सावन

सावन पहले भी आता था ,

बारिश के संग कितनी खुशियाँ भी लाता था ,

बारिश में नहाना होता था ,

कागज़ की नाव चलाना भी बड़ा काम होता था ।

नीम पर पड़ा झूला कितना सुहाना होता था ,

हर पींग पर आसमान को छूना होता था ,

इंद्रधनुष के रंगों से कुछ रंग चुरा कर बस्ते में भरना होता था ।

स्कूल से लौटते , पानी भरे गड्ढों में छाई-छप्प कर

साथी को बस यूँही भिगोना होता था ।

भीगे तन पर डाँट नही , पकोंड़ों से दुलार होता था ।

तब नदियाँ , नदियाँ थीं ,

कचरे का ढेर उसमें किसी ने डाला नही था ,

पॉलिथिन का भी बोलबाला नही था ,

गाय-भैंस का गोबर सड़कों पर फैला नही था

क्योंकि गाय-भैंस का घर में भी एक ठिकाना था ।

चिकिनगुनिया और डेंगू के डर ने अब सबको घेरा है ,

तब इनका कहीं कोई बसेरा नही था ।

अबके सावन आएगा , कितनों को अपने साथ ले जाएगा

ये तो हमने कभी सोचा भी नही था !

हम कहाँ से कहाँ आ गए !

एक बूंद को जीवन माना था ,

जीवन ही जीवन का दुश्मन बन जाएगा ,

सावन ने ये तो कभी सोचा भी नही था ।

क्या झमेला है !

क्या झमेला है !

ये रिश्तों का कैसा रेलम-पेला है ?

भीड़ सी मची है जैसे अजनबियों का मेला है ,

न मैं जानूँ उन चेहरों को

न वो पहचानें मेरी राहों को फिर भी लाखों के लाईक्स हो गए !

तू काम का है तो मेरा है वरना तू भीड़ में भी अकेला है ।

क्या करें यूज़ एंड थ्रो का ज़माना है !

क्रैडिट से काम चलाना है , कौन सा अपनी जेब से जाना है !

हम सिर्फ़ बंटोरते रह गए , वो हमारे पिन कोड से समेट कर ले गए !

कहता तो वो मुझको अपना था फिर मेरा नंबर ब्लॉक कर कहाँ चले गए !

पहले तो रिश्तों की एहमियत पर बड़े-बड़े मैसेज भेजा करते थे ,

इंसान के अख़लाक़ पर हिला देने वाले वीडियो शेयर किया करते थे !

हम उन उपदेशों पर अपने को आँकते रह गए

और वो उपदेशों के सैंसेशन बन ज़माने को हाँकते चले गए ।

एहसास

सुमेधा , की आँखों से आँसू थमने का नाम नही ले रहे थे , बच्चे भी माँ को देख सहमें से उसकी बगल में दुबक कर सो गए थे । पाँच साल की परी और दो महीने का मुन्ना उसकी दोनों बाहों का तकिया बना कर चुपचाप सो रहे थे । धीरज का कहीं कुछ पता नही था , कह कर गया था ऑफ़िस में देर हो जाएगी लेकिन कितनी देर होगी ये नही कहा था ।

हर रोज़ की तरह बाहर के कमरे से गालियों और शराब की दुर्गंध आ रही थी । सुमेधा ने अपने कमरे की भीतर से सिटकनी लगा ली थी । आज भी सुधीर को छोड़ने कुछ अंजान , टेढ़ी मुस्कान लिए , आर-पार करती नज़रों से सुमेधा को सिर से पाँव तक घूरते वो लोग वहीं मंडराते रहे थे और पूछा था ,

भाभी जी कौन हैं ये आपके ?

सुमेधा  उनकी नज़रों से भीतर तक काँप रही थी उसने थरथराते हुए जवाब दिया था जो वो कई बार नए-नए अजनबियों को दे चुकी थी ,

जी , मेरे पति के छोटे भाई हैं , ये ऑफ़िस से आते ही होंगे ।

उसने “ये ऑफ़िस से आते ही होंगे” पर खासा ज़ोर दिया था । उसके तन को भेदती वो अजनबी नज़रें उसे घूर रही थीं जैसे वो निरवस्त्र हो । वो तेज़ी से भीतर कमरे में आई और कमरा बंद कर लिया था । परी भयभीत सी सुमेधा से चिपक गई थी , मुन्ना माँ की छाती से चिपका उसकी धड़कनें महसूस करता खोया सा उसे ताक रहा था ।

