मैं नूँ दिलों मुकाइए

बुल्लेशा गल ताईंयों मुकदी , जद मैंनूँ दिलों मुकाईये………

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में एक गाँव है कलोल । इस दूर दराज़ गाँव में बेटियों के लिए जो मुहीम चलाई जा रही है वो देखकर मैं नतमस्तक हो गई , उन लोगों के प्रति जिन्होंने इसे शुरू किया । मन चाहा कि इसे आप सब तक पहुँचाऊँ , शायद देश के किसी कोने में किसी ज़रूरतमंद बेटी के लिए हम भी कुछ कर सकें।

आज से तीन साल पहले कर्नल यशवंत सिंह चंदेल ने जब अपनी जवान बेटी मंजुषा को बीमारी में खोया तो दोनों पति – पत्नी टूट गए । इस दुख ने उन्हें गहरा घाव दिया था । खेत के हर पत्ते और बाग़ के हर फूल में मंजुषा का चेहरा दिखता था । जीवन बोझ लगने लगा था । गाँव में अपने आस – पास कई बेटियाँ या मंजुषा की सखियाँ दिखतीं तो उसकी याद और गहरा जाती । तभी उनके दिल में विचार आया , हर बेटी में अपनी बेटी देखने का और इस तरह शुरू हुआ “मंजुषा सहायता केंद्र” । उन्होंने अपनी पेंशन और अपने दूसरे बच्चों की सहायता से ज़रूरतमंद लड़कियों को आर्थिक सहायता देकर पढ़ाने का काम शुरू किया । इन तीन वर्षो में वे गाँव – गाँव घूमकर ऐसे परिवार को ढूँढते हैं जिनके बेटी है लेकिन आर्थिक अभाव के कारण स्कूल नही जा रहीं । वे उन्हें स्कूल में दाख़िला दिलवाकर उनकी पूरी शिक्षा की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं । अभावों में रह रहे ऐसे परिवार जिन्होंने एक या दो बेटियों के बाद कोई और संतान नही की उन्हें सम्मानित कर आर्थिक सहायता पहुँचाते हैं । एक परिवार की ऐसी बच्ची जो न सुन सकती थी और न बोल सकती थी को उन्होंने कई साल पढाया , नौकरी लगवाई और फिर शादी करवाई । आज वो सुखी पारीवारिक जीवन न्यतीत कर रही है ।

कर्नल साहब कुछ ग़रीब प्रतिभाशाली लड़कों की भी परवरिश कर रहे हैं । यही नही पति – पत्नी गाँव के लोगों की हर प्रकार से सहायता करते रहते हैं । कोई भी गाँव का व्यक्ति आर्थिक अभाव के कारण इलाज के बिना न रहे , उसकी जान ना जाए इस बात का वो पूरा ध्यान रखते हैं । ख़ुद आज के इस “और मिल जाए” के युग में दोनों पति-पत्नी सादगी भरा जीवन व्यतीत करते हैं । कबीर , नानक और बुल्लेशा के प्रशंसक हैं , उन्हीं को अपना पथप्रदर्शक मानते हैं ।

एक म्हाको फूल प्यारो , अधखिलो कुम्हला गयो ।

सोग बीतो , हरख छायो , फूल बाग लगा गयो ।

मन बाँवरा

मन बाँवरा उड़ चला

ना जानू मैं ये कहाँ चला

था जो बंधा पिंजरे में , साँसें थी पहरे में

कंठ था सूखा , गीत नही थे , गूँगे मन , सूनी आँखों में

मैं खोई थी सपनों में

मन बाँवरा………

झोंका हवा का ऐसा आया

मन पिंजरे को तोड़ के भागा

पर , पंख थके थे , भूल गए थे  उड़ना , हवा को छूना

मन बाँवरा…………………

दिल ने यूँ आवाज़ लगाई

परशिकस्त तू नही , तू शादकामी

परवाज़ है तू….मंज़िल तेरी पास आई

मन बाँवरा………..

