूँछ , बेचारा लगता है ?

कहते हुए गायत्री ने उसकी कमर पर एक धौल धर दिया । फ़रदौस ,

उई अम्मा……

चिल्लाई तो नीचे सहन में घूम रहे दीनदयाल जी ने सिर उठा कर गुस्से में ऊपर देखा । अम्मा खाट पर बैठी अपना गुस्सा जवों पर निकाल रही थीं , तोड़ तो जवें रही थीं लेकिन उनका बस चलता तो घरभर का सिर फोड़ देतीं । इस मुद्दे को लेकर दोनों पति-पत्नि के बीच अच्छा खासा विवाद हो कर चुका था । गायत्री नीचे घर के गरम माहौल से बच कर छत पर भाग आई थी। सबको पता था कि वो घर में कम और फ़िरदौस के साथ छत पर ज़्यादा रहती थी । खुली हवा में उसे सुकून मिलता था ।

आ….आ….आ….।

करती फ़िरदौस के साथ रिफ़त चाचा के कबूतरों को दाना खिलाती रही । उसे इन कबूतरों के साथ समय बिताना बहुत अच्छा लगता था । कबूतरों को वो पहले कई बार चुपके से आज़ाद भी कर चुकी थी , जिसकी शिकायत बाऊजी तक पहुँची थी । इससे पहले कि बाऊजी कुछ कहते , निशा ने रिफ़त चाचा से कान पकड़ कर माफ़ी माँग सब सुलटा लिया था । उसे इन कबूतरों के पैरों में पहनाई चूड़ियाँ अच्छी नही लगती थीं । इनके बोझ से बेचार ऊँची उड़ान ही नही भर पाते थे । वो तो बस इनकी चूड़ियाँ निकाल देती थी , उड़ान तो वो ख़ुद भर लेते थे । अब इसमें उसका क्या कसूर था ? इस ख़ुराफ़ात में उसे फ़िरदौस का हमेशा साथ मिलता था ।

कबूतरों को दाना खिलाते हुए उसका ध्यान नीचे अम्मा – बाऊजी में अटका था । जानती थी कि अम्मा बहुत नाराज़ होंगी और बाऊजी भी । उसने सोच लिया कि वो आज उन्हें साफ़ – साफ़ बता देगी कि वो क्या चाहती थी । नीचे आने लगी तो अम्मा की आवाज़ कानों में पड़ी । अम्मा तो नाराज़ क्या , उबल रही थीं और निशाने पर बाऊजी थे ,

इस लड़की को , तुमने बिगाड़ा है , चार किताबें क्या पढ़ लीं , इसे दिमाग़ हो गया है । यूँ रिश्ते मना कर के बिरादरी में नाक कटाएगी ये लड़की । अब पूछो ज़रा इससे कि आख़िर चाहती क्या है !!

दीनदयाल जी इस बात से परेशान नही थे कि गायत्री ने लड़के को मना क्यों कर दिया । वो तो सिर्फ़ ये सोच रहे थे कि वो शादी के लिए हर बार मना क्यूँ कर रही थी ? जब से उनकी तबीयत बिगड़ी थी उन्हें सिर्फ़ गायत्री की ही चिंता थी । चावड़ी बाज़ार में बाप-दादों के समय की किराने की दुकान से घर चलता था । बेटा हरीश दुकान पर बैठना नही चाहता , नौकरी कर रहा था । पुरानी दिल्ली के लोगों की सोच उसे पुरानी लगती थी इसलिए गुड़गाँव में रहता था । उसे तो अपना नाम तक पुराने टाईप का लगता था इसलिए हरीश से हैरी हो गया था । दीनदयाल जी तो अब बेटी के हाथ पीले कर निफ़राम होना चाहते थे फिर बेटा दुकान का जो चाहे करे । गायत्री नीचे आकर अम्मा – बाऊजी के सामने सिर झुकाए अपराधी सी खड़ी थी । उसे देख कर अम्मा का जवें तोड़ना और तेज़ हो गया था । बाऊजी पास आकर धीरे से उसके सिर पर हाथ रख कर बोले ,

तेरी अम्मा परेशान है कि लड़के में क्या खराबी थी जो तूने मना कर दिया ? कैसा लड़का चाहती है , बता दे अम्मा को , हम वैसा ही देखेंगे ।

अम्मा को समझ नही आ रहा था कि ये डाँट रहे हैं या उसकी साइड ले रहे हैं ? गायत्री ने हिम्मत जुटाकर कहा ,

बाऊजी….मुझे अभी नही करनी शादी । मेरी पढ़ाई पूरी हो जाए तो मैं दुकान पर आपका हाथ बटाऊँगी । अपनी दुकान को बढ़िया स्टोर बनाऊँगी , बिलकुल मॉड्रन स्टाईस का ।

उसकी बात सुनते ही बाऊजी उसे हैरत से देखने लगे और अम्मा जवें पटक खाट से खड़ी हो गईं । चाऊड़ी बाज़ार में किराने की दुकान पर उनकी बेटी बैठेगी…!! ये लड़की कहाँ से इतनी सिरफिरी हो गई , गली कासिम जान की लड़की दुकानदारी करेगी ? ये सुनते ही उनका तो दिमाग़ भिन्ना गया ,

तुम पगला तो नही गई हो ? हमारे यहाँ लड़कियाँ दुकानदारी नही करतीं और वो भी चावड़ी बाज़ार में !!

गायत्री बड़े इत्मिनान से बोली ,

नही किया तो क्या ? अब करेगी । ऐसा थोड़े ही होता है कि जो अभी तक नही हुआ वो कभी नही होगा ।

उसकी बेबाकी पर अम्मा गुस्से से दाँत पीस रही थीं और बाऊजी मुँह बाए हैरत से देख रहे थे कि बल्लीमरान के मोहल्ले में पली – बढ़ी उनकी लड़की के दिमाग़ में ये आज़ादी कहाँ से आ गई थी ! गायत्री जानती थी कि यही होगा , लेकिन वो तैयार थी । बाऊजी बड़े प्यार से समझाते हुए बोले ,

बेटा , ये क्या कह रही है तू । तू मेरे साथ दुकान पर बैठेगी ? ये काम लड़कियों का नही होता । तू पढ़ना चाहती है तो पढ़ ना , कोई नही रोकेगा तुझे लेकिन ये दुकान-वुकान की बात दिमाग़ से निकाल दे ।

इस बार गायत्री झल्लाकर बोली ,

बाऊजी , लड़कियाँ फ़ौज में भरती होने लगी हैं , चाँद पर जाने लगी हैं , मैट्रो ट्रेन चला रही हैं और मैं दुकान पर नही बैठ सकती !

बाऊजी ठहरे ठंडे दिमाग़ के , उसकी बात को फ़िलहाल बदल कर घर का माहौल बदलने लगे , हँसकर बोले ,

अच्छा चल बैठ जाईयो , पहले पढ़ाई तो पूरी कर ले ।

ये सुनकर अम्मा का तो पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया ,

तुम और तुम्हारी बेटी एक दिन मोहल्ले में जीना मुश्किल कर दोगे । मैं तो घर छोड़कर हरिद्वार चली जाऊँगी ।

इसके बाद अम्मा के पास एक ही अस्त्र बचता था और वो था कमरे में जाकर खाटपर पड़ जाना । बाप-बेटी ने एक दूसरे को देखा और दबी मुस्कान से बात आई-गई कर दी लेकिन वो नही जानते थे कि इस बार अम्मा ब्रह्मास्त्र लिए बैठी हैं । वो तो खाना-पीना त्याग कोप भवन में पड़ी रहीं । बाऊजी ने , गायत्री ने बहुत मनाया लेकिन वो थीं कि टस से मस नही हुईं । आज उसे अपनी अम्मा कम और केकैई ज़्यादा लग रही थीं । केकैई की ज़िद के आगे हारे राजा दशरथ भी थे और राम भी । इस युग में भी वही हुआ , परेशान हो कर बाऊजी ने बेटी को समझाया कि हाँ कह दे , माँ की मान जा , उसे डायबिटीज़ है , खाएगी नही तो बीमार हो जाएगी । जहाँ तू हाँ कहेगी शादी वहीं करेंगे पर अभी मान जा ।

मरती क्या न करती , बेचारी गायत्री ने बाऊजी का मुँह देखकर न चाहते हुए भी वो कहा जो वो नही करने वाली थी , अम्मा से माफ़ी माँगी और कह दिया,

अच्छा अम्मा , तुम जीतीं , मैं हारी । वही होगा जो आप कहोगी लेकिन अब उठो और खाना खालो ।

ये सुनते ही अम्मा उठकर बैठ गईं और तिरछी आँखें करके बोलीं ,

देख , कहे देती हूँ कि अब कोई लड़का देखने आए तो तू अपना मुँह बंद रखेगी । हम कोई तेरे दुश्मन हैं जो किसी से भी ब्याह देंगे ?

गायत्री सिर नीचा किए अम्मा की सुनती रही , मौका ही ऐसा था । उस दिन गायत्री ने खाना बनाया और सबने साथ बैठकर खाना खाया । खाना खाते ही गायत्री भागी छत पर खुली हवा में साँस लेने के लिए । आज पूर्णिमा थी , पूरी छत पर चाँदनी छिटकी हुई थी । वो मुंडेर पर बैठी चाँदनी में नहाती , जामामस्जिद और लाल किले की गुंबद निहार रही थी । इतनी पुरानी इमारतें आज भी नई इमारतों को मुँह चिढ़ाती अपनी विशालता लिए खड़ी थीं । वो सोच रही थी कि इन इमारतों की क्या खास बात रही होगी जो आज भी इतनी आपदाओं के बाद भी अटल खड़ी हैं ? कितनी अलग हैं ये इमारतें और इमारतों से ,  इनकी नींव कितनी मज़बूत रही होगी । न होती तो कब की ढह गई होतीं । बिल्कुल हमारे वजूद की तरह , हमारी सोच की तरह । उसे भी भीड़ में चलना अच्छा नही लगता लेकिन अलग वजूद बनाने के लिए नींव मज़बूत करनी होगी । तभी एक ज़ोर का धक्का उसकी पीठ पर लगा , वो चौंक कर गिरते-गिरते बची । ये फ़िरदौस थी ,

, मेरी लेडी ग़ालिब , किस सोच में डूबी हो !

गायत्री कूदकर उसके पीछे भागी ,

लेडी ग़ालिब की बच्ची , ठहर अभी बताती हूँ तुझे , अभी मैं गिरती तो सारा थोबड़ा फूट जाता मेरा ।

थोड़ी देर भागम-भाग के बाद दोनों के साँस चढ़ गए और एक साथ मुंडेर पर बैठकर ज़ोर – ज़ोर से हँसनें लगीं । उसके बाद गायत्री ने फ़िरदौस को आज का सारा किस्सा सुनाया । फ़िरदौस कुछ गंभीर होते हुए बोली ,

तो अब क्या करेगी तू ? चचीजान जिससे कहेंगी उससे शादी कर लेगी ?

गायत्री ने उसके सिर पर धौल जमाते हुए फुसफुसाते हुए कहा ,

पागल है क्या ? वो तो बाऊजी का मुँह देखकर मैंने हाँ कह दी । मैं नही करने वाली किसी भी ऐरे-गैरे से शादी । हालात आसानी से नही बदले जाते लाडो , लड़ना पड़ता है , अपने से , अपनों से और बाहर वालों से भी ।

एक लंबी , गहरी साँस छोड़ते हुए उसने फ़िरदौस के कंधे पर अपना सिर टिकाते हुए कहा,

फ़िरदौस , क्या लड़की होना कोई गुनाह है ? हम अपने मन की क्यों नही कर सकते ? अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से क्यों नही जी सकते ?

