चाय का कप

(मानव प्रवृति है कि अपने से कमज़ोर को देखकर बड़ा आत्मिक सुकून सा मिलता है । उसे ऊपर उठते देख कहीं भीतर हलचल सी मच जाती है क्योंकि उसके कमज़ोर बने रहने में ही हमारा बड़प्पन बना रहता है । कुछ ऐसे ही अनुभव से प्रेरित है ये कहानी ।)

मैं कई बार बाल्कनी में जा कर देख आई थी । कई बार फ़ोन भी मिलाया था , लेकिन आरती का कहीं पता नहीं था । वो तो एक ही रिंग में फ़ोन उठा लेती थी फिर आज फ़ोन क्यूँ नही उठा रही । सोचा था संडे है , आज घर में आराम करूँगी , पर वो नही आई तो हो गया आराम !! इस उमस में मैं भीतर बाहर उबल रही थी । सारा घर ठीक करने के लिए संडे ही मिलता था । कहाँ से शुरू करूँ कुछ समझ नही आ रहा था । सबसे पहले किचन में गई क्योंकि नाश्ते के लिए देर हो रही थी । किचन में घुसते ही होश उड़ गए । सिंक में बरतनों का ढेर और फैला सामान देखकर सिर चक्कर खा गया । आरती की गैरहाज़िरी बहुत खल रही थी । उसके होते कोई चिंता नही होती थी । वो सब संभाल लेती थी । मैं उसी के रहते नौकरी कर पा रही थी । घर की , खाने की , कोई फ़िक्र नही थी । घरवालों की पसंद – नापसंद का ध्यान रखते हुए बड़े मन से खाना बनाना उसकी खासियत थी । दस साल में वो घर का अभिन्न अंग बन गई थी । उसके न होने का विचार ही डरावना था । उसकी अनुपस्थिति में ही उसकी उपस्थिति का महत्त्व पता चलता था । मैं गहरी साँस लेकर बर्तनों की ओर मुड़ी । किचन में बर्तनों की उठापटक की आवाज़ से मेरे भीतर का गुस्सा ज़ाहिर था , सुनकर पति ने भीतर झाँका , मानो दिख गए तो मुसीबत आ जाएगी । वहीं से झाँकते हुए बोले……….

बिचारी बीमार हो गई होगी……इतना नाराज़ क्यूँ होती हो ।

ये तो आग में घी डालने वाली बात हुई….!! मेरा तो ये सुनते ही सेरों खून फुँक गया….यानि हमदर्दी भी उसी से….., बेचारी भी वो !! बर्तन और ज़ोर से खनके । फिर तो पतिदेव किचन के आस-पास भी नज़र नही आए । भूल गई कि गैस पर बैंगन भुनने रख दिए थे , ये सोच कर कि आरती के आते ही कहूँगी कि आज बैंगन का भरता बना दे । बच्चों को बहुत पसंद है , वो बनाती भी बहुत बढ़िया थी । तभी सास की आवाज़ आई………..

बहू…..कुछ जल रहा है…….देख तो ज़रा ।

मन ही मन गुस्सा सास पर भी उतरा…………

इन्हें भी मुझे ही जलाने में मज़ा आता है !!

बर्तन छोड़कर मुड़ी तो देखा बैंगन जल-भुन कर राख हो चुके थे । ऊफ़…….समझ नही आ रहा , क्या-क्या संभालूँ । इस घर में सबको अपनी पड़ी है….मेरी किसी को चिंता नही !! तभी बेटी भागती हुई आई………

मम्मा…….मैंने आरती आंटी को देखा……अभी……एक आंटी से बातें करते हुए….नीचे ।

मैं तो सुनते ही खुशी से उछलना चाहती थी लेकिन ऐसा नही किया । बस एक गहरी साँस सुकून की ली और चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ गई ।

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आरती के आगमन की ख़बर से घर में ऐसा खुशी का माहौल छा गया जैसे लॉट्री निकल आई हो । लेकिन मेरा तो फ़र्ज़ था कि नाराज़गी दिखाऊँ……..

आज आने दो इस महारानी को , अच्छी डाँट लगाऊँगी , कम से कम फ़ोन तो उठाना चाहिए था ना ।

आरती ने अपनी बड़ी सी मुस्कान के साथ प्रवेश किया जैसे कुछ हुआ ही नही……….

गुडमोर्निंग दादी जी । गुडमोर्निंग आंटी जी ।

यही अंदाज़ था उसका घर में प्रवेश करने का । सब दम साधे मेरा चेहरा देख रहे थे , मैं तो जैसे सीमा पर तैनात थी……

तू कहाँ रह गई थी ? फ़ोन भी नही उठा रही थी । देर कैसे हो गई ?

मेरे दिल की भड़ास उस पर सवालों की गोलियाँ दाग रही थी । और वो……..दाँत निपोरती , शांतिदूत बनी काम में लग गई थी । मुझे दिल की भड़ास निकाल कर बड़ा सुकून मिला , वही जो ठंडी हवा के झोंकों से मिलता है……बिलकुल वैसा ही ।

मैं चैन से बालकनी में बैठी चाय का आनंद ले रही थी । आरती के हाथ की चाय के बिना मेरा दिन पूरा नही होता था । वो भी चाय की शौकीन थी । जब मेरी बनाती तो अपना कप लेकर मेरे पास बैठ जाती थी । उसे पता था कि उसका कप कौन सा था । अब इतनी भी अभिन्न नही बनी थी वो !! बालकनी में झूलती नीम की टहनी के झोंके के साथ आरती की मौजूदगी का एहसास बड़ा सुखद था , बिल्कुल रूई का सा । उसने मुझे निहारते हुए कहा….

आंटी जी आपका ये मंगलसूत्र बहुत सुंदर है , कितने का था ?

हाँ…। बहुत मंहगा था ।

मैंने कहा और उसकी बात को महत्त्व न देते हुए , उसके मतलब की बात की ।

आज क्या बनाएगी ?

बस इतना पूछने की देर थी और वो शुरू हो गई…….

अरे आंटी  जी , आप जो कहो वो बना दूँगी । मैंने दो साल एक साहब के यहाँ काम किया था , उनकी वाईफ़ अंग्रेज़ थीं । उन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया । मुझे सब आता है । वो साहब ना फिर अमरीका चले गए ।

खाना बनाने के साथ – साथ बातें भी वो बढ़िया बनाती थी । जब स्वादिष्ट खाना हज़म करना है तो उसकी बातें भी हज़म करनी पड़ेंगी । कभी – कभी मम्मी जी उसकी बातों से कुढ़ कर कह देतीं……….

तू थोड़ा कम बोला कर…..बोलती बहुत है ।

मैं मन ही मन घबरा जाती कि अगर आरती बुरा मान कर भाग गई तो क्या होगा…..?  इसलिए उसकी तरफ़दारी करते हुए कहती…….

मम्मी जी , घर की रौनक है हमारी आरती । ये ना हो तो घर में कैसा सन्नाटा सा छा जाता है ।

पति और मम्मी जी ने मुझे इस बात पर घूर कर देखा , पर मैंने नज़रें नहीं मिलाईं । क्यूँ मिलाऊँ…? ये इतना ज़रूरी नही !! बस आरती को देख मुस्कुरा दी । मुझे मुस्कुराते देख आरती खुशी से दोहरी हो गई थी ।

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आरती खुश होती तो कुछ बढ़िया डिश ज़रूर बनाती । आज रात भी डिनर में उसने मलाई कोफ़्ते बनाए थे । हम सब टीवी देखते हुए गरमा – गरम रोटियाँ खा रहे थे । पति ने चटकारे मारते हुए कहा…..

आरती तू ना , खाने के ऑर्डर लेना शुरू कर दे , क्या लज़ीज़ खाना बनाती है ।

आरती अपनी तारीफ़ सुनकर शर्मा गई । इस पर बेटी टीनी ने भी उसे हवा दी…….

हाँ आंटी , क्या गजब आईडिया है…..!! आरती केटरिंग सर्विस !!

अब तो आरती , रसोई से ला रही फूली रोटियों सी फूल रही थी । उसके चेहरे के भाव ऐसे बदल रहे थे , मानो केटरिंग सर्विस शुरू हो ही गई । चेहरे की मुस्कान कानों के आर – पार होने को थी ।

आंटी जी सच्ची में ऐसा हो सकता है क्या ?

क्यूँ नही…..क्यूँ नही । तू क्या किसी से कम है ।

मैंने फल की चिंता किए बिना उसकी हौसला अफ़ज़ाई की । सासू जी व्यंग्यात्मक…..हूँह….कह कर खाना खाती रहीं । मैंने और आरती ने उनकी हूँह को कम्पलीट इग्नोर किया । आरती का जोश बढ़ गया और एक रोटी मुझे एक्स्ट्रा खिला दी । मैं खुश थी कि वो खुश है लेकिन उस दिन उसके सपनों के ऐसे पंख लगेगें इस बात का अंदाज़ा मुझे नहीं था ।

आरती ने टीनी की बात को कुछ ज़्यादा ही सिरीयसली ले लिया था । इसका एहसास मुझे तब हुआ जब  एक दिन मैं ऑफ़िस से आई तो देखा कि आरती टीनी के पास , घुटनों पर हाथ टिकाए बड़ी मगन हो बातें कर रही थी । टीनी कंप्यूटर पर कुछ कर रही थी । मुझे देखते ही आरती उठ खड़ी हुई और चहकती हुई बोली……..

आंटी जी देखिए , टीनी दीदी ने मेरा काम शुरू करने की तैयारी कर दी । अंकल जी कह रहे थे काम सोसाईटी से शुरू करूँ ।

टीनी से अब वो टीनी दीदी हो गई थी…..। टीनी ने प्रिंटआऊट निकाल कर दिखाया…..

आरती केटरिंग सर्विस……हर तरह की पार्टी ऑर्डर के लिए कॉन्टैक्ट करें…..

नीचे आरती का और मेरा फ़ोन नंबर लिखा था । अपना नंबर देख मेरी भँवें तन गईं , मैंने टीनी को घूरा…..बच्चे मेरी आँखों के इशारे खूब समझते थे । टीनी ने आँखें झपकाते हुए कहा……

मम्मा आपका नंबर इसलिए लिखा है ताकि आरती आंटी का ना मिले , तो कम से कम आप के फ़ोन पर ऑर्डर आ जाएँगे । आपको सिर्फ़ आरती आंटी को बताना होगा ।

मैंने टीनी को तीखी नज़र से ऐसे देखा कि “क्या मैं अब इसकी सैक्रेटरी बनूँगी ?” मेरे अहम पर सीधी चोट थी । इन बच्चों को क्या समझाऊँ….? घर का भेदी लंका ढाए……आरती चली गई तो मेरा क्या होगा…?  घर का क्या होगा…..?

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आरती और टीनी मेरा मुँह देख रहे थे । मैंने बात का रूख़ बदल आरती की ओर देख कर कहा…..