पता नही वो लोग गए या वहीं हैं लेकिन उसका भय कायम था । उसकी शादी के बाद से ये सिलसिला चल रहा था और आगे कब तक चलेगा वो नही जानती थी । उसने अपने लिए लड़ना सीखा ही नही था , कभी ज़रुरत ही नही पड़ी थी । पापा के रहते वो कितनी महफ़ूज़ थी । उसका चेहरा पढ़कर ही वो सब जान जाते थे लेकिन अब उसका चेहरा पढ़कर जानने वाला कोई नही था । उसे कुछ कहने की आदत ही नही थी , काश कोई ऐसा होता जो उसके दिल को समझ लेता , उसके सुख या दुख को जानता । धीरज इस बारे में कुछ नही कहते थे , न ही सुनते थे । आज सब कुछ उसकी बरदाश्त से बाहर हो रहा था , वो अपने इन हालातों से मुक्ति चाहती थी । कोई रास्ता सूझ नही रहा था कि क्या करे , कैसे करे ? कोई नही था जिससे दिल हल्का करले , बस पापा को याद करते-करते रोती रही ।

कोई नर्म , मुलायम स्पर्श उसके पास बैठा और उसके सिर को सहलाता रहा , वही पापा का स्पर्श था , बड़ा सुखद एहसास , उसे कब नींद आ गई पता नही । सुबह मुन्ना की कुनमुनाहट से उसकी आँख खुली , परी अब भी गहरी नींद में सो रही थी । उसे याद आया कि धीरज ऑफ़िस से पहुँचा कि नही ? दरवाज़ा खोला तो देखा धीरज सोफ़े पर सो रहा था और सुधीर नदारद था ।

सुमेधा किचन में मुन्ने का दूध बनाने गई तो मुन्ने को झूले में लिटा गई । मुन्ना माँ को पास न पाकर रोने लगा तो धीरज की आँख खुल गई । वो ऑफ़िस के ही कपड़ों में सो गया था । किचन में आकर सुमेधा के पास खड़ा हो गया , सुमेधा मुड़ी तो उसे सामने देख कर घबरा गई ,

अरे , सॉरी , मुझे पता ही नही चला तुम कल रात कब लौटे । मैं दरअसल कल बहुत डर गई थी इसलिए कमरा अंदर से बंद कर लिया था । कब नींद आ गई पता ही नही चला । 

धीरज उसका मुँह देख रहा था ,

मेधा , तुम ठीक तो हो ? कल क्या हुआ , तुम बाहर का दरवाज़ा खुला छोड़कर क्यों सो गईं ? ये सुधीर कहाँ चला गया ?

सुमेधा की आँखें बरस रही थीं , उसने सुबकते हुए बीती रात का सारा किस्सा सुना दिया । धीरज चुपचाप सुनता रहा और एक लंबी , बेबस साँस छोड़ता हुआ कमरे में आया तो देखा कि सुधीर के बिस्तर पर एक ख़त रखा था ।

धीरज भाईसाहब और सुमेधा ,

मैं कल जब नशे में सोया था तो सुमेधा के पापा ने आकर मुझे हिलाकर उठाया और पकड़ कर बाहर ले गए । उन्होंने मुझ से कहा कि अगर मैं ये घर छोड़कर नही गया तो वो कुछ भी कर सकते हैं । उन्होंने मुझसे कहा कि उनकी बेटी सुमेधा की आँखों में आँसू का कारण तुम बने हो और ये मैं सह नही सकता

भाईसाहब सच मानिए वो थे सचमुच थे , मुझे बहुत डर लग रहा है , वो मेरा पीछा कर रहे हैं । मैं जा रहा हूँ , सुमेधा मुझे माफ़ कर देना , अब मैं तुम्हें सताने कभी नही आऊँगा ।

सुधीर

सुमेधा रोती जा रही थी , कल की बात तो उसने धीरज को बता दी थी लेकिन वो एहसास नही बताया था । क्या था वो एहसास जो अब भी उसकी परवाह कर रहा था , जो अब भी उसकी आँखों में आँसू नही देख सकता था ।

अजीब है ये ज़िंदगी

ये ज़िंदगी भी बड़ी अजीब है !

चलते – चलते बदल जाती है !

सोचते कुछ हैं तो कर कुछ और जाती है !

चाहते कुछ हैं तो दे कुछ और जाती है !

किसी को ख़्वाब बेशुमार तो किसी को ख़ुमारी दे जाती है !