लोरी

जब छोटे थे तो लोरी सुन कर सोते थे । जब माँ बनी तो लोरी गा कर बच्चों को सुलाती थी । बिना लोरी सुने उन्हें नींद ही नही आती थी । तब फ़िल्मों में भी लोरी ज़रूर होती थी । “मैं गाऊँ तुम सो जाओ ” , “नन्ही परी सोने चली हवा धीरे आना” , “राम करे ऐसा हो जाए मेरी निंदिया तोहे मिल जाए” ऐसी अनगिनत मधुर , सुरीली लोरियाँ गा कर माँओं ने बच्चों को थपकियाँ देकर सुलाया है । अफ़सोस! आज बच्चे लोरी जानते ही नही ! माँएँ लोरियाँ गाती नही ! इंसान की तरक्की ने कहीं बहुत ही मधुर पलों को भुला दिया जो माँ – बच्चों के मधुर संबंधों को गहरा करता था । वो पल जीवन भर साथ रहते हैं । हम कहते हैं कि अब समय बदल गया , संबंधों में वो गर्माहट नही रही । इसका ज़िम्मेदार कौन है ? सोचना होगा कि हम क्या छोड़े और क्या कभी न भूलें । मोबाइल और कंप्यूटर से समय निकाल कर उन प्यारे पलों को फिर से ज़िंदा करें । फ़ेसबुक पर नही  , टीवी पर कार्टून दिखा कर नही बल्कि बच्चों को बाहों मेें भरकर , लोरी गा कर सुलाएँ , देखिए बच्चा प्यारे सपने देखकर मुुुस्कुराता हुआ उठेगा । माँ के गले से निकली लोरी सीधी दिल को छू लेती है , वैसे पिता भी ये काम बखूबी कर सकते हैं ! चलिए लोरी को फिर ज़िंदा करते हैं ।

कुछ चाह

मैं क्यूँ चाहूँ ज़िंदगी से कुछ ?

मैं क्यूँ चाहूँ मेरे अपनों से कुछ ?

मैं क्यूँ चाहूँ अपने से कुछ ?

इस चाहत ने , क्या दिया है , मुझको कुछ ?

यह मन लगता है पागल मुझको कुछ ?

न पाए तो होता है परेशाँ कुछ-कुछ ?

पाए तो भी होता है परेशाँ फिर कुछ ।

उफ़ ! न जाने है ये चाहत क्यों फिर कुछ !

चलने दे जीवन को थोड़ा यूँही कुछ ।

मन बन जा तू भी बनजारा कुछ , लेने दे खुली हवा में साँस अपनों को कुछ ।

होने दे अपने को आज़ाद कुछ ।

पीपल की छाँव

पीपल की छाँव

बचपन की है याद सुहानी

मस्त हवा से दौड़े भागे

सर्दी – गर्मी न धूप थी आगे

पीपल था एक घर के आगे

घने पेड़ की ठंडी हवा सुहानी

छाँव में उसकी करते दिनभर मनमानी

डाल के झूला डाली पर , पींगे भरते ऊँची – ऊँची

वहाँ से दुनिया लगती थी फिर कितनी अनूठी

कोमल – कोमल पत्ते उसके , प्यार से हमको सहलाते थे

अम्मा दूर से देख हमें फिर मुस्काती थी

घनी टहनियों के भीतर घुस नीड़ बया ने बना लिया था

उसकी अजब कला हम सब , देखा करते अचरज से बस

फिर एक दिन कुछ बदला यूँ सब

सोया था सपनों में जग जब

काली रात अँधियारी थी तब

आया एक तूफ़ान अचानक

ज़ोर काथा फिर पानी बरसा

दिल मेरा था ज़ोर से धड़का

घर का हर एक कोना खड़का

सुबह हुई तब दौड़ के बाहर देखा

कैसा होगा नीड़ बया का

देख के दिल यूँ ठहर सा गया

नीड़ बया का दूर पड़ा था

पीपल का भी तना झुका था

रोई , चीखी , चिल्लाई

पर पीपल को खड़ा न कर पाई

चली गई वो पीपल छाया

टूटा डाली का वो झूला

बया की मुस्कान ले गया

बचपन का वो प्यार ले गया

एक सुहानी याद दे गया

अस्मिता

औरत का जीवन इतना आसान नही होता जितना वो दिखता है । मेरी एक सहेली ने जब मुझसे ये कहा कि मैं माँ के बारे में कुछ लिखूँ तो मैं सोच में पड़ गई , मन की गहराइयों में अचानक अनगिनत ऐसी औरतों की शक्लें उभर आईं जिनका जीवन अदभुत रहा है । जिन्होंने जीवन में कभी हार नही मानी , ठोकर लगी , गिरीं , कपड़े तार – तार हो गए , ज़माना उँगलियाँ उठाता रहा और वो हर बार सिर उठा कर खड़ी होती रहीं । ऐसे में साहिर साहब का ये शेर याद आता है…..