यही करती रहेगी कि कुछ चाय – वाय भी पिलाएगी !!

आरती कंधे उचका कर , दाँतों तले जीभ दबाती किचन की ओर भागी । टीनी पता नही मेरे चेहरे पर क्या देख रही थी !! पोस्टर बना कर बच्चे सोसाईटी में लगाने भागे ।

मुझे घर में सबका आरती की केटरिंग सर्विस को लेकर इतना पर्सनल होना अच्छा नही लग रहा था । जो भी हो इस चक्कर में कुछ दिन लंच – डिनर की शक्ल ज़रूर बदल गई थी । तरह – तरह के पकवान बन रहे थे क्योंकि आरती नई – नई डिशेज़ की प्रैकटिस कर रही थी । सब बड़े खुश थे । थोड़े दिन जब यूँही निकल गए तो मैं भी निश्चिंत हो गई कि अब तक कोई ऑर्डर नही आया तो मतलब ये कि कुछ नही होने का । मैं मन ही मन खुश थी , इसी खुशी में अपना एक पुराना सूट निकाल कर आरती के सामने रख दिया…….

कुछ दिनों में दुर्गा पूजा आने वाली है , ये ले……..मैंने कम पहना है….नया सा ही है ।

आरती के चेहरे पर बच्चों जैसी मुस्कान आ गई……

आंटी थैंक्यू…..बहुत सुंदर है ।

मुझ में रूई सा एहसास उड़ रहा था । जो हल्का होता है उड़ता ही है !! मम्मी जी अपने कमरे में बैठी माला फेर रही थीं , बीच – बीच में आँखें भी कमरे के बाहर फेर लेती थीं । साथ ही गा रही थीं…….

रहिमन चुप ह्वै बैठिए , देखी दिनन के फेर…..

चोट सीधी मुझे ही लग रही थी या मुझ पर की जा रही थी !! उस पर सामने बैठे पति की संदिग्ध टेढ़ी मुस्कान मेरे घाव पर नमक छिड़क रही थी । बना दो मुझे विलेन…..लेकिन मेरे ही कारण आरती तो टिकी थी !!

पर मेरा अनुमान ग़लत था ये मुझे जल्द ही पता चल गया । एक दिन जब मैं ऑफ़िस से आई तो मम्मी जी ने ख़बर दी…….

आरती सुबह आई थी , लंच बना गई थी और कह गई कि रात को नही आएगी । एक पार्टी का आर्डर मिला है । एक रात के दस हज़ार रूपए मिलेंगे । चलो अच्छा है , उसका बिज़नस चल पड़ा ।

सुनते ही मेरा मन और मुँह दोनों छोटे हो गए । मेरे रेत के अनुमानों का महल एक लहर के साथ ही ढहता नज़र आया । आरती जीवन में आगे बढ़ना चाहती थी और मैं घट रही थी , क्या कहती !! अगले दो दिन तक आरती का कहीं कोई पता नही था । मैं उस दिन को कोस रही थी जब आरती के महत्वाकांक्षी मन ने सपने देखने शुरू किए थे । ये आग अपनों की ही लगाई थी , किसी को क्या दोष दें ।

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इसी बीच एक दिन आरती का फ़ोन आया………..

आंटी जी , आप लोगों को कितना थैंक्यू करूँ । मुझे बहुत आर्डर मिल रहे हैं । टाईम भी नही मिल रहा आपसे मिलने का ।

अब आरती…….आरती कहाँ बिज़नेस वूमन बन गई थी । सुर बदल गए थे । सुन कर मेरा दिल बैठ सा गया , बच्चों पर भी गुस्सा आ रहा था कि उन्हें क्या ज़रूरत थी भला ये सब करने की !! आग लगी थी…….उबाल आ रहा था…….बाहर फैलेगा ही…….

लेलो मजे अब आरती केटरिंग सर्विस के….!! और उकसाओ उसे । एक कहावत सुनी है ना…..कौवा चला हंस की चाल तो अपनी भी भूल गया ।

इस बात पर टीनी ने , जो कंप्यूटर में सिर दिए बैठी थी , 360 डिग्री मुड़कर मेरी ओर देखा…..

मम्मा…..कल वो नीलम आंटी से आप फ़ोन पर क्या बातें कर रही थीं….!! वूमन लिब्रेशन….इक्वैलिटी….!! जब अपनी बारी आई तो हो गईं हवा सारी बातें !!

ये सुन मैंने पति को घूरा……लेकिन वो तो धीमी मुस्कान लिए अख़बार में नज़रें गड़ाए बैठे थे । गुस्सा तो बहुत आया…

पर चुप रही , ये सोच कर कि मैं उसे इतना तूल क्यूँ दे रही हूँ…..?

इसी बीच आरती अचानक प्रकट हो गई , अपनी किसी सहेली को लेकर । उस पर गजब ये कि उसके हाथ में रसगुल्लों का डिब्बा था । आरती का रूप बदला हुआ था । अब उसके कपड़े भड़कीले और नए फ़ैशन के थे । पैरों में चमचमाती सैंडिल थीं । कपड़ों से मैच खाती हाथ – पैरों में नेलपॉलिश लगी थी । मैचिंग ज्वैलरी और चूड़ियाँ खनक रही थीं ।

लेकिन वो उसी अंदाज़ में आई थी……..

गुड मोर्निंग दादी जी…….। गुड मोर्निंग आंटी जी । मेरा काम आप लोगों की दुआ से अच्छा चल गया है । आप सब के लिए रसगुल्ले लाई हूँ ।

उसे सिर से पैर तक निहारते हुए मैंने नोटिस किया कि उसके गले में मेरे मंगलसूत्र से मिलता-जुलता मंगलसूत्र लटक रहा था । मैंने तीखेपन को मिठास का लिबास उढ़ाते हुए कहा…….

आरती तू बहुत अच्छी लग रही है । कैसी है ?

बढ़िया हूँ आंटी ।

कहते हुए वो अपनी चुन्नी समेटती लटके से बोली……  

ये ना….. मेरी फ्रैंड है , मौली……मेरी असिस्टैंट है , पाल्टी में कभी – कभी मेरी हैल्प करती है । आपका एक टाईम का खाना ये बना देगी…..अच्छा बनाती है ।

वो कहे जा रही थी , हम आँखें फाड़े उसे देख रहे थे । आरती चाँदनीचौंक के शोरूम में लगी चमचमाती बुत लग रही थी ।

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आरती चली गई…..लेकिन मेरे मन में कई गाँठें छोड़ गई । मैं उसके बारे में इतना क्यूँ सोच रही थी….!! मुझे इससे क्या कि वो क्या बन गई थी….? मेरी खाना बनाने की गाड़ी तो खिसक ही पड़ी थी । लेकिन बच्चे हर बात पर उसे याद करते…………

मम्मी आरती आंटी , पास्ता बहुत अच्छा बनाती थीं ।

मम्मी जी भी रोटी बड़े अनमने मन से खातीं………..

आरती जैसी रोटी नही आती इसे । कच्ची रखती है , सब्ज़ी में तेल भी ज़्यादा डालती है ।

मुझे उसका नाम सुनते ही गुस्सा आता था……….

ये भी सीख जाएगी धीरे-धीरे । पर अब सोच लिया कि किसी के लिए इतना नही करना । ये लोग होते ही बड़े एहसान फ़रामोश हैं । 

मेरी बात पर सब मुझे अजीब नज़रों से देख रहे थे । मैं भी कुछ सकपका सी गई । आरती कभी – कभी फ़ोन ज़रूर करती थी । मन से उसे हटाने की कोशिश करती , लेकिन वो ढीढ की तरह वहीं अटक गई थी । अब सिर्फ़ सोसाईटी में ही नही सोसाईटी से बाहर भी उसे ऑर्डर मिल रहे थे । मेरी पड़ौसनें कहतीं……

आपकी आरती ने हमारे यहाँ पार्टी में खाना बनाया , सब उसके दीवाने हो गए । वहीं उसे और ऑर्डर मिल गए । क्या खाना बनाती है !!

ये सुनकर कुछ न कह पाती , आरती…..अब मेरी कहाँ रही थी । वो तो केटरिंग सर्विस वाली हो गई थी ।

आरती अब भी मेरी थी !! कहीं भीतर ही भीतर उसके जाने का ग़म गहरा जाता था । ये मन भी बड़ी उलझन पैदा कर देता है…….। अपनी उलझन बड़े अजीब ढंग से दिखाता है ।

अगले दिन ऑफ़िस में तबीयत ख़राब लगी , तो घर जल्दी आ गई । सिर भारी था…..फ़ोन बंद कर मैं सो गई । आँख खुली तो बाहर अंधेरा सा था । बच्चों की आवाज़ों के साथ नाक में कुछ जानी पहचानी सी मसालों की ख़ुशबू से मैं झटके से उठी और बाहर आई । देखा आरती किचन में बच्चों के साथ बातों में लगी कुछ बना रही थी ।

ये क्या बन रहा है ?

मेरी आवाज़ सुनते ही आरती चौंक कर मुड़ी…..

अरे…आंटी आप उठ गईं…..!! मैं आपको कितना फ़ोन कर रही थी , आपका फ़ोन बंद आ रहा था । चिंता हुई कि क्या हो गया ! इसलिए तो आई…..फिर दादी ने बताया आपकी तबीयत ठीक नही है । सोचा खाना बना देती हूँ । मौली तो सिर्फ़ एक टाईम बनाती है ।

मैं उसका मुँह ताक रही थी……कितनी…..साफ़…..चमकती आँखें थीं । उसने मुस्कुराते हुए कहा…

आंटी आपके लिए चाय बनाती हूँ ।

मैंने नज़रें फेरते हुए कहा…….

नहीं आज चाय मैं बनाऊँगी , हम दोनों पीएँगे ।

उसी बालकनी में बैठे हम चाय पी रहे थे । आज दोनों के कप अलग नही थे । चाय का आख़िरी घूँट बहुत मीठा लग रहा था ।

पीपल

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यह कहानी एक ऐसी लडकी की है जिसने बचपन से अपने पापा से संगीत सीखा था। उसका और उसके पापा का एक पिता – पुत्री के अलावा , गुरू – शिष्य का रिश्ता भी था । उसके पापा ने उसका बड़ा अद्भुत नाम रखा था , जिसका अर्थ वो बचपन में नही समझ पाई थी । अचानक पिता के चले जाने से उसका जीवन निराशा में डूब गया और उसका आत्मविश्वास , उसका संगीत सब खो गया।

पीपल

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काव्या अपने बगीचे में पानी दे रही थी…..पास ही माली काका क्यारियों की गुड़ाई कर रहे थे|
”दीदी ये दीवार के कोनों में उग आगे पीपल के पौधों को उखाड़ दूँ क्या?”-काका ने अचानक पूछा तो काव्या का मन अतीत की ओर भागने लगा……जहाँ पीपल सिर्फ एक पेड़ का नाम नहीं था….
उसने मुस्कुरा कर कहा- निकाल कर फेंकिये नहीं,कहीं और लगा दीजिये……

माली काका ने बड़े प्यार से पौधे को उखाड़ कर दूसरी जगह रोप दिया……काव्या को यकीन था कि जल्द ही पौधा वहां भी जड़ पकड़ लेगा और वक्त के साथ लहलहाने लगेगा….