फ़िरदौस ने उसे अपनी दोनों बाहों में प्यार से समेटते हुए कहा ,

मेरी पगली सहेली , अरे , अल्ला मियाँ ने बड़े सोच कर लड़की की ज़ात को इजात किया होगा । बस उसे उड़ने को पर भी दे देता तो कितना अच्छा होता । हम भी इन कबूतरों की तरह पैरों की चूड़ियाँ निकाल फुर्र से उड़ जातीं ।

इस बात पर दोनों सहेलियाँ खिलखिलाकर बहुत देर तक हँसती रहीं । तभी अम्मा की पुकार ने उसमें विध्न डाल दिया ,

अरी , बेशर्मों , कोई लाज – लिहाज़ है कि नही ? बे लगाम घोड़ियों की तरह इतनी रात को छत पर बैठी हँसी-ठट्ठा कर रही हैं , चलो उतरो नीचे ।

दोनों सहेलियाँ होंठ दबाए हँसती हुईं अपने-अपने घर की ओर भागीं ।

अगले दिन से गायत्री कॉलेज के अपने अंतिम वर्ष की पढ़ाई में जुट गई और अम्मा उसके लिए नया रिश्ता ढूँढने में । मैट्रो से उतर कर गायत्री अब हर रोज़ बाऊजी के पास दुकान पर पहुँच जाती थी । कभी उनका एकाउंट संभालती तो कभी ग्राहकों के आने वाले फ़ोन । दीनदयाल जी को बड़ा सहारा लग रहा था , लेकिन पत्नी को पता चला तो क्या होगा इसका अंदाज़ा था उन्हें । अम्मा से ये सब छिपा कर रखा गया था । आस-पास के दुकानदारों ने पहले-पहल तो खूब खुसर-फुसर की फिर दीनदयाल जी से पूछने भी लगे ,

क्या बात है बाऊ जी अब बेटे की जगह बेटी को दुकानदारी संभलवाने का इरादा है क्या ?

पहले तो दीनदयाल जी उनकी बातों पर सिर झुका कर कोई जवाब न देते थे और गायत्री को भी बोलने से रोकते रहते थे लेकिन एक दिन उनकी बर्दाश्त का बाँध टूट गया और दुकान के बाहर खड़े होकर ज़ोर से बोले ,

क्यूँ जी आपकी भी तो बेटियाँ हैं , उन्हें क्या पर्दे में रखने का इरादा है या , बेटी पढ़ाओ , बेटी बचाओ का नारा यूँही सरकार ने दे दिया है ? अपनी बेटियों के साथ तुम लोग जो जी में आए करो , मेरी बेटी वही करेगी जो वो चाहेगी । अगर बेटा दुकनदारी नही करना चाहता और बेटी करना चाहती है तो करे । मेरी बेटी में तो दम है वो कर के दिखाएगी दुकनदारी ।

सुनते ही सब चुपचाप अपनी – अपनी दुकानों में घुस गए । लेकिन अब ये बात यहीं तक तो रहनी नही थी , पहुँच गई बल्लीमरान की गली कासिम जान में और गली से होती हुई दीनदयाल जी के घर में । बस फिर क्या था , घर में पहुँचते ही भूडोल गई , अम्मा ने चंडी का रुप धर लिया ,

अब इसका ब्याह होना मुश्किल है , बिठाओ दुकान पे । सारी बिरादरी में बातें बन रही हैं , कौन रिश्ता आएगा इसके लिए !  

बाऊजी ने बड़े प्यार से अम्मा को बैठाया और समझाया कि तसल्ली रख सब ठीक हो जाएगा । पर अम्मा तो सिर बाँधकर पड़ गईं और रोती रहीं । दिन छिपने को आया लेकिन अम्मा ने बिस्तर नही छोड़ा । तभी किसी ने बाहर का दरवाज़ा खड़काया ,

कोई है क्या घर में ? दीनदयाल जी , घर में हैं क्या ?

दीनदयाल जी दालान में बैठे विचार कर रहे थे कि पत्नी को कैसे मनाएँ । उन्हें तो जैसे आए गए की कोई ख़बर ही नही थी । गायत्री ने दौड़कर दरवाज़ा खोला तो सामने एक भले से अजनबी को खड़े पाया ,

मैं अंदर आ जाऊँ क्या बेटी ? मुझे दीनदयाल जी से मिलना था ।

गायत्री ने तुरंत उन्हें अंदर बुलाकर बाऊजी को आवाज़ लगाई ,

आप आईए , बाऊजी कोई मिलने आया है आपसे ।

उन्हें बैठक में बैठा वो पानी लेने चली गई , अब घर में इतना तूफ़ान हो और कोई अजनबी आ जाए तो बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती है । बाऊजी अपरिचित सा भाव लिए बैठक में पहुँचे तो अवाक रह गए । सामने मूलचंद मसालेवाले खड़े थे । बाज़ार में बड़ा नाम था उनका , नाम ही नही काम भी बड़ा था । इतना बड़ा व्यापारी उनके घर कैसे आया सोच ही रहे थे कि मूलचंद जी बोल पड़े ,

दीनदयाल जी मैं आपसे एक बड़ी ज़रुरी बात के लिए मिलने आया हूँ । बात कुछ पर्सनल थी तो सोचा घर ही चल पड़ूँ ।

बाऊजी हाथ जोड़ बोले ,

अजी धन्यभाग हमारे , बैठिए ना । अरी गायत्री , पानी ला बिटिया ।

गायत्री पानी लाई तो वो बोले ,

ये बिटिया है आपकी ? जो आजकल दुकान पर बैठती है आपके साथ ?

दीनदयाल जी थोड़े सकपका से गए ,

जी , इसकी ज़िद थी कि दुकान पर बैठकर मेरा हाथ बंटाएगी । कई बार बच्चों की ज़िद के सामने बड़ों को झुकना ही पड़ता है लेकिन इसकी अम्मा को ये सब बिल्कुल पसंद नही है ।

मूलचंद जी मुस्कुराते हुए गायत्री को देख रहे थे ,

बड़ी बहादुर है आपकी बिटिया और काबिल भी ।

इस बीच गायत्री चाय बनाने चली गई । अम्मा अभी भी जस की तस पड़ी थीं । मूलचंद जी ने कहा ,

अगर आप बुरा ना मानें तो एक बात कहनी थी ।

ये सुनते ही दीनदयाल जी का दिल धड़कने लगा , कहीं गायत्री का दुकान पर बैठना कोई मुसीबत खड़ी तो नही कर देगा । फिर भी दबी सी ज़बान से बोले ,

ना ना , बुरा क्या मानना , कहिए ना ।

आपकी बिटिया का हाथ अपने बेटे भास्कर के लिए माँगने आया था । ऐसी होनहार बेटी घर आ गई तो मेरे बिज़नस में चार चाँद लग जाएँगे ।

कहते हुए मूलचंद जी उनका चेहरा देखने लगे कि क्या भाव आते हैं । दीनदयाल जी के चेहरे पर तो इतने रंग आ रहे थे कि मूलचंद जी समझ ही नही पा रहे थे कि वो इस संबंध से खुश हैं या दुखी । इसी बीच गायत्री चाय ले आई थी , मूलचंद जी गायत्री को बड़े प्यार से निहार रहे थे । दीनदयाल जी ने मूलचंद जी का चेहरा देखते हुए खोई आवाज़ में बेटी से कहा ,

जा बेटा अपनी अम्मा को बुला ला ।

गायत्री के हाथ की ट्रे काँप गई , भला ये बाऊजी क्या कह रहे हैँ ? अम्मा तो कोप भवन में सिर बाँधे पड़ी थीं । ततैयों के छत्ते में कौन हाथ डालेगा ? कम से कम वो तो नही । क्या पड़ी थी बाऊजी को उन्हें आए – गए से मिलवाने की । जब वो नही हिली तो दीनदयाल जी ने थोड़ी संभली आवाज़ में कहा , शायद अब तक वो इस नए , अचानक हुए अप्रत्याशित घर में आई पुरवा हवा के झोंके का आनंद अनुभव कर रहे थे ,

अरे , देखती क्या है ? अच्छा ठहर मैं ही जाकर बुलाता हूँ ।

कुछ खिसयाते से बोले कहीं मूलचंद जी को थोड़ी देर पहले घर में आए भूचाल का आभास न हो जाए ,

दरअसल , गायत्री की अम्मा की कुछ तबीयत खराब थी सो लेटी हैं ।

इससे पहले कि मूलचंद जी कुछ कहते वे तेज़ी से निकल गए । जाकर मूँह ओढ़े लेटी पत्नी से बड़े प्यार से बोले ,

भागवान उठो , आज तो तुम्हारे मन की हो गई । मूलचंद जी मसाले वाले आए हैं अपनी गायत्री का रिश्ता लेकर ।

ये सुनते ही उनकी धर्मपत्नी को तो जैसे करंट लग गया , चादर दूर फैंक , खड़ी हो गईं । बड़ी-बड़ी आँखें फाड़े पति को देखती हुई बोलीं ,

क्या कहा ! मूलचंद जी मसाले वाले , अपनी गायत्री का रिश्ता माँगने आए हैं !

साथ ही अपनी बिखरी हालत को संवारती हुई वो ऐसी फुरती से रसोई की ओर भागीं जैसे आज ही रिश्ता पक्का हो जाएगा ।

मूलचंद जी की उसदिन अम्मा ने खूब खातिरदारी की । गायत्री और बाऊजी ये देखकर हैरान थे कि इतनी फुर्ती उनमें अचानक कहाँ से आ गई । उनके जाने के बाद बाऊजी गायत्री से पूछने लगे ,

बोल बेटा क्या तुझे रिश्ता मंज़ूर होगा ? मैंने इनका लड़का देखा है , लंदन से पढ़कर आया है और विज़नेस में नए-नए तरीके अपना रहा है तभी तो इनका बिज़नेस इतना अच्छा हो गया ।

इससे पहले कि वो कुछ कहती अम्मा बिफर पड़ीं ,

अब इसकी एक नही चलेगी । ऐसा रिश्ता घर चल कर आया है तो इसे क्या ऐतराज़ होगा भला ।

पर गायत्री कब चुप रहने वाली थी ,

बाऊजी मैं लड़के से मिले बिना कोई फैसला नही करने वाली फिर चाहे वो मसाले वाले हों या घी-मक्खन वाले । लड़का बौड़मदास निकला तो ?

अम्मा ने बड़ी – बड़ी सुनाई लेकिन बाऊजी ने उसकी बात मान कर मूलचंद जी के यहाँ संदेश भिजवा दिया कि लड़की लड़के से मिलना चाहती है । बात उन्होंने तुरंत मान ली क्योंकि लड़का भी यही चाहता था । लड़का-लड़की की इच्छा अनुसार दोनों घर में नही , कहीं बाहर मिले । गायत्री ने लड़के का पूरा इंटरव्यू ले डाला ,

मेरे काम करने में आपको ऐतराज़ तो नहीं , आपकी माँ को सुंदर – सुशील कन्या तो नही चाहिए ? और न जाने क्या – क्या । भास्कर बड़ी शांती से उसके हर सवाल का जवाब देता रहा और मुस्कुराता रहा । आखिर में उसके बोलने की बारी आई ,

अब मैं कुछ पूछ सकता हूँ आपसे ?

गायत्री ने हाँ में सिर हिला दिया । भास्कर उसे देखते हुए बोला ,

अगर आपको अपने सवालों के जवाब मिल गए हों तो क्या मैं आपसे एक सवाल पूछ सकता हूँ कि क्या आप मुझसे शादी करना पसंद करेंगी ? मैं तुम्हें सॉरी आपको बहुत दिनों से आपके बाऊजी की दुकान पर काम करते देख रहा था और तभी सोच लिया था कि शादी करनी है तो बस ऐसी ही लड़की से ।

गायत्री ने शरारत से उसे देखते हुए कहा ,

अच्छा जी आप चुपके – चुपके नज़र रखे थे हम पर । 

गायत्री को भास्कर में अपने जीवन साथी के सपने दिखाई दे रहे थे । उस रात जब वो छत पर गई तो फ़िरदौस को सारी कहानी कह सुनाई । दोनों सखियाँ देर तक बातें करती रहीं । आज उसे घर में बड़ी शांति लग रही थी अम्मा बड़ी देर से बाऊजी के कानों में खुसर-फुसर करने में लगीं थीं । गायत्री का जवाब उन्हें मिल गया था कि लड़का उसे पसंद है । जब वो कबूतरों को दाना खिलाने लगी तो फ़िरदौस ने जाली में से एक सफ़ेद दूध जैसी पंख फैलाए मशकली को निकाल कर उसके सामने कर दिया । उसने बताया कि इसे उसके अब्बा कल ही ख़रीद कर लाए थे । पंख फैलाए , उड़ान को तैयार मशकली कितनी खूबसूरत लग रही थी । रिफ़त चाचा ने उसके पैरों में चूड़ियाँ भी नही पहनाई थीं ये देख कर निशा के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई । गली कासिम जान में एक बार फिर इंकलाब की हवा बह रही थी ।

 