हज़ार बर्क गिरें , लाख आँधियाँ उट्ठें

वो फूल खिल के रहेंगे , जो खिलने वाले हैं ।

ये औरत की ज़िंदगी पर बड़ा सटीक बैठता है । ऐसा ही कुछ माँ का भी जीवन रहा है । लेकिन  उस औरत की  कहानी लोगों के सामने लाने में झिझक हो रही थी जब की वो जीवित हैं । पता नही लोग क्या सोचेंगे…..!! बात मेरे जीवन की नही किसी और के जीवन की है….. !! सोचा उनसे पूछ कर लिखूँ….वैसे मुझे उनकी प्रतिक्रिया पता है…..उन्होंने कुछ भी करने से पहले कभी ये नही सोचा कि लोग क्या कहेंगे । आज वो तेरासी वर्ष की हो गईं…..!! कहाँ से शुरू करूँ समझ नही आ रहा । संघर्ष और केवल संघर्ष ही जिसका जीवन रहा हो उसके लिए कुछ शब्द लिखना बहुत कठिन है । कभी संभव होगा तो ज़रूर लिखूँगी । हाँ , इतना ज़रूर कहूँगी कि ऐसा जीवन जीने वाले लोगों को हमारा समाज केवल मरने के बाद ही सराहता है । उनके जीते जी उनकी बेबाकी और ख़ुद्दारी उनसे बरदाश्त नही होती ।

वो औरत जिसने अपने वजूद से लड़ते , कलाकार पति की कला को कभी मरने नही दिया । उसके लिए ज़माने भर की ज़िल्लतें सहीं , मज़दूरी कर परिवार को पाला लेकिन कभी साथ नही छोड़ा ।  जब मैं मज़दूरी शब्द का प्रयोग कर रही हूँ तो वो मज़दूरी ही है । जिस उम्र में औरतें साज – सिंगार करती हैं तब उसने दो अदद सूती धोतियों में जीवन बिता दिया , बिना किसी शिकवे – शिकायत के । सम्पन्न परिवार की होते हुए भी कभी किसी के आगे हाथ नही फैलाया और उनकी सहायता को नकार दिया । समाज ने तरह – तरह के लांछन लगाए…..अपनों ने ही उसकी अस्मिता पर सवाल उठाए , क्योंकि औरत की बेबाकी और ख़ुद्दारी को तो दुनिया बेशर्मी का नाम देते हिचकती नही । समाज को तो वही लजाती , घूँघट में शर्माती , पति की हाँ में हाँ मिलाती , रसोई घर में परिवार के लिए उनकी पसंद का खाना पकाती स्त्री ही संपूर्ण स्त्री नज़र आती है !! यदि आप इस श्रेणी में नही आतीं तो आप बेशर्म हैं , आपका चाल – चलन ठीक नही , लेकिन उसने इन बातों की कभी परवाह नही की । अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर गुज़रने से घबराई नहीं फिर चाहे उससे उन्हें सराहना मिली या अपमान । संकुचित सोच वाले उन्हें कभी नही समझ पाए और ना समझ पाएँगे । रायसाहब की बेटी कठिन से कठिन समय में भी एक ही बात दोहराती थी…….

गुरू वशिष्ट से ज्ञानी ध्यानी , सोच के लगन धरी ,

सीता हरण , मरण दशरथ का , वन में विपत्ति पड़ी ।

हमेशा से हरिवंशराय बच्चन जी , निराला जी की कविताएँ , अमृतलाल नागर और आचार्य चतुर्सेन के उपन्यास पढ़ने की चाट है उनको ।  भाग्य को नही कर्म को ही सब कुछ माना और जीवनभर कर्म ही किया और आज भी करती हैं ।कभी अपनी किस्मत को कोस कर ईश्वर से शिकायत नही की । इस उम्र की और औरतों की तरह घंटियाँ बजा कर आरतियाँ नही गातीं । बस एक ही बात दोहरा देती हैं…..

