स्कूल की यादों की कड़ी

स्कूल की यादों की कड़ी में मुझे वो प्रकृति को अपनी सखी सहेली समझना सबसे प्यारा लगता था , शायद तभी से प्रकृति से गहरा प्रेम हो गया था । हमारे बोर्डिंग स्कूल का दायरा बहुत बड़ा था , वह कई किलोमीटर तक फैला था । उसी में हमारी सारी दुनिया थी , एक छोटा सा एयरपोर्ट , एक छोटी नदी जिसमें कभी कभी नाव चलाने जाते थे । थोड़ी दूर एक टीले पर  ब्रह्म मंदिर था जो बेल के और इमली के पेड़ों से घिरा हुआ था । हम समय मिलने पर अक्सर वहाँ जाया करते थे , वहाँ जाना हम सबको बहुत अच्छा लगता था । सबसे मेरा मतलब मुझे और मेरी सहेलियों को । पेड़ से तोड़ कर इमली खाने का मज़ा ही कुछ और था । मैं अपनी सहेलियों में सबसे लंबी थी तो पेड़ पर चढ़ कर तोड़ने का काम मेरा होता । हॉस्टल से स्कूल की ओर जाते-आते आँवले के पेड़ थे , उनके टेढे-मेढ़े तनों पर बंदर की तरह चढ़ कर आँवले तोड़ना बेहद ज़रूरी होता । उसमें भी खेल मिल गया था , एक आँवला खाते और फिर पानी पीते तो पानी मीठा लगता , बस यही करते रहते । आप भी आज़मा कर देखिये , सच में बड़ा मज़ा आएगा !

हॉस्टल के आस-पास कचनार के पेड़ थे जब उनके खिलने का मौसम आता तो वो गुलाबी फूल इतने सुहाते कि बकरी की तरह तोड़ – तोड़ कर चबा जाते । लाल-लाल माणिक से झाड़ियों में लटकते बेर के गुच्छे देख कर मुह में पानी आ जाता और अपने हाथों का छिलना – कटना सब भूल कर झाड़ियों में मधुमक्खियों की तरह चिपटे रहते और अपनी जेबें भर लेते । फिर इत्मिनान से बैठ कर खाते तो उसी में जीवन का सबसे बड़ा सुख मिलता । अब सोचते हैं तो पाते हैं कि बड़े-बड़े गैजेट्स पाकर भी बच्चे खुश नही हो पाते ।

सुबह आँख खुलती तो मोरों की पीकू पीकू की आवाज़ से । वो हमारे इर्द-गिर्द ऐसे बेख़ौफ़ होकर घूमते थे जैसे हम में से एक हों । हम उनके उपहार स्वरूप छोड़े गए पंखों को अपनी जायदाद समझ कर बीनते रहते ।

बसंत पंचमी के दिन पीले ही कपड़े पहनते और हमें खाने में पीले मीठे चावल मिलते । इससे जुड़ा एक किस्सा याद आता है ,जब मैं छटी-सातवीं में रही होंगी । बसंत पंचमी पर उस बार माँ किसी कारणवश मुझे पीली फ्रॉक नही भेज पाईं । अब मुझ से अधिक मेरी सहेलियों को फिक्र थी कि मैं क्या पहनूँगी ? अगले दिन बसंत था , मैं उदास बैठी थी , मेरा उतरा मुँह देख कर मेरी सखियाँ परेशान थीं । तभी मेरी सहेलियों ने हॉस्टल में सबसे पीले ड्रॉइंग कलर इकट्ठा कर लिए और एक बाल्टी में घोल दिए । मेरी एक सफ़ेद फ्रॉक थी , बस फिर क्या था उसे उसमें डुबो दिया गया । एक घंटे बाद निकाल कर उसे सुखाया गया और प्रेस करने के लिए बिस्तर पर गद्दे के नीचे दबा दिया । सुबह जब निकाला तो पीली फ्रॉक तैयार थी , हाँ , परफ़ेक्ट नही थी लेकिन बुरी भी नही थी । मैं खुश थी कि आखिरकार मैंने पीली फ्रॉक पहनी , मेरी खुशी में मेरी सहेलियां भी खुश थीं । आखिर हमने पूरे उल्लास के साथ बसंत मना ही लिया  ।

माला जोशी शर्मा

स्कूल की यादें

बचपन की यादें एक ठंडी हवा के झोंके की तरह होती है जो तन-मन को ताज़ा कर जाती हैं । विशेषकर स्कूल में बिताए दिन हमारे व्यक्तित्व पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं । वो टीचर हमारा व्यक्तित्व बनाते हैं , वो मित्र दिल के सबसे करीब होते हैं ।
मेरी स्कूली शिक्षा बोर्डिंग स्कूल में हुई इसलिए शायद उसकी छाप भी बहुत गहरी है । याद करती हूँ तो पाती हूँ कि आज ऐसा वातावरण मिलना मुश्किल ही नही नामुमकिन सा है । हमारा स्कूल गाँधी जी की विचारधारा का स्कूल था (अब भी है )। खादी पहनना आवश्यक था जो अब तक है क्योंकि हमारे स्कूल के प्रमोटर पंडित हीरालाल शास्त्री जी स्वतंत्रता सेनानी थे ।
2 अक्टूबर और 30 जनवरी हमारे लिए बड़ा खास दिन होता था । 30 जनवरी हम श्रम दिवस के रूप में मनाते थे । उस दिन अपने हॉस्टल , स्कूल की सफ़ाई के साथ-साथ और भी काम करते थे जैसे एक बार हमने एक तालाब बनाने का काम शुरू किया था आज वहाँ पिकनिक स्पॉट है । तभी से अपना काम स्वयं करने की आदत और स्वच्छता का महत्त्व भी सीखा । वो शिक्षा किताबों से बाहर की थी जो जीवनभर काम आई । आज हमारे स्कूल केवल किताबी ज्ञान की ओर भाग रहे हैं बच्चे का बहुमुखी विकास होता ही नही । उसके भीतर छिपी प्रतिभा छिपी ही रह जाती है और स्कूल केवल 90 प्रतिशत और उससे बेहतर की होड़ में बच्चों को धकेल रहे हैं ।
मैं वो दिन नही भूल पाती जब हमारी सामूहिक सर्वधर्म प्रार्थना हुआ करती थी जिसमें हम हर धर्म की प्रार्थना पढ़ा करते थे । बाइबिल , कुरान , जैन धर्म , बोद्ध धर्म ,गुरुग्रंथ साहब , गीता , रामायण आदि सभी धर्मों से अंश पढ़ते थे । अंत में रघुपति राघव राजा राम से समापन करते थे । यही नींव थी जिसने हमें हर धर्म का सम्मान करना सिखाया था । कहाँ हैं आज वो संस्कार जो स्कूल को देने चाहिए ?
यही नही स्कूल के ऐसे अनगिनत किस्से हैं जिसने हमारी सोच को पंख लगाए और हमें एक अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास किया , देशभक्ति का सही मायने समझाया ।