सज़ा-ए-मौत

सज़ा-ए-मौत

वो सलाखों के पीछे ज़मीन पर नंगे पाँव , घुटनों को समेटे बैठा था । कानों को ढकते , माथे पर आए उसके उल्झे , घने , मटमैले बाल बिखरे हुए थे , पता नही वे काले थे या भूरे थे । हाँ…समय की धूल से कुछ-कुछ सफ़ेदी भी लिए थे । टखनों से ऊपर तक आती चुस्त पैंट धूल से सनी थी । लंबे कॉलर वाली छींट की , पूरी बाज़ू की मैली कमीज़ के कुछ बटन टूटे थे तो कुछ लापरवाही से खुले थे जिसमें से उसकी चौड़ी छाती झाँक रही थी । उसकी तीखी नाक और बड़ी-बड़ी काली आँखों के ऊपर घनी भँवें तनी हुई थीं उसका रंग शायद गोरा होगा । उम्र लगभग बाईस – तेईस साल की रही होगी । बाहर डंडे खड़काता पुलिसवाला पहरा दे रहा था । उसकी कोठरी में मध्यिम रोशनी का बल्ब जल रहा था । कोठरी के ऊपर छोटा सा सलाखों वाला रोशनदान था जहाँ से धूप तो नही आती थी लेकिन कभी-कभी चक्कर लगाता चाँद ज़रुर दिख जाता था । आज उसने भी उसका साथ छोड़ दिया था और न जाने कहाँ छिप गया बिल्कुल उसके अपनों की तरह , शायद आमावस थी । उसके जीवन में भी तो अमावस का अंधकार छा गया था , तभी हवलदार ने उसकी कोठरी की सलाखों पर डंडा खड़काया ,

ओए , सो जा , कल तेरी कोर्ट में तारीख़ है , सज़ा सुनाई जागी , जल्दी उठणा है ।

ये सुनते ही उसके सिर की नसों में खिंचाव आ गया , अगर उसके बाऊजी ने पुलिस को ख़बर न की होती तो आज वो आज़ाद होता । यही सोचकर तो वो घर गया था कि बाऊजी उसे बचा लेंगे , बीजी उसे कुछ नही होने देंगी , आखिर मैं उनका बेटा हूँ । वो अभागी रात याद आ रही थी जब वो रात को खाना खाने के बाद रोज़ की तरह अपने यार-दोस्तों के साथ कॉलोनी के नुक्कड़ वाली पान की दुकान पर सुट्टा मारने गया था , ये उसका रोज़ का नियम था । घरवालों को क्या पता था कि वो किन-किन आदतों का आदि होता जा रहा था । बाऊजी ने उस दिन चलते हुए उससे कहा था ,

देख शुभ , तेरी बहनें शादी लायक हो रही हैं , अब तू ये आवारा लड़कों के साथ नुक्कड़ पर मत खड़ा हुआ कर । पुत्त संगत अच्छी रखणीं चाईदी है ।

बाऊजी की ये बातें हर रोज़ की थीं , कोई नई बात तो नही थी । वो पाँच बहन-भाईयों में सबसे बड़ा था । नंदकिशोर शर्मा नंगल के रहने वाले थे और जवानी में सुभाषचंद्र बोस से प्रभावित हो आज़ाद हिंद फ़ौज में भरती हो गए थे । बर्मा जाने से पहले माँ-बाप ने शादी करदी । नई नवेली दुल्हन को छोड़ देश के लिए बोस की पुकार से खून में उबाल आ गया । चौदह साल तक उनका कोई पता नही था । देश आज़ाद हो गया लेकिन वो लौट कर नही आए , घर वालों ने मान लिया कि अब वो कभी वापस नही आएगा । दुल्हन ने विधवा का रुप धार लिया । बहू को देख कर सास – ससुर आज़ादी का जश्न न मना सके , बेटा जो आज़ादी की भेंट चढ़ चुका था ।

तभी अचानक एक तार ने सब कुछ बदल दिया , नंदकिशोर ज़िंदा है और घर आ रहा है ये सुनकर पिता सारे गाँव में ख़बर दे आए । उनका राम चौदह साल बाद घर लौट रहा था । सास ने बहू का फिर से श्रृंगार किया , पिता बैंड-बाजा लेकर बेटे को लेने स्टेशन पहुँचे । ट्रेन से उतरते बेटे को देखकर पिता दिल पर काबू न रख पाए और धड़कनें थम गईं ।

बेटा घर तो आया लेकिन पिता की अर्थी के साथ । माँ और बहू समझ नही पा रहे थे कि आँसू किसके लिए बह रहे थे ।

जब शुभ पैदा हुआ तो बाऊजी ने बड़े लाड़ से उसका नाम रखा था ‘शुभ’ । उन्हीं बाऊजी ने उसे पुलिस के हवाले करते हुए एक बार नही सोचा । उसने सब सच बता दिया था उन्हें , वो उस दिन बहुत डर गया था जब उनके साथियों में से एक साथी राजेश का कत्ल हो गया था । वो तो सिर्फ़ उनके बीच किसी लड़की को लेकर हुई लड़ाई को रोक रहा था कि भीमा और शंकर ने कब उसके पेट में छुरा घोंप दिया और राजेश ने उसके हाथों में दम तोड़ दिया था । ये देखते ही सब भाग खड़े हुए तो घबराकर वो भी राजेश को वहीं छोड़ कर भाग गया । सब फ़रार घोषित कर दिए गए और नंदकिशोर शर्मा जी को छोटे बेटे रवि के साथ सारी रात थाने में बिठाए रखा था । रवि अभी स्कूल में पढ़ रहा था लेकिन पुलिस ने कुछ नही देखा और पूछताछ करते रहे । नंदकिशोर जी ने पुलिस को आश्वासन दिया कि वो सच्चे देशभक्त हैं , धोखा नही देंगे , जैसे ही शुभ उन्हें मिलेगा वो ख़ुद उसे पुलिस के हवाले कर देंगे । उन्होंने वही किया जब एक रात किसी ने घर का दरवाज़ा खटखटाया तो नंदकिशोर जी ने ही दरवाज़ा खोला , सामने शुभ खड़ा था । वो घबराया हुआ था , उसने सारी वारदात बाऊजी को सुनाई थी । बाऊजी ने कहा था ,

देख , अगर तू बेकसूर है तो क्यों डरता है ? पुलिस को सब बता देना ।

ये कहते हुए उन्होंने पुलिस को फ़ोन कर दिया था । वो बहुत गिड़गिड़ाया था , बाऊजी के पैरों में पड़कर माफ़ी माँगी थी । जब वो नही माने तो शुभ ने भागने की कोशिश भी की थी लेकिन बाऊजी ने पुलिस के आने तक उसे कमरे में बंद कर दिया था । बहनें , माँ सब रोते रहे लेकिन बाऊजी ख़ामोश खड़े थे ।

बाकी दो फ़रार अभियुक्त अभी तक हाथ नही आए थे । पुलिस के डंडे उसकी कमर तोड़ रहे थे , टाँगे बेजान हो रही थीं लेकिन वो यही कहता रहा कि उसने कुछ नही किया , उसने किसी को नही मारा । लेकिन उसकी किसी ने नही सुनी । बाऊजी की देशभक्ति ने उसे क्या दिया ? उनके लिए तो कानून , सच का साथ देगा , यही सच था । उसे बाऊजी की देशभक्ति पर गुस्सा आता था , उसका दिल बागी बन जाता था , जो बाऊजी कहते उसका उल्टा करता था । फिर भी बाऊजी ने उसे बेगुनाह मान लिया लेकिन उसके पास कोई गवाह नही था जो उसे बेगुनाह साबित कर सके ।

तभी कांस्टेबल ने दरवाज़ा खोलकर एक बाल्टी पानी का रख दिया । उसने सिर उठाकर देखा उसके हाथ में सफ़ेद , नीली धारीदार कपड़े थे । कपड़े एक ओर फेंकता हुआ बोला ,

, हीरो , अपना थोबड़ा धोले , अर यो कपड़े पहर ले , आज कोर्ट में हाज़िर होणा है ।

उसे पता नही कि आज कोर्ट में क्या फ़ैसला सुनाया जाएगा । पंद्रह दिन हो गए थे उसे पुलिस रिमांड में , न वो खाता था , न वो सोता था । मन-मस्तिष्क दर्द से टूट रहे थे । उसे याद आ रहा था जब एक दिन स्कूल में उसकी कुछ लड़कों से लड़ाई हो गई थी । दरअसल एक लड़के ने उसकी छोटी बहन माणों को पटाखा कह दिया था । बस वो टूट पड़ा था उस लड़के पर , इस मारा-पीटी में उसकी भी खूब पिटाई हुई थी । माणों उसकी लाडली बहन , उसे कोई कुछ कह दे , वो कैसे बरदाश्त कर सकता था । जब घर आया तो बीजी देखकर कितना रोई थीं । दूध हल्दी पिलाया और सिर पर हाथ फिराते हुए कितनी बार उसे चूमकर कहती रहीं ,

पुत्त , एंज नहीं किया कर , तेरा गुस्सा कम कर । गल्ल नाल बात बणाया कर , मार-पिटाई चंगे बच्चेयाँ दा काम नही ।

दिल में टीस सी उठी और गला भारी होने लगा कि तभी सलाखों पर फिर डंडा खड़का ,

चल बाहर निकल , भाई….टैम हो गया कचहरी का ।

हवलदार ने पुकारा तो बोझिल आँखों से उसकी धुंधली सी छाया देख कर वो डगमगाते कदमों से कोठरी के बाहर आ गया । उसकी लंबी काया पर सफ़ेद धारीदार पायजामा टखनों से ऊपर चढ़ा हुआ था , कमीज़ उसके चौड़े कंधों पर कसी हुई थी । उसकी धीमी चाल देख पुलिसवाला उसे धक्का देकर चिल्लाया…

तेरे पाँह ना उठते के , भैंण….. ।

ये सुनते ही शुभ एक मिनट ठहरा और हवलदार को अपनी लाल आँखों से घूर कर देखा । तभी एक ज़ोर का ठुड्डा लगाते हुए हवलदार ने एक और गाली फैंकी…..

देखिए…किसे दिद्दे पाड़ै… , साल्ड़े…खा गा मनै ?

शुभ का बस चलता तो वो सचमुच उसे खा जाता । बहन की गाली दी !! उसने अपने आप को पुलिस की गाड़ी में डाल दिया था । रास्ते में कई बार दिल में आया कि चलती गाड़ी से कूद जाए लेकिन दोनों ओर से दो पुलिसवालों ने उसे बाँधा हुआ था । आस-पास से गुज़रते लोग उसे खतरनाक खूनी की तरह भयभीत नज़रों से देख रहे थे !  उसे उनकी नज़रों से डर लग रहा था । एक विचार आता कि काश उस दिन उसने बाऊजी की बात सुनी होती और नुक्कड़ पर न गया होता तो उसे आज ये दिन न देखना पड़ता । बाऊजी या बीजी ने अपने बच्चों को मारना तो दूर कभी ऊँची आवाज़ में भी बात नही की थी । तीनों बहनें अपने वीरे पर जान छिड़कती थीं । छोटा भाई रवि कभी अपने बड़े भाई से आँख मिलाकर बात नही करता था । फिर वो ऐसा कब हो गया पता नही , कैसे देशभक्त बाऊजी और सीधी – सादी बीजी का बेटा कब ऐसा बन गया ? उसे पूरा विश्वास था कि आज कोर्ट में बाऊजी ज़रुर बोल देंगे कि उनका बेटा खून कर ही नही सकता , जज साहब उनकी बात मानेंगे , क्यूँ नहीं मानेंगे भला ? वो देश के लिए लड़े हैं , कितने कष्ट उठाए हैं ! वो फिर से घर जाएगा , इस बार वो बाऊजी की हर बात मानेगा ।

जीप एक झटके से रुकी और वो कोर्ट के अंदर था । वो बंधे हाथों से पुलिसवालों के बीच चल रहा था , उसकी निगाहें कोर्ट की भीड़ में बाऊजी को ढूँढ रही थीं । उसे एक कमरे के बाहर बैंच पर बैठा दिया गया था , वो अपनी पुकार का इंतज़ार कर रहा था । पसीने कान से होते हुए गरदन को भीगो रहे थे , गला सूख रहा था । उसने अपने पास खड़े पुलिसवाले को पुकारा जो अपने साथी से बतियाने में मस्त था ,

साहब , बहुत प्यास लगी है , थोड़ा पानी मिलेगा ?