होई है सोई जो राम रची राखा ।

मैं उन जैसी कभी नही बन पाई और ना बन पाउँगी क्योंकि मुझमें उन जैसा साहस नही है । उनके जीवन के पन्ने पलटूँ तो कितनी अनकही कहानियाँ दबी हैं जिनमें कहीं एक औरत का साहस है तो कहीं रूसवाई । किसी की भी सहायता करने से पहले एक पल नही सोचतीं कि इससे उन्हें क्या मिलेगा…बस कर देती हैं फिर चाहे मुसीबत में ही क्यों न फँस जाएँ । ऐसा एक बार नही कई बार हुआ है । उन्होंने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जीया है ।

औरत तो वही है फिर चाहे वो माँ के रूप में हो या बहन , पत्नी और बेटी के रूप में । उनकी कहानी सिर्फ़ उनकी नही है , ये हर औरत की कहानी है । उसे अपनी अस्मिता के लिए पहले भी लड़ना पड़ता था और आज भी । अफ़सोस तो ये है कि हम यही सोच कर बड़े होते रहे कि एक दिन समय बदलेगा ज़रूर लेकिन ये सोच बदलने की लड़ाई अभी भी बहुत बाकी है ।

चाय का कप

(मानव प्रवृति है कि अपने से कमज़ोर को देखकर बड़ा आत्मिक सुकून सा मिलता है । उसे ऊपर उठते देख कहीं भीतर हलचल सी मच जाती है क्योंकि उसके कमज़ोर बने रहने में ही हमारा बड़प्पन बना रहता है । कुछ ऐसे ही अनुभव से प्रेरित है ये कहानी ।)

मैं कई बार बाल्कनी में जा कर देख आई थी । कई बार फ़ोन भी मिलाया था , लेकिन आरती का कहीं पता नहीं था । वो तो एक ही रिंग में फ़ोन उठा लेती थी फिर आज फ़ोन क्यूँ नही उठा रही । सोचा था संडे है , आज घर में आराम करूँगी , पर वो नही आई तो हो गया आराम !! इस उमस में मैं भीतर बाहर उबल रही थी । सारा घर ठीक करने के लिए संडे ही मिलता था । कहाँ से शुरू करूँ कुछ समझ नही आ रहा था । सबसे पहले किचन में गई क्योंकि नाश्ते के लिए देर हो रही थी । किचन में घुसते ही होश उड़ गए । सिंक में बरतनों का ढेर और फैला सामान देखकर सिर चक्कर खा गया । आरती की गैरहाज़िरी बहुत खल रही थी । उसके होते कोई चिंता नही होती थी । वो सब संभाल लेती थी । मैं उसी के रहते नौकरी कर पा रही थी । घर की , खाने की , कोई फ़िक्र नही थी । घरवालों की पसंद – नापसंद का ध्यान रखते हुए बड़े मन से खाना बनाना उसकी खासियत थी । दस साल में वो घर का अभिन्न अंग बन गई थी । उसके न होने का विचार ही डरावना था । उसकी अनुपस्थिति में ही उसकी उपस्थिति का महत्त्व पता चलता था । मैं गहरी साँस लेकर बर्तनों की ओर मुड़ी । किचन में बर्तनों की उठापटक की आवाज़ से मेरे भीतर का गुस्सा ज़ाहिर था , सुनकर पति ने भीतर झाँका , मानो दिख गए तो मुसीबत आ जाएगी । वहीं से झाँकते हुए बोले……….

बिचारी बीमार हो गई होगी……इतना नाराज़ क्यूँ होती हो ।

ये तो आग में घी डालने वाली बात हुई….!! मेरा तो ये सुनते ही सेरों खून फुँक गया….यानि हमदर्दी भी उसी से….., बेचारी भी वो !! बर्तन और ज़ोर से खनके । फिर तो पतिदेव किचन के आस-पास भी नज़र नही आए । भूल गई कि गैस पर बैंगन भुनने रख दिए थे , ये सोच कर कि आरती के आते ही कहूँगी कि आज बैंगन का भरता बना दे । बच्चों को बहुत पसंद है , वो बनाती भी बहुत बढ़िया थी । तभी सास की आवाज़ आई………..

बहू…..कुछ जल रहा है…….देख तो ज़रा ।

मन ही मन गुस्सा सास पर भी उतरा…………

इन्हें भी मुझे ही जलाने में मज़ा आता है !!

बर्तन छोड़कर मुड़ी तो देखा बैंगन जल-भुन कर राख हो चुके थे । ऊफ़…….समझ नही आ रहा , क्या-क्या संभालूँ । इस घर में सबको अपनी पड़ी है….मेरी किसी को चिंता नही !! तभी बेटी भागती हुई आई………

मम्मा…….मैंने आरती आंटी को देखा……अभी……एक आंटी से बातें करते हुए….नीचे ।

मैं तो सुनते ही खुशी से उछलना चाहती थी लेकिन ऐसा नही किया । बस एक गहरी साँस सुकून की ली और चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई ।

2

आरती के आगमन की ख़बर से घर में ऐसा खुशी का माहौल छा गया जैसे लॉट्री निकल आई हो । लेकिन मेरा तो फ़र्ज़ था कि नाराज़गी दिखाऊँ……..