माला जोशी शर्मा

तेरे मेरे सपने

हम दिल पर बोझ ढोए चले जाते हैं

अपना बोझ दूसरों पर डाले चले जाते हैं

बचपन अच्छा था , दिल बड़ा हल्का था

दूसरों के सपनों का बोझ कहाँ अपना था ?

अब घरों में सपने समाते नही , अपने बच्चों में बाँट देते हैं हम

उनके सपनों पर अपने रंग चढ़ा देते हैं हम

लाल रंग लाल है , नीला नही , पीला चमकदार है , काला नही

क्यों , हम ये समझ पाते नही ?

क्यों उनके सपनों को बेरंग बना देते हैं हम ?

मेरे सपने क्यों मेरे नही , उसके सपने क्यों उसके नही ?

सफ़ेद रंग में हर रंग चढ़ा देते हैं हम

दिल का बोझ यूँही बढ़ा देते हैं हम ।

उसके सपनों पर उसका हक है , उसमें केवल उसका वजूद है

क्यों उसके वजूद को हिलाए जाते हैं हम

अपनी परझाई क्यों उसमें देखना चाहते हैं हम ?

क्यों अपना बोझ उसके कांधे पर डाले चले जाते हैं हम ?

 

रायसाहबणी

 

बहुत दिनों से दिल पर रह-रह कर बचपन की कुछ पुरानी यादें दस्तक दे रही थीं । शहर की हापा-धापी में वो गाँव के पुराने दिन बहुत याद आ रहे थे । वे यादें एक ठंडी हवा के झोंकें की तरह दिल को गुदगुदा गई थीं , उन दिनों में फिर से जीने को मन मचल उठा और मैं चल पड़ी । मन बहुत खुश था कि मैं एक बार फिर उन लम्हों को जीने जा रही थी । घर के सामने पहुँचते ही दिल की धड़कनें बढ़ गई थीं , किसी अनजाने भय का कुछ सूनापन सा उस बेरंगे दरवाज़े पर नज़र पड़ते ही महसूस हो रहा था । यादों और यथार्थ में बहुत अंतर होता है । मैंने जैसे ही गाँव की उस जरजर हुई हवेली के विशाल दरवाज़े को भीतर जाने के लिए धकेला तो उसमें लगे बड़े-बड़े पीतल के कुंडे और सांकलें खड़कने लगे और दरवाज़ा चरमराहट की तीखी आवाज़ से थोड़ा सा खुल गया वैसे ही जैसे किसी के लंबे समय के गहरे घावों को छू दिया हो और कराह निकल गई हो । उसकी हर आह , उसका हर दर्द मैं भीतर तक महसूस कर रही थी । दरवाज़ा थोड़ा सा खुलकर अटक गया जैसे अपने हालात छिपाना चाहता हो , कभी वो भी नीले रंग में चमकता , मधुमालती की लताओं से लिपटा , गर्व से खड़ा आने-जाने वालों के दिलों में भीतर की दुनिया को जानने के लिए कौतुहल पैदा करता था । भीतर प्रवेश के लिए लठ वाले दरबान से इजाज़त लेनी पड़ती थी । मैं टेढ़ी होकर भीतर घुस गई क्योंकि आज वहाँ कोई दरबान नही था और वैसे भी मुझे यहाँ प्रवेश के लिए कभी इजाज़त नही लेनी पड़ती थी । घुसते ही एक बड़ा नीम का पेड़ स्वागत करता था जिसके चारों ओर ऊँचा चबूतरा बना था । आज वहाँ टूटा चबूतरा तो है लेकिन नीम का पेड़ कटा पड़ा था , उसका सूखा , मोटा तना समय की दरारों से छिन्न-भिन्न हो चुका था । वो उम्र से नही मानवीय चोट से आहत था । याद आ रहा था कि कभी हम इसकी मज़बूत टहनियों पर झूला डाल कर दिनभर झूलते थे , जिसकी छाल को न जाने कितनी बार छील कर चबूतरे पर घिसा था अपने ज़ख़्म भरने के लिए लेकिन आज वो आहत मेरे सामने राख़ पड़ा था । कहाँ उसकी पीली मीठी निबौरियों को झोली में भरकर खाते थे वहीं आज एक बीज भी नही फूट रहा था । सामने रहट वाला कुआँ था , नज़र दौड़ाई तो टूटा रहट एक ओर पड़ा देखा और उसके डब्बे जंग खाए टेढ़े-मेढ़े लटक रहे थे । एक पल को लगा कि जैसे अभी पानी भर कर छनछनाते हुए चल पड़ेंगे । मेरे कानों में गाँव की गोरियों के छैल-कड़ूलों की आवाज़ गूँज रही थी , साथ ही गूँज रहे थे उनके कंठ से निकले लोकगीतों की आवाज़ें……..