पुलिसवालों की बातचीत में खलल आ गया था , उसने त्यौंरियाँ चढ़ा कर कुछ चिढ़ते हुए कहा ,

तू म्हारा साब , चाल , उठले , वो रा कूलर ।

वो उसे कूलर तक ले गया , बंधे हाथों से ओक बनाकर पानी पीया तो राहत मिली , थोड़ा पानी उसने अपने मुँह पर छिड़क लिया । फिर अपनी जगह ऊँगलियों को ज़ोर-ज़ोर से दबाता , चटकाता हुआ बैठ गया , उसकी नज़रे  भीड़ में बाऊजी को ढूँढती , उठतीं और गिरती रहीं । एक-एक पल भारी पत्थर सा उसके दिल को दबा रहा था और वो गहरे डूबता जा रहा था । तभी उसके नाम की पुकार हुई ,

शुभ शर्मा हाज़िर हों ।

अपना नाम सुनकर उसका दिल टप्पे खाती गेंद की तरह छाती को धकेल रहा था , पैर उठ नही रहे थे । पुलिसवाले लगभग धसीटते से उसे भीतर ले गए । आस-पास का शोर उसे सुन्न बना रहा था । सामने जज बैठा था और उसके बराबर में सरकारी वकील खड़ा था । इधर-उधर कुर्सियों पर लोग बैठे थे जिनके केस शायद उसके बाद लगे थे , भीड़ उनके साथ आए रिश्तेदारों ने बढ़ा दी थी , वो भीड़ शुभ के लिए बेगाने , अंजान चेहरों से भरी थी । सरकारी वकील ने उसका केस पढ़ा और कहा ,

मिलोर्ड , ये साफ़-साफ़ कोल्ड ब्लडेड मर्डर का केस है । इसके दो साथी शंकर और भीमा अभी भी फ़रार हैं , इसे पुलिस की मुस्तैदी के कारण पकड़ लिया गया । गली के इन गुंडों ने कॉलोनी में लड़कियों का आना-जाना दूभर कर रखा था । ये समाज के वो दीमक हैं जिनको अगर समय रहते नही रोका गया तो समाज की जड़ें कमज़ोर पड़ जाएँगी । इन्हें सख़्त से सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए । शुभ शर्मा जैसे मुजरिम समाज के लिए खतरा हैं ।

शुभ कुछ सुन रहा था , कुछ खोज रहा था कि तभी उसकी सफ़ाई पूछी गई , वो लड़खड़ाती ज़बान से भीड़ में खोए बच्चे की तरह अपने बाऊजी को ढूँढ रहा था , जो उसे कहीं नज़र नही आ रहे थे । वो रूँधे गले से बस इतना कह पाया ,

जज साहब मैंने कुछ नही किया मैं तो उसे संभाल रहा था । वो मेरा दोस्त था , मैंने उसे नही मारा , मैंने उसे नहीं मारा……..

वो कहता रहा और रोता रहा , थोड़ी देर बाद उसे पुलिसवाले पकड़ कर बाहर ले जा रहे थे , वो चल कहाँ रहा था , उसे तो वो धकेल रहे थे । तभी उसकी नज़र एक धुंधली सी छाया पर पड़ी , कुछ साफ़ हुई…… वो उसके बाऊजी थे , थके हुए , उदास । वो एक पल रुका उसकी नज़रें उनसे मिलीं , और वो मुड़कर मंद गति से आगे चले गए । बगल में चलते पुलिसवाले की कमर में लगी पिस्टल निकाल कर अपने को ख़त्म करने का दिल किया , लेकिन उसके भीतर कुछ भी करने की ताकत नही थी , मरने की भी नही । उसे दूसरी जेल में ले जाया जा रहा था , जहाँ और भी अनगिनत सलाखों के पीछे अपनी किस्मत के फ़ैसले का इंतज़ार कर रहे थे । अब वो भी उनमें से एक नंबर बन गया था , शुभ बहुत पीछे छूट गया था । शाम को मिलने के समय में बहुत से कैदियों के रिश्तेदार उनसे मिलने आ रहे थे । उसे पता था कि उससे मिलने कोई नही आने वाला । हवलदार ने उससे चुटकी ली थी ,

क्यूँ रे हीरो तेरा कोई रिश्तेदार ना है के ?

उसने अपना सिर झुका लिया था , खोया सा सलाखों को घूरता रहा , जहाँ उसे शायद अब जीवन भर रहना होगा या उसे फ़ाँसी की सज़ा हो जाएगी । कितना अच्छा होता जो उसे आज ही फ़ाँसी की सज़ा सुना दी जाती । तभी हवलदार ने उसकी कोठरी पर डंडा खड़काया ,

चाल भाई तेरा छोटा भाई तेरे तै मिलण आया है , राजी होजा ईब ।

शुभ को विश्वास नही हो रहा था , उसे लगा वो उसके साथ मज़ाक कर रहा था । रवि भला यहाँ , इस जगह मुझसे मिलने कैसे आ सकता था ? वो तो अभी स्कूल में , बारहवीं में पढ़ रहा था , उसे बाऊजी यहाँ कभी नही भेजेंगे । वो अभी अपने सवालों में उल्झा हुआ था कि उसके सामने रवि खड़ा था । उसका छोटा भाई , रवि ! दिल किया उससे लिपट जाए , लेकिन नही ! रवि ने हकलाते हुए , कुछ डरते हुए कहा…

भैया , मुझे बाऊजी ने आपसे मिलने भेजा है । आप चिंता ना करना , बाऊजी कोई वकील करेंगे और आपको छुड़ा लेंगे ।

ये कहते हुए एक टिफ़िन उसने आगे करते हुए कहा ,

ये बीजी ने आपके लिए भेजा है ।

शुभ की आँखों की कोर से गरम , गीला पानी ढुलक रहा था । उसने काँपते हाथों से टिफ़िन पकड़ लिया । उसे अपना वकील करने का मौका दिया गया था । बाऊजी उस दिन कोर्ट में मौजूद थे फिर भी मिले क्यों नही । ये सोचकर उसके दिल में एक चुभन सी हुई और पलट कर रवि को देखते हुए सख़्ती से बोला ,

तू जा यहाँ से , ये जगह तेरे लिए नही है ।   

रवि अपने बड़े भाई की बात सुनकर धीरे से मुड़ा तो शुभ की आवाज़ फिर आई ,

और सुन , अब कभी मत आना यहाँ , अब जा तू , दिल लगा के पढ़ना । अच्छा !

ये बड़े भाई की आवाज़ थी , रवि ने मुड़कर भाई को देखा और हाँ में सिर हिलाते हुए तेज़ी से बाहर निकलने लगा । बाहर आकर उसने गहरी , लंबी साँस ली । वो क्यूँ डर रहा था , उसे पता नही , पर वो डर रहा था । क्या भैया कभी वापस नही आएँगे ? ये लोग कहते हैं कि उन्होंने अपने दोस्त को जान से मार डाला ! नही , भाई कभी किसी को नही मार सकते । वो तेज़ कदमों से बस स्टॉप पर पहुँच गया ।

शुभ , ने बीजी का भेजा हुआ डिब्बा खोला , उसकी पसंद की दाल मखनी , पालक पनीर और आटे का हलवा देख कर उसने अपना मुँह घुटनों में दे दिया । रोते-रोते आवाज़ रोक नही पाया और बच्चों की तरह बिलखने लगा । उसकी आवाज़ सुनकर गालियाँ देने वाला हवलदार भी नर्म होकर बोला ,

ओए , तू किस्मत वाला है कि घरवाले रोटी भेज रहे हैं वरना यहाँ कौन किसको याद करता है ? तू भले घर का बंदा लगता है नही तो घरवाले भी दूर भागते हैं , रो मत , चल खाले रोटी ।

बीजी के हाथ की नरम-नरम रोटियाँ बिल्कुल उनके हाथों सी नरम होती थीं । आज कितने दिनों बाद उनके हाथ की रोटियाँ खाने को मिली थीं , उनसे देसी घी की सुगंध उसे बीजी की और याद दिला रही थी । हमेशा खाना खाते हुए रसोई में उनके पास बैठ जाता था और बीजी प्यार से एक – एक गरम फ़ुल्का उसकी थाली में डालतीं ,

पुत्त घ्यो खाया कर , जवान बच्चे नूँ तगड़ा होणा चाईदा है ।

कहती हुई वो उसकी दाल में चम्मच भर कर घी डाल देतीं । यादों के साथ , रुँधे गले से हर कौर धीरे-धीरे गले से उतर रहा था । अगले दिन सुबह दस बजे के करीब एक वकील उससे मिलने आया ,

मैं तुम्हारा वकील हूँ , मुझे शर्मा जी ने सब बताया लेकिन मैं अब तुमसे सच्चाई जानना चाहता हूँ । मुझे सब सच बताओगे तो मेरे लिए केस लड़ना आसान होगा ।

शुभ ने एक बार फिर सारी कहानी वकील साहब को सुनाई कि किस तरह वो पास खड़ा था जब राजेश और शंकर में बहस हो गई , भीमा भी शंकर का साथ दे रहा था । बहस होते – होते झगड़े में बदल गई थी , बात किसी शिवानी नाम की लड़की को लेकर थी । वो दोनों एक ही लड़की को चाहते थे , लड़की शायद राजेश को पसंद करती थी । बस बात बढ़ते-बढ़ते हाथा-पाई तक आ गई और शंकर ने पलभर में ही जेब से चाकू निकाल कर उसके पेट में घोंप दिया । शंकर के दोस्त भीमा ने राजेश को पकड़ रखा था , मैं उन्हें रोकना चाहता था लेकिन वो दोनों भाग गए और राजेश वहीं गिर गया , मेरी बाँहों में । मैं उसे उठाने लगा कि तभी किसी ने पुलिस को ख़बर कर दी थी , मैं बहुत डर गया था । बिना सोचे – समझे मैं भी वहाँ से भाग गया । पूरी बात सुनाकर उसने एक लंबी , गहरी साँस ली मानों कई दिन से उठाया बोझ सिर से उतार दिया था । वकील साहब की ओर उम्मीद से देखता हुआ बोला ,

बस वकील साहब यही मेरी ग़लती थी ।

वकील उसे लगातार घूर रहा था जिससे वो थोड़ा सकुचा कर इधर-उधर देखने लगा । अचानक वकील ने अपना फोल्डर उठाया और खड़ा हो गया ,

आई होप , तुमने मुझसे कुछ छिपाया नही होगा । अपनी बातों पर डटे रहना , किसी से घबराना नही , मैं फिर मिलता हूँ ।

वकील साहब चले गए और शुभ के भीतर एक उम्मीद छोड़ गए । आज वो हल्का महसूस कर रहा था , कोठरी के भीतर थोड़ा सा दिखता चाँद भी उसकी कोठरी को ऱोशन कर रहा था । बीजी के हाथ की खाई रोटियों के बाद दो-तीन दिन तक उसे भूख ही नही लगी , जेल का खाना देखते ही जी भर जाता ।

उसके मना करने पर भी रवि कभी-कभी उससे मिलने आता रहा और बीजी के हाथ का खाना भी लाता रहा । वकील साहब से उसकी मुलाकातें होतीं , वो उसे केस के बारे में समझाते , उसे कोर्ट में कैसे और क्या बोलना है सब बतलाते । केस चलता रहा , कई महीने गुज़र गए । पता चला कि फ़रार शंकर और भीमा पकड़े गए , अगली सुनवाई में उनका भी बयान होना था जो शुभ की किस्मत का फ़ैसला बदल सकता था । उसे जेल में लगभग साल होने को था लेकिन अभी तक कुछ फ़ैसला नही हो पाया था । केवल तारीख़ें थीं और लोगों के बयान थे , वकीलों की बहस थी । फिर एक दिन वकील साहब ने बताया कि उसकी अगली तारीख़ में उसकी सज़ा सुनाई जाएगी । उस दिन जब वो कोर्ट में आया तो भीड़ में उसने अपने बाऊजी को देखा , वो थके हुए , उदास और पहले से अधिक उम्र के लगने लगे थे । पता नही आज क्या होने वाला था , बाऊजी को उसकी चिंता थी तभी तो वो आए थे । वकील की फ़ीस पता नही वो कैसे दे रहे होंगे , कहाँ से इंतज़ाम किया होगा ? ये सब सोचते हुए उसका दिल गहरी उदासी से भर गया । उसे आज बाऊजी पर नाराज़गी नही थी , बल्कि वो शर्मसार हो रहा था , बाऊजी की इस उम्र में ऐसी हालत के लिए ख़ुद को कसूरवार मान रहा था । वो उनसे नज़रें चुराता रहा और बाऊजी भीड़ में गरदन उचका कर उसे ताकते रहे ।

वकीलों की दलीलें और बहस देर तक चलती रही फिर अचानक शंकर और भीमा को पेश किया गया उनके बयान हुए । उन्होंने एक नज़र शुभ पर डाली और वकील साहब की ओर देखकर पहले शंकर बोला ,

जी ये भी हमारे साथ ही था , झगड़ा हम सब का ही हुआ था ।

शुभ हैरान उसका मुँह देख रहा था , वो झूठ क्यों बोल रहा था ? उसका तो किसी से झगड़ा नही हुआ था । भीमा ने भी यही कहा कि वो झगड़े में उनके साथ ही था और उसने ही राजेश को पकड़ रखा था । शुभ के वकील और दूसरे वकीलों के साथ पब्लिक प्रोस्यिक्यूटर की बहस के बाद जज साहब के फ़ैसले का इंतज़ार था । शुभ के लिए एक-एक पल भारी था , तभी जज साहब की आवाज़ से कोर्ट रुम में सन्नाटा छा गया ,

सभी बयानों और चश्मदीद गवाहों के आधार पर शुभ , शंकर और भीमा को उम्र क़ैद की सज़ा दी जाती है ।

ये सुनते ही शुभ के भीतर इतने दिन से दबा तूफ़ान बाहर आ गया वो वहीं ज़मीन पर बैठ कर रोता रहा और कहता रहा ,

बाऊजी मैं सच कह रहा हूँ , मैंने कुछ नही किया , मैंने किसी को नही मारा । ये मेरी बात क्यों नही मान रहे ?