हम पीछा किए गए इसका और ये हमें डॉज दिए जाती है !

किसी को थपकी दे-दे सुलाती है तो किसी को नींदों में डराती है !

ऐ ज़िंदगी , तू सचमुच बड़ी अजीब है !

आ हम पर भी कुछ करम कर , हमारे ख़्वाबों पर भी रहम कर ।

चल हमारे संग भी दो क़दम , कर लेंगे हम उसी में बसर ।

 

बेटी

बुल्लेशा गल ताईंयों मुकदी , जद मैंनूँ दिलों मुकाईये………

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में एक गाँव है कलोल । इस दूर दराज़ गाँव में बेटियों के लिए जो मुहीम चलाई जा रही है वो देखकर मैं नतमस्तक हो गई , उन लोगों के प्रति जिन्होंने इसे शुरू किया । मन चाहा कि इसे आप सब तक पहुँचाऊँ , शायद देश के किसी कोने में किसी ज़रूरतमंद बेटी के लिए हम भी कुछ कर सकें।

आज से तीन साल पहले कर्नल यशवंत सिंह चंदेल ने जब अपनी जवान बेटी मंजुषा को बीमारी में खोया तो दोनों पति – पत्नी टूट गए । इस दुख ने उन्हें गहरा घाव दिया था । खेत के हर पत्ते और बाग़ के हर फूल में मंजुषा का चेहरा दिखता था । जीवन बोझ लगने लगा था । गाँव में अपने आस – पास कई बेटियाँ या मंजुषा की सखियाँ दिखतीं तो उसकी याद और गहरा जाती । तभी उनके दिल में विचार आया , हर बेटी में अपनी बेटी देखने का और इस तरह शुरू हुआ “मंजुषा सहायता केंद्र” । उन्होंने अपनी पेंशन और अपने दूसरे बच्चों की सहायता से ज़रूरतमंद लड़कियों को आर्थिक सहायता देकर पढ़ाने का काम शुरू किया । इन तीन वर्षो में वे गाँव – गाँव घूमकर ऐसे परिवार को ढूँढते हैं जिनके बेटी है लेकिन आर्थिक अभाव के कारण स्कूल नही जा रहीं । वे उन्हें स्कूल में दाख़िला दिलवाकर उनकी पूरी शिक्षा की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं । अभावों में रह रहे ऐसे परिवार जिन्होंने एक या दो बेटियों के बाद कोई और संतान नही की उन्हें सम्मानित कर आर्थिक सहायता पहुँचाते हैं । एक परिवार की ऐसी बच्ची जो न सुन सकती थी और न बोल सकती थी को उन्होंने कई साल पढाया , नौकरी लगवाई और फिर शादी करवाई । आज वो सुखी पारीवारिक जीवन न्यतीत कर रही है ।

कर्नल साहब कुछ ग़रीब प्रतिभाशाली लड़कों की भी परवरिश कर रहे हैं । यही नही पति – पत्नी गाँव के लोगों की हर प्रकार से सहायता करते रहते हैं । कोई भी गाँव का व्यक्ति आर्थिक अभाव के कारण इलाज के बिना न रहे , उसकी जान ना जाए इस बात का वो पूरा ध्यान रखते हैं । ख़ुद आज के इस “और मिल जाए” के युग में दोनों पति-पत्नी सादगी भरा जीवन व्यतीत करते हैं । कबीर , नानक और बुल्लेशा के प्रशंसक हैं , उन्हीं को अपना पथप्रदर्शक मानते हैं ।

एक म्हाको फूल प्यारो , अधखिलो कुम्हला गयो ।

सोग बीतो , हरख छायो , फूल बाग लगा गयो ।

क्या खोया , क्या पाया

कुछ खोया सा है ,

मन कुछ ढूँढ रहा है ,

आँखों में कुछ इंतज़ार सा है ,

धड़कनें क्यूँ बेहिसाब सी हैं ?

यूँही भटक जाना ,

सब कुछ भूल जाना चाहता है दिल ।

किसी को कुछ समझाना ,

कुछ बतलाना ,

कुछ भी तो नही चाहता है ये मन !

फिर भी क्या खोया और क्या ढूँढ रहा है ये मन ?