आज आने दो इस महारानी को , अच्छी डाँट लगाऊँगी , कम से कम फ़ोन तो उठाना चाहिए था ना ।

आरती ने अपनी बड़ी सी मुस्कान के साथ प्रवेश किया जैसे कुछ हुआ ही नही……….

गुडमोर्निंग दादी जी । गुडमोर्निंग आंटी जी ।

यही अंदाज़ था उसका घर में प्रवेश करने का । सब दम साधे मेरा चेहरा देख रहे थे , मैं तो जैसे सीमा पर तैनात थी……

तू कहाँ रह गई थी ? फ़ोन भी नही उठा रही थी । देर कैसे हो गई ?

मेरे दिल की भड़ास उस पर सवालों की गोलियाँ दाग रही थी । और वो……..दाँत निपोरती , शांतिदूत बनी काम में लग गई थी । मुझे दिल की भड़ास निकाल कर बड़ा सुकून मिला , वही जो ठंडी हवा के झोंकों से मिलता है……बिलकुल वैसा ही ।

मैं चैन से बालकनी में बैठी चाय का आनंद ले रही थी । आरती के हाथ की चाय के बिना मेरा दिन पूरा नही होता था । वो भी चाय की शौकीन थी । जब मेरी बनाती तो अपना कप लेकर मेरे पास बैठ जाती थी । उसे पता था कि उसका कप कौन सा था । अब इतनी भी अभिन्न नही बनी थी वो !! बालकनी में झूलती नीम की टहनी के झोंके के साथ आरती की मौजूदगी का एहसास बड़ा सुखद था , बिल्कुल रूई का सा । उसने मुझे निहारते हुए कहा….

आंटी जी आपका ये मंगलसूत्र बहुत सुंदर है , कितने का था ?

हाँ…। बहुत मंहगा था ।

मैंने कहा और उसकी बात को महत्त्व न देते हुए , उसके मतलब की बात की ।

आज क्या बनाएगी ?

बस इतना पूछने की देर थी और वो शुरू हो गई…….

अरे आंटी  जी , आप जो कहो वो बना दूँगी । मैंने दो साल एक साहब के यहाँ काम किया था , उनकी वाईफ़ अंग्रेज़ थीं । उन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया । मुझे सब आता है । वो साहब ना फिर अमरीका चले गए ।

खाना बनाने के साथ – साथ बातें भी वो बढ़िया बनाती थी । जब स्वादिष्ट खाना हज़म करना है तो उसकी बातें भी हज़म करनी पड़ेंगी । कभी – कभी मम्मी जी उसकी बातों से कुढ़ कर कह देतीं……….

तू थोड़ा कम बोला कर…..बोलती बहुत है ।

मैं मन ही मन घबरा जाती कि अगर आरती बुरा मान कर भाग गई तो क्या होगा…..?  इसलिए उसकी तरफ़दारी करते हुए कहती…….

मम्मी जी , घर की रौनक है हमारी आरती । ये ना हो तो घर में कैसा सन्नाटा सा छा जाता है ।

पति और मम्मी जी ने मुझे इस बात पर घूर कर देखा , पर मैंने नज़रें नहीं मिलाईं । क्यूँ मिलाऊँ…? ये इतना ज़रूरी नही !! बस आरती को देख मुस्कुरा दी । मुझे मुस्कुराते देख आरती खुशी से दोहरी हो गई थी ।

3

आरती खुश होती तो कुछ बढ़िया डिश ज़रूर बनाती । आज रात भी डिनर में उसने मलाई कोफ़्ते बनाए थे । हम सब टीवी देखते हुए गरमा – गरम रोटियाँ खा रहे थे । पति ने चटकारे मारते हुए कहा…..

आरती तू ना , खाने के ऑर्डर लेना शुरू कर दे , क्या लज़ीज़ खाना बनाती है ।

आरती अपनी तारीफ़ सुनकर शर्मा गई । इस पर बेटी टीनी ने भी उसे हवा दी…….

