पानी

 

पानी तो बरसा , बहुत बरसा ,

आसमान के नदी-नाले तोड़ कर बरसा ,

मानो पूर्वजों के सारे दर्द बूँदों में बदल गए !

ईश्वर ने सोचा ,

कोई भागीरथ फिर नही आया तो क्या ,

बच्चा मेरा घरती पर प्यासा क्यों तरस रहा ?

फिर बरसा , बहुत बरसा

लेकिन ये क्या ,

सारा पानी यूँही बिखर गया ?

कहीं गटर में तो कहीं बाढ़ में बदल गया !

समंदर और नदियों का किनारा छोटा पड़ गया !

बावलियाँ और जोहड़ को सीमेंट से भर दिया !

मेरा भेजा पानी तबाही बन गया !

ये बच्चा तो बड़ा लापरवाह निकला !

धन सहेज रखा और जीवन बेकार बहा दिया !

ये मैंने इसमें लालच का पुर्ज़ा कब लगा दिया ?

 

 

चाँद

ओ चाँद !! तू कितना अकेला है !!

तारों से भरा आसमाँ है

पर चलता बिल्कुल अकेला है ।

वो ग्रहण भी आता है

तो तुझे ही सताता है !!

कभी लाल तो कभी काला कर जाता है ।

वो हल्के , रूई से बादल आते हैं

तुझ को ही ठग जाते हैं !!

अमावस तुझे अंधेरे में धकेल जाती है ।

फिर एक दिन पूर्णिमा आती है ,

बड़ा तरसा के आती है ,

तुझे दूध से नहला जाती है ।

अमावस आएगी ये सोचकर तू फिर घटता जाता है ,

मैं ताकती हूँ तुझे , मेरा दिल तेरे ही साथ चलता है ।

ऐ.., मेरे हमसफ़र , तेरी राह आसमाँ पे है ,

तुझे सारा जहाँ ताकता है ,

गीतों में ज़िक्र तेरा आता है ।

मेरी राह इस ज़मीं पे है ,

कहाँ बढ़ी , कहाँ घटी , कौन जानता है ,

कभी तू भी फ़लक से ज़मीं पे आ के तो देख ,

नज़रों का फेर ही यहाँ नज़र आता है ।

फिर भी ऐ…मेरे हमसफ़र , तेरा-मेरा एक सा रास्ता है ।

 

ज़िंदगी

ज़िंदगी एक दिन मिली थी राह में

मैंने कहा , आ बातें करें तनहाई में

बेवफ़ा है तू बड़ी हर बात में ,

चलती कहाँ है तू मेरे जज़्बात में !!

छोड़ दिया था साथ मेरा , बीच राह में !!

थक गया हूँ , मैं तेरी हर चाल में

कैसे फँस गया हूँ , तेरे जाल में !!

ज़िंदगी मुस्कुराती रही बैठी साथ में ,

जल रहा था दिल मेरा इस बात में ,

थाम कर बाँहें मेरी वो चल पड़ी थी साथ में ,

चल आज को लेकर तू मेरे साथ में ,

मुड़ता है क्यूँ पीछे को लेकर साथ में !!

पानी हूँ मैं , समय की रेत में ,

मुड़ती नहीं फिर रब्त की उस लहर में ।

 

बवंडर

 

कैसे धुंधला गए हैं चेहरे समय की आँधी में

आता है कभी यादों का बवंडर

फिर गुज़र जाता है धीमी चाल से

छोड़ जाता है वो फिर अपने निशाँ ।

कहीं दिल छिल गए , हैं कहीं कोरी नज़र ,

कहीं उखड़े हैं पेड़ तो कहीं उजड़ी है छत

फिर न पेड़ लगते हैं और न छत ही बनती है ।

कहीं कोई बीज शायद छितर कर दब गया था मिट्टी में

मिट्टी नर्म होगी तो वो निकलेगा अंधेरों से ।

ईंट-गारा मिल गया तो सर पे छत भी आएगी

छिले ज़ख्मों में कोई मरहम भी लगाएगी

कोरी नज़रों में शायद नमी भी आएगी

यादों के बवंडर की आँधी , कोई निशानी साथ लाएगी ।

रात के साए

शहर में भटकते वो रात के साए

है कहीं उनका भी कोई गाँव में ।

फ़ुटपाथ पर सोते हुए

झलती है पंखा आती-जाती गाड़ियाँ ।

लिपटा है वो भी इंच भर की मौत में ,

चला आया यहाँ रोटी की खोज में ।

चूल्हा है ठंडा आज माँ का

अपने बेटे की सोच में ।

सुबह मिली थी लाश एक लावारिस यहाँ

हँह!! न जाने क्यों इन्हें है सोना यहाँ !!