पीपल….पापा उसे भी तो इसी नाम से पुकारा करते थे…..कैसे चिढ़ जाया करती थी वो….पापा से झगड़ती भी कि “पापा आपने ऐसा फनी सा नाम क्यूँ रखा है?…मेरी सहेलियां मज़ाक बनाती हैं”|

पापा हँस देते और अपनी लाड़ली को गोद में बैठा कर दुलारते और कहते –

“कोमल पत्तियों और ठंडी छाँव देने वाले पीपल जैसी है मेरी पीपल……जब बड़ी हो जाओगी तब ख़ुद समझ जाओगी अपने नाम का अर्थ”

अपने संगीत प्रेमी पापा की दुलारी थी वो……
काव्या भी उनकी तरह संगीत सीखे ये उनका ख्वाब था….वे उसे बचपन से संगीत से जुडी फिल्में दिखाते,हर शाम तानपुरा लेकर उसे रियाज़ करवाते…..वो अपनी लाड़ली को समझाते-“संगीत ज़िन्दगी में खुशियाँ और प्यार लाता है इससे कभी नाता मत तोडना…”
अपने पापा की हर बात वो गांठ बाँध लेती……

कभी कभी माँ उन्हें छेड़ती भी…..कि “घर के काम काज भी सीख लेने दीजिये उसे ,वरना शादी के बाद घर कैसे सम्भालेगी……”

पापा मुस्कुराते हुए कहते-“ बहुत वक्त पड़ा है…..घर तो मेरी काव्या गाते गुनगुनाते हुए सम्हाल लेगी….

कितना यकीन था पापा को उस पर…काव्या पौधों के बीच से सूखे पत्ते चुनते हुए सोचने लगी….

उस यकीन की वजह से ही तो पापा ने उसे हॉस्टल पढने भेजा था,क्यूंकि उनके शहर में कोई अच्छा संगीत विद्यालय नहीं था…….

अपनी लाड़ली को याद करके उसके पापा जब जब उदास होते उसे ख़त लिख भेजते…..वे कोई मामूली ख़त नहीं बल्कि बाकायदा संगीत की क्लास होते…..

खतों में माँ पूछती –कि काव्या तू ठीक से खाती पीती तो है न? और पापा का सवाल होता कि रोज़ क्लास के बाद रियाज़ करती है न काव्या?

काव्या भी उतने ही प्यार से उनके खतों का जवाब देती……उन्हें यकीन दिलाती कि उनकी बेटी उनके ख्वाब ज़रूर पूरे करेगी….

आज भी वो सारे ख़त सहेजे रखे हैं उसके पास…..

माली काका के जाने के बहुत देर बाद भी काव्या वहीं बगीचे में बैठी उन बीते सुरीले दिनों को याद करती रही……
उसने गुनगुनाने की कोशिश की मगर उसका गला रुंध गया……..

2

काव्या घर के कामों से निबट कर बाकी समय अपने बगीचे में फूलों के बीच ही बिताती थी। खाली बैठती तो फिर यादों में डूब जाती थी। वो अपने पापा का जाना भूल नही पा रही थी और भूलती भी कैसे , उसका संगीत उसके पापा से ही तो था , हर गीत उन्ही का सिखाया था। उसकी सुबह पापा के राग भैरव और विभास के सुरों से होती थी और रात राग पीलू और मालकौंस के स्वरों से होती थी। उसके संगीत को लेकर पापा ने और उसने कितने सपने देखे थे , पर पापा के जाने के बाद , जैसे उसने सपने देखना बंद कर दिया था। गाने की कोशिश करती तो उसकी आँखों के आगे वो दिन आ जाता जब उसे उसके एक दूर के रिश्तेदार हॉस्टल लेने आए थे और वह हैरान थी क्योंकि ऐसा पहले कभी नही हुआ था। उसे बताया गया था कि उसके पापा की तबीयत खराब है।  काव्या सारे रास्ते सोचती रही थी कि क्या हो गया पापा को ? कल ही तो उनका ख़त मिला था जिसमें उन्होंने लिखा था कि वो “मिली” फ़िल्म देख कर आए थे जिसे देख वो बहुत रोए थे क्योंकि वो कहानी एक पापा और उनकी बेटी की कहानी है, फिर आज अचानक उन्हें क्या हो गया ? जब वह घर पहुँची तो माँ को बिलखते पाया था ,पापा उसे छोड़ कर जा चुके थे। वह सन्न रह गई थी समझ नही पाई थी कि ये क्या हो गया उसके साथ। उसे लगा जैसे उसकी दुनिया खत्म हो गई। उनके पास न रहने को अपना घर था और न कमाई का कोई ज़रिया था। ऐसे में उसे हॉस्टल में पढ़ाना माँ के लिए बहुत मुश्किल था , काव्या भी माँ की मजबूरी समझ रही थी इसलिए उसी ने माँ से कहा था कि … वो वहीं पास के स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी कर लेगी । लेकिन संगीत छूट गया था , क्योंकि अब सुविधा नही थी। काव्या मन ही मन बुझती जाती थी लेकिन हर रोज़ नियम से पापा का तानपुरा साफ़ करती और भीगी आँखों से फ़िर कोने में रख देती थी।एक दिन बेसुरे हो गए तानपुरे को मिलाने बैठ गई थी।सुर लगाने लगी तो फिर गला भर आया और आँखों में नमी आ गई ।पापा के बिना  वो कभी गाएगी ऐसी कल्पना भी नही की थी ।

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काव्या की ज़िंदगी से संगीत छूटता जा रहा था । हर पल वो अपने बचपन और पापा की यादों में घिरी रहती थी। उसने अपने आस पास बचपन की यादों का एक दायरा सा बना लिया था , जिसके बाहर वो निकल ही नही रही थी। कॉलेज में आई तो भी काव्या वही बुझी बुझी सी रहती , मुस्कुराती चहकती काव्या की मुस्कान फीकी पड़ गई थी । ऐसे में माँ ने अनिकेत से उसकी शादी का फैसला ले लिया था क्योंकि माँ का विचार था कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा ये अपने घर परिवार में सब भूल जाएगी। अनिकेत , जिसका संगीत से कोई संबंध नही था लेकिन सरल और काव्या से प्रेम करने वाला पति था। काव्या शादी के बाद घर गृहस्थि में लीन तो हो गई लेकिन मन का एक कोना खाली ही रहा था। वो अब भी अपनी यादों के दायरे को तोड़ नही पाई थी । वह कभी बगीचे में लगी रहती तो कभी माँ के पास चली जाती थी। एक दिन माँ ने उससे कहा था

काव्या तुम गाना फिर से शुरु क्यों नही करतीं ? तुम्हारी सच्ची खुशी तो उसी में है।

और जाते हुए माँ ने उसे पापा का तानपुरा थमाते हुए कहा था

काव्या इसे अपने साथ लेकर जाओ , और गाने की कोशिश करो ।तुम्हारे पापा तुम्हें जो दे गए हैं वो कभी ख़त्म नही हो सकता।

उसने सिर झुका कर तानपुरा थामा तो उसके बेसुरे हो गए तार झंझना उठे थे तब उसे याद आया था कि पापा कभी तानपुरा बेसुरा नही होने देते थे , हमेशा सुर में मिलाकर ही रखते थे , यह सोच उसे अपने पर ग्लानि हो रही थी कि उसने पापा की कोई बात नही रखी। उसने अपने पापा की मेहनत और सपने सब तोड़ दिए थे। माँ ने कही तो उसके मन की बात थी पर उसे अपने पर विश्वास कहाँ था कि वो फिर कभी गा पाएगी । फिर भी उसका मन हर वक्त कुछ तलाश करता रहता था , जैसे वो अंधकार में कुछ ढूँढ रही थी और उसकी तलाश अधूरी ही रहती थी। जो चीज़ उसे जन्म से मिली थी वह उससे दूर नही रह सकती थी लेकिन उसे राह नही सूझ रही थी , वह दिशाहीन सी यादों में कैद चल रही थी।

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तानपुरा अपने कमरे के एक कोने में खड़ा करते हुए उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई , उसे याद आया जब उसने पहली बार उस तानपुरे को हाथ लगाया था और पापा ने रियाज़ करने को कहा था तो शौक शौक में देर तक बजाने के कारण उसकी उँगली छिल गई थी और उससे खून आने लगा था , उसने चुपचाप उसपर बैंडएड लगा ली थी । पापा और माँ के पूछने पर झूठ कह दिया था कि माँ के लिए पूजा के फूल तोड़ रही थी तो काँटा चुभ गया  था । अगर ऐसा न कहती तो पापा उसे कई दिन तानपुरा बजाने न देते। वो सोच रही थी कि अब वही तानपुरा बेसुरा खड़ा था और वो उससे दूर भाग रही थी। इतने में कॉल बैल बजी और काव्या दरवाज़ा खोलने बाहर आई । अनिकेत ऑफ़िस से वापस आया था

काव्या बहुत थक गया हूँ । एक कप अदरक वाली चाय  मिलेगी।

कहते हुए अनिकेत सोफ़े पर बैठ गया था ।

तुम फ़्रैश हो कर आओ मैं अभी बनाती हूँ।

कहती हुई काव्या किचन में चली गई और अनिकेत कमरे में । अनिकेत ने कमरे में जाते ही कोने में खड़ा तानपुरा देखा तो चहक उठा

काव्या तुम गाना शुरू कर रही हो ? वाह , मज़ा आ गया ।

ये कहते हुए वो बाहर आ गया था

काव्या ये तुमने बहुत अच्छा सोचा।

पता नही अनिकेत मैं गा भी पाऊँगी कि नही , इतने समय के बाद गाना आसान नही और मुझे कुछ याद भी कहाँ है।

कहते हुए उसके गले में जैसे कुछ फँस गया और वो चुप हो गई थी। अनिकेत ने उसके कंधों कर हाथ रखते हुए प्यार से कहा था

काव्या तुम भूली कुछ भी नही हो ,तुमने अपने मन दर्पण पर धूल जमा ली है। उसे साफ़ कर दो।

लेकिन वो तो जैसे अपना अस्तित्व खो चुकी थी । वो सिर्फ़ और सिर्फ़ बेटी , पत्नी , बहू और माँ थी बस ।