मेरे सिर पे बंटा टोकणी ,

ओ मेरे हाथ में नेजू डोर ,

मैं पतली सी कामनी…….

उनके लहराते , रंग-बिरंगे , छत्तीस कली के घाघरे एक लय में मेरी आँखों के सामने घूम रहे थे । धीरे-धीरे गुम होते वो गीत न जाने कहाँ चले गए और कुएँ के चारों ओर फैला सन्नाटा बोलने लगा । दूर से कहीं मुझे जीजी की खनकती मीठी आवाज़ आ रही थी ,

बेबड़….ओ बेबड़ , कहाँ मर गई ! सारा दिन चबूतरे पे बैठी इन लुगाईयों के गीत सुणती रहेगी या कुछ खाएगी भी , चल भीतर आजा अब ।

जीजी यानि मेरी नानी , जिन्हें घर में सब प्यार से जीजी ही कहते थे । मेरे कदम एक-एक कर पीछे के दरवाज़े से अंदर जाने लगे । अब वहाँ दरवाज़ा नही था और ना ही कोई पूरी दीवार , बस कच्ची-पक्की ईंटों का ढेर था । मैं संभल-संभल कर कदम रखती अंदर चली गई । छोटा सा गलियारा पार कर मैं आगे बढ़ी , सब कुछ तो मुझे पता था , वो सामने चूल्हे के पास मथनी रखी थी जहाँ जीजी हर सुबह , मुँह अंधेरे उठकर दूध मथती थीं । उनकी मथनी की आवाज़ आज भी कानों में साफ़ आ रही थी , घर्र…घर्र…घर्र और मैं आँखें मलती उनके पास बैठ जाती थी । वो अपने गोरे गुलाबी चेहरे पे मुस्कान लिए मुझे प्यार से देखतीं और मक्खन निकालते हुए मेरे मुँह में ताज़ा मक्खन डाल देतीं , काम ख़त्म हो जाने पर अपने मक्खन से भरे हाथों को मेरे मुँह पर लपेट देतीं , थोड़ी देर में ही छाछ लेने वालों की लाईन लग जाती । जीजी के पतले , गुलाबी होंठ मुस्कुरा उठते और मुझ से कहतीं ,

लाडो , जा छाछ देदे सबको ।

मैं गर्व से जीजी की गद्दी पर बैठ कर छाछ बाँटती तो ऐसा लगता मानो राजा की गद्दी पर बैठी प्रजा को इनाम बाँट रही हूँ । बस जीजी का दिन शुरु हो जाता , गाँव की औरतें , जिनमें अधिकतर गरीब और उपेक्षित समाज की होती थीं , अपने-अपने बच्चों को लेकर खड़ी हो जातीं । किसी के पेट में दर्द होता , किसी का हाथ उतर जाता तो किसी के फोड़े – फुन्सी निकल आते । जीजी के पास सब मर्ज़ की दवा थी , पता नही कैसे । बच्चे को इतने प्यार से गोद में लेकर सहलातीं और बच्चा रोता-बिलखता उनकी गोद में आते ही चुप हो जाता । लोग उन्हें प्यार से रायसाबणी दादी कहते । अब रायसाहब की पत्नी गाँव में रायसाहबणी हो गई थीं । कई बार तो लोग उन्हें रात को किसी भी समय बुलाने आ जाते ,

दादी , रायसाबणी दादी , बच्चा बहुत रो रहा है , पता ना के हो गया ।

और वो एकदम चल देतीं थीं फिर चाहे वो कोई भी क्यों न हो । उन्होंने उस समय में कभी भी जाति-धर्म का भेद नही किया था । यूँ तो उच्चकोटि की ब्राह्मण कुल की थीं लेकिन गाँधी जी के उस युग में वो पक्की गाँधीवादी थीं , वैष्णव जन तो तैने कहिए और रधुपति राघव राजा राम बड़े मन से गाती थीं लेकिन अपनी ही धुन में ।

बात देश की हो या समाज की वो बेहद जागरुक थीं , ये बात आज़ादी के बाद की थी जब हिंदुस्तान को आज़ादी के कुछ वर्षों बाद ही सन् 1962 में एक दर्दनाक युद्ध का सामना करना पड़ा था । चीन से जुड़ी सीमाओं पर ख़तरनाक परिस्थितियों में , युद्ध और विपरीत तापमान से लड़ने के लिए सैना के पास अभाव थे ऐसे में सैनिक सीमा पर जान गवाँ रहे थे । उस समय अरुणांचल प्रदेश को नेफ़ा कहा जाता था । घर-घर में लोग सैनिकों के लिए खाने का सामान , कपड़े और धन इकट्ठा कर रहे थे । मैं बहुत छोटी थी पर फिर भी पता नही कैसे मुझे जीजी का वो गीत याद है जिसमें उस समय का पता चलता है ,