है फ़ुटपाथ भी कहीं सोने की जगह ??

गाड़ी सड़क से आ गई फ़ुटपाथ पर

गाड़ी बड़ी थी क्या करे

था बड़ा वो आदमी

होती हैं उनकी रातें भी बड़ी ।

मर गया तो क्या हुआ ?

है बोझ वो धरती पर बड़ा ।

जीने का हक़ उनको नही

ग़रीबी हटाने का है हमने नारा लिया ।

 

घर

ये तेरा घर , ये मेरा घर

ये ईंट-पत्थरों का घर

फिर भी है ये मेरा घर ।

बड़े-बड़े ये महल ,

शानों-शौकतों से भरे ,

चले गए , बना के सब ,

सिर्फ़ नाम रह गए ।

गुमनाम सा है ये महल ,

कोई नही जो कह रहा ,

ये मेरा घर , ये तेरा घर ।

उजड़ गए हैं रिश्ते सब ,

बस रहे हैं फिर भी घर ,

मेरा-तेरा है ये घर ,

हमारा कब ये होगा घर !!

मैं नूँ दिलों मुकाइए

बुल्लेशा गल ताईंयों मुकदी , जद मैंनूँ दिलों मुकाईये………

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में एक गाँव है कलोल । इस दूर दराज़ गाँव में बेटियों के लिए जो मुहीम चलाई जा रही है वो देखकर मैं नतमस्तक हो गई , उन लोगों के प्रति जिन्होंने इसे शुरू किया । मन चाहा कि इसे आप सब तक पहुँचाऊँ , शायद देश के किसी कोने में किसी ज़रूरतमंद बेटी के लिए हम भी कुछ कर सकें।

आज से तीन साल पहले कर्नल यशवंत सिंह चंदेल ने जब अपनी जवान बेटी मंजुषा को बीमारी में खोया तो दोनों पति – पत्नी टूट गए । इस दुख ने उन्हें गहरा घाव दिया था । खेत के हर पत्ते और बाग़ के हर फूल में मंजुषा का चेहरा दिखता था । जीवन बोझ लगने लगा था । गाँव में अपने आस – पास कई बेटियाँ या मंजुषा की सखियाँ दिखतीं तो उसकी याद और गहरा जाती । तभी उनके दिल में विचार आया , हर बेटी में अपनी बेटी देखने का और इस तरह शुरू हुआ “मंजुषा सहायता केंद्र” । उन्होंने अपनी पेंशन और अपने दूसरे बच्चों की सहायता से ज़रूरतमंद लड़कियों को आर्थिक सहायता देकर पढ़ाने का काम शुरू किया । इन तीन वर्षो में वे गाँव – गाँव घूमकर ऐसे परिवार को ढूँढते हैं जिनके बेटी है लेकिन आर्थिक अभाव के कारण स्कूल नही जा रहीं । वे उन्हें स्कूल में दाख़िला दिलवाकर उनकी पूरी शिक्षा की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं । अभावों में रह रहे ऐसे परिवार जिन्होंने एक या दो बेटियों के बाद कोई और संतान नही की उन्हें सम्मानित कर आर्थिक सहायता पहुँचाते हैं । एक परिवार की ऐसी बच्ची जो न सुन सकती थी और न बोल सकती थी को उन्होंने कई साल पढाया , नौकरी लगवाई और फिर शादी करवाई । आज वो सुखी पारीवारिक जीवन न्यतीत कर रही है ।

कर्नल साहब कुछ ग़रीब प्रतिभाशाली लड़कों की भी परवरिश कर रहे हैं । यही नही पति – पत्नी गाँव के लोगों की हर प्रकार से सहायता करते रहते हैं । कोई भी गाँव का व्यक्ति आर्थिक अभाव के कारण इलाज के बिना न रहे , उसकी जान ना जाए इस बात का वो पूरा ध्यान रखते हैं । ख़ुद आज के इस “और मिल जाए” के युग में दोनों पति-पत्नी सादगी भरा जीवन व्यतीत करते हैं । कबीर , नानक और बुल्लेशा के प्रशंसक हैं , उन्हीं को अपना पथप्रदर्शक मानते हैं ।

एक म्हाको फूल प्यारो , अधखिलो कुम्हला गयो ।

सोग बीतो , हरख छायो , फूल बाग लगा गयो ।