ज़िंदगी

ज़िंदगी एक दिन मिली थी राह में

मैंने कहा , आ बातें करें तनहाई में

बेवफ़ा है तू बड़ी हर बात में ,

चलती कहाँ है तू मेरे जज़्बात में !!

छोड़ दिया था साथ मेरा , बीच राह में !!

थक गया हूँ , मैं तेरी हर चाल में

कैसे फँस गया हूँ , तेरे जाल में !!

ज़िंदगी मुस्कुराती रही बैठी साथ में ,

जल रहा था दिल मेरा इस बात में ,

थाम कर बाँहें मेरी वो चल पड़ी थी साथ में ,

चल आज को लेकर तू मेरे साथ में ,

मुड़ता है क्यूँ पीछे को लेकर साथ में !!

पानी हूँ मैं , समय की रेत में ,

मुड़ती नहीं फिर रब्त की उस लहर में ।

 

बवंडर

 

कैसे धुंधला गए हैं चेहरे समय की आँधी में

आता है कभी यादों का बवंडर

फिर गुज़र जाता है धीमी चाल से

छोड़ जाता है वो फिर अपने निशाँ ।

कहीं दिल छिल गए , हैं कहीं कोरी नज़र ,

कहीं उखड़े हैं पेड़ तो कहीं उजड़ी है छत

फिर न पेड़ लगते हैं और न छत ही बनती है ।

कहीं कोई बीज शायद छितर कर दब गया था मिट्टी में

मिट्टी नर्म होगी तो वो निकलेगा अंधेरों से ।

ईंट-गारा मिल गया तो सर पे छत भी आएगी

छिले ज़ख्मों में कोई मरहम भी लगाएगी

कोरी नज़रों में शायद नमी भी आएगी

यादों के बवंडर की आँधी , कोई निशानी साथ लाएगी ।

रात के साए

शहर में भटकते वो रात के साए

है कहीं उनका भी कोई गाँव में ।

फ़ुटपाथ पर सोते हुए

झलती है पंखा आती-जाती गाड़ियाँ ।

लिपटा है वो भी इंच भर की मौत में ,

चला आया यहाँ रोटी की खोज में ।

चूल्हा है ठंडा आज माँ का

अपने बेटे की सोच में ।

सुबह मिली थी लाश एक लावारिस यहाँ

हँह!! न जाने क्यों इन्हें है सोना यहाँ !!

है फ़ुटपाथ भी कहीं सोने की जगह ??

गाड़ी सड़क से आ गई फ़ुटपाथ पर

गाड़ी बड़ी थी क्या करे

था बड़ा वो आदमी

होती हैं उनकी रातें भी बड़ी ।

मर गया तो क्या हुआ ?

है बोझ वो धरती पर बड़ा ।

जीने का हक़ उनको नही

ग़रीबी हटाने का है हमने नारा लिया ।

 

घर

ये तेरा घर , ये मेरा घर

ये ईंट-पत्थरों का घर

फिर भी है ये मेरा घर ।

बड़े-बड़े ये महल ,

शानों-शौकतों से भरे ,

चले गए , बना के सब ,

सिर्फ़ नाम रह गए ।

गुमनाम सा है ये महल ,

कोई नही जो कह रहा ,

ये मेरा घर , ये तेरा घर ।

उजड़ गए हैं रिश्ते सब ,

बस रहे हैं फिर भी घर ,

मेरा-तेरा है ये घर ,

हमारा कब ये होगा घर !!

मैं नूँ दिलों मुकाइए

बुल्लेशा गल ताईंयों मुकदी , जद मैंनूँ दिलों मुकाईये………

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में एक गाँव है कलोल । इस दूर दराज़ गाँव में बेटियों के लिए जो मुहीम चलाई जा रही है वो देखकर मैं नतमस्तक हो गई , उन लोगों के प्रति जिन्होंने इसे शुरू किया । मन चाहा कि इसे आप सब तक पहुँचाऊँ , शायद देश के किसी कोने में किसी ज़रूरतमंद बेटी के लिए हम भी कुछ कर सकें।