हाँ आंटी , क्या गजब आईडिया है…..!! आरती केटरिंग सर्विस !!

अब तो आरती , रसोई से ला रही फूली रोटियों सी फूल रही थी । उसके चेहरे के भाव ऐसे बदल रहे थे , मानो केटरिंग सर्विस शुरू हो ही गई । चेहरे की मुस्कान कानों के आर – पार होने को थी ।

आंटी जी सच्ची में ऐसा हो सकता है क्या ?

क्यूँ नही…..क्यूँ नही । तू क्या किसी से कम है ।

मैंने फल की चिंता किए बिना उसकी हौसला अफ़ज़ाई की । सासू जी व्यंग्यात्मक…..हूँह….कह कर खाना खाती रहीं । मैंने और आरती ने उनकी हूँह को कम्पलीट इग्नोर किया । आरती का जोश बढ़ गया और एक रोटी मुझे एक्स्ट्रा खिला दी । मैं खुश थी कि वो खुश है लेकिन उस दिन उसके सपनों के ऐसे पंख लगेगें इस बात का अंदाज़ा मुझे नहीं था ।

आरती ने टीनी की बात को कुछ ज़्यादा ही सिरीयसली ले लिया था । इसका एहसास मुझे तब हुआ जब  एक दिन मैं ऑफ़िस से आई तो देखा कि आरती टीनी के पास , घुटनों पर हाथ टिकाए बड़ी मगन हो बातें कर रही थी । टीनी कंप्यूटर पर कुछ कर रही थी । मुझे देखते ही आरती उठ खड़ी हुई और चहकती हुई बोली……..

आंटी जी देखिए , टीनी दीदी ने मेरा काम शुरू करने की तैयारी कर दी । अंकल जी कह रहे थे काम सोसाईटी से शुरू करूँ ।

टीनी से अब वो टीनी दीदी हो गई थी…..। टीनी ने प्रिंटआऊट निकाल कर दिखाया…..

आरती केटरिंग सर्विस……हर तरह की पार्टी ऑर्डर के लिए कॉन्टैक्ट करें…..

नीचे आरती का और मेरा फ़ोन नंबर लिखा था । अपना नंबर देख मेरी भँवें तन गईं , मैंने टीनी को घूरा…..बच्चे मेरी आँखों के इशारे खूब समझते थे । टीनी ने आँखें झपकाते हुए कहा……

मम्मा आपका नंबर इसलिए लिखा है ताकि आरती आंटी का ना मिले , तो कम से कम आप के फ़ोन पर ऑर्डर आ जाएँगे । आपको सिर्फ़ आरती आंटी को बताना होगा ।

मैंने टीनी को तीखी नज़र से ऐसे देखा कि “क्या मैं अब इसकी सैक्रेटरी बनूँगी ?” मेरे अहम पर सीधी चोट थी । इन बच्चों को क्या समझाऊँ….? घर का भेदी लंका ढाए……आरती चली गई तो मेरा क्या होगा…?  घर का क्या होगा…..?

4

आरती और टीनी मेरा मुँह देख रहे थे । मैंने बात का रूख़ बदल आरती की ओर देख कर कहा…..

यही करती रहेगी कि कुछ चाय – वाय भी पिलाएगी !!

आरती कंधे उचका कर , दाँतों तले जीभ दबाती किचन की ओर भागी । टीनी पता नही मेरे चेहरे पर क्या देख रही थी !! पोस्टर बना कर बच्चे सोसाईटी में लगाने भागे ।

मुझे घर में सबका आरती की केटरिंग सर्विस को लेकर इतना पर्सनल होना अच्छा नही लग रहा था । जो भी हो इस चक्कर में कुछ दिन लंच – डिनर की शक्ल ज़रूर बदल गई थी । तरह – तरह के पकवान बन रहे थे क्योंकि आरती नई – नई डिशेज़ की प्रैकटिस कर रही थी । सब बड़े खुश थे । थोड़े दिन जब यूँही निकल गए तो मैं भी निश्चिंत हो गई कि अब तक कोई ऑर्डर नही आया तो मतलब ये कि कुछ नही होने का । मैं मन ही मन खुश थी , इसी खुशी में अपना एक पुराना सूट निकाल कर आरती के सामने रख दिया…….