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काव्या भोर होते ही , चिड़ियों की चहक के साथ उठ जाती थी । समय कब पक्षियों के झुंड की तरह उड़ गया पता ही नही चला । अब वो दो बच्चों की माँ थी । आज भी वो उठ कर बाहर बगीचे में आकर बैठ गई थी और अनिकेत की कही बात को सोच रही थी। वह नए रोपे गए पीपल के पौधे को देखने लगी कि इसने जड़ पकड़ी कि नही कि उसकी नज़र दीवार की झिर्री से झाँकते पीपल के कोमल नए पौधे पर पड़ी तो वो सोचने लगी कि किस तरह ये कोमल पौधा इस पथरीली , सख़्त दीवार में भी पनपने की जगह ढूँढ लेता है ! आज वो उसमें अपना अस्तित्व , अपने नाम का अर्थ ढूँढ रही थी । कैसी भी विपरीत परिस्थिति में अपने वजूद को बनाए रखना , क्या यही था उसके नाम का अर्थ ? क्या इसीलिए पापा ने उसका नाम पीपल रखा था ? लेकिन उसने तो परिस्थितियों के सामने हथियार डाल दिए , वो तो हार कर बैठ गई थी। शायद अनिकेत ठीक ही कह रहा था कि उसने अपने मन पर धूल जमा ली है । यह सोचते हुए वो धीमे कदमों से अंदर जाने लगी । कमरे में जाकर उसने काँपते हाथों से तानपुरा उठाया और दूसरे कमरे में बैठ गई। बेसुरे हो गए तानपुरे को सुर में मिलाने लगी , तानपुरा मिलाते हुए पापा की एक एक बात याद आ रही थी । इतने दिनों बाद सुर लगाने लगी तो आवाज़ काँप गई और खाँसते खाँसते आँखों से पानी बहने लगा । अनिकेत कमरे के बाहर चुपचाप खड़ा सब देख रहा था । वो जानता था कि काव्या को ये यादों का दायरा खुद ही तोड़ना होगा , इससे बाहर निकलना होगा। काव्या ने तानपुरा रख दिया उसे घुटन होने लगी , अनिकेत ने अंदर आकर उसे उठाया तो वह उसके कंधे पर सिर रख कर भीतर की घुटन बहाती रही । काव्या को निराशा के बादलों ने घेर लिया था , कहीं दूर तक कोई किरण नज़र नही आ रही थी।

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अगले दिन जब उसने सुबह उठ कर बगीचे के बाहर रोपे पीपल के पौधे को देखा तो उसके चेहरे पर  मुस्कान आ गई , पौधा जड़ पकड़ चुका था और नन्हें नन्हें लाली लिए पत्ते बाहर झाँक रहे थे। उस दिन उसके मन में भी एक उम्मीद ने जन्म लिया था , वह भीतर गई और फिर तानपुरा लेकर बैठ गई थी। आज उसके हाथ तानपुरा थामते हुए काँपे नही थे । वह मंद मंद आलाप ले रही थी । काव्या नियम से अपना रियाज़ करने लगी । बरसों की जमी धूल झड़ने लगी थी । निराशा के बादल धीरे धीरे छंटने लगे थे । अनिकेत उसके लिए बहुत खुश था , वो चाहता था कि काव्या अपना सपना पूरा करे । आज काव्या का जन्मदिन था , अनिकेत उसके लिए पंडित जसराज के प्रोग्राम के पास लाया था । काव्या के लिए इससे अच्छा उपहार नही हो सकता था। बरसों वाद वो म्यूज़िक प्रोग्राम सुनने जा रही थी , जब छोटी थी तो पापा उसे ले जाते थे। एक दिन जब काव्या अपना सुबह का रियाज़ समाप्त कर उठी तो फ़ोन की घंटी बज उठी , उसने सोचा माँ का होगा , वह रोज़ नियम से उसकी ख़ैर ख़बर लेती रहती थीं , लेकिन फ़ोन किसी अजनबी का था , किसी म्यूज़िक कॉलेज का जहाँ उसे परफ़ॉम करने का आमंत्रण मिला था। अक्सर संयोग ही मनुष्य का निर्माण कर देते हैं । उसे अपने पर विश्वास नही हो रहा था ।वो सोच रही थी कि ये कैसे हुआ ? भागकर उसने अनिकेत को ये खबर दी थी ।

अनिकेत , क्या मैं ये कर पाऊँगी । क्या मुझे हाँ कहना चाहिए ।  “

वो नरवस थी ।

काव्या तुम सब कर सकती हो । तुम ये प्रोग्राम ज़रूर करोगी।“ 

अनिकेत ने उसे विश्वास दिलाया था।

लेकिन ये हुआ कैसे ?

उसने अनिकेत से पूछा था । तभी पता चला कि पड़ौस के पॉल साहब के यहाँ म्यूज़िक कॉलेज की प्रिंसिपल साहिबा आईं थी जोकि उनकी मित्र हैं । उन्होंने काव्या का रियाज़ सुना और सोच लिया कि उन्हें अपने कॉलेज में बुलाएँगी ।उसके पास एक महीने का समय था तैयारी करने के लिए , उसने दिन रात मेहनत शुरू कर दी , उसे लग रहा था जैसे ये उसकी ज़िंदगी का सबसे कठिन इम्तेहान था । आखिर वो दिन भी आ गया , काव्या आज पहली बार लोगों के सामने परफ़ॉम करने वाली थी । जब वो परफ़ॉम करने स्टेज पर पहुँची तो उसके पाँव काँप रहे थे , इतने लोगों के बीच उसे डर लग रहा था । सामने बैठा अनिकेत ऐर उसके बच्चे मुस्कुरा रहे थे । ओपन स्टेज पर वह आँखें मूँद कर बैठ गई , उसे याद आया पापा कहते थे जब स्टेज पर बैठो तो सोचो सिर्फ़ तुम हो , उसने पापा से सीखी स्तुति से गाना शुरू किया और गाती चली गई । प्रोग्राम समाप्त होने पर उसने देखा लोग तालियाँ बजा रहे थे ,अनिकेत और उसके बच्चे खड़े हो गए थे । उसने आसमान की ओर देखा तो सिर पर पीपल के पेड़ों के झुरमुठ उसे साया दे रहे थे ।

 

एक और कबीर

गोरखपुर की घटना ने देश में सभी को कहीं भीतर तक हिला दिया । उन माँओं के दर्द और रुदन से पूरा देश दहल गया ।दिल में दर्द उठा और खारा पानी गालों पर ढुलक गया । बचपन का वो दिन याद आ गया जब मेरा बुखार नही टूट रहा था और डॉक्टरों को कारण पता लगाने में समय लग रहा था । मैं पेट दर्द से रात में उठ बैठती थी । एक दिन रात में उठी तो पापा को घर के छोटे से मंदिर में जिसमें हिंदू देवताओं के अतिरिक्त गुरू नानकदेव , बुद्ध और जीजस की तसवीर भी थी । गीता , बाईबिल के साथ कुरान भी थी । पापा हाथ जोड़े , आँखें मूँदें खड़े बोल रहे थे……

हे भगवान , मेरी बच्ची का सारा दर्द मुझे देदे और उसे अच्छा कर दे ।

मैं चुपचाप पेट दबाए सोने का बहाना किए लेटी रही । सुबह जब पापा ने पूछा कि रात को दर्द तो नही हुआ था , तो मैंने पापा की ओर देखते हुए , ना में सिर हिला दिया था । ये सुनते ही पापा के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी । सोचती हूँ कि इन बच्चों के माँ-बाप पर क्या गुज़र रही होगी जिन्होंने अपनी आँखों से अपने बच्चों का दम घुटते देखा होगा । अराजकता की जड़ें मज़बूत हो छोटे पौधों को खा रही हैं । मेरी कल्पना के घोड़े बेलगाम दौड़ते हुए सोचने लगे कि आज से सैंकड़ों साल पहले शायद कुछ ऐसा ही हुआ होगा जब कबीर और नानक जैसे संतों का उदय हुआ था । क्या आज हमें फिर किसी कबीर की ज़रूरत नही है जो हमारी आँखों पर पड़े अज्ञान के पर्दे को हटाए ? क्यूँ फिर कोई कबीर नही आ रहा?

कभी ऐसा लगता है जैसे कबीर सब देख रहे हैं !! तभी तो उन्होंने ये कहा………..

जागहु रे नर सोबहु कहा , जम बटपारै रूँधे पहा ।

जागि चेति कछु करौ उपाई , मोटा बैरी है जँमराई ।।

सेत काग आये बन माँहि , अजहूँ रे नर चेतै नाँहि ।

कहै कबीर तबै नर जागै , जम का डंड मूँड मैं लागै ।।

अर्थात – ऐ मनु्ष्य , अज्ञान निद्रा में क्यों सोए हो ? ज्ञान में जागो । यम रूपी रहजन ने तुम्हारा रास्ता रोक रखा है । जाग कर कोई उपाय करो । तुम्हारा दुश्मन मज़बूत है । वृद्धावस्था आ गई , अब मृत्यु करीब है । तुम्हें अब भी ज्ञान नही हो रहा है ।जान पड़ता है तुम तभी जागोगे जब यम का डंडा तुम्हारे माथे पर लगेगा । संकेत ये है कि मृत्यु के समय का जागरण व्यर्थ होगा । कबीर हँस रहे हैं , उन्हें हँसी आती है । कबीर समृद्ध समाज पर हँस रहे हैं । अधिकतम और इफरात के समाज को देख कर हँसी आ रही है । चंचल मछली को नदी के जल से संतोष नही हुआ । वह समुद्र का सुख चाहती थी । किंतु समुद्र में सुख कहाँ है ? जो समाज ख़ुद दुखी है वहाँ व्यक्ति कैसे सुखी रह सकता है । कबीर बेलाग कहते हैं , कब्र में रहने वाला कैसे निश्चिंत रह सकता है ? ” जाका वासा गोर में सो क्यों सोवै निश्चिंत ।”

कृष्ण ने अर्जुन को जातिधर्म , कुलधर्म , परिवारधर्म सबको छोड़कर भक्तिधर्म में आने को कहा है । मनुष्य का उद्देश्य भक्ति है न कि जाति । भक्ति व्यापक समाज का हित है , विश्व मानवता का हित है । क्योंकि भक्ति स्वार्थ नही , परमार्थ है इसलिए जाति नहीं , भक्ति चाहिए । कबीर भी यही कहते हैं……….

राम और रहीम के प्रति उदार कबीर कहते हैं यदि ईश्वर एक हैं तो ख़ुदा और राम भी एक हैं । कबीर हिंदु – मुसलमान दोनों से नाराज़ हैं । वे कहते हैं दोनों को राह नही मिली है , दोनों भटक गए हैं ।

जोगी गोरख गोरख करैं , हिंदू राम नाम उच्चरै ।

मुसलमान कहै एक ख़ुदाई , कबीर के स्वामी घटि रहयौ समाई ।।

कबीर की हँसी का कारण समझ आ रहा है………इस सदी में जब विज्ञान उन्नति की सीमाएँ पार रहा है , हम कहाँ खड़े हैं ? कहाँ है वो कबीर जो फिर से समाज को झकझोर दे ? चलो उस कबीर को ढूँढें……!