उमड़-घुमड़ दूध बिलोवै ,

जाटनी का छोरा रोवै ,

रोवै है तो रोवण दे ,

माखन नेफ़ा जावण दे ।

वो गीत याद आते ही आज भी मेरे रोएँ खड़े हो जाते हैं ।

मिजाज़ की बड़ी शौकीन थीं जीजी , उनका गोल्डन फ्रेम का चश्मा , सफ़ेद मलमल की या शिफ़ोन की साड़ी बड़ी करीने से पहनी होती थी , ऊँचे-लंबे कद , दूधिया रंग और हल्की नीली आँखों में वो किसी महारानी सी लगती थीं । उनका हर काम बड़ा अनोखा होता था । माली हर रोज़ बाग से फलों के साथ मोतिये के फूल भी लाता था और वो मोतिए के फूल जीजी , गीले , मलमल के कपड़े में लपेट कर घर के बीचों-बीच रखी बड़ी सी लकड़ी की घड़ौंची पर रखे हर मटके के ऊपर रख दिया करती थीं । उन फूलों की महक से सारा दिन घर महकता रहता था । अब वहाँ केवल टूटा चूल्हा और टूटी घड़ौंची उजड़े खंडहर में पड़ी थीं । वहाँ से मेरे कदम ख़ुद-ब-ख़ुद जीजी के कमरे की ओर चल पड़े , कमरे के बाहर कदम ठिठक गए क्योंकि कमरे की छत से शहतीर नीचे लटक रहे थे जो कभी भी थोड़ी सी हलचल से नीचे गिर सकते थे । जीजी का हाथीनुमा निवाड़ का पलंग जो हमेशा उस कमरे की शोभा बना रहता था और हम सब भाई-बहनों के दरबार की तरह था , जहाँ जीजी सबसे दिनभर की ख़बरें जाना करती थीं । आज उस पलंग की जगह मिट्टी का ठेर था जो शायद छतों और दीवारों से गिरी होगी । उस पलंग के पाए उस समय हमारे कद से ऊँचे होते थे और हमें उस पर चढ़ने के लिए स्टूल का सहारा लेना पड़ता था । उसके पावों पर चाँदी के ढक्कन लगे थे , सिरहाने रंग-बिरंगे लकड़ी के नक्काशी के काम के साथ एक बड़ा सा आईना था जिसमें हम टेढ़ी-मेढ़ी शक्लें बना अपने को निहारा करते थे ।

वो ज़माना बिजली का ज़माना नही था , लालटेन , लैंप , दीए और हाथ से झलने वाले पंखे होते थे । ठंडक के लिए दरवाज़ों , खिड़कियों पर खसखस की चिकें लगी होती थीं । जीजी हम सबको उस पलंग पर घेर कर दोपहर की नींद लेती थीं , उनके हाथ का पंखा चलता रहता , जैसे ही पंखा उनकी पकड़ से छूट कर उनके पेट पर आता हम समझ जाते कि वो गहरी नींद में हैं । बस मौका देखकर हम चुपके से उस हाथी से उतरते और बाहर नीम पर पड़े झूले पर झूलते या हारे में पक रहे दूध से मलाई चुरा कर खा जाते । कटी हुई मलाई का हिस्सा देखकर जीजी पूछतीं तो एक सुर में कहते ,

जीजी हमने देखा एक बिल्ली को मलाई खाते

जीजी हँस कर कह देतीं ,

हाँ , मनै पता है उन बिल्लियों का ।

और हम सोचते उन्हें कुछ नही पता चला । वो हमें ऐसी बातों के लिए कभी नही डाँटती थीं जबकि नियम – कायदों के मामले में वो बड़ी सख़्त मानी जाती थीं जिसका आभास तब मुझे कभी नही हुआ था । हाँ !! दरअसल , मैं बात उनके पलंग की कर रही थी , सिंहासन बत्तीसी का सा वो पलंग !! मुझे उस पलंग से जुड़ी वो बात याद आ रही थी जो बड़ी अजूबा सी लगती थी । बात सर्दियों की थी , उस दिन अच्छी धूप निकली थी , जीजी ने घर के नौकर-चाकरों से कहा कि

आज मेरा पलंग बाहर निकालो और निवाड़ निकाल कर धो-दो

बस फिर क्या था हम बच्चों को तो दिन-भर का तमाशा मिल गया , हम सब ऐसे जुटे जैसे ये सारे काम हम ही को करने हों । ख़ैर , जैसे-तैसे करके उस सिंहासन बत्तीसी को बाहर निकाला गया , हमें पलंग पर कूदने की मनाही थी इसलिए मूक दर्शक बने देखते रहे । अब निवाड़ खोलने की बारी आई , निवाड़ की परतें दर परतें खुलती जा रही थीं जैसे ही आखिरी परत खुलने लगी कि एक काला बंडल नीचे धप्प से गिरा और अपने आप खुलने लगा । हमारे समेत , सब चीख मार कर पीछे हट गए । वो काले जीव , साँप के बच्चे थे !! सब हैरत से उन्हें इधर-उधर रेंगते देख रहे थे , एक उन्हें मारने के लिए लाठी ले आया तभी जीजी ने उसे रोक दिया ,

भाई मार मत , बच्चे हैं । आजतक इनकी माँ ने मुझे और मेरे बच्चों को कोई नुकसान नही पहुँचाया तो मैं भला उसके बच्चों को कैसे मार सकती हूँ ? भाई जा इन्हें पीछे जंगल में छोड़ आ । 

उन साँप के बच्चों को पीछे झाड़ियों में छोड़ दिया गया लेकिन हम डर कर कई दिन तक उस पलंग पर तो क्या उसके आस-पास भी नही गए थे । पर जीजी बाकायदा वहीं सोती थीं , उन्हें पूरा विश्वास था कि जिसने हमें आजतक नुक्सान नही पहुँचाया वो अब भी नही पहुँचाएगी । कुछ दिनों बाद हम भी वो बात भूल गए और फिर से वहीं जीजी के अगल-बगल उनकी दूध जी सफ़ेद मलमल की साड़ी में लिपटे पड़े रहते ।