कुछ दिनों में दुर्गा पूजा आने वाली है , ये ले……..मैंने कम पहना है….नया सा ही है ।

आरती के चेहरे पर बच्चों जैसी मुस्कान आ गई……

आंटी थैंक्यू…..बहुत सुंदर है ।

मुझ में रूई सा एहसास उड़ रहा था । जो हल्का होता है उड़ता ही है !! मम्मी जी अपने कमरे में बैठी माला फेर रही थीं , बीच – बीच में आँखें भी कमरे के बाहर फेर लेती थीं । साथ ही गा रही थीं…….

रहिमन चुप ह्वै बैठिए , देखी दिनन के फेर…..

चोट सीधी मुझे ही लग रही थी या मुझ पर की जा रही थी !! उस पर सामने बैठे पति की संदिग्ध टेढ़ी मुस्कान मेरे घाव पर नमक छिड़क रही थी । बना दो मुझे विलेन…..लेकिन मेरे ही कारण आरती तो टिकी थी !!

पर मेरा अनुमान ग़लत था ये मुझे जल्द ही पता चल गया । एक दिन जब मैं ऑफ़िस से आई तो मम्मी जी ने ख़बर दी…….

आरती सुबह आई थी , लंच बना गई थी और कह गई कि रात को नही आएगी । एक पार्टी का आर्डर मिला है । एक रात के दस हज़ार रूपए मिलेंगे । चलो अच्छा है , उसका बिज़नस चल पड़ा ।

सुनते ही मेरा मन और मुँह दोनों छोटे हो गए । मेरे रेत के अनुमानों का महल एक लहर के साथ ही ढहता नज़र आया । आरती जीवन में आगे बढ़ना चाहती थी और मैं घट रही थी , क्या कहती !! अगले दो दिन तक आरती का कहीं कोई पता नही था । मैं उस दिन को कोस रही थी जब आरती के महत्वाकांक्षी मन ने सपने देखने शुरू किए थे । ये आग अपनों की ही लगाई थी , किसी को क्या दोष दें ।

5

इसी बीच एक दिन आरती का फ़ोन आया………..

आंटी जी , आप लोगों को कितना थैंक्यू करूँ । मुझे बहुत आर्डर मिल रहे हैं । टाईम भी नही मिल रहा आपसे मिलने का ।

अब आरती…….आरती कहाँ बिज़नेस वूमन बन गई थी । सुर बदल गए थे । सुन कर मेरा दिल बैठ सा गया , बच्चों पर भी गुस्सा आ रहा था कि उन्हें क्या ज़रूरत थी भला ये सब करने की !! आग लगी थी…….उबाल आ रहा था…….बाहर फैलेगा ही…….

लेलो मजे अब आरती केटरिंग सर्विस के….!! और उकसाओ उसे । एक कहावत सुनी है ना…..कौवा चला हंस की चाल तो अपनी भी भूल गया ।

इस बात पर टीनी ने , जो कंप्यूटर में सिर दिए बैठी थी , 360 डिग्री मुड़कर मेरी ओर देखा…..

मम्मा…..कल वो नीलम आंटी से आप फ़ोन पर क्या बातें कर रही थीं….!! वूमन लिब्रेशन….इक्वैलिटी….!! जब अपनी बारी आई तो हो गईं हवा सारी बातें !!

ये सुन मैंने पति को घूरा……लेकिन वो तो धीमी मुस्कान लिए अख़बार में नज़रें गड़ाए बैठे थे । गुस्सा तो बहुत आया…

पर चुप रही , ये सोच कर कि मैं उसे इतना तूल क्यूँ दे रही हूँ…..?

इसी बीच आरती अचानक प्रकट हो गई , अपनी किसी सहेली को लेकर । उस पर गजब ये कि उसके हाथ में रसगुल्लों का डिब्बा था । आरती का रूप बदला हुआ था । अब उसके कपड़े भड़कीले और नए फ़ैशन के थे । पैरों में चमचमाती सैंडिल थीं । कपड़ों से मैच खाती हाथ – पैरों में नेलपॉलिश लगी थी । मैचिंग ज्वैलरी और चूड़ियाँ खनक रही थीं ।

लेकिन वो उसी अंदाज़ में आई थी……..

गुड मोर्निंग दादी जी…….। गुड मोर्निंग आंटी जी । मेरा काम आप लोगों की दुआ से अच्छा चल गया है । आप सब के लिए रसगुल्ले लाई हूँ ।

उसे सिर से पैर तक निहारते हुए मैंने नोटिस किया कि उसके गले में मेरे मंगलसूत्र से मिलता-जुलता मंगलसूत्र लटक रहा था । मैंने तीखेपन को मिठास का लिबास उढ़ाते हुए कहा…….