चल छोड़ , चल दे यूँही , कहीं भी ,

किसी अंजान की मुस्कान बन ,

किसी बेनाम की आँखों में तैरते आँसू को ऊँगली पर उतार ले ,

कुछ उलझते दिलों को सुलझा दे ।

पाया-खोया का हिसाब छोड़ ,

अपनी धड़कनों को विराम दे ।

 

रुद्राक्ष

 

धौलाधार की चोटियों पर बर्फ़ गिरते ही पालमपुर में बारिश शुरू हो गई थी । अब बारिश हुई तो घर के बरामदे में बैठे प्रोफ़ेसर साहब अपनी पत्नी के साथ सूजी का हलवा खाने का इंतज़ार कर रहे थे । उन्हें गरम – गरम चाय की तलब भी हो रही थी । हलवे की खुशबू नाक से होती हुई दिल तक पहुँच रही थी कि तभी संध्या टेबल पर ट्रे रखकर पास ही बैठ गई ,

तुम बिन कहे सब कुछ कैसे समझ जाती हो ?

ये कहते हुए प्रोफ़ेसर साहब आँखें मूँदे , हलवे का मज़ा लेने लगे । कुछ देर बाद अजीब सी ख़ामोशी महसूस हुई तो आँखें खोल कर उन्होंने संध्या को देखा। वो कुछ कुछ खोई  सी पहाड़ियों पर जमी बर्फ़ को एकटक देख रही थी ।

क्या हुआ ? क्या सोचने लगीं ?

प्रोफ़ेसर साहब के कहने पर संध्या का ध्यान टूटा…..वो चाय का कप होठों से लगाते हुए बोली ,

क्या पैंतीस साल बाद , आप….मेरे मन की बात बिन कहे…समझते हैं ?

इस बार चौंकने की बारी प्रोफ़ेसर साहब की थी , संध्या गंभीर थी !! वो कुछ अटकते हुए से बोले ,

हाँ……अब साईंस वालों को…..इतना भी इनसैंसीटिव मत समझो ।

तुम कहीं जाना चाहती हो ।

इतना कह वे संध्या की ओर देख  ,  मुस्कुरा दिए , पर उसकी नज़र अब भी बर्फ़ से ढकी पहाड़ियों पर थी । वो बिना पलक झपकाते हुए बोली ,

मैं ऋषिकेश जाना चाहती हूँ ।

हाँ तो चलते हैं ना….मैंने तो कितनी बार कहा तुमसे , पर तुम बच्चों को छोड़ना ही नही चाहती थीं । अब तो बच्चे सैटल हो गए हैं , तुम फ़्री हो ।

प्रोफ़ेसर साहब ने संध्या का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा , तो संध्या पहाड़ से अपनी नज़रें  हटाकर बोली ,

हमेशा के लिए चलेंगे सब कुछ छोड़ कर…?

प्रोफ़ेसर साहब के हाथ की पकड़ कस गई ,

अरे…..संध्या जी आपके साथ हम कहीं भी चलेंगे…..तू जहाँ जहाँ चलेगा मेरा साया साथ होगा…..

गाते हुए प्रोफ़ेसर साहब हँस दिए ।

ये मज़ाक नही , मैं सीरियस हूँ….

संध्या ने उनकी आँखों की गहराई को नापते हुए कहा ,

तुम हमेशा वो फूलचट्टी आश्रम की बात करते हो , वहाँ वृद्धाश्रम में हर महीने कुछ भेजते भी हो ।वहीं चलते हैं , मुझे गंगा के पास रहने का बहुत मन है।

बारिश थम गई थी , बादलों से चमकते सूरज की गुनगुनी धूप अब चोटियों पर पड़ रही थी जैसे किसी ने चाँदी का वर्क उढ़ा दिया हो।

बच्चों से बात करलें ।

प्रोफ़ेसर साहब ने कहा तो संध्या ने उनकी ओर देखा ,

बच्चों से क्या पूछना…? उन्हें क्या प्रॉबलम होगी ? वैसे भी हम उनके मम्मी पापा हैं , वो हमारे नही !!   

पहली बार संध्या को अपने फ़ैसले पर अटल देख कर उन्हें अच्छा लगा । शायद उन्होंने अभी तक उसे ठीक से पहचाना ही नही था….दोनों गृहस्थी में ऐसे उलझे कि एक – दूसरे के मन से अंजान हो गए !!