माँझा

जीवन में किसी – किसी की जगह ऐसी होती है कि उसका जाना दिल के कोने को ऐसा सूना कर जाता है कि वो कभी नही भरता । समय हाथ से रेत की तरह फ़िसल जाता है और हम सोचते रह जाते हैं कि काश हम ऐसा करते या काश हम ऐसा कहते…..। पर बीता समय कब वापस आया है….!! ये समझने में एक उम्र निकल जाती है । ऐसी ही एक कहानी कुछ जग बीती तो कुछ आप बीती कहने जा रही हूँ ।

माँझा

बसंत की हलकी ठंड में , दिल्ली के दुमंजिले मकानों की छतों पर खड़े , छोटे – बड़े सभी की नज़रें आसमान में रंग-बिरंगी लहराती पतंगों पर थीं । वहीं एक छत पर रंजन अकेला , उदास कहीं और खोया था । उसे ये मौसम , ये रंग , सब बेरंग लग रहे थे । वो सोच रहा था कि कुछ दिन पहले वो भी अपने पापा के साथ ऐसे ही पतंग उड़ा रहा था । पापा ने उसे पतंगबाज़ी के सारे दावपेच सिखा दिए थे । कैसे पतंग की कन्नी बाँधनी चाहिए और कैसे उड़ानी चाहिए , वो सब सीख गया था ।…..पापा के हाथ में डोर होती और वो चरखी संभालता था । किसी की क्या मज़ाल थी कि कोई उनकी पतंग काट दे !! पापा कहते थे……

देख बेटा , माँझा मज़बूत होना चाहिए , नही तो पतंग कट जाएगी ।

उसका मज़बूत माँझा तो उसके पापा थे….!! उसके चैंपियन थे पापा !!  उनके बिना उसके जीवन की पतंग कट चुकी थी । क्यूँ…..? आखिर उसके साथ ही ऐसा क्यूँ हुआ ? उसे वो दिन याद आ रहा था जब वो और उसकी छोटी बहन गीता स्कूल से लौटे थे । वो आते ही अपनी पतंग – डोर ढूँढ रहा था…….

माँ….मेरी पतंग नही मिल रही…आपने कहीं रखी क्या ?

उसने कुछ खीजते हुए पूछा था । माँ ने नाराज़ हो कर कहा था…

ऊँट का ऊँट हो गया , फिर भी छतों पर छलांगें मारता फिरता है…….बारहवीं में आ गया……..ग्यारहवीं का रिज़ल्ट तो किसी से छिपा नही है……मुश्किलों पास हुए हो……और ख़्वाब हैं एन डी ए में जाने के……!!!! तुम्हारे पास क्या अलादीन का चिराग़ है कि घिसोगे और सब कुछ मिल जाएगा…..? आने दे तेरे पापा को आज ।

लेकिन पापा की डाँट भी कोई डाँट थी !! बिलकुल कॉलोनी के नंदू की चाट जैसी……..।फिर आज तो पापा उसे मूवी ले जाने वाले थे और उन्हें ऑफ़िस से जलदी आना था । पापा ने उसे नई – पुरानी सारी वॉर मूवीज़ दिखाईं थीं । गीता ने मुँह फुलाकर कहा था……

पापा…भैया की पसंद की मूवी के बाद मेरी पसंद की भी देखेंगे ।

पापा ने मुस्कुरा कर गीता से अगली बार उसकी पसंद की मूवी देखने का वादा किया था । पापा पता नहीं कहाँ रह गए….वो सोच ही रहा था कि तभी फ़ोन की घंटी बजी थी और उस फ़ोन ने उनकी दुनिया बदल दी थी । ऑफ़िस से आते हुए पापा का एक्सीडैंट हो गया था । सिर में गहरी चोट आई और वो नही रहे । ये सुन उसके दिल की धड़कने जैसे रूक सी गई थीं , सब कुछ जैसे थम गया था ।

पापा के जाने के बाद जो समय रूक गया था वो आगे बढ़ा ही नही । सूरज ढलने लगा तो उसे याद आया कि उन्हें कैसे रोज़ शाम को पापा के आने का इंतज़ार रहता था । गीता अपनी शिकायतों का पुलिंदा बाँधे बालकनी में लटकी रहती तो रंजन दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलते हुए उनकी राह देखता रहता । उनके आते ही दोनों बहन-भाई उन्हें घेर लेते । पापा पहले गीता की शिकायतें सुनते……

पापा भैया को समझाइये….अपना टिफ़िन तो ब्रेक से पहले ही खा लेते हैं और ब्रेक में मेरा माँगते हैं ।

पापा रंजन का कान पकड़ कर दिखावे के लिए डाँटते ।

ये ग़लत बात है , भला अपनी छोटी बहन का भी कोई टिफ़िन खाता है ? तुझे तो इसका ध्यान रखना चाहिए ।

गीता खुश हो जाती । रंजन उसके सिर पर प्यार से एक चपत लगाता और अपने दिनभर के किस्से सुनाने लगता । उसके बाद जाकर पापा माँ से बात करते । रात का खाना सब साथ खाते तो पापा पढ़ाई के बारे में पूछते और खाने के बाद मुश्किल सवाल ख़ुद करवाने बैठ जाते । पापा चाहते थे कि रंजन ट्वैल्थ के बाद एन डी ए का एग्ज़ाम दे और आर्मी जोइन करे । पापा का सपना उसका भी सपना था । हर 26 जनवरी को वे परेड दिखाने ज़रूर ले जाते । गीता साथ ले जाने के लिए तिरंगा झंडा बनाती । सुबह पाँच बजे से घर में परेड देखने जाने की उत्सुकता बढ़ जाती । दिल्ली की कोहरे वाली ठंड में वे गर्म कपड़ों से लद जाते थे। माँ खाने के लिए सामान पैक करतीं । पापा पूरी तरह से देशभक्ति में डूबे “ ऐ वतन , ऐ वतन हमको तेरी कसम , तेरे कदमों में जाँ अपनी लुटा जाएँगे” और “वतन की राह में वतन के नौ जवाँ शहीद हो , पुकारती है ये ज़मीनो – आसमाँ शहीद हो” जैसे गीत गा रहे होते , जिन्हें रंजन और गीता हैरानी से सुनते । दोनों ने वो गीत केवल पापा से सुने थे , फिर धीरे – धीरे उन्हें भी याद हो गए थे और वो भी उनके सुर में सुर मिलाकर गाने लगे थे ।  जवानों की टुकड़ियाँ देख कर रंजन के रोएँ खड़े हो जाते और शरीर तन जाता था ।

छत पर खड़े रंजन की मुट्ठियाँ भिंच गईं और सीना तन गया। पापा कहते थे……….

एक दिन तू भी ऐसे ही परेड में सीना तान कर सलामी देगा ।

हलकी ठंड से शरीर में सिहरन सी दौड़ गई । ख़्याल आया कि वो तो बिलकुल अकेला खड़ा था , शरीर ढीला पड़ने लगा था । मन में फिर उदासी छाने लगी , पापा सिर्फ़ उसके ख़्यालों में थे , सच तो ये था कि पापा अब कभी वापस नही आएँगे । उसका और पापा का सपना अब कभी पूरा नही होगा उनके साथ ही वो सपना भी चला गया । पापा के बिना वो कुछ नही कर सकता । क्या करेगा आर्मी में जाकर ? उसे यूनीफ़ॉर्म में देखने वाले पापा ही नही होंगे तो क्या फ़ायदा ? वो धीमे कदमों से नीचे आया तो घर में ख़ामोशी फैली थी जो पापा के जाने के बाद से गहराती जा रही थी । माँ रसोई में व्यस्त थीं लेकिन पहले की तरह रसोई से उनकी आवाज़ नही आती थी। गीता टेबल पर सिर झुकाए स्कूल का काम कर रही थी । गीता भी अब ना मुस्कुराती थी , ना ही कोई शिकायत करती थी , करती भी किस से ? फिर भी पढ़ तो रही थी !! उसका दिल तो पढाई में लगता ही नही । वो चुपचाप अपने कमरे में किताबें उलटने – पलटने लगा । पढ़ने की कोशिश करने लगा , पर नाकामयाब रहा । किताबों को एक ओर पटक , टेबल पर सिर झुकाया तो गीता की आवाज़ आई………

भैया…..एक सवाल नही आ रहा…। प्लीज़…बता दीजिए…।

मुझे नही आता….कोई सवाल…ववाल….। अपने आप करले ।

उसके भीतर का गुस्सा गीता पर निकल गया और गीता को झिड़क दिया । गीता सहम कर बाहर चली गई । रंजन ने गीता से कभी ऐसे बात नही की थी , उसे बुरा लग रहा था । पर पता नही उसे किसी से बात करने का मन नही था । वो बिस्तर पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगा , पर आजकल नींद भी कहाँ आती थी उसे , उसके कानों में तो लोगों की आवाज़ें गूँजती रहती थी……

देख , बेटा , अब तो तू ही है अपनी माँ और बहन का सहारा । तुझे ही सब संभालना है ।

रंजन भीतर तक काँप रहा था । उसका दिमाग़ सुन्न पड़ रहा था । घर संभालना , माँ – बहन का सहारा बनना…….वो भला ये सब कैसे कर सकता है? ये सब तो पापा करते थे…..वही संभालते थे । वो….ये सब नही कर सकता । एक अंजाना डर था जो उसके भीतर समाता जा रहा था ।

मन कर रहा था कि कहीं से पापा को ढूँढ कर ले आए और फिर से सब कुछ पहले जैसा हो जाए । अगले दिन सुबह स्कूल जाने लगा तो माँ ने बैग में टिफ़िन पहले ही डाल दिया था।क्यूँकि आजकल वो पहले की तरह माँ से टिफ़िन के लिए शोर नही मचाता था । कई बार बिना लंच लिए ही चला गया था । बाहर निकलने लगा तो एक बार मुड़कर देखा जहाँ पापा हर रोज़ खड़े बाय किया करते थे । पापा की वो नाक तक सरक आए चश्मे से मुस्कुराती…..झाँकती आँखें याद आते ही गले में कुछ अटक सा गया । भरी आँखों से उसके कदम आगे बढ़ गए , रास्ते में पड़े कंकड़ को पैर से ठोकर मारता वो आगे बढ़ गया । उसने गीता का इंतज़ार भी नही किया । गीता भागती सी उसके साथ चलने का प्रयास कर रही थी लेकिन वो दूर चल रहा था ।जैसे सबसे नाराज़ था वो । स्कूल पहुँचा तो क्लास में चुपचाप बैठा रहा , ना दोस्तों से पहले सी मस्ती , ना गेम्स पीरियड के लिए मैदान में सबसे पहले भागना । मन करता कहीं दूर चला जाए , सबसे दूर । उसे देख उसकी क्लास टीचर उसके पास आईं थीं….उन्होंने कहा था…..