आरती तू बहुत अच्छी लग रही है । कैसी है ?

बढ़िया हूँ आंटी ।

कहते हुए वो अपनी चुन्नी समेटती लटके से बोली……  

ये ना….. मेरी फ्रैंड है , मौली……मेरी असिस्टैंट है , पाल्टी में कभी – कभी मेरी हैल्प करती है । आपका एक टाईम का खाना ये बना देगी…..अच्छा बनाती है ।

वो कहे जा रही थी , हम आँखें फाड़े उसे देख रहे थे । आरती चाँदनीचौंक के शोरूम में लगी चमचमाती बुत लग रही थी ।

6

आरती चली गई…..लेकिन मेरे मन में कई गाँठें छोड़ गई । मैं उसके बारे में इतना क्यूँ सोच रही थी….!! मुझे इससे क्या कि वो क्या बन गई थी….? मेरी खाना बनाने की गाड़ी तो खिसक ही पड़ी थी । लेकिन बच्चे हर बात पर उसे याद करते…………

मम्मी आरती आंटी , पास्ता बहुत अच्छा बनाती थीं ।

मम्मी जी भी रोटी बड़े अनमने मन से खातीं………..

आरती जैसी रोटी नही आती इसे । कच्ची रखती है , सब्ज़ी में तेल भी ज़्यादा डालती है ।

मुझे उसका नाम सुनते ही गुस्सा आता था……….

ये भी सीख जाएगी धीरे-धीरे । पर अब सोच लिया कि किसी के लिए इतना नही करना । ये लोग होते ही बड़े एहसान फ़रामोश हैं । 

मेरी बात पर सब मुझे अजीब नज़रों से देख रहे थे । मैं भी कुछ सकपका सी गई । आरती कभी – कभी फ़ोन ज़रूर करती थी । मन से उसे हटाने की कोशिश करती , लेकिन वो ढीढ की तरह वहीं अटक गई थी । अब सिर्फ़ सोसाईटी में ही नही सोसाईटी से बाहर भी उसे ऑर्डर मिल रहे थे । मेरी पड़ौसनें कहतीं……

आपकी आरती ने हमारे यहाँ पार्टी में खाना बनाया , सब उसके दीवाने हो गए । वहीं उसे और ऑर्डर मिल गए । क्या खाना बनाती है !!

ये सुनकर कुछ न कह पाती , आरती…..अब मेरी कहाँ रही थी । वो तो केटरिंग सर्विस वाली हो गई थी ।

आरती अब भी मेरी थी !! कहीं भीतर ही भीतर उसके जाने का ग़म गहरा जाता था । ये मन भी बड़ी उलझन पैदा कर देता है…….। अपनी उलझन बड़े अजीब ढंग से दिखाता है ।

अगले दिन ऑफ़िस में तबीयत ख़राब लगी , तो घर जल्दी आ गई । सिर भारी था…..फ़ोन बंद कर मैं सो गई । आँख खुली तो बाहर अंधेरा सा था । बच्चों की आवाज़ों के साथ नाक में कुछ जानी पहचानी सी मसालों की ख़ुशबू से मैं झटके से उठी और बाहर आई । देखा आरती किचन में बच्चों के साथ बातों में लगी कुछ बना रही थी ।

ये क्या बन रहा है ?

मेरी आवाज़ सुनते ही आरती चौंक कर मुड़ी…..

अरे…आंटी आप उठ गईं…..!! मैं आपको कितना फ़ोन कर रही थी , आपका फ़ोन बंद आ रहा था । चिंता हुई कि क्या हो गया ! इसलिए तो आई…..फिर दादी ने बताया आपकी तबीयत ठीक नही है । सोचा खाना बना देती हूँ । मौली तो सिर्फ़ एक टाईम बनाती है ।

मैं उसका मुँह ताक रही थी……कितनी…..साफ़…..चमकती आँखें थीं । उसने मुस्कुराते हुए कहा…

आंटी आपके लिए चाय बनाती हूँ ।

मैंने नज़रें फेरते हुए कहा…….

नहीं आज चाय मैं बनाऊँगी , हम दोनों पीएँगे ।

उसी बालकनी में बैठे हम चाय पी रहे थे । आज दोनों के कप अलग नही थे । चाय का आख़िरी घूँट बहुत मीठा लग रहा था ।