प्रोफ़ेसर साहब और संध्या विचार कर रहे थे कि अब तक तो बस सिर्फ़ अपने और अपनों के लिए ही जीते रहे । सभी ये करते हैं…!! सोचते थे कि बाकी बचे जीवन को कुछ मायने दे दें । आज तक के फ़ैसले भी उन्होंने मिल कर ही लिए थे फिर ये तो उनकी ज़िंदगी का अहम फ़ैसला था । सोच – विचार के बाद दोनों ने फ़ैसला लिया कि यहाँ से दूर जाएँ , जहाँ “मेरा” कुछ न हो । प्रोफ़ेसर साहब , संध्या को देख मुस्कुरा दिए , जैसे पहली बार उन्हें देख कर मुस्कुराए थे। तब भी नई ज़िंदगी में कदम रख रहे थे और आज भी….. दोनों ने “मैं” और “मेरा” से दूर जाने का फ़ैसला कर लिया…..ऋषिकेश आश्रम में जाने का फ़ैसला ।

सारे इंतज़ाम हो गए हैं , बच्चों को भी ख़बर कर दी है । एक हफ़्ते बाद की बुकिंग मिली है , तब तक मैं बाकी बचे काम भी निपटा लेता हूँ।

प्रोफ़ेसर साहब ने कहा तो संध्या सामान समटने में लगी थी । सिर हिला कर हाँमी भरती  रही , उसके भीतर न जाने क्या-क्या सिमट रहा था । सालों इस घर को समेटने में लगे थे और अब उसमें से कुछ सामान समेटना आसान नही था । तभी घर के बाहर गाड़ी के रूकने की आवाज़ आई , उनका बेटा सिद्धार्थ था। बड़ा हो गया , पर वही आदतें , बेसब्रों की तरह घंटी बजाना , जब तक कि दरवाज़ा खुल नही जाता ।

तू क्या अंधेरे में ही चल दिया , जो इतनी सुबह पहुँच गया ?

प्रोफ़ेसर साहब ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा तो सिद्धार्थ भरे गुब्बारे की तरह फूट पड़ा ,

क्या करता , आपका फ़ैसला सुनकर बेचैनी बहुत बढ़ गई थी ।    

उसकी बेचैनी , परेशानी चेहरे पर साफ़ झलक रही थी । संध्या उसके लिए किचन में कुछ बनाने चल दी ,

भूख लगी होगी , पहले कुछ खा ले , भूखे पेट तुझे बहुत गुस्सा आता है । फिर आराम से बात करते हैं ना ।

सिड , सिर झटकते हुए , माथे पर त्यैंरियाँ बिखेरे , डायनिंग टेबल पर बैठते हुए बोला ,

मेरी फ़िक्र भी है…..और छोड़कर भी जा रहे हो , क्यूँ जा रहे हो…? यहाँ मन नही लगता तो कुछ दिन सोनल के पास और कुछ दिन मेरे पास आकर रहो ना ।

उसकी आवाज़ में कहीं  परेशानी के साथ खीज भी थी । दोनों उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे कि सन्यास नही ले रहे वो , सिर्फ़ मोह के धागों को सुलझाना है , अपने जीवन को कुछ मायने देना चाहते हैं । सिद्धार्थ कितना समझा पता नही लेकिन थक कर माँ की गोद में सो ज़रुर गया ।

मोह के धागे भला इतनी आसानी से कहाँ सुलझते हैं ? सुबह तो आई थी पर कई सवाल ले कर । सूरज आज कुछ घबराया सा पहाड़ के पीछे से निकला ही नही । सिड तैयार हो रहा था उसे आज जाना था ,

पापा ये टिकट वगैरह कैंसिल कराइए । कहीं नही जा रहे आप ।

रिटायर होने पर कौन ऐसा करता है ? सोनल कह रही थी कि वो बहुत बिज़ी चल रही है , लेकिन मम्मी – पापा नही मानते तो मैं आती हूँ ।

सिड ने बड़ी समझदारी दिखाते हुए कहा था ,

आप दोनों को अब आराम करना चाहिए वरना लोग कहेंगे कि बच्चे नालायक हैं इसलिए दुखी हो कर माँ – बाप घर छोड़ कर ऋषिकेश चले गए ।   

अब तक सब का ही तो सोचा था उन्होंने आज कुछ अपने मन का सोचने चले थे । बच्चों और पालमपुर को छोड़कर कैसे रह पाएँगें ? संध्या तो कभी पालमपुर छोड़कर निकली ही नही थी । बेगाने लोगों में कैसे रहेंगे ? कितने सवाल सामने खड़े थे । फिर सिद्धार्थ ने माँ के पास आकर धीरे से कहा ,