मैं उन यादों में लिपटी आगे के कमरों में जाने की हिम्मत नही कर पाई । मैं बाहर की ओर निकल कर छत की ओर चल पड़ी जहाँ से हम पूरे गाँव का नज़ारा देख सकते थे । कहते हैं जब रायसाहब जी ने अचानक दिल का दौरा पड़ने पर इस दुनिया से विदा ली तो उनके पाँच बच्चों में सबसे बड़ी बेटी केवल बारह साल की थी और सबसे छोटा बेटा आठ महीने का था । जीजी यानि रायसाहबणी जवान और बला की खूबसूरत थीं ये बात आस-पास के कई गाँवों तक फैली हुई थी । रायसाहब की अनुपस्थिति में उनकी बेशुमार जायदाद की देखभाल के लिए उनके कई अनजाने रिश्तेदार अचानक पैदा हो गए थे । उन सब का एक ही उद्देश्य था और वो था किसी तरह रायसाहबणी को रास्ते से हटा कर उनकी जायदाद पर कब्ज़ा करना । माँ से सुना था कि एक बार इन रिश्तेदारों ने उन्हें छत से धक्का दे दिया था । वो बरसात के मौसम में छत की मोख यानि छत पर बने रोशनदान जो कमरों में रोशनी के लिए होते थे बंद करने गईं थीं बस मौका ताड़ कर किसी ने उन्हें नीचे धकेल दिया । वो तो ऊपर वाले का करम था कि उनकी हाथ-पैर की हड्डियाँ तो टूटीं लेकिन जान बच गई । उस हादसे के बाद एक बड़ा अजीब हादसा हुआ था , वो ज़माना डाकू-डकैतियों का था । एक दिन रात बारह बजे के बाद की बात होगी कि उनके दरवाज़े की साँकल ज़ोर से खड़की ,

रायसाहबणी……ओ रायसाहबणी , दरवाज़ा खोल ।   

अब उनके दरवाज़े पर तो गाँव वालों की गुहार लगती रहती थी । उन्होंने सोचा कि कोई ज़रुरतमंद होगा , नौकर से दरवाज़ा खोलने को कहा,

रामभरोसे , किवाड़ खोल दे ।

किवाड़ खुलते ही नौकर को धकेल कर हाथ में बंदूकें लिए , मुँह ढके डाकू भीतर घुस गए । जीजी उठ कर संभल ही रही थीं कि उनके सीने पर एक डाकू ने बंदूक तान कर कहा ,

बैठी रह रासाबणी ।

जीजी वैसे भी हाथ-पैर में चोट के कारण खाट से उठ नही पाईं थीं । तभी एक और डाकू आगे बढ़ा और उनके सीने पर तनी बंदूक को हटा दिया ,

रहैण दे , इसकी जरुरत ना है ।

उसने अपने मुँह से कपड़ा हटाया तो जीजी यह देख कर अवाक रह गईं कि वो डाकू एक लड़की थी । वो उन पर लगभग झुक कर धीरे से बोली ,

रासाबणी , पता चला अक लोग तनै मारना चावै हैं , तेरी जमीन हथियाना चावै हैं ! मनैं पता है तेरे छोटे-छोटे बाड़क सैं । मैं तनै लूटण ना आई हूँ , बस तनै यो बताणा था अक तू डर मत , मेरे होते , तेरा अर तेरे बच्चाँ का कोई कुछ ना बिगाड़ सकैगा ।

एक बंदूक उनकी ओर बढ़ा कर बोली ,

यो रख , हाथ मैं राख्या कर इसनै , सब डरैंगे ।

ये कह कर वो सब गायब हो गए और जीजी हैरान सोचती रह गईं कि ये मेरी खैरख्वाह कहाँ से आ गई ! बच्चे सब सो रहे थे , उन्हें कुछ पता नही था कि रात को घर में क्या हो गया । बच्चों को क्या गाँव में किसी को भी ख़बर नही हो पाई । कहते हैं उसके बाद से जीजी बंदूक को आँगन में रख कर बैठती थीं , खेत में जातीं तो साथ लेकर जाती थीं । उसके बाद जीजी का एक भाई उनके पास आकर रहने लगा जो बहुत होशियार और ईमानदार था । उसके बाद से रिश्तेदार ख़ुद-ब-ख़ुद दूर हो गए । पढ़ी-लिखी न होते हुए भी उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाने में कोई कसर नही छोड़ी और हिम्मत से समाज का सामना करती रहीं ।

साँझ हो रही थी , आसमान पर तारे चमकने लगे थे । एक बार मुझे फिर जीजी की याद शिद्दत से आ रही थी । गर्मियों में उनका आँगन में सोना और हमें आसमान में बिछा सारा खगोलशास्त्र का ज्ञान दे देना । हवा के रुख से बारिश का बता देना ,

लगता है मोन-सोन आने वाले हैं ।

हम सोचते कोई रिश्तेदार आने वाले हैं , वो तो बड़े होने पर पता चला कि मोन-सोन तो मानसून था ।

बच्चे बड़े हुए तो उन्हें गाँव छोड़ कर शहर बच्चों के साथ जाना पड़ा क्योंकि उनकी उम्र हो चली थी । शायद ये उनकी ज़िंदगी का सबसे कठिन निर्णय रहा होगा , उनका जीवन गाँव के बिना सूना और एकाकी हो गया था । मैं जब हैदराबाद से उनसे मिलने आई तो मुझे विदा करते हुए वो बहुत रोई थीं । मैंने जीजी को ऐसे रोते हुए पहले कभी नही देखा था , मैंने कहा ,

जीजी आप रोइए मत मैं जल्दी ही आपसे फिर मिलने ज़रुर आऊँगी ।

लेकिन जीजी उस दिन मुझे गले लगा कर कहने लगीं ,

बस बेबड़ , मैं अब नही मिलूँगी , तू खुश रहना ।

मैं गाड़ी में बैठी तो जीजी देर तक हाथ हिलाती रहीं , मैं अपने आँसुओं को दुपट्टे में छिपाती रही । उसके बाद जीजी से मेरी मुलाकात कभी नही हो पाई । आज गाँव आ कर मैं अपनी उस अधूरी मुलाकात को विराम दे रही थी , जो शायद कई वर्षों से मेरा इंतज़ार कर रही थी । मैं अपने उसी दुपट्टे को साथ लाई थी जिसमें जीजी के आँसुओं के कुछ कतरे बाकी थे । गाड़ी में बैठ कर मैं पीछे मुड़कर देखती रही लेकिन अब वहाँ केवल सूनापन था , एक उजड़ा हुआ माज़ी और कुछ भी नही ।

माला जोशी शर्मा

प्रेम सुधा

 

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नारी को लेकर उठते सवाल-जवाबों में मन के भीतर मंथन चलता ही रहता है । सबके ही चलता होगा शायद ! जिन पात्रों को हम अपना संबल मानते हैं उनसे हम कितने और क्यों प्रेरित होते हैं , ये सवाल भी मन में आता है । यदि नारी उनसे प्रत्यक्ष मिलती तो क्या कहती और क्या सुनती , ये जिज्ञासा भी जागी और कुछ यूँ बन गया ।

प्रेमसुधा

(पहला दृश्य)

नारी – मैं , बेटी हूँ , बहन हूँ , पत्नी हूँ , बहू हूँ , या माँ हूँ ? क्या मेरी पहचान है ?