रंजन….बोर्ड एग्ज़ाम आने वाले हैं , पढ़ाई पर कोंसेनट्रेट करो ।

ये बातें उसकी बेचैनी  बढ़ा रही थीं । उसे घबराहट हो रही थी……मन में रह – रह कर विचार आ रहा था कि नही कर सकता वो कुछ भी । एक महीने बाद बोर्ड हैं……ये सोचकर ही वो पसीने से भीग गया । उसे नही देने कोई एग्ज़ाम…..वो कहीं भाग जाएगा । तभी रीसेस की घंटी बजी तो उसने देखा गीता अपना लंच बॉक्स लिए उसकी क्लास के सामने खड़ी थी । उसे वहाँ देख उसके माथे पर बल आ गए , आँखों में सवाल था कि क्यूँ आई है ? वो पहले कभी उसकी क्लास तक नही आती थी । गीता उसके पास आकर प्यार से बोली…..

भैया…..खा लो….।

लेकिन रंजन खीजता हुआ रूखेपन से बोला……

नही खाना मुझे…..तू जा यहाँ से ।

रंजन के जवाब से गीता की आँखों में पानी भर आया । वो भाई के दुख को समझ रही थी । वो भी तो उसी दुख से गुज़र रही थी । वो भाई को फिर से पहले जैसा देखना चाहती थी । पर वो तो दूर होता जा रहा था सबसे । वो चुपचाप वापस मुड़ गई । रंजन को अपने पर हैरानी हो रही थी कि उसे क्या होता जा रहा था । पर क्या करे उसका मन उसके वश में नही था ।

स्कूल की छुट्टी हुई तो वो गीता से नज़र चुरा कर जलदी से निकल जाना चाहता था । क्यूँकि आज उसे सीधा घर नही जाना था । गीता जानती थी कि वो कभी – कभी दोस्तों के साथ खेलने के लिए स्कूल में रूक जाया करता था । वो स्कूल में क्रिकेट कोचिंग लेता था । उसके दोस्तों ने उसे आज भी खेलने  को कहा था । लेकिन आज तो वो सबसे दूर भागना चाहता था । उसका दिल क्या चाहता है , वो खुद नही जानता था । स्कूल से निकल कर रंजन यूँ ही सड़कों पर इधर – उधर घूमता रहा । लेकिन दिल की उदासी जाती ही नही थी । पापा के साथ , वो हँसते – खेलते दिन भी ख़त्म हो गए । अब उसे हँसी आती ही नही , उसे तो हँसते लोग भी अच्छे नही लगते । रंजन के माथे पर तनाव आ गया , वो माथे पर आए पसीने को पौंछने लगा तो महसूस हुआ कि हलकी बारिश शुरू हो गई थी । उसने सिर उठा कर आसमान को ताका , बादल घिर आए थे । जलदी से एक पेड़ के नीचे खड़ा हो गया । बारिश तेज़ हो गई थी , वो सिकुड़ता हुआ घने पेड़ के नीचे आ गया । कुछ लोग मस्ती में भीग रहे थे । उन्हें देख उसे वो दिन याद आ गया जब……एक बार इतवार के दिन वो पापा के साथ छत पर पतंग उड़ा रहा था कि इसी तरह बादल आए और तेज़ बारिश शुरू हो गई थी। पापा ने पतंग डोर एक ओर फ़ैंकी और कुरता उतार कर बारिश में नहाने लगे । वो पापा को हैरानी से देख रहा था तो उन्होंने हँसते हुए कहा था…….

देखता क्या है ? कमीज़ उतार और आजा ।

उस दिन उसे पापा……अपनी उम्र के टीनएजर लग रहे थे , मस्ती में डूबे । तभी गीता भी आ गई थी और पापा ने उसे गोद में उठा लिया था । वो शोर मचाती रही थी । माँ शोर सुनकर ऊपर आईं तो उन्होंने माँ को कितना बुलाया था…… । जब माँ नही आईं तो उन तीनों ने माँ को खींच लिया था । माँ कहती रहीं थीं…..

क्या करते हो…..!! बच्चे बीमार पड़ जाएँगे ।

पर किसी ने माँ की बात नही सुनी और पापा अपने उसी मस्ताना अंदाज़ में पुराने फ़िल्मी गीत गाते रहे…….रिमझिम के तराने लेके आई बरसात……, आया सावन झूम के…….। फिर तो माँ भी पापा के गीतों का मज़ा ले रही थीं । चारों देर तक बारिश में नहाते रहे , हँसते रहे थे….भीगते रहे थे।

बारिश थमी तो पेड़ के आस – पास जमा लोग चलने लगे । रंजन भी यादों से निकल , आज में आ गया था । वो थक गया था , आराम करना चाह रहा था । अभी रात नही हुई थी , सूरज ढलने पर था । आसमान में पंछी चहकते हुए अपने घोंसलों की ओर जा रहे थे । उसने एक नज़र भर कर आसमान को देखा और कदम घर की ओर बढ़ गए । घर के पास पहुँचा तो देखा कि गीता बालकनी में खड़ी थी , बिलकुल वैसे ही जैसे वो पापा की इंतज़ार में खड़ी रहती थी । घर के पास आते ही दिल पर फिर से उदासी छाने लगी थी । गीता ने आँखों में बहुत से सवाल लिए दरवाज़ा खोला । आवाज़ सुन माँ ने बस इतना पूछा…….

कहाँ था इतनी देर…..?

उसने भी इतना ही कहा…….

दोस्त के यहाँ गया था पढ़ने ।

और कहता भी क्या ??  ये कह कर वो सीधा अपने कमरे में चला गया । उसकी टेबल पर उन चारों की एक फ़ोटो रखी थी जो पहले नही थी । फ़ोटो में चारों कितने खुश दिख रहे थे । पास ही एक एलबम रखी थी , वो बिस्तर पर बैठ कर एलबम के पन्ने पलटने लगा । उसके पैदा होने पर , पापा की गोदी में , फिर पापा के कंधों पर । गीता के पैदा होने पर वो कितना प्यार कर रहा था उसे…..और एक फ़ोटो में कैसे उसे गोदी में टाँगा हुआ था । उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई । स्कूल के फ़ैंसी ड्रैस कोंपीटीशन में एक बार वो फ़ौजी बना था और पापा उसके लिए वो ड्रैस खरीद कर लाए थे । पापा ने कैसे एक सपना उसमें देखा था । उसने एक गहरी ठंडी साँस ली । राखी के दिन की फ़ोटो जिसमें गीता छोटी सी थी….अपनी नन्ही सी हथेली फैलाए अपना गिफ़्ट माँग रही थी । सारी खुशियाँ….सारी मुस्कान उस एलबम में कैद हो गईं थीं । उसने आँखें मूँद लीं , एलबम उसके सीने पर रखी थी । थकान से उसे गहरी नींद आ गई । सुबह जलदी आँख खुल गई , आज इतवार था । मुँह – हाथ धो कर वो अपनी टेबल पर बैठ गया । पापा उसके लिए एन डी ए के एंट्रैंस की तैयारी के लिए किताब लाए थे , उसे उठाया और पढ़ने लगा । माँ ने दूध का ग्लास और नाश्ता उसकी टेबल पर रख दिया जैसे पहले उसके एग्ज़ाम्स के दिनों में रखती थीं । थोड़ी देर में गीता हाथ में पतंग और माँझा लिए उसके सामने बैठ गई । वो पतंग को माँझे से बाँधने लगी , पर उसे पतंग उड़ाना कहाँ आता था !! रंजन कनखियों से उसे देखता रहा । गीता पतंग को कभी सीधा करती तो कभी उलटा , पर बाँध नही पा रही थी । अचानक रंजन उठा और उसके हाथ से माँझा लेते हुए बोला………

जो काम तुझे आता नही उसमें क्यों सिर मार रही है…….ला मुझे दे….।

गीता ने मुस्कुराकर माँझा और पतंग उसके हाथ में थमा दी । रंजन पतंग बाँधकर छत की ओर भागा , गीता उसके पीछे भागी । रंजन ने एक झटके से पतंग को आसमान की ओर छोड़ माँझा संभाल लिया था।

साँझी

रिश्तों को किसी मान्यता की आवश्यकता नही होती , वो तो दिल से दिल के होते हैं , फिर चाहे वो कोई भी रिश्ता क्यूँ न हो । आज मैं एक ऐसे ही रिश्ते की बात कर रही हूँ…..भाई – बहन के रिश्ते की ।रिश्तों में कुछ कहने सुनने की कोई जगह नही होती…..ये मैंने अपने पिता (जिन्हें समाज के आधार पर ससुर कहा जाता है) से सीखा । उनकी छोटी बहन के साथ उनके रिश्ते ने मेरा दिल हिला कर रख दिया था । आज उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर इस बहन – भाई की कहानी के माध्यम से मैं उस रिश्ते को श्रृद्धांजली अर्पित करती हूँ । लिखते हुए कई बार दिल रिस्ता रहा । कहानी केवल उनसे प्रेरित है , कुछ कल्पना तो कुछ असल है ।

साँझी

बुआ जी पचास – पचपन की होंगी शायद , उनके चेहरे से उनकी उम्र का अंदाज़ा होना मुश्किल था । उनकी छोटी मगर गहरी आँखों में इतनी गहराई थी कि उनमें अनकही , ख़ामोश ज़िंदगी दफ़्न सी लगती थी । होंठ फड़फड़ाते थे पर बोलती आँखें थी । अधपके लंबे बालों की खुली सी चोटी , गोरा रंग , लंबा कद , भारी  शरीर पर बेतरतीबी से पहनी सूती धोती का लापरवाही से लटकता पल्लू । वो सारे गाँव की बुआ जी थीं । घर में किसी की क्या मज़ाल कि बुआ जी की बात टाल दे…..उनके रौब से नही बल्कि उनकी ख़ामोशी के कारण । कहते हैं कि बुआ जी की शादी दिल्ली के सीताराम बाज़ार में अच्छे खाते – पीते घर में हुई थी , लेकिन भाग्य में तो कुछ और ही लिखा था । छोटी उम्र में ही विधवा हो गईं।

फूफा जी के गुज़रने के बाद बुआ जी कुछ दिन ससुराल में ही रहीं लेकिन ससुराल वालों का व्यवहार बदल गया था । सबसे बड़ा कारण उसमें जायदाद को लेकर था , सीताराम बाज़ार की हवेली वालों को बुआ जी और उनकी बच्ची दुश्मन नज़र आने लगे । उन्हें पहले तो तानों से घायल किया गया लेकिन फिर भी बात न बनी तो हाथ उठाने लगे । एक दिन अचानक कर्नल साहब बहन से मिलने पहुँच गए तो आँख से सब देख लिया…..उन्होंने बहन का हाथ पकड़ा और बच्ची को गोद में उठाया , ससुराल वालों से कह दिया……..