मम्मी…..आप भी पापा का साथ दे रही हैं ! निकाल दो मन से ये बेकार की बात और पापा को समझाओ , प्रैक्टिकल होकर सोचो । अगर आप गए ना….तो मैं वहीं पहुँच जाऊँगा आपके पीछे ।

संध्या ने प्यार से उसका सिर सहलाते हुए कहा था ,

देख , तुम दोनों बहन-भाई अब इंडिपैंडैंट हो , हम बहुत खुश हैं तुम्हारे लिए । हमारा मन अब अपने जीवन का अर्थ ढूँढना चाहता है , अपने आप को तलाशना चाहता है । हम तुम से नाराज़ होकर नही जा रहे ।

लेकिन सिड अपना फ़ैसला सुना कर कि आप कहीं नही जा रहे , चला गया । ज़िंदगी चलती रहे तो कितनी खूबसूरत है रूक जाए तो थमी हवा सी घुटन भर देती है । वही घुटन शायद वे दोनों भी मेहसूस कर रहे थे । प्रैक्टिकल होकर सोचो ? क्या ज़िंदगी यहीं थम कर रह जाने दें ! क्या यहीं जीवन को विराम लगा दें ? लेकिन बच्चों के मन का क्या होगा ! विचारों में उलझे दोनों सामान वापस अलमारी में रखने लगे । बच्चों का दिल कैसे तोड़ दें !! सोनल और सिद्धार्थ बहुत खुश थे कि उन्होंने जाना रद्द कर दिया । लेकिन उन दोनों का मन ?

संध्या और प्रोफ़ेसर साहब आँखें खोले छत ताक रहे थे । दोनों के मन में एक सी हवा बह रही थी , ख़ामोश , मगर आस पास ।

दोनों ने हसरत से आसमान को देखा बादल सूरज को कहाँ रोक पाए , धूप सिर्फ़ उनके आँगन में नही थी दूर तक फैल गई थी। दोनों ने एक दूसरे को देखा प्रोफ़ेसर साहब आर्मचेयर पर बैठे डूबे से बोले ,

संध्या जीवन के अंत का इंतज़ार करें या इंतज़ार का अंत करें ?

पति के सवाल के जवाब में वो खुद भी उलझी थी ,

संध्या और प्रोफ़ेसर साहब के दिलों में भावनाओं का कुरूक्षेत्र बना हुआ था । सोनल का फ़ोन आया तो भावनाएँ भँवर बन गई ,

ये संयास – वंयास सब किताबों में अच्छे लगते हैं , कितना मुश्किल होगा अचानक अंजान लोगों के साथ रहना ! सिड ठीक कह रहा था छ: महीने मेरे पास और छ : महीने सिड के पास अच्छा टाईम पास हो जाएगा आपका ।

ज़िम्मेदारी बाँट ली थी दोनों बच्चों ने । लेकिन क्या , अब टाईम पास करना जीवन का मक़सद बन जाएगा ! मन ने पूछा , कहाँ जा रही है ? जवाब मिला ज़िंदगी को तलाशने , ख़ुद को ख़ुद से मिलवाने ! पर ये मोह छोड़ता ही नही ! कैसा मकड़जाल है ये ! दिन-दिन मोम सा गलता जीवन….ये मन पतंगा , रोशनी की मोह में ख़त्म हो गया ! किसी के काम न आया…ख़ुद ने भी क्या पाया ?  सिर्फ़ अंत ! संध्या का मन जकड़ गया , वो छूटने की कोशिश करने लगी ।

धीरे – धीरे भावनाएँ युद्ध में हारे कौरवों की तरह पस्त होने लगीं । जकड़न ढीली पड़ने लगी । संध्या ने एक गहरी साँस ली , दोनों एक बार फिर उठे । संध्या बच्चों का कमरा बंद करने लगी तो  दीवारों को देखा जिन पर अब कोई निशान नही थे पर उनके बचपन की गूँज अब भी वहाँ थी जो उसके दिल में भी थी । उनके नाम की प्लेट वैसे ही लटक रही थी “सोनल” , “सिद्धार्थ”। किचन को देख चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई अपनी कलाई पर जले निशान को देखा और दरवाज़ा बंद कर दिया । पालमपुर से चंडीगढ़ के सफ़र ने काफ़ी थका दिया था उन्हें । प्रोफ़ेसर साहब की नज़र संध्या पर पड़ी तो देखा वो सिर बैग से टिकाए ऊँघ रही थी । वो पहली बार ट्रेन से इतना लंबा सफ़र कर रही थी । उन्होंने धीरे से संध्या के सिर के नीचे से बैग हटा कर तकिया लगाया तो उसकी आँख खुल गई । उसे चादर उढ़ाते हुए बोले ,