संसार , देखता यही मेरा रुप है ,  समझता यही मेरा अस्तित्व है ।

कभी घर की लाज हूँ तो कभी घर की साज हूँ ।

इस घूँघट की परतों के पीछे मैं भी इक इंसान हूँ ।

स्त्री हूँ मैं , नदिया की मीठी धार सी , बहती हूँ अपनी चाल से , डिगती नही किसी बाधा , तूफ़ान से ।

निश्च्छल हूँ मैं , दृढ़ हूँ अपने विचार से , जानती हूँ कि मिलना है मुझे सागर के उस उन्माद में ।

करलूँ इरादा तो पार कर जाती हूँ हर बाधा , दुनिया देख कर हैरान है , कैसे है मोती ,ये सीप के उर श्वास में ।

 

सती – तप से मैंने शिव को पाया , शिव को अपना मान बनाया ।

कोमल तन को यूँ पिघलाया , तभी तो जग ने सती बनाया ।

शक्ति कोई मुझको रोक ना पाई , पर्वत पर यूँ धूनी रमाए , बैठे थे शिव ध्यान लगाए , ठान लिया था अपने मन में , तप हो , जप हो , करके पर्वत सा यूँ मन को , शंकर को ही पति बनाऊँ ।

 

राधा – मैं राधा , कृष्ण बिना था मेरा जीवन आधा , यमुना तट संग रास रचाता था वो ।

प्यार मेरा केवल वो कान्हा था लेकिन उसने प्यार में जग को बाँधा था । दुनिया टोके , चाहे रोके , बंसीधर की बंसी बन कर , हरदम उसकी धुन में घुलकर , बाँस बनी ज्यों मधुर बाँसुरी , बन जाऊँ कान्हा की रागिनी ।

(दूसरा दृश्य)

( आधी सती , आधी राधा )

वही हूँ मैं , एक ही हूँ मैं । एक ने प्रेम से अपने प्रिय को पाया , उसकी हो कर जग बिसराया ।

दूजी ने तप से प्रियतम को पाया , सब कुछ त्यागा , तब जाकर मन को मन से मिलाया ।

 

राधा – कान्हा , तू गोपियों के संग यमुना तट पर रास रचाता , धुन पे लुभाता पीपल छैंया ,

मेरा मन है जल – जल जाता , मोहन बस तू मेरा मन-मोहन , तेरी हर धुन मेरे ही हिय की छैंया ।

कृष्ण समझ कर मंद-मंद हैं मुस्काते , राधा को फिर यूँ समझाते –

तुम हो मेरी प्यारी राधा , तुम्हारा प्यार नही है साझा । तुम मेरे प्रेम की हो परिभाषा , तुम को नही है जग से बाँटा । व्यर्थ गोपियों से जलती हो , मेरे जीवन में तो केवल एक ही राधा ।

 

सती – हे , शिव , भोले भंडारी , तुम त्यागे बैठे हो ये दुनिया सारी , कैलाश बना है तपोवन सारा ,

मैंने भी है जग को त्यागा , बनी अपर्णा , पार्वती ये , पति रुप में केवल तुझको माना ।

शिव – हे , पार्वती तू , मेरी शक्ति है , तेरे बिन ये आधी भक्ति है ,

आदिकाल से तू मेरी ही पत्नी है , नाम हैं बदले तेरे पर तू मेरे भीतर ही बसती है ।

 

(तीसरा दृश्य)

सती शिव की अराधना करते हुए कहती हैं  — हे शिव , तुम्हे ही मैंने पति है माना , हर जन्म में तुम्हें ही है पाना । तप , त्याग से एक रुप ही हृदय बसाना ।

( सती हिमालय की ओर चल पड़ती हैं , इस पर शिव कहते हैं )

शिव – हे सती , तुमसे प्रकृति , तुम हो प्रकृति । उमा , रमा , ब्रह्माणी तुम हो , तुम से ही कहलाया मैं अर्धनारीश्वर । होता कैसे पूर्ण मैं रम कर , यदि न करतीं तुम इतना तप ?  तुम जग – जननी , जगत की माता , तुम से ही तो पूर्ण हुआ था ।

 

(चौथा दृश्य)

सती , राधा , औरत तीनों मिलती हैं और आपस में वार्तालाप होती है –

राधा – कृष्ण से मेरी लगन लगी है , वृंदावन मेरी प्रेम गली है ,

मेरे प्राण आधार वही हैं , गति – पति , विहार वही हैं , जीवन की रस भरी वीणा के तार वही हैं ।

सती – शिव तो हैं एक रमता जोगी , हर युग में जिनको पाने मैं बनी योगिनी , कभी तप में थी मैं जग को भूली ।

जैसे भस्म रमाई शिव ने , मैंने उनकी भक्ति रमाई , हर युग उनको पाने की ऐसी शक्ति फिर मैंने पाई ।

औरत – राधा तुम तो धन्य हुई थीं , कान्हा के मन बसी हुई थीं , प्रेम में मोक्ष की शक्ति मिली थी ।

सती हो तुम , तुम हो शक्ति आपारा , भक्ति से संसार उबारा , कैसी कठिन तपस्या करके , शिव को आसन से था उतारा , अर्धनारीश्वर रुप धराया ।

संसार तुम्हारे हाथों में है , मैं संसार के हाथों में हूँ । मुझ में तुम सी शक्ति कहाँ है ? मेरे साथ वो कृष्ण कहाँ है ?  पार्वती का शिव भी कहाँ है ?