कोर्ट रुम खाली हो गया था , उसे पकड़ कर पुलिस की गाड़ी में बैठा दिया । दूर एक पेड़ के नीचे उसने अपने बाऊजी को सिर झुकाए बैठे देखा था । शायद अब वो कभी बाहर नही आ पाएगा , कभी आज़ाद नही हो पाएगा । उसे उस ज़ुर्म की सज़ा भुगतनी होगी जो उसने किया ही नही । इससे अच्छा होता कि उसे फ़ाँसी की सज़ा हो जाती , एक ही बार में किस्सा ख़त्म होता । बाऊजी को ये ज़िल्लत तो न सहनी पड़ती , अब मेरी बहनों की शादी कैसे होगी , एक मुजरिम की बहनों से कौन शादी करेगा ?

अगले दिन वकील साहब फिर उससे मिलने आए थे । उन्होंने उसे आश्वासन दिया था कि वो ऊपर कोर्ट में जाएँगे , अपील करेंगे । शुभ को अब कोई उम्मीद नज़र नही आ रही थी , वो ख़ामोश उनकी बातें सुनता रहता । एक दिन उसने वकील साहब से बड़ी मायूसी से पूछा ,

वकील साहब आज आप एक बात मुझे सच-सच बताएँगे ?

हाँ पूछो ,

कहते हुए उन्होंने शुभ को सवालिया नज़रों से देखा ।

मेरे बाऊजी , आपकी फ़ीस का इंतज़ाम और घर का खर्च कैसे कर रहे हैं , क्या आप को पता है ? मेरी बहनें , मेरी बीजी , मेरा भाई कैसे हैं ? मैं ये सब किसी से नही पूछ सकता लेकिन ये सवाल मुझे खाए जा रहे हैं । प्लीज़ बताइए ।

कहते हुए शुभ ने उनके पैरों को हाथ लगाया तो वकील साहब ने उसे उठाते हुए कहा ,

मैं सब बताऊँगा तुम्हें । शर्मा जी मेरे लिए पिता समान हैं , मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ । तुम्हारा भाई रवि पढ़ाई के साथ-साथ एक पार्ट टाईम जॉब करता है , तुम्हारी बड़ी बहन को सरकारी नौकरी मिल गई है । छोटी बहन कॉलेज के बाद ट्यूशन पढ़ाती है । चिंता मत करो मैं अपनी फ़ीस उतनी ही लूँगा जितनी शर्मा जी दे पाएँगे , तुम उसकी चिंता मत करो ।

शुभ ख़ामोश सिर नीचे किए बैठा रहा , उसकी एक भूल की सज़ा सारा परिवार भोग रहा था , बस फ़र्क सिर्फ़ जगह का था । वकील साहब जाने लगे तो शुभ ने एक बार फिर उनके पैरों को हाथ लगाया और जल्दी से मुड़ कर अपनी कोठरी की ओर चल दिया । वो जो नही दिखाना चाहता था वकील साहब से छिपा नही था ।

रवि एक दिन इतवार को आया था उसी तरह टिफ़िन लेकर । शुभ ने उसे देखा अब वो गोल-मटोल , लाल गाल वाला रवि नही रहा था । वो बहुत पतला हो गया था आँखों पर मोटा चश्मा चढ़ गया था , उन आँखों में एक गहरी सोच समा गई थी जो साफ़ दिखाई दे रही थी , रंग गहरा गया था । वो एक टक उसे देखते हुए बोला ,

रवि ये क्या हो गया तुझे ? तू कितना कमज़ोर हो गया है । बहुत मेहनत करता है ना ? मैं बहुत बुरा हूँ , तुम सबको सिर्फ़ दुख दे रहा हूँ । बाऊजी को मना कर दे केस लड़ने के लिए , मुझे यहीं रहने दो । 

रवि ने बड़े प्यार से फीकी सी मुस्कान से कहा ,

नही भैया हम केस जीतेंगे , आप चिंता मत करो , आप घर आओगे । मैं भी अब वकालत पढ़ रहा हूँ , कुछ तो समझ रहा हूँ । आप फ़िक्र मत करो , सब ठीक हो जाएगा ।

रवि , शुभ को तसल्ली देने के लिए कह रहा था कि सब ठीक हो जाएगा लेकिन वो ख़ुद नही जानता था कि सब कुछ कैसे ठीक होगा । उधर से राजेश की ओर का वकील कोल्डब्लडेड मर्डर के अपराध में उन्हें फ़ाँसी की सज़ा दिलवाने को तैयार बैठा था । रवि दिन – रात मेहनत कर बड़े से बड़ा वकील कर रहा था । बड़ी बहन सोना की उम्र बढ़ रही थी और साथ ही उसकी खूबसूरती भी । एक ओर तो शुभ को बरी कराने के लिए दौड़-धूप हो रही थी तो दूसरी ओर सोना के लिए एक शरीफ़ लड़के की तलाश । जहाँ भी जाते कोई शरीफ़ घर शुभ का ज़िक्र आते ही पीछे हट जाता और ख़ामोश हो जाते । शुभ की रिहाई से सोना की विदाई का गहरा रिश्ता था , बहन-भाई जो थे । तारीख़ पर रवि जाता और कहीं लड़का देखना होता तो भी बाऊजी के साथ रवि जाता क्योंकि बाऊजी अब बहुत कमज़ोर होते जा रहे थे , अकेले सफ़र नही कर सकते थे । काम का स्ट्रैस भी कम नही हो सकता था , वरना पैसा कहाँ से आएगा ? रवि पच्चीस साल की उम्र में बुज़ुर्ग हो गया था ।

आखिरकार रवि की मेहनत रंग लाई और शुभ को बेकसूर साबित करने में सफ़लता मिली । शुभ घर आया तो सोना की विदाई भी किसी तरह हो गई । सरला और माणों भाई को देख कर सहमी सी रहतीं । शुभ भी एब पहले वाला शुभ कहाँ था , वो खोया-खो सा कमरे में बंद बैठा रहता । उसे आँखों के सामने सिर्फ़ सलाखें दिखतीं , सोता तो कई बार नींद में चौंक कर उठ जाता । जेल में बीजी के हाथ का खाने को तरसता था लेकिन अब न जाने क्यों भूख मर गई थी । एक अपराधबोध दिलो-दिमाग़ पर काले – घने बादलों सा छाया रहता । घर में हाथ बंटाने के लिए काम ढूँढना चाहता था , एक इज़्ज़तदार ज़िंदगी बिताने के लिए काम चाहिए था लेकिन उसका माज़ी उसका पीछा नही छोड़ रहा था । बाऊजी के सामने आने से कतराता , बाऊजी उसकी शर्म समझ रहे थे ।  एक दिन शाम को जब सैर के बाद वो घर लौटे तो शुभ को पुकारा ,

शुभ , यहाँ आ ।

उनकी आवाज़ सुनकर उसके शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई थी । न जाने कितने दिनों बाद बाऊजी के मुख से अपना नाम सुन रहा था । कई बार उसका जी चाहा था कि उनसे लिपट कर खूब रोए लेकिन केवल तनहाई में रोता था । वो आँसू उसके दिल से निकले पश्चाताप के होते थे , अपने बाऊजी को दिए दुख के होते थे , उसके लिए बीजी के बहाए आँसुओं के लिए होते थे , रवि का बचपन छीनने के होते थे , अपनी बहनों को शर्मसार करने के होते थे । बाऊजी की एक और पुकार पर वो बाहर आकर उनके पीछे खड़ा हो गया था । बाऊजी ने महसूस कर लिया था ,

कल ओखला चला जाना , मेरे दोस्त हैं जोशी जी उन्होंने तेरे लिए काम तलाशा है एक एक्सपोर्ट कंपनी में । जाकर मिल लेना उनसे , वो जानते हैं तुझे ।

उसने सिर हिलाकर हामी भर दी थी , बाऊजी समझ गए थे । अगले दिन सुबह जल्दी उठकर तैयार होने लगा तो बाऊजी ने उसके पलंग पर एक नई कमीज़ और पैंट रख दी और साथ में सौ रुपए भी रखे थे । जिस पिता की देशभक्ति से उसे नफ़रत थी और जिनकी हर बात के उलट करने की उसकी आदत बन गई थी , आज वो उनके लिए हर वो काम करना चाहता था जो उन्हें खुशी दे ।

एक्सपोर्ट हाऊस पहुँचा तो वहाँ उसकी मुलाकात उस लड़की शिवानी से हुई जिसकी वजह से राजेश का खून हुआ था । शुभ उसकी नज़र से छिपता रहा लेकिन वो उसका पीछा तब से कर रही थी जब से वो रिहा हुआ था । वो उसी एक्सपोर्ट हाऊस में काम करती थी । शुभ को काम की सख़्त ज़रुरत थी वो अब घरवालों पर और बोझ नही बनना चाहता था इसलिए उसने कुछ नही सोचा और काम पकड़ लिया । शिवानी हर रोज़ खाने के समय उसके पास आ जाती , कुछ दिन तो शुभ ने ज़्यादा बात नही की लेकिन हर रोज़ वही होता , वो बात करने की कोशिश करती ,

शुभ जो भी हुआ मैं उसके लिए कसूरवार नही हूँ । केवल तुम ही नही हो जिसने सज़ा भोगी , मैंने भी भोगी है । समाज में मेरा चलना मुश्किल हो गया था , मेरे परिवार से सब रिश्तेदार दूर हो गए थे ।

उसकी बोतें सुनकर उसका दिल पसीज गया था , उससे सहानुभूति होने लगी थी । धीरे-धीरे वो खुलने लगा लेकिन अपने माज़ी की बात नही करना चाहता था । दोनों साथ खाना खाते , शिवानी उसका इंतज़ार करती , दोनों साथ-साथ बस पकड़ कर घर जाते । दोस्ती गहराने लगी थी , घर में जब ये पता चला तो बाऊजी ने एतराज़ उठाया और उसे अब अलग घर लेकर रहने की सलाह दी क्योंकि बाऊजी अब शुभ को ज़िम्मेदारियों का एहसास कराना चाहते थे और रवि के जीवन को ज़िम्मेदारियों के बोझ से मुक्त कराना चाहते थे । शुभ अलग रहने लगा , एक दिन शिवानी के साथ घर आया तो शिवानी की माँग में सिंदूर था । बाऊजी उसके इस फ़ैसले से बेहद नाराज़ हुए थे पर बोले कुछ नही , बस ख़ामोशी से उसके सिर पर हाथ रख उठ कर बाहर चले गए । बीजी ने भी बहू के हाथ में शगुन के ग्यारह रुपए रखे और अपनी आँखों को भींचकर , फड़फड़ाते होठों से चुप बैठी रहीं । उसके बाद शुभ कभी-कभी अकेला आ जाता था लेकिन शिवानी नही आती थी । शिवानी का कहना था कि उसे यूँही बीच में घसीटा गया , उसकी और उसके परिवार की बदनामी हुई सो अलग । शंकर और भीमा अभी रिहा नही हुए थे इसलिए शिवानी आज़ाद थी । दोनों की गृहस्ति चलने लगी और अब बढ़ने भी वाली थी । शिवानी माँ बनने वाली थी , जब ये बात बीजी को पता चली तो खुशी से पास वाले मंदिर में जाकर माता रानी के चरणों में पाँच रुपए का प्रसाद बोल आईं । अब उनका दिल बहू को पास रखने को ललकने लगा था लेकिन बाऊजी पता नही क्यों इस बात को टाल जाते थे , उनसे कोई ज़िद तो कर नही सकता था । उनकी उन बढ़ती उम्र की हड्डियों में कहीं अभी भी आज़ादहिंद फौज का अंश ज़िंदा था , अपनी बात पर अडिग । चोरी – चुपके से बीजी छोटे-छोटे टोपी , मोज़े और स्वेटर बुनती रहती थीं । शिवानी के लिए कुछ-कुछ खाने का बना कर भेजतीं । उनकी आँखों में एक चमक आ गई थी , आखिर उनके शुभ की ज़िंदगी सँवरने जो लगी थी ।