अपनी हवेली अपने पास रखो……मेरी बहन यतीम नही……चाहूँ तो तुम्हें कोर्ट – कचहरी में खींच सकता हूँ…….लेकिन तुम जैसे लोगों से हमें कुछ नही चाहिए….भूल से भी इन दोनों की तरफ़ आँख उठा कर मत देखना ।

बुआ जी भाई का मुँह देखती रह गईं थीं । कर्नल साहब उन्हें घर ले आए , उनकी पत्नी ने भी बड़े प्यार और सम्मान से रखा , अंबा तो उनकी अपनी ही बेटी हो गई । चार बच्चों के साथ अब घर में पाँच हो गए थे । जहाँ उनकी पोस्टिंग होती बुआ जी साथ ही रहतीं । रिटायर हुए तो गाँव में आ गए । धीरे – धीरे बुआ जी ने घर की रसोई का ज़िम्मा ले लिया और भाई की पसंद नापसंद को ध्यान में रख कर ही खाना बनाती । कभी भाभी से पूछ लेतीं……

हैं…भाभी….क्या बनाऊँ…….

तो भाभी हँस कर कह देतीं………..

बीबीजी…..बनेगा तो वही जो आपके भाई खाएँगे……।

बुआ जी उनकी बात पर मुस्कुरा देतीं और खुद ही फ़ैसला कर लेतीं……

पालक की कढ़ी बना लेती हूँ भाई साहब को बहुत पसंद है….।

बुआ जी के जीवन का केंद्र बिंदु तो बस भाईसाहब थे या फिर आँगन में लगी तुलसी ,……..सुबह से शाम , बस भाई के खाने की सोच में या तुलसी की देखभाल में बिता देतीं। उनकी अपनी आवश्यकताएँ थी या नही पता नही…..लेकिन उन्होंने अपने मुँह से कभी कुछ माँगा नही । घर में अगर बुआ जी ना होतीं तो कौन सा त्योहार कब आने वाला है ये कैसे पता चलता……? वही थीं , जो भाभी को पंचांग पढ़ , त्योहारों की ख़बर दे देतीं थीं। उनकी मीठी वाणी के कायल तो घर के सारे नौकर – चाकर भी थे , सबका ध्यान रखतीं । कोई बीमार हो जाए तो खुद चाय बनाकर पिलातीं और साथ में डाँट भी पिलातीं…………

क्यूँ री अंगूरी……तुझ से कितनी बार कहा है कि ठंड में नंगे पैर काम मत किया कर…पर नही…..अब भुगत ।

अब बुआ जी की डाँट को कोई डाँट कहाँ समझता था वो तो प्यार भरी झिड़की होती थी जिसमें अपनत्व था ।

नवरात्री के दिनों में तो उनकी आँखें भी मुस्काती थीं । एक दिन पहले सबको सूचित कर दिया जाता……

कल से नवरात्र शुरू हो रहे हैं , घर की सफ़ाई करनी है…….साँझी आएगी ।

ये घर भर के लिए विशेष सूचना होती थी । दुनिया से बेख़बर रहने वाली बुआ जी साँझी की तैयारी में इतनी उतावली होती थीं कि देखते ही बनता था , वो गुमसुम रहने वाली बुआ जी , नौकरों को अपनी खनकती मीठी आवाज़ में हिदायतें दे रही होती थीं……सुबह से घर के हर सदस्य में उत्साह होता था और काम में लगे रहते थे ।

त्योहार के आने की ख़ुशी में घर खिला-खिला सा लगता । बुआ जी ने सुबह उठते ही अपनी ओर का आँगन धोया और अपना पल्लू लटकातीं बाहर चली गईं , आईं तो एक टोकरी में गाय का गोबर और मिट्टी थी । ज़मीन पर फैल कर बैठ गईं और दीवार पर गाय के गोबर से बड़े प्यार से साँझी बनाने लगीं । मिट्टी से ज़ेवर और कपड़े बनाने का काम बहू नलिनी और अंबा को मिला । घर का आँगन उस मिट्टी की ख़ुशबू से महक उठा ।

शाम तक साँझी तैयार हो गई थी , चमकती , सलमें – सितारों के कपड़े पहने । बुआ जी बहुत कम मुस्कुराती देखीं थी…., लेकिन इन दिनों तो उनकी आँखें भी मुस्काती थीं । अंगूरी हाथ में झाड़ू लिए साँझी निहारती अपनी जवानी के किस्से सुना रही थी कि बुआ जी की नज़र उस पर पड़ी…..

तू खड़ी-खड़ी बातें बनाए जा……काम कौन करेगा……?

और वो दाँत निपोरती वहाँ से हवा हो गई , बुआ जी की डाँट पर सब मुस्कुरा ही देते थे । रसोई से हलवे की खुशबू आ रही थी , साँझी को जिमाना जो था……। बुआ जी ने एक कटोरी पहले साँझी के लिए फिर एक बड़ा कटोरा भर कर अलग रखते हुए बोलीं…

ये भाई साहब का है , कोई हाथ मत लगाना ।

घर के आँगन में जहाँ तुलसी का पौधा लगा था , वहीं पास की दीवार पर साँझी बनी थी और बुआ जी बच्चों की टीम के साथ बैठीं , तरह-तरह के पकवानों से थाल सजाए गीत गा रही थीं………..

मेरी संझा…..ए….क्या खावैगी…..क्या पीवैगी……

बच्चे तालियाँ बजा-बजा कर बुआ जी का साथ दे रहे थे…उनके आनंद का अंदाज़ा उनके खिले चेहरों से ही लग रहा था । उसके पीछे रहस्य भी था…..और वो रहस्य था गीत के बाद उन्हें वो मज़ेदार खाना मिलने वाला था । ये नौ दिन की उनकी दावत दोनों वक्त होगी….शर्त केवल यही थी कि बुआ जी के साथ बैठ कर गीत गाओ….साँझी को मनाओ और फिर खुद खाओ । अब शर्त कोई मुश्किल भी नही थी । कभी – कभी गीत लंबा हो जाता तो शीनू जैसा बदमाश एक आँख खोल कर थाली तक हाथ बढ़ाकर साँझी से पहले ही जीमने की कोशिश करता तो बुआ जी की तेज़ निगाहें हाथ पकड़ लेतीं……….

शीनू के बच्चे……ठहर जा…..मक्कार कहीं का…..साँझी को तो खाने दे…।

और शीनू बेचारा मुँह बना कर रह जाता और ललचाई नज़रों से पकवानों से सजे थाल को होठों पर ज़बान फिराता देखता रहता ।

अब तो हर रोज़ घर में तरह-तरह के पकवान बन रहे थे , और रसोई पूरी तरह से बुआ जी संभाल रही थीं । पर एक बात ज़रूर थी , जो सब जानते थे कि साँझी को भोग लगाने के नाम पर बुआ जी , पसंद अपने भाई साहब की ही ध्यान में रखतीं….

आज तो पालक की कढ़ी बनाऊँगी , भाई साहब को बहुत पसंद है……, साथ में चूरमा बना देती हूँ , भाई साहब अम्मा से रोज़ चूरमा बनवाते थे ।

सब हँसते कि बुआ जी साँझी की पसंद और भाईसाहब की पसंद एक ही समझती हैं ।

साँझी को खूब गीत गा-गा कर भोग लगाया जाता……….

करते – करते नौ दिन कैसे बीत गए पता ही नही चला । आखिर वो दिन भी आ गया जब साँझी को अपने घर से ससुराल विदा होना था । उसकी भी तैयारियाँ होने लगीं……..एक सुंदर मटका लेकर रंगों से सजाया गया और उसमें छोटे-छोटे छेद किए गए । पर आज बुआ जी सुबह से मुस्कुराई नही , फिर कुछ गुमसुम सी थीं ।

हलवा – पूरी बनाए गए आखिरी दिन भोग लगाया गया , पर गीत कुछ उदासी भरा था……साँझी आज ससुराल जाने के नाम से उदास थी……मना-मना कर खिला रहे थे……

मैं तनैं बूझूँ संझा…..किसकी मानैगी…….भाई आया…..भाभी आई…….खाले मेरी संझा…….

और फिर सारा घर गिना दिया गया , तब जाके साँझी ने भोग लगाया…….सूरज छिपने से पहले ही भारी मन से साँझी को दीवार से उतारा गया……और सजे मटके में रखा गया……..सूरज ढलते ही उसमें दीए जला कर रखे गए , कहीं ऐसा ना हो रास्ता भूल जाए , सिर पर रख कर सब पीछे-पीछे चले……बुआ जी के साथ सब रूँधे गले से गीत गाती चल रही थीं……….

साथन चाल पड़ी ए मेरे डब-डब भर आए नैन……….

पास की नहर में साँझी का विसर्जन कर लौटे तो घर सूना-सूना लग रहा था….बुआ जी चुपचाप अपने कमरे में चली गईं , फिर सुबह से उनकी वही पुरानी दिनचर्या शुरू हो गई…..कभी तुलसी को पानी देतीं , कभी गीता पढ़तीं तो कभी अपने भाई के पसंद का खाना बनातीं । कभी-कभी खाना बनाते – बनाते वो मुस्कुरातीं  , कुछ बात याद आई होगी उन्हें…..पास बैठी नलिनी ने पूछ लिया……

बुआ जी कुछ याद आ गया क्या…जो आप मन ही मन मुस्कुरा रही हैं…..मुझे भी बताइए ना……..।

फिर तो बुआ जी बड़े चाव से अपने भाई के किस्से सुनाने लगीं………ये यादें उनके जीवन की मधुर और मीठी यादें थीं , वो मुँह में गुड़ की डली की तरह स्वाद लेकर सुना रही थीं……

उनके जीवन में जैसे और कुछ इतना मधुर था ही नही जितनी कि उनके भाई से जुड़ी उनकी यादें……

मेरे भाई साहब पढ़ाई में बड़े होशियार थे , आस-पास के दस गाँव में , वो पहले अफ़सर बने थे……जब पहली बार अफ़सर बनकर , बाऊ जी से मिलने आए तो बाऊ जी गाजे-बाजे के साथ गाँव वालों को लेकर स्टेशन पहुँचे थे और भाईसाहब जब वर्दी पहन कर ट्रेन से उतरे , तो ऐसे बाँके जवान लग रहे थे….जैसे सिनेमा के हीरो…।

ये किस्सा सुनाते हुए बुआ जी की छोटी-छोटी आँखों में अनगिनत तारे चमक रहे थे , प्यार का सागर उमड़ रहा था । नलिनी एक टक उनकी ओर देख रही थी , उनकी आँखों में अनकही कहानियाँ पढ़ना चाह रही थीं ।

एक सुबह बुआ जी ने बैठक के पास आकर आवाज़ लगाई………

भाई साहब……..आज क्या बनाऊँ…?