बिक जाती हूँ बाज़ारों में , गिर जाती हूँ दहलीज़ों में , बंध जाती हूँ जंज़ीरों में , ढूँढ रही हूँ मान वही मैं , कान्हा के उस प्रेम वचन को , सती का मान बचाने वाले , शिव के उस तांडव को ।

राधा और सती उसके पास आती हैं —

तू भिन्न कहाँ है हम दोनों से ? हम दोनों तो तुझ में ही हैं । तुझ में प्रेम की धारा बहती , राधा सी है सहनशील सी , पार्वती की भक्ति तुझ में , शक्ति अपार छिपी है तुझमें । प्रेम है तुझमें , ममता तुझमें , भवसागर से पार उतरने , पाई है हर शक्ति तूने ।

(औरत जाग उठती है , दृढ़ हो जाती है) —

औरत – नही क्षीण , हीन मैं नारी , निठुर जगत की हर एक चुभन में ,

फूलों पर रेणु की चमक बन , अस्मि बनी मैं , अस्मि हूँ मैं ।

 

मैं न जाने क्या ढूँढ रही हूँ

मैं न जाने क्या ढूँढ रही हूँ

वो गर्म रेत पर नंगे पाँव रखना

पैर जलने पर कूद-कूद कर चलना

चप्पल टूटने पर सेफ़्टी पिन से काम चलाना

पिन न चुभ जाए कहीं ये सोच कर सहेली का रुमाल से मेरी चप्पल बांध देना

उस रेत में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ।

बसंत में सबका पीले कपड़े पहनना

पीले फूलों की माला बनाकर मंदिर में चढ़ाना

घर से मेरी पीली फ़्रॉक न आने पर मेरा उदास होना

सहेलियों का रातों-रात सफ़ेद फ़्रॉक को ड्रॉइंग कलर से पीला रंग देना

उस बसंत में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

सर्दियों की धूप में खेत से कच्ची मूंगफलियाँ खाना

तू लंबी है , कह कर मुझ से इमलियाँ तुड़वाना

आँवले तोड़ कर जेब में भर लेना

पैसे जोड़कर , चंदा-नंदा की दुकान से कुछ मुस्कुराहटें ले लेना

उन मस्ती भरे दिनों में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

एग्ज़ाम से पहले मेरा बीमार हो जाना

फ़ेल होने के डर से मेरा रात-रात रोना

सहेलियों का बारी-बारी से मुझे पढ़ कर याद कराना

मेरे पास हो जाने पर उनका खुशियाँ मनाना

उस बेगर्ज़ ज़माने में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

मिलकर गीत हम गाते थे , डर में साथ सो जाते थे

तेरा – मेरा पता न था , साथ में खाना खाते थे

रुखा था या बेस्वादा था , स्वाद साथ का आता था

न ऊँच – नीच का सोचा था , न जात-पात का रौला था

वो प्रेम-प्यार के मौसम थे , मैं उनमें आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

फ़िल्मों का कुछ और मज़ा था , राजेश खन्ना क्रेज़ बना था

फूलों और पंखों को लेकर , डायरी के पन्नों में दबा दिया था

मौन प्रेम को आँखों के रस्ते से , कुछ शब्दों में उतार लिया था

डायरी के उन बंद पन्नों में , फूलों का रंग समा गया था

उन महकते रंगों में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

कहते हैं हम आगे बढ़े गए हैं , तकनीकी से जुड़ गए हैं

दूरी को हम भूल गए हैं , कंप्यूटर से नए आयाम को छूने चले हैं

सब अपने-अपने में मस्त हुए हैं , मंगल तक भी पहुँच रहे हैं

घर आना अब दूर बहुत है , कुशल मंगल ही पूछ रहे हैं

तकनीकी प्रेम के इस समय में , मैं आज न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

बचपन के उन दिनों में , मैं आज का ज़माना ढूँढ रही हूँ

या आज के ज़माने में , मैं तब का ज़माना ढूँढ रही हूँ ?

मैं न जाने क्या ढूँढ रही हूँ ।

 

आज़ादी

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आज़ादी , स्वतंत्रता , independence , ये शब्द बड़ा सुख देते हैं । कभी सोचा तो ज़रुर होगा कि क्यों । क्या इस शब्द में सुख है या इसके रस में सुख छिपा है ? सुख तो सदैव रस में ही होता है , शब्द तो केवल उस आनंद को बताने का एक माध्यम है । हमने यानि आदमज़ात ने आज़ादी को लेकर बड़ी-बड़ी लड़ाईयाँ लड़ीं है , इसका गवाह इतिहास है । लेकिन जब बात नारी आज़ादी की आती है तो मीडिया पर इतने जंगी तर्क-वितर्क शुरु हो जाते हैं कि वो हास्यास्पद हो जाता है ।

पहली बात तो ये कि क्या नारी को अपनी आज़ादी के लिए समाज से सैर्टिफ़िकेट या इजाज़त चाहिए ? इसकी परिभाषा कौन तय करेगा ? क्या ये लड़ाई , ये परिभाषा औरत को ख़ुद तय नही करनी चाहिए ?