पंद्रह अगस्त का दिन था , सरकार ने कई कैदियों को आज़ादी दे दी थी । मोहल्ले के लोगों ने शर्मा जी को हमेशा की तरह विशेष अतिथि बनाकर एक कार्यक्रम किया था । बाऊजी हर बार “कदम-कदम बढ़ाए जा” उसी जोश से गाते और मोहल्ले के बच्चे उनका साथ देते । आज भी शर्मा जी सुबह से तिरंगा लिए स्टेज पर चढ़े हुए बच्चों के साथ गा रहे थे ,

कदम-कदम बढ़ाए जा खुशी के गीत गाए जा

ये ज़िंदगी है कौम की तू कौम पे लुटाए जा ।

रवि भीड़ में खड़ा , उमस में पसीने से भीगा हुआ उन्हें एकटक भीगी आँखों से देख रहा था । वो उनका स्टेज से उतरने का इंतज़ार कर रहा था । उसने बाऊजी को हाथ पकड़ कर उतारा और गले लग गया । रवि आज टूट गया था उसके हाथ में आज का अख़बार था , बाऊजी ने कंधे से पकड़कर रवि का मुँह देखा तो चेहरा आँसुओं से भीगा था । रवि ने अख़बार आगे कर दिया । अख़बार के मुड़े पन्ने पर शुभ की फ़ोटो के साथ ख़बर छपी थी ,

“ एक युवक की दिन-दहाड़े गोली मार कर हत्या कर दी गई” हत्यारे फ़रार । ख़बर पढ़ते ही शर्मा जी के हाथ से अख़बार छूट गया । बस रवि से इतना कहा ,

जा पुत्त , शिवानी को घर ले आ ।  

रवि ने उन्हें बताया ,

शिवानी लापता है , पुलिस उसे ढूँढ रही है । बाऊजी हम शुभ को नहीं बचा पाए , उसे ये सज़ा क्यों मिली ?  

शर्मा जी ने रवि के कंधे का सहारा लिया और आसमान की ओर देखा फिर धीरे-धीरे पुलिस स्टेशन की ओर चल पड़े , अपने शुभ की इस आखिरी सुनवाई को अंजाम देने ।

 

माला जोशी शर्मा

 

कल की ही बात है

कल की ही बात थी
कुलांचे भरी थीं , खेत – खलिहानों में ,
हाँ ये कल की ही बात थी कि फ्रॉक से सलवार कमीज़ पर आई थी ।
कल की बात थी कि माँ ने ऊपर दुपट्टा उढ़ा दिया था ,
हाँ ये कल की ही बात थी जब घर के मेहमान ने मुझे कस कर दबोच लिया था ,
बदन छिल रहा था और सिसकी घुट गयी थी ,
वो हँस रहा था और मैं थरथरा रही थी ,
माँ का उढ़ाया दुपट्टा दूर पड़ा उठा नही पाई थी ,
उस मेहमान की खुरदुरी हंसी कभी भूल नही पाई थी ।
उसके लिए घरवालों का लगाव देख , किसी से कुछ कह नही पाई थी ।
हाँ ये कल की ही बात थी कि मैं रातों रात बड़ी हो गई थी ।
माँ का उढाया दुप्पटा भी बड़ा हो गया था ,
ये मत पहन , टाँगें दिखती हैं , ये पहन , छाती नही दिखनी चाहिए तेरी ।
माँ के सवाल और बढ़ती हिदायतें भी याद आई थीं ,
छत पे क्या कर रही थी ,
कॉलेज से देर क्यों हो गई थी ?
ये कल की ही बात थी कि बस में मुश्किल था सफ़र करना ,
अजनबी हाथों की छुअन से बेबस सड़क पे गिर आई थी ,
कहाँ ज़ख्म हुए ,कहाँ चोट खाई मैंने , कह नही पाई थी ।
जल्दी ब्याह दो ,कह बोझ बन गयी थी ।
कल की बात है कि मेरा ब्याह बड़ी बात बन गई थी ,
ब्याह का मतलब मैं कब जान पाई थी ?
कितनी हसीन दुनिया तब मन में सजाई थी ,
समय ने कैसी कैसी दुनिया फिर मुझे दिखाई थी ,
शादी हो गई फिर भी रिश्ते नही समझ पाई थी ,
रिवाज़ों का बोझ मैं कब उठा पाई थी ?
कल की ही बात है ,पत्नी से माँ कब बनी जान नही पाई थी ।
घर , बच्चे , रिश्ते , गृहस्थी में डूबी अपने को ढूंढ नही पाई थी ।
घर की लाज का पल्लू सिर से उतार नही पाई थी ।
आईने में अपना चेहरा पहचान नही पाई थी ,
डूबी आँखों पर चाँदी का वर्क देख नज़र धुंधलाई थी ।
फिर भी दिल ने कुछ करने की चाह जगाई थी ,
कल की ही बात है एक छोटी सी लड़की की कुलांचे याद आई थीं ,
तन को भूल मन ने हर एक अधूरी तमन्ना दोहराई थी ।
समय बहुत कम है ,ये सोच कर आँख भर आईं थी ।
हर पल ज़िन्दगी का आखिरी पल है याद कर तन में जान भर आईं थी ।
ये कल की ही बात है कि ज़िन्दगी की हर मन्ज़िल फिर से याद आई थी ।

मन बंजारा

 

माया हर रोज़ की तरह सुबह छ: बजे उठ कर बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गई थी । उसकी बालकनी के ठीक सामने ही एक घना गुलमोहर का पेड़ था । उस के हरे , महीन पत्तों में लाल फूलों के गुच्छों पर जब सूरज की पहली किरणें पड़ती तो वो सुनहरे रंग में नहाए से लगते । माया कुछ देर उन्हें यूँही निहारती रही और मन ताज़ा करती रही । सुबह की चाय वो उन्हीं के साथ पीती थी । जैसे वो फूल उसकी इंतज़ार कर रहे हों । उन पलों में वो भूल जाती थी कि वो अकेली है , बहुत अकेली । पाँच साल बीत गए आलोक को गए , कभी – कभी उसे लगता था कि यादें जैसे धुंधला रही थीं । उसके कमरे में लगी उनकी शादी की तसवीर देख कर वो यादों के ज़हन पर ज़ोर डालती थी । जान-पहचान से ये रिश्ता आया और शादी तय हो गई थी , न उसकी राय ली गई , न उसकी मर्ज़ी । लड़का अच्छा कमाता है , लड़की की कॉलेज में नौकरी लगी है यानि पढ़ी-लिखी है , बस इससे आगे क्या चाहिए भला , परफ़ैक्ट मैच था । बड़ी अजीब बात है कि जिस परफ़ैक्ट मैच के साथ उसने दस साल बिताए उसकी यादें इतनी जल्दी धुंधली पड़ रही थीं । उन दस सालों में शायद ही कोई दिन होगा जब आलोक ने उसके साथ बैठ कर इस बालकनी में चाय पी होगी । उसे तो बिस्तर में ही बैड टी चाहिए थी और माया को बाहर खुली हवा में । इसी बात पर वो न जाने कितना नाराज़ हो जाता था , उसका गुस्सा तो नाक पर ही रहता था । बस यूँही मन की लुका-छिपी सा ये रिश्ता सरकता रहा । आलोक अपने काम में इतना डूबा था कि घर आने की सुध ही न रहती । उसका टारगेट आगे बढ़ता गया और ज़िंदगी ने सब कुछ पीछे छोड़ दिया । माया उसके टार्गेट में कहीं भी फ़िट नही बैठती थी । एक दिन आलोक को अचानक ऑफ़िस में ही अटैक हुआ और सारे टार्गेट अपने साथ ले गया । माया अकेली की अकेली रह गई थी । माँ और भाई ने बहुत कहा था कि इस फ़्लैट को बेच कर जयपुर आ जाए , यहाँ दिल्ली में अब कौन था उसका….? लेकिन कॉलेज की नौकरी वो कैसे छोड़ सकती थी ?  वो तो पहले भी अपने साथ ही थी…बस अब नही था तो वो था इंतज़ार । आलोक से कितनी बहस होती थी इस बात पर कि कॉलेज की नौकरी छोड़ दे , उसने समझाया था आलोक को कि दिनभर घर में वो क्या करेगी । बड़ी मुश्किल से माना था वो , उसे अपनी बीवी घर में अच्छी लगती थी , घर और पति की देखभाल करती हुई । माया को तो इंगलिश लिटरेचर पढ़ते-पढ़ाते स्टेज से प्यार हो गया था । वो कॉलेज में बहुत प्लेज़ करती थी और अब बच्चों से करवाती है । आलोक से वो कभी इस बारे में बात नही कर पाई अगर करती भी थी तो वो हूँ….हाँ करता ऊब कर कहता ,

यार….ये नाटक की बातें तुम कॉलेज में छोड़ कर आया करो , मैं बहुत थक गया हूँ ।

वो सो जाता और माया अपनी बालकनी में आकर बैठ जाती । देर तक तारों और चाँद को ताका करती । कॉलेज से आकर फिर वही बालकनी और नीचे बना प्लेग्राउंड जिसमें हर शाम बच्चे खेलते थे , वे उसके साथी थे । वो सोचती थी कि अगर उसका भी बच्चा होता तो कुछ इतना ही बड़ा होता । लेकिन आलोक के टार्गेट में बच्चे की कोई जगह नही थी । उन्हीं बच्चों में वो सपने बुनती रहती थी , कितनी ही बार बच्चों की बॉल उस तक आती और वो लपक कर पकड़ लेती , फिर बच्चे उसकी पहली मंज़िल की बालकनी की ओर देख कर कहते ,

आंटी…मेरी ओर फ़ेंकिए ।

दूसरा कहता ,

नहीं आंटी मेरी टर्न है मेरी ओर फ़ेंकिए ।

और वो मुस्कुराती हुई उन्हें डॉज देती किसी तीसरे की ओर फ़ेंक देती । इस खेल में उसे बड़ा मज़ा आता था । उन पलों में वो भी बच्चा बन जाती थी ।

कोई बच्चा किसी दिन न आता तो अगले दिन ऊपर से पूछती ,

अरे…बंटी तू कल क्यूँ नही आया था खेलने…?

और बंटी भी बड़े अपनेपन से बताता ,

आंटी कल मैथ्स पढ़ना था ना , आज टैस्ट था ।

कैसा हुआ टैस्ट…..?

वो पूछती और जवाब मिलता ,

अरे आंटी……..हो गया बस।

इसी तरह इस बालकनी का उससे बड़ा गहरा रिश्ता बन गया था , ये उसकी बड़ी अपनी सी थी , सखी – सहेली जैसी । उसके साथ वाला फ़्लैट काफ़ी समय से खाली था , उसकी बालकनी उस खाली फ़्लैट की बालकनी के बहुत पास थी । उस बालकनी का खालीपन उसे बड़ा अखरता था । सोचती थी कि कोई आ जाए तो थोड़ी रौनक हो जाएगी । आज उसे वहाँ कुछ हलचल सी दिखाई दी थी , मन में सोच रही थी , पता नही कौन आया होगा , शायद कोई यंग कपल होगा , या कोई बुज़ुर्ग कपल , मन जानने को उत्सुक था । जब कोई बाहर नही दिखा तो उसे बोरियत होने लगी और वो भीतर आ गई । पता नही आजकल लोग घर-घुसेड़ू क्यों हो गए हैं ? घर से बाहर ही नही निकलते ! उसने अपने लंबे , काले , घुंघराले बालों को लापरवाही से ऊपर बाँधा और सुबह के काम में लग गई । कॉलेज को देर हो रही थी , जल्दी – जल्दी ब्रैड – टोस्ट खाए और भागी लिफ़्ट की ओर । आज खाना भी नही पैक किया , दिल नही था कुछ बनाने का , कॉलेज की कैंटीन ज़िंदाबाद । लिफ़्ट के लिए इंतज़ार कर रही थी कि उस साथ वाले फ़्लैट से भागता-दौड़ता सा एक लड़का निकला , बिखरे-गीले बाल जैसे अभी नहा कर बाथरूम से बाहर आया हो । लिफ़्ट आते ही दौड़ कर उसमें घुस गया , साबुन की महक लिफ़्ट में फैल गई थी । उसने माया की ओर देख कर एक मुस्कान फैंकी और इधर-उधर देखने लगा । माया ने उसकी मुस्कान का कोई जवाब नही दिया और बाहर आकर जल्दी से गाड़ी स्टार्ट की तो देखा वही लड़का सामने खड़ा था । उसने हाथ देकर गाड़ी रोकने का इशारा किया , माया लेट हो रही थी उसके चेहरे पर झुंझलाहट आ गई । पर क्या करती नया पड़ौसी था , पता नही क्या सोचेगा , उसने गाड़ी रोक दी । इससे पहले कि वो कुछ कहती वही बोल पड़ा ,