ठीक से सो जाओ…तुम बहुत थक गई हो ।

वो मुस्कुरा दी , सब सो गए थे ,

तभी अंधेरे कूपे में एक पल को रोशनी आई , शायद कोई स्टेशन था । साथ की सीट पर लेटे प्रोफ़ेसर साहब की ओर उसकी नज़र गई । वही चेहरा जिसमें सिर्फ़ प्यार था ।

दोनों के बीच अगर कभी बहस हुई भी तो बच्चों को लेकर ही हुई , उसमें भी उनका प्यार ही था ,

तुम कुछ ज़्यादा नही करती हो इनके लिए !  हर वक्त इन्हीं में उल्झी रहती हो ! ताउम्र हम इनके साथ नही होंगे । अपने लिए भी समय निकाला करो ।

पर वो तो माँ बनने के बाद , सब कुछ भुला बैठी थी । उसकी सबसे प्यारी सहेली की शादी थी दिल्ली में , कितना मन था उसका जाने का ।  

पर उन्हीं दिनों सोनल और सिद्धार्थ के एग्ज़ाम थे ।

बच्चों का बहुत हर्ज़ होगा…..रहने दो….

और वो नही गई , दोनों बच्चों में ऐसी रमी कि माँ से मिलने भी कम जाती । कहीं बच्चों की पढ़ाई में ख़लल न हो , कहीं उन्हें खाने की परेशानी न हो , यही सोचती रहती । आज कैसे वो अपने बच्चों से दूर जा रही है उन्हें छोड़ कर !!

ट्रेन सब कुछ पीछे छोड़ती आगे भाग रही थी और संध्या आँखें मूँदे अपने पीछे छूटे हुए पलों में डूब रही थी ,

शादी करके जब वो शिमला से पालमपुर आई थी तो उसे पालमपुर गाँव सा लगा था । एक छोटा सा बाज़ार जिसमें शिमला सी चहल-पहल नही थी , कोई बड़ी बिल्डिंग नही , चारों ओर फैले टी गार्डन्ज़ । सूरज ढलते ही फैला सन्नाटा उसे बड़ा खलता था । फिर कब उस जगह से उसे प्यार हो गया पता नही।

वो मन ही मन मुस्कुरा दी ,

एक बार कैसे उसके मन में कांजीवरम पहनने की लालसा पैदा हुई और पैसे जमा करने लगी ,

सुनो , जब सोनल की शादी होगी ना , तो मैं कांजीवरम साड़ी और कुंदन का सैट पहनूँगी । वैसे ही जैसे रेखा पहनती है….कितनी एलीगैंट लगती है ना !!

पति ने भी हँस कर कहा ,

अजी आप किसी रेखा से कम हैं क्या…!!

वो भी हँस कर टाल गई। लेकिन जब सोनल के अमेरिका जाने में पैसे कम पड़े तो उसने वही जमा पैसे निकाल कर पति के सामने रख दिए ,

ये कुछ पैसे मेरे पास हैं , शायद काम आ जाएँ ।

पर ये तो तुमने अपने लिए जमा किए थे , ये नही लूँगा ।

प्रोफ़ेसर साहब ने कहा तो उसने कहा था ,

मेरे सपने तो मेरे बच्चे हैं , कांजीवरम और कुंदन का सैट नही !!

उसने बात हँसी में उड़ा दी थी । मन की संध्या ने कभी सुनी ही नही । समय पानी सा बह गया और वो बर्फ़ सी जमी रह गई ।

संध्या का मन भी समय के साथ बहना चाहता था । इसीलिए शायद अब वो गंगा के साथ जीना चाहती थी । रात के ग्यारह बज रहे थे , सोनल का फ़ोन अक्सर रात को ही आता , तब अमेरिका में सुबह होती थी । तभी फ़ोन बजा तो समझ गई कि सोनल का होगा उसकी आवाज़ आई ,

मम्मी….कहाँ हो आप ?