मैं स्वयं एक नारी हूँ तो मेरे इस विषय पर अपने विचार हैं , किसी से भिन्न भी हो सकते हैं । यहाँ क्या सही है और क्या ग़लत , मैं ये बिल्कुल नही कहना चाहती क्योंकि सही -ग़लत तो अपना-अपना परिमाण होता है ।

गत वर्षों में कई बार ये सुनने में आया कि लड़कियों को ऐसे कपड़े पहनने चाहिए , ऐसे कपड़े नही पहनने चाहिए । कुछ सम्माननीय कहे जाने वाले पदों पर आसीन लोगों को कहते सुना कि “अगर लड़कियाँ ढंग के कपड़े पहने तो ये बलात्कार के हादसे कम हो सकते हैं ।” उनकी कमतर सोच और बुद्धि पर बड़ा अफ़सोस हुआ । उनके अनुसार किसी साड़ी पहने या बुर्का पहने या सलवार-कमीज़ पहने औरत का बलात्कार हुआ ही नही होगा । यही सोच औरत की आज़ादी को कभी समझ नही पाएगी । स्त्री को कपड़ों से आज़ादी नही चाहिए ये बात उन्हें समझाना बड़ा जटिल काम है ।

आज़ादी एक सोच है , एक विचार है , एक भाव है । जब हमें ये न सोचना पड़े कि हम क्या पहने , हम बाहर जाएँ तो कितने बजे तक वापस आना ज़रुरी होगा । यदि वो अकेले जाना चाहे , अपने साथ समय बिताना चाहे तो उसे किसी की इजाज़त न लेनी पड़े । कहने का मतलब है कि उसे अपनी सोच की आज़ादी चाहिए जो आज तक दरवाज़ों में बंद है । यह बात केवल गाँव या कस्बों की औरतों के लिए नही है , अफ़सोस की बात तो ये है कि ये बात हर तबके और हर स्तर की औरतों के लिए है । मैंने ख़ुद , अच्छे , पढ़े-लिखे कहे जाने वाले परिवारों की औरतों को देखा है कि वो कमाते हुए भी आर्थिक और मानसिक रुप से पति पर निर्भर हैं । एक डर उनके भीतर समाया रहता है कि अगर उसने अपना महत्त्व जताया तो उसे न जाने किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है । वो जीते जी पुरुष के अहम् को पुचकारती – सहलाती रहती है , पुरुष “मैं” के मद में डूबा रहता है । उसका काम , काम होता है और औरत के काम को , उसके मन बहलाव या टाईम-पास कह कर अपने अहम् को पोसता रहता है । औलाद में गुण है तो बाप पर गई है , नालायक है तो माँ पर गई है कह कर सिर ऊँचा रखता है । घर के बेहतर या महत्त्वपूर्ण फ़ैसले केवल पुरुष ही ले सकता है , औरत में वो क्षमता नही है , इस बात का घर-भर को यकीन होता है । औरत भी इसे हँस कर स्विकृति देती रहती है , फिर चाहे भीतर कुछ भी सोचती रहती हो लेकिन उसका भीतर तो कब का दफ़्न हो चुका होता है । ये ग़ुलामी मुझे बेबस और लाचार बना देती है , भीतर से कुंठित कर देती है , ऐसे में कभी-कभी औरत पर गुस्सा भी आता है , उसके इस डर से नाराज़गी है मुझे क्योंकि ये अधिकार वो लेने का प्रयास ही नही करती ।

मैं विदेशों में रही तो अपने देश की औरत मुझे बेहद पिछड़ी और ग़ुलाम लगी । कपड़ों की बात मैं यहाँ भी नही कर रही हूँ , कपड़ों में तो हमारे शहरों की लड़कियाँ कुछ-कुछ बराबरी पर हैं । यहाँ मैं , न ही मैं कुछ गिनी-चुनी , सफ़ल औरतों की गिनती पूछ रही हूँ , हर बार उनका उदाहरण देकर हम देश की उन लाखों करोड़ों औरतों को उपेक्षित कर अपने को भ्रमित कर देते हैं । हाँलाकि , गाँव में अभी भी सिर ढक कर रसोई में काम करती बहू अच्छी बहू की श्रेणी में आती है , इस बात के सबूत के लिए आपको गाँवों में जाना पड़ेगा । गाँव भी शहर से दूर वाले नही , बल्कि राजधानी , दिल्ली के आस-पास ही मिल जाएँगे । न चाहते हुए भी हमें तुलना करनी ही पड़ेगी वरना अपनी प्रगति की गति को हम कभी आँक नही पाएँगे ।

चलिए अपनी-अपनी आज़ादी पर सोचें और अपने दबे पंखों को फड़फड़ा कर उड़ने का प्रयास करें । वो खुला आसमान , वो खुली हवा हमारे लिए भी है , उसका एहसास करें । वो एहसास एक अद्भुत एहसास होगा । हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी जगह बनानी है क्योंकि अपने वजूद का एहसास करना बहुत ज़रुरी है ।

 

पैमाना

साँझ होते ही पैमाने छलक जाते हैं
होठों से छूते ही दीवाने मचल जाते हैं
कोनों में दबे दर्द भी आँखों से झलक जाते हैं
मेहताब तेरे आने से क्यूँ अश्क पिघल जाते हैं ।
यूँ तो दिनभर भी दुनिया के बाज़ार से गुज़र जाते हैं
चलते हुए लोगों से क्या – क्या हम पी जाते हैं
कुछ ग़म दे जाते हैं तो कुछ गर्द उड़ा जाते हैं
हम भी ऐसे काफ़िर हैं कि गर्द को झाड़े चले जाते हैं ।

मैंने देखा है

मैंने देखा है , रिश्तों का दम घुटते

, सुबह-शाम उन्हें मरते

मैंने देखा है , उनको बाहर से हँसते

, उन्हें भीतर से सुलगते

मैंने देखा है उनको अहम् की आग में जलते

उन्हें एकांत की गहराई में डूबते

मैंने देखा है उनके क़दमों को डगमगाते

उन्हें दिलों में गिरह बाँधे

मैंने देखा है उनकी नज़रों को धुंधलाते

उन्हें बीते दिनों में झांकते

मैंने देखा है उनको छत पर शामियाना ताने

शामियाने के छेदों से तारों को ताकते

मैंने देखा है उनको रातों में जागते
अनदेखे रंगीन सपनों को तरसते ।

माला जोशी शर्मा