मैम आप कहाँ जा रही हैं ? प्लीज़…प्लीज़…प्लीज़ मुझे भारतीय विद्या भवन तक छोड़  सकतीं हैं क्या ?  अगर आप उधर जा रही हैं तो ? मैं क्लास के लिए लेट हो गया हूँ ।

उसके चेहरे पर मायूसी और मासूमियत के साथ निवेदन था , वो मुस्कुराकर बोली ,

आईए मैं छोड़ दूँगी ।

गाड़ी में बैठ कर उसने गहरी , लंबी चैन की साँस ली और माया की ओर देखकर मुस्कुरा दिया , माया भी मुस्कुरा दी । कुछ देर दोनों के बीच चुप्पी फैली रही जो माहौल को बेवजह भारी बना रही थी । शायद उसे भी यही लगा होगा इसलिए सवाल किया ,

सॉरी मैंने तो ये पूछा ही नही कि आप किधर जा रही हैं , बस कूद कर बैठ गया ।

कुछ हँसते हुए वो बोला तो माया भी उसकी बात पर मुस्कुरा दी ,

मैं युनिवर्सिटी की ओर जा रही हूँ , छोड़ दूँगी आपको आपकी मंज़िल तक ।

ओह , थैंक्यू सो मच । मैं लेट न हो रहा होता तो आपको ये तकलीफ़ न देता । मैं वहाँ कोर्स कर रहा हूँ , आर्ट और आर्कियोलॉजी में । मेरा नाम अरूप है ।

उसने ख़ुद ही अपना परिचय देते हुए औपचारिकता निभाई तो माया ने भी गंभीर आवाज़ में औपचारिक हो कर कहा ,

मुझे माया कहते हैं….मिसेज़ माया त्रिवेदी । मैं कॉलेज में इंगलिश लिटरेचर पढ़ाती हूँ ।

अरूप ओह कहता हुआ हैरत से उसे देखता रहा जैसे पढ़ाने वाले उसे कुछ और ही तरह के लगते हों ।

इस बीच अरूप की मंज़िल आ गई थी वो माया को धन्यवाद की मुस्कान देता हुआ भाग गया । माया ने गहरी साँस लेते हुए सिर झटका , उसे ये हड़बड़ाहट और आख़िरी वक्त पर काम करने वालों से ऐलर्जी थी । वो पाँच मिनट पहले पहुँचना पसंद करती थी , देर करना उसके स्वभाव में नही था । उसका हर काम समय पर होता था , कोई उसके साथ अपनी घड़ी मिला सकता था । एक आलोक ही था जिसे वो अपने समय में व्यवस्थित नही कर पाई थी । अरूप जैसे लोगों पर उसे गुस्सा आता था , बेढंगे , बिखरे से । नया पड़ौसी आया भी तो ऐसा , क्या फ़ायदा ! कॉलेज में आते ही वो सब भूल जाती थी अरूप को भी भूल गई , वैसे भी उसमें याद करने जैसा था भी क्या ?

शाम को कॉलेज से थक कर आई माया ने चाय बनाकर अपनी बालकनी में झाँका , गुलमोहर के फूल उसे लहरा-लहरा कर बुला रहे थे । उन्हें देख उसके चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई जैसे किसी परिचित को देख कर आती है बिलकुल वैसी ही । अपने बालों को ढीला छोड़ कर चाय के साथ दिनभर की थकान उतारने लगी तभी साथ की बाल्कनी से आवाज़ आई ,

हाय……!

उसने घूम कर देखा तो अरूप बड़ी सी मुस्कान लिए हाथ हिला रहा था । उसने भी जवाब में हाथ हिला दिया । औपचारिकता में उसने पूछ भी लिया ,

चाय….पीजिए ।

और वो जनाब अभी आया…. कहते हुए उसके घर धमक पड़े । इतनी अनौपचारिकता उसे बुरी नही लगी थी क्योंकि अकेले चाय पीने में मज़ा कहाँ आता था । उसने एक कप चाय और बनाई और दोनों बैठ गए । चीनी कम-ज़्यादा का हिसाब पूछ कर उसने जिज्ञासा से पूछा ,

घर में कौन-कौन है आपके ? कोई दिखाई नही दिया ?

अरूप हँसते हुए बोला ,

कोई होगा तो दिखाई देगा ना….अ….मिसेज़…..नो…..माया । ये मिसेज़ – विसेज़ कह कर बुलाना कितना अजीब लगता है ना ?

माया को भी उसकी बात पर हँसी आ गई……नो प्रॉबलम…यू कैन कॉल मी माया । घर में कौन-कौन हैं और कहाँ हैं ?

अरूप खड़ा हो कर पास रखे बुकशैल्फ़ पर नज़र डालते हुए बोला ,

मैं अकेला ही हूँ फ़्लैट में , मम्मी-पापा कानपुर में हैं । मैं यहीं जॉब ढूँढ रहा हूँ और कोर्स भी कर रहा हूँ ।

अरूप शैल्फ़ से एक किताब निकाल उस पर नज़र डालता हुआ माया की ओर मुड़ा ,

हैरीटेज कन्ज़रवेशन में पढ़ाई की है मैंने , हिस्ट्री का शौक है । देख रहा हूँ कि आप भी हिस्ट्री में दिलचस्पी रखती हैं , हिस्ट्री की काफ़ी किताबें हैं आपके पास । आपके पति को भी शौक है किताबों का ?

इस सवाल पर माया किताबों की ओर देखते हुए बोली ,

हाँ….मुझे ये ऐतिहासिक इमारतें बोलती हुई सी लगती हैं । लगता है कि इनमें कितने किस्से , कहाँनियाँ जब्त हैं जो ये सुनाना चाहती हैं । मेरे पति को किताबों का नही काम का शौक था , वो अब नही रहे ।

कहीं खोई सी माया ऐसे बोल रही थी जैसे उन इमारतों का दिल जानती हो , आलोक को तो ये पुरानी इमारतें कब्रिस्तान लगती थीं । अरूप उसे एकटक देखता हुआ बोला ,

ओह…..आई एम सौरी ।

उसके देखने से वो कुछ झेंप गई और उन नज़रों से बचने के लिए किचन से कुछ लेने के बहाने उठ गई । उसे एहसास हो रहा था कि अब भी अरूप की आँखें उसका पीछा कर रही थीं । अरूप ने कुछ ऊँचे स्वर में कहा ,

चलो…, मुझे इन खंडहरों में घूमने के लिए भूतों के साथ कोई और भी मिल गया ।

उसकी बात पर माया हँस पड़ी , वो हैरान थी कि वो कितनी जल्दी उसके साथ सहज हो गया था ,

क्यूँ इससे पहले कोई नही मिला तुम्हारा और भूतों का साथ देने वाला ?

मिला नही , मिली थी लेकिन वो मुझे ज़्यादा बर्दाश्त नही कर पाई या फिर भूतों का साथ उसे अच्छा नही लगा । चलिए संडे को चलते हैं ग़ालिब की हवेली , वहीं कुछ खा लेंगे । अ….अगर आप कहें तो ।

कहते हुए वो कुछ हकला सा गया फिर ज़ोर का ठहाका लगाया , माया उस घर में बरसों बाद किसी हँसी की गूँज सुन रही थी । उसने कुछ सोचते हुए कहा ,

देखती हूँ , कुछ काम नही हुआ तो चल सकते हैं ।

अरूप चला गया और माया सोचती रही कि कितने दिनों बाद इस घर की ख़ामोश दिवारों में बातें और हँसी की आवाज़ आई है । संडे आया तो अरुप उसे लेने सुबह-सुबह घर के दरवाज़े पर खड़ा था । बड़ी हिचकिचाहट के बाद , उसके साथ जाने को तैयार हुई । वो दोनों ग़ालिब की हवेली गए , उस दिन अरूप ने उसे ग़ालिब के शेर और ग़ज़लें सुना हैरान कर दिया था । चाँदनी चौंक में गली से पूरी , आलू की सब्ज़ी और चाट खा कर माया उस दिन जैसे बरसों की भूख मिटा रही थी । अब अरूप हर संडे कहीं न कहीं उसे घसीट ले जाता , वो मना करती तो एक न सुनता , बच्चों की तरह ज़िद करता और वो मना नही कर पाती । अकेली होती तो अरूप का चेहरा , उसकी बातें उसकी आँखों के सामने आता रहता और वो हटाती रहती । शायद लंबे समय के बाद कोई उससे इतनी बेतकल्लुफ़ी से बात कर रहा था , उसकी पसंद-नापसंद की परवाह कर रहा था । अब हर रोज़ अरूप , माया के साथ जाने लगा , माया को भी रेडियो के अलावा कोई साथी मिल गया था । वो बहुत बातूनी था , रास्ते में न जाने कहाँ-कहाँ के किस्से सुनाता रहता और वो मुस्कुराती उसकी बातें सुनती रहती । इतने कम समय में वो माया के साथ काफ़ी घुल-मिल गया था । माया के जीवन का खालीपन भरने लगा था , वो कभी अचानक रात को आ जाता ,

क्या बनाया है आपने….? मुझे भूख लगी है , आपने सिर्फ़ सूप बनाया है !

और वो उसके लिए कुछ ना कुछ पकाती और वो खाते हुए पूरा मज़ा लेता ,

आ…हा…हा…हा , क्या बनातीं हैं आप ? आपके हज़बैंड कितने लकी थे !

वो जैसे कहीं खो जाती , आलोक ने कभी ऐसा नही कहा , वो तो अक्सर ऑफ़िस से खा कर ही आता था । इस बीच एक बार अरूप कुछ दिन के लिए कानपुर चला गया , पता नहीं क्यूँ उसका दिल ही नही लग रहा था ! कई बार फ़ोन को देखती कि कहीं उसकी कॉल तो नही है , कभी फ़ोन उठाती कि उससे बात कर लूँ लेकिन नही करती । क्यूँ वो इतना सोच रही है उसके बारे में ? वो बहुत छोटा है उससे उम्र में और फ़ोन रख देती । एक दिन अरूप सुबह-सुबह धमक पड़ा ,

रात की ट्रेन से आया हूँ….बहुत भूख लगी है , कुछ खिलाएँगी नही ?

कितनी खुश थी माया उस दिन , उसके आने से जैसे खुशी लौट आई थी । अब वो अपने घर कम और माया के पास ज़्यादा समय बिताने लगा था । किताब पढ़ते – पढ़ते वहीं सोफ़े पर बच्चों की तरह सो जाता और माया उसे देख मुस्कुराती रहती । छुट्टी वाले दिन बच्चों की तरह ज़िद पकड़ लेता कि चलो कहीं बाहर और ले जाता किसी न किसी नई जगह पर । एक दिन वो उसे महरौली ले गया , वहाँ की उन पुरानी इमारतों को देख कर लग ही नही रहा था कि वे दिल्ली में हैं । दूर तक फैले अलग-अलग मकबरे और खूबसूरत बावलियाँ देख कर वो दिनभर उनमें घूमते रहे थे । उस दिन एक बावली में नीचे जाकर वो बैठी तो पीछे से आकर अरूप ने उसका हाथ पकड़ लिया था । उसे कुछ अटपटा सा लगा था , अजीब सा , जो पहले कभी नही लगा था । उसने हाथ छुड़ाया नही था , वो भी बहुत देर तक उसका हाथ अपने हाथ में थामें बैठा रहा था । माया का दिल चाह रहा था कि वो अपनी वर्षों की थकान मिटा दे , उसके कंधे पर सिर रख कर , लेकिन नही कर पाई थी वो ऐसा । उसकी भावनाएँ उसे छल रही थीं , ये ठीक नही है , कुछ भी ठीक नही है । पत्ते पर ठहरी ओस टपकने को थी उसने रोक लिया था । वो ख़ामोश चलती रही थी । उस दिन अरूप भी कुछ ख़ामोश था , हर वक्त बोलने वाला , बकबक करने वाला अरूप खोया सा चल रहा था । उन्होंने वहीं किसी खोंमचे पर चाय पी थी , कितनी चाह थी माया को इस चाय की । कॉलेज में थी तो कई बार पी लेती थी लेकिन शादी के बाद कभी नही क्योंकि आलोक को ये सड़क पर खाना-पीना बिल्कुल अच्छा नही लगता था ,