ट्रेन में हैं बेटा..ऋषिकेश जा रहे हैं ।

संध्या ने धीरे से कहा लेकिन उधर तो सोनल जैसे चिल्ला पड़ी ,

क्या कह रही हो ! क्यूँ मम्मी ? आप ऐसा नही करोगे । मैं आ रही हूँ ।

ये कह कर सोनल ने फ़ोन रख दिया । जानती थी कि उसे उनका ऋषिकेश जाना अच्छा नही लग रहा था । उनके लिए भी आसान कहाँ था ये बदलाव !! पता नही रह पाएँगे कि नही ? कितने अंजाने भय मन को मथते जा रहे थे ।

स्टेशन आया तो दोनों ने उतर कर ऋषिकेश की टैक्सी ले ली । पालमपुर पीछे छूट गया था , रह-रह कर सिड और सोनल की बातें याद आ रही थीं । दिल में कहीं घबराहट थी। नए लोगों में कैसे रहेंगे ! दिमाग़ ने कहा “ चल अब भी वापस मुड़ जा” !!  दिल कुछ भारी सा हुआ । संध्या ने पास बैठे पति का हाथ थाम लिया , कुछ राहत सी मिली । फूलचट्टी आश्रम आ गया था , दोनों ने एक दूसरे को देखा और आगे बढ़ गए । भीतर गए तो कुछ कमज़ोर , उम्र का लंबा सफ़र तय किए शरीर देख , एक बार को दोनों सहम से गए । इतनी सच्चाई से पहली बार सामना हो रहा था । संध्या सोच रही थी कि जीवन भर घर में सबका करती रही पर अब उसके कदम क्यूँ काँप रहे थे !  ”क्यूँकि वो तेरे अपने थे ? ये तेरे क्या लगते हैं ?” मन हँसा था “तू तो “मैं” और “मेरा” छोड़ कर आई थी ? “ काँपते हाथों से उसने अपने माथे का पसीना पौंछा । रातभर नींद नही आई , उसे अपने बिस्तर की आदत जो थी । सुबह गंगा किनारे जाने लगी तो एक और जोड़ी हाथ सहारा माँग रहे थे । उसने मुस्कुरा कर हाथ बढ़ाया और नपे कदमों से चलकर उनके साथ किनारे बैठ गई । कितनी चमक और खुशी थी उन आँखों में । संध्या के दिल को कैसा सुकून मिला था । प्रोफ़ेसर साहब एक कोने में व्हीलचेयर पर बैठे बुज़ुर्ग को अख़बार पढ़कर सुना रहे थे । बीच बीच में दोनों की मिलीजुली हँसी भी हवा में बह रही थी । कितना अनोखा एहसास था किसी और को अपने हाथों से खाना खिलाने का !! बच्चों का बचपन याद आ गया था । किसी को नहला कर कपड़े बदले तो वही सिड की ज़िद ! उसके चेहरे पर हँसी आ गई थी । नए एहसासों से जीवन भरने लगा । तभी एक दिन सिड और सोनल को आश्रम के दरवाज़े पर खड़े पाया था । पास आकर उन्होंने कहा था ,

हम आपको वापस लेने आए हैं…., प्लीज़ घर वापस चलिए ।

संध्या और प्रोफ़ेसर साहब ने एक दूसरे की ओर देखा , उनकी आँखों में कितना सुकून था , कितनी संतुष्टि थी । उनका दिल तो अब इन अपनों में रम गया था , यही उनका घर – संसार हो गया था । संध्या का हाथ एक बुज़ुर्ग महिला ने थाम रखा था और वो उन्हें न जाने किस उम्मीद से ताक रही थीं । एक बुज़ुर्ग बिस्तर पर लेटे टूटती सी आवाज़ में प्रोफ़ेसर साहब को पुकार रहे थे जिन्हें वो हर रोज़ अख़बार और किताब पढ़ कर सुनाते थे । दोनों ने एक नज़र अपने बच्चों पर डाली और फिर अपनी उम्मीदों की ओर देखा जो हसरत से उन्हें ताक रहे थे । प्रोफ़ेसर साहब ने बच्चों की ओर कदम बढ़ाया तो संध्या उन्हें अचरज से भीगी नज़रों से देखती रही । प्रोफ़ेसर साहब ने बच्चों को गले से लगाया और मुड़कर उन बुज़ुर्ग की ओर चल दिए जो उन्हें पुकार रहे थे । संध्या के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी , वो अपना हाथ थामे उस बुज़ुर्ग को लिए बच्चों की ओर बढ़ीं और दोनों के माथे को चूमते हुए बुज़ुर्ग महिला को प्यार से थामें गंगा की ओर बढ़ गईं । सोनल और सिद्धार्थ ने भीगी आँखों से अपने जन्मदाताओं के इस नए जीवन के उदय को नमन कर विदा ली ।