आज से तीन साल पहले कर्नल यशवंत सिंह चंदेल ने जब अपनी जवान बेटी मंजुषा को बीमारी में खोया तो दोनों पति – पत्नी टूट गए । इस दुख ने उन्हें गहरा घाव दिया था । खेत के हर पत्ते और बाग़ के हर फूल में मंजुषा का चेहरा दिखता था । जीवन बोझ लगने लगा था । गाँव में अपने आस – पास कई बेटियाँ या मंजुषा की सखियाँ दिखतीं तो उसकी याद और गहरा जाती । तभी उनके दिल में विचार आया , हर बेटी में अपनी बेटी देखने का और इस तरह शुरू हुआ “मंजुषा सहायता केंद्र” । उन्होंने अपनी पेंशन और अपने दूसरे बच्चों की सहायता से ज़रूरतमंद लड़कियों को आर्थिक सहायता देकर पढ़ाने का काम शुरू किया । इन तीन वर्षो में वे गाँव – गाँव घूमकर ऐसे परिवार को ढूँढते हैं जिनके बेटी है लेकिन आर्थिक अभाव के कारण स्कूल नही जा रहीं । वे उन्हें स्कूल में दाख़िला दिलवाकर उनकी पूरी शिक्षा की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं । अभावों में रह रहे ऐसे परिवार जिन्होंने एक या दो बेटियों के बाद कोई और संतान नही की उन्हें सम्मानित कर आर्थिक सहायता पहुँचाते हैं । एक परिवार की ऐसी बच्ची जो न सुन सकती थी और न बोल सकती थी को उन्होंने कई साल पढाया , नौकरी लगवाई और फिर शादी करवाई । आज वो सुखी पारीवारिक जीवन न्यतीत कर रही है ।

कर्नल साहब कुछ ग़रीब प्रतिभाशाली लड़कों की भी परवरिश कर रहे हैं । यही नही पति – पत्नी गाँव के लोगों की हर प्रकार से सहायता करते रहते हैं । कोई भी गाँव का व्यक्ति आर्थिक अभाव के कारण इलाज के बिना न रहे , उसकी जान ना जाए इस बात का वो पूरा ध्यान रखते हैं । ख़ुद आज के इस “और मिल जाए” के युग में दोनों पति-पत्नी सादगी भरा जीवन व्यतीत करते हैं । कबीर , नानक और बुल्लेशा के प्रशंसक हैं , उन्हीं को अपना पथप्रदर्शक मानते हैं ।

एक म्हाको फूल प्यारो , अधखिलो कुम्हला गयो ।

सोग बीतो , हरख छायो , फूल बाग लगा गयो ।

मन बाँवरा

मन बाँवरा उड़ चला

ना जानू मैं ये कहाँ चला

था जो बंधा पिंजरे में , साँसें थी पहरे में

कंठ था सूखा , गीत नही थे , गूँगे मन , सूनी आँखों में

मैं खोई थी सपनों में

मन बाँवरा………

झोंका हवा का ऐसा आया

मन पिंजरे को तोड़ के भागा

पर , पंख थके थे , भूल गए थे  उड़ना , हवा को छूना

मन बाँवरा…………………

दिल ने यूँ आवाज़ लगाई

परशिकस्त तू नही , तू शादकामी

परवाज़ है तू….मंज़िल तेरी पास आई

मन बाँवरा………..

लोरी

जब छोटे थे तो लोरी सुन कर सोते थे । जब माँ बनी तो लोरी गा कर बच्चों को सुलाती थी । बिना लोरी सुने उन्हें नींद ही नही आती थी । तब फ़िल्मों में भी लोरी ज़रूर होती थी । “मैं गाऊँ तुम सो जाओ ” , “नन्ही परी सोने चली हवा धीरे आना” , “राम करे ऐसा हो जाए मेरी निंदिया तोहे मिल जाए” ऐसी अनगिनत मधुर , सुरीली लोरियाँ गा कर माँओं ने बच्चों को थपकियाँ देकर सुलाया है । अफ़सोस! आज बच्चे लोरी जानते ही नही ! माँएँ लोरियाँ गाती नही ! इंसान की तरक्की ने कहीं बहुत ही मधुर पलों को भुला दिया जो माँ – बच्चों के मधुर संबंधों को गहरा करता था । वो पल जीवन भर साथ रहते हैं । हम कहते हैं कि अब समय बदल गया , संबंधों में वो गर्माहट नही रही । इसका ज़िम्मेदार कौन है ? सोचना होगा कि हम क्या छोड़े और क्या कभी न भूलें । मोबाइल और कंप्यूटर से समय निकाल कर उन प्यारे पलों को फिर से ज़िंदा करें । फ़ेसबुक पर नही  , टीवी पर कार्टून दिखा कर नही बल्कि बच्चों को बाहों मेें भरकर , लोरी गा कर सुलाएँ , देखिए बच्चा प्यारे सपने देखकर मुुुस्कुराता हुआ उठेगा । माँ के गले से निकली लोरी सीधी दिल को छू लेती है , वैसे पिता भी ये काम बखूबी कर सकते हैं ! चलिए लोरी को फिर ज़िंदा करते हैं ।