खाना ही है तो किसी अच्छी जगह खाओ , ये क्या सड़क पर खाने लगो ।

उसने कितना डाँटा था उसे एक बार जब उसने ड्राइव पर जाते हुए ढाबे में चाय पीने की इच्छा ज़ाहिर की थी । अरूप बिल्कुल उस जैसा है , उसकी पसंद कितनी मिलती है उससे । शायद अरूप ने बहुत देर करदी उसकी ज़िंदगी में आने में । उसके दिल ने खाली जगह बना ली थी अब उसमें वो जगह किसी के लिए नही थी । उसे वो खाली जगह भाने लगी थी , उसमें कोई आए तो उसे घबराहट होने लगती थी । अरूप के आने से वही घबराहट बढ़ गई थी , उस खाली जगह में खलबली सी मच गई थी । उसे इस खलबली को हटाना होगा , कोई वहाँ नही आ सकता , वो उसकी अपनी जगह थी । आज संडे था , उसने बालकनी का दरवाज़ा बंद ही रखा था , उसने गुलमोहर के लटकते फूलों के झालर को खिड़की से देख कर खिड़की भी बंद कर दी थी । चाय भी उसने आज अपने बिस्तर पर बैठ कर पी थी बिल्कुल आलोक की तरह । अगर अरूप आएगा तो उससे कह देगी कि आज उसकी तबीयत ठीक नही , उसे कहीं नही जाना । इतने में कॉल बैल बज उठी , बड़े अनमने मन से वो उठी थी । उसने कामवाली से कह दिया था कि उसे संडे को देर से काम चाहिए , ये फिर भी आ गई । उसे उस पर गुस्सा आ रहा था । दरवाज़ा खोला तो सामने दोनों हाथों को देहरी पर फैलाए मुस्कुराता हुआ अरूप खड़ा था । उसे देखते ही माया का दिल ज़ोर से धड़क उठा था लेकिन वो मुस्कुराई नही कुछ रूखी सी निगाह उस पर डाल कर अपने दिल को काबू में करती रही । वो मस्ती में अंदर आ गया , सामने खड़ा होकर उसकी आँखों में आँखें डालता हुआ बोला ,

क्या हुआ….आज चाय नही पी….बालकनी बेचारी उदास है , ये फूल भी उदास हैं । ये मुरझाया सा चेहरा क्यूँ ?

कहते हुए उसने माया की ठोडी प्यार से उठाई तो माया का दिल गले तक आ गया , वो अरूप से दूर भागना चाहती थी लेकिन वो था कि उसे अपनी ओर खींच रहा था । इस प्यार से उसकी आँखें भारी होने लगीं थीं और न जाने कब मुंद गईं थीं , बाल खुल कर बिखर गए थे । अपनी आँखों पर उसे कोमल स्पर्श और गर्म साँसें महसूस हुईं तो उसने घबरा कर आँखें खोल दीं और झटक कर अलग हो गई ,

ये ठीक नही है….। तुम चले जाओ…प्लीज़ । मुझे अकेला छोड़ दो ।

अरूप उसके और पास आ गया था , चेहरे से उसके बालों को हटाते हुए उसने माया का कोमल , बर्फ़ सा हाथ अपने हाथों में ले लिया ,

क्या ठीक नही है और क्यूँ ठीक नही है ? क्योंकि तुम मुझसे बड़ी हो ?

हाँ…अरूप , ये हमारा रिश्ता बस दोस्ती तक ही ठीक है । समाज , तुम्हारे घरवाले , मेरे घरवाले कोई इसे नही मानेगा । सब ग़लत हो रहा है ।

कहते हुए माया ने अपना हाथ छुड़ा लिया और पीछे हट गई । अरूप ने फिर पास आकर , बहुत पास आकर उसकी आँखों में देखा ,

क्या तुम ये दिल से कह रही हो ? क्या मेरे चले जाने से तुम्हें कोई फ़र्क नही पड़ेगा ? क्या मेरी भावनाएँ एक तरफ़ा हैं ?

माया ने आँखें मूँदे , गहरी साँस लेते हुए कहा ,

क्या फ़र्क पड़ता है इससे कि मैं क्या सोचती हूँ या क्या चाहती हूँ । जाओ चले जाओ यहाँ से ।

जब उसने आँखें खोलीं तो अरूप वहाँ नही था । वो वहीं सोफ़े पर घंटों बैठी अपनी भावनाओं और दिल को थामें डूबती रही । उसने कुछ फ़ैसला कर लिया था , वो अरूप का सामना नही कर सकती थी , उसका मन नही मानेगा वो जानती थी ।

सुबह जब अरूप बाहर निकला तो माया के घर में ताला लगा था । उसने उदास नज़रों से घर को देखा और बाहर आकर ऑटो पकड़ लिया । सीधा माया के कॉलेज पहुँच गया , वहाँ पता चला कि वो नही आईं और छुट्टी की मेल भेजी है । अरूप सिर झुकाए विद्या भवन आ गया लेकिन आज उसका दिल नही लग रहा था । कहाँ गई होगी वो….? शायद शाम तक घर वापस आ जाए ये सोच कर वो भी घर आ गया और बार-बार उसके घर के दरवाज़े की आहट लेता रहा । अगले दिन सुबह उठ कर उसने बालकनी में झाँका लेकिन सब दरवाज़े बंद थे । वो उसे बिन बताए कहीं चली गई थी , वो ऐसा कैसे कर सकती थी उसने ऐसा क्यों किया ? वो उसकी खाली बाल्कनी में लटकते गुलमोहर के फूलों को देखता रहा जो उसे ढूँढ रहे थे उसी की तरह ।

माया ने अपने को जैसे सब से काट लिया था वो अपने जज़्बातों को भी काटती जा रही थी । वो अरूप से दूर जाना चाहती थी , जहाँ उसकी याद न हो । पर्वतों से बहती हवा , साथ ही झाग उछालती पहाड़ों से अठखेलियाँ करती गंगा , वातावरण में गूँजते वेदों के मंत्रोच्चारण , ऋषिकेश की सुबह को काल्पनिक लोक सा बना रही थी । ऐसे में आश्रम से निकल माया अपने ही विचारों में डूबी , गंगा के किनारे एक पत्थर पर बैठ गई । अरूप ने उसे सपनों की दुनिया दिखाई थी , प्यार की दुनिया , जो सच नही हो सकती थी । वो बार बार अपनी सूती , हल्के नीले रंग की साड़ी को तन से लपेट रही थी ,ठंडे पानी में झुरझुरी सी उठ रही थी । आसमानी रंग की साड़ी में माया गंगा की धार सी ही लग रही थी जो उसी में समा जाना चाहती थी , तभी एक तेज़ लहर ने उसे सिर से पाँव तक भीगो दिया , पर वो अविचल बैठी भीगती रही । यूँ भीगते हुए उसे लग रहा था जैसे गंगा उसके भीतर बैठे मोह , लोभ सब धो देगी । अब  तक वो इस मोहजाल को ही तो लपेटती रही थी , इस कदर लपेट लिया कि मकड़ी के जाले की तरह वह उस में उलझ कर रह गई , वो इस मोहजाल को तोड़ ही नही पाई , अब भी कहाँ तोड़ पा रही थी , वो तो सिर्फ़ उन यादों से भाग रही थी । कितनी बार चाहा कि सब जंज़ीरें तोड़ दे लेकिन समाज , परिवार और मर्यादा उसके पैरों की बेड़ियाँ बन गई थीं । गंगा किनारे एक शिला पर बैठी माया अपने मन को टटोल रही थी , कौन सा मन ? उसे तो मन याद ही नही रहा , याद भी कैसे रहता क्योंकि उसने इतने वर्षों में अपने मन को कहीं गहराईयों में दफ़्न कर दिया था । अरूप उसकी ज़िंदगी में आकर सैलाब के पानी सा सब ऊपर ले आया था लेकिन उसने छोड़ दिया सब कुछ क्योंकि सैलाब का पानी अपने साथ बहुत कुछ लेकर आता है और साथ ले जाता है । वो निकल गई , नहीं बह पाई थी साथ । फिर वो खुद कहाँ जानती थी कि वो कहाँ जा कर रुकेगी । लेकिन अरूप अब भी उसके दिलो – दिमाग़ पर क्यों छाया था ? क्या कहीं खंडहरों से प्यार करने वाली माया के मन की ढहती दीवारों से कोई अंकुर तो नही फूट पड़ा था ?  वो उसकी परवाह करता था लेकिन ये ठीक नही था , वो…वो उसे चाहने लगा था । वो हर पल उसे खुशी देता था जो पहले उसने कभी नही पाई थी , कहीं वो उसकी दिल की धड़कनें तो नहीं समझने लगा था ? उसने अपना पल्लू और कस लिया था , वो उसके बारे में क्यूँ सोच रही है ? वो कंधे झटक कर खड़ी हो गई , धुंधलका होने लगा तो गीले बदन उठ कर आश्रम की ओर चल दी जैसे इस काया को घसीट रही थी जो सूने , विरान खंडहरों सी थी । मन अब भी उसका नही था उसे डर था कि कहीं कोई अरमान आँखें न खोल दे । उसने दिल की कस के गिरह बाँध ली थी , नही सुनना चाहती थी उसकी कोई भी बात । आश्रम पहुँच कर कपड़े बदले और ध्यान में बैठ गई , मन भटकता रहा , कभी उसकी साँसों की गरमाहट तो कभी वो कोमल भावनाएँ तो कभी उसकी वो निश्छल हँसी । वो बिस्तर से चटाई पर लेट गई , अपने मन और तन को कष्ट देना चाहती थी ताकि उन कोमल भावनाओं को उस फ़र्श की सख़्ती से मिटा सके ।

दिन-रात आश्रम के काम में अपने आप को झोंक देती , घंटों ध्यान में बैठी रहती , अपने को थका देती । मन को पक्का करती कि अब वो कभी वापस नही जाएगी , उसने अपना फ़्लैट बेचने के लिए भाई को कह दिया , कॉलेज में अपना रैज़िंगनेशन भेज दिया । माँ को बता दिया कि अब वो कभी वापस नही आएगी । माँ ने इसे अपनी जवान , विधवा बेटी के पति के प्रति समर्पण समझा और उसे स्वीकार लिया । माया ने अपनी गिरह नही खोली । महीनों बीत गए , वो धीरे-धीरे अपने को भूलने लगी थी , अपने अरमानों पर समय की रेत डालती रही । कभी – कभी दिल उससे पूछ लेता कि अरूप का हाल नही जानेगी ? वो किस हाल में है , उसे किस तरह छोड़ आई थी जानना नही चाहेगी ?  वो भी शायद कभी उसके बारे में सोचता होगा कि नही ? वो ऐसे विचारों को धकेल देती , उसके न सोचने और न जानने में ही उसकी और अरूप की भलाई थी । वो कठोर हो घंटों गंगा की लहरों में ख़ामोश पड़ी रहती मानों उसके साथ ही सारी भावनाएँ बहा देना चाहती हो ।

एक दिन जब वो संध्या की आरती के समय वापस लौट रही थी , आश्रम के चारों ओर अंधकार और शांति फैली थी , सन्नाटा गूँज रहा था । आश्रम के दरवाज़े पर उसे एक धुंधती सी आकृति खड़ी दिखाई दी । वो धीमे कदम रखती आगे बढ़ी तो उसका दिल पलभर को रूक गया , धड़कनें थमने लगीं । सामने अरूप उदास आँखों से उसे देख रहा था । उसका दिल किया कि जाकर उससे लिपट जाए और सारे अरमान धो डाले , लेकिन वो बुत बनी , भावनाहीन सी खड़ी रही , दिल में एक दर्द सा उठा , उसने अपने दिल को कस कर दबा लिया । उसका गीला बदन थरथरा रहा था , दिल की गिरह ढीली पड़ने लगी थी । अरूप ने धीमें कदमों से आगे बढ़कर अपनी जैकेट उसे उढ़ा दी और उसे कंधे से पकड़ कर एक ओर ले गया । संध्या आरती शुरू हो रही थी , शंख और घंटियों की आवाज़ तेज़ होती जा रही थी । माया घुटती आवाज़ में , लड़खड़ाते शब्दों से बोली ,

मुझे जाना होगा , देर हो रही है ।

अरूप ने उसके कान के पास अपने होठों को लाकर धीमे स्वर में कहा ,

हाँ , तुम्हें चलना होगा , तुमने बहुत देर कर दी  ।

माया अरूप के कंधे पर सिर टिकाए शून्य थी , अरमानों की भारी पलकें खुल रही थीं । अरूप उसे मज़बूती से थामें खड़ा था ।