तो कुछ देर तक आवाज़ नही आई ।

बुआ जी के चेहरे पर चिंता और घबराहट आई………उन्होंने धीरे से दरवाज़ा खोला तो देखा कि कर्नल साहब कारपेट पर चादर ओढ़े लेटे हैं । वे पास गईं और काँपते हाथों से उन्हें हिलाया……………

भाई साहब क्या बात हो गई…अरे….आपको तो तेज़ बुख़ार है….? भाभी आना….देखो तो…..ज़रा…।

अगले कई दिन कर्नल साहब का बुख़ार नही टूटा और बुआ जी उनके कमरे के आस पास चक्कर लगातीं रहीं लेकिन भीतर नही जातीं…..बस भाभी से हालचाल पूछ उनके लिए बीमारी में दी जाने वाली तरह-तरह की चीज़ें बनातीं…….

भाभी आज साबूदाना बना दूँ……खिचड़ी तो कल ही खाई थी……

चुपचाप रसोई में उनके लिए कुछ नया बनाती रहतीं………कुछ दिनों बाद पता चला कि कर्नल साहब को कैंसर ने जकड़ लिया था…..यह बात बुआ जी से छिपाई गई ……लेकिन अपने भाई की गिरती सेहत उनसे छिपी नही थी…..उन्हें किसी अनहोनी का आभास हो रहा था शायद , उन्होंने एक अजीब सी चुप्पी ओढ़ ली । भाई खाता तो वो खातीं , भाई नही खाता तो वो किसी व्रत का बहाना कर अपने कमरे में बैठी गीता पढ़ती रहतीं । फिर एक दिन कर्नल साहब का संघर्ष ख़त्म हो गया…….आखिरी शब्द जो उनके मुख से निकला वो मोना ही था…….और बुआ जी अपने कमरे में चुपचाप जाकर बैठ गईं , जब कर्नल साहब को अंतिम यात्रा के लिए ले जाने लगे तो घर के बड़े-बूढ़ों ने बुआ जी से कहा………..

मोना , चल आखिरी बार भाई का चेहरा देख ले……..तेरा नाम लेते गए हैं…।

लेकिन बुआ जी अपने पलंग पर करवट लेकर लेटी रहीं और हिलीं नही । वो अपने कमरे से बाहर नही आईं और ना उन्होंने भाई को आखिरी बार जाते देखा।

लोग कहते…..

साँसें जैसे मोना में अटकी थीं……..आखिर साँस में भी मोना ही कहा…..बड़ी फ़िकर थी मोना कि……..

कुछ खाने के लिए उन्हें वहीं दे आते तो पलंग पर लेटी बिन देखे कह देतीं………..

रख दे वहीं……..

अगले दिन देखते तो खाना यूँही पड़ा होता……बस पानी पीतीं…..या एक ग्रास खा लेतीं…..। तेरह दिन बाद घर के आँगन में कुछ आवाज़ आई….भाभी ने बाहर झाँक कर देखा तो बुआ जी नलके पर कपड़ों समेत सिर से नहा रही थीं और धीरे-धीरे कोई श्लोक बुदबुदा रही थीं । पानी का लोटा भरा और तुलसी में पानी दे कर अपने कमरे की ओर चली गईं । बुआ जी ने अपनी दिनचर्या फिर से शुरू कर दी थी और सबने सोचा कि उन्होंने अपने भाई का जाना स्वीकार कर लिया था शायद…………..

उस दिन के बाद से उनकी दिनचर्या में एक परिवर्तन तो ज़रूर आया था….और वो था उनका रसोई में आना……जहाँ वो दिनभर रसोई में बिताती थीं वहीं अब रसोई की ओर मुँह भी नही करती थीं ।

जो देते चुपचाप खा लेतीं लेकिन बहुत सीमित……., वो तरह-तरह के पकवान बनाने और खाने की शौकीन बुआ जी स्वाद शब्द भूल गईं थीं । वे केवल सुबह तुलसी और सूरज को जल चढ़ाती ही दिखतीं , बाकी समय में अपने कमरे में बैठी गीता पढ़ती , नहीं तो गुमसुम बिस्तर पर लेटी छत को ताका करतीं…..। अब वो घरवालों से नही ख़ुद से बातें करतीं…..। सप्ताह के दो दिन के व्रत अब चार दिन में बदल गए थे…..बहुत कहते………

बुआ जी ऐसे तो आप बीमार हो जाएँगी……..कुछ तो खाईए……।

लेकिन वो अपने व्रत पर अड़ी रहीं । अब अंबा ही थी जो सुबह-शाम किसी तरह उन्हें दूध में चाय पत्ती डालकर बहला देती और पेट में कुछ तो जाता । एक दिन सबने देखा कि बुआ जी लड़खड़ाती सी सिर पर पट्टी बाँधे तुलसी को जल दे रही थीं , पूछा तो धीरे से बोलीं…….

मरा , ये सिर दर्द बहुत तंग कर रहा है…..।

सबने  कहा………

बुआ जी डॉक्टर के पास चलो…..दिखा देते हैं ।

लेकिन वो नज़रें नीची किए अनसुना कर चुपचाप कमरे में चली जातीं । सिर का दर्द बढ़ता गया और सिर की पट्टी कसती गई । लेकिन फिर एक दिन वो भीतर का दर्द फट कर बाहर आ गया…..ज़ख़्म बन गया । डॉक्टर घर आकर देख रहा था , पर उन्हें अब वो दर्द महसूस नही हो रहा था………जैसे उस फटे ज़ख़्म से उन्हें सुकून मिल रहा था……, चेहरे पर दर्द का नामो-निशान नही । डॉक्टर परेशान थे , उन्हें देखते ही वो मुँह फेर कर लेट जातीं……ज़ख्म पर कुछ भी करो उफ़…तक नही करतीं। अब उनका उठना – बैठना भी बंद हो गया । किसी को पास भी नही आने देतीं , सिर्फ़ अंबा जाती और कुछ ज़बरदस्ती मुँह में डाल देती । आँगन की फैली तुलसी में पानी देने की याद वो अंबा को ही करातीं ।

जनवरी का महीना था , ऐसा जाड़ा कि हाथ पैर जमे जाते थे । बुआ जी तो पतली धोती ओढ़े लेटीं थी….रजाई उठा कर परे फैंक दी…..अंबा को पुकारा….

अंबा…..आज तू कॉलेज मत जा…..। गीता का अट्ठारवाँ अध्याय सुना ।

अंबा उनके बिल्कुल पास बैठ कर पढ़ने लगी…………………………

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।

अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम् ।।

आत्मा को बाँटा नही जा सकता । शरीर अलग-अलग है पर आत्मा एक ही है । अंबा ने आँख उठा कर देखा तो बुआ जी चैन से आँखें मूँदे थीं । अंबा की आँखों से आँसू बह रहे थे । सब ख़ामोश सजल आँखों से अपनी साँझी को विदा करने की तैयारी में लग गए थे ।

 

नया कदम

ठीक से कह नही सकती कि मैंने यूँ लिखना क्यूँ पसंद किया । शायद अपनी इस तलाश के सफ़र में एक और पन्ना खोल दिया । अपने आस पास घट रहे जीवन के कुछ पलों को अपनों से बाँटने की चाह में ये कदम उठाया । कुछ ऐसे भी साधारण लोग होते हैं कि उनके पास से गुज़रो तो न भूलने वाला एहसास छोड़ जाते हैं । सोचा उनके बारे में लिख दूँ क्योंकि मेरे लिए वे असाधारण हैं और प्रेरणा के स्त्रोत भी । कुछ ऐसी घटनाएँ भी लिखने की चाह मन में थी कि जिन्हें पढ़ कर शायद कहीं कोई बदलाव की उम्मीद जागे । अब मैं कोई नेता या उपदेशक नही हूँ और न बनना चाहती हूँ । मेरे जैसे कई होंगे जिनके पास बहुत कुछ होगा कहने को , बस उन्हीं की बातें लिखूँगी । इस श्रृंखला की शुरूआत मैं अपने गाँव के ऐसे व्यक्ति के संघर्षमय जीवन की कहानी से कर रही हूँ जिसने मुझ पर गहरा असर डाला । उसने सिखाया कि जीवन सिर उठा कर जीने का नाम है । हालात जैसे भी हों सुधारे जा सकते हैं । कहानी में थोड़ी काल्पनिकता डालने के लिए रवी भाई क्षमा । यह उनकी अधूरी कहानी है , उनकी दिवंगत आत्मा को शत-शत प्रणाम ।

गुमशुदा ख़्वाब

गाँव की तंग , हथेली की रेखाओं सी फैली गलियों में रवी की ट्रायसाईकिल अनोखी सी आवाज़ वाला हॉर्न बजाती हर रोज़ घूमती थी । ये हॉर्न भी शायद रवी की ही इजात थी , और बच्चे घरों से निकल , रवी भैया….. रवी भैया……., करते हुए उसके पीछे भागते…….कारण , उसकी ट्रायसाइकिल के पीछे , टोकरी में भरी रंगबिरंगी पतंगें थीं । बैटमैन , स्पाइडर मैन , सूपरमैन और न जाने क्या – क्या उसकी पतंगों में बना होता । दशहरे के दिनों में वे पतंगें रावण , रामचंद्र जी , हनुमान जी आदि का रूप ले लेती और दिसंबर के महीने में सांता बन जातीं………। बच्चे उसकी पतंगों के दीवाने थे , वैसे बड़े भी पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी के दिनों में ऑर्डर पर उससे पतंगें बनवाते थे । रवी के हाथों की कलाकारी उन पतंगों पर निखर कर आती । उस ऊपर वाले ने उसे जनम से पैर तो नही दिए थे लेकिन उसके हाथों में कला का जादू भर दिया था । मिट्टी के खिलौनों में ऐसे – ऐसे रंग भरता कि लोग हैरान हो जाते , उसकी सारी कल्पनाएँ उन रंग बिरंगे कागज़ों और मिट्टी के खिलौनों में उतर जाती । घर में माँ , दो भाई और एक बहन थी , बहन जो जीवन भर बच्ची ही रही , कभी बड़ी हुई ही नही , दोनों छोटे भाई स्कूल में पढ़ते थे । पिता गाँव में पंडिताई कर के घर चलाया करते थे लेकिन एक दिन लंबी बीमारी के बाद उन्होंने भी आँखें मूँद लीं…………, तब से रवी ,घर का बड़ा बन गया था । दसवीं के बाद उसे स्कूल छोड़ना पड़ा । ये ट्राईसाईकिल रवि के पैर बन गई थी , कौन सा काम था जो रवी नही कर सकता था । सारे गाँव के बिजली के बिल , टेलीफ़ोन के बिल शहर जा कर वही तो भरता था । काम करते – करते अपने फ़ेवरेट मन्ना डे के गीत गुनगुनाता । कोई भजन – कीर्तन का समय हो , तो रवी  को सबसे पहले याद किया जाता , और वो भी ऐसे भजन गाता कि लोगों की आँखों से आँसू बहते । रामलीला के दिनों में रामचंद्र जी के सभी संवाद रवी की आवाज़ में होते । गाँव वाले उसे प्यार से नरसिंह भगत कह कर बुलाते । लेकिन इस नरसिंह भगत को उस नरसिंह भगत की तरह हुंडी नही मिली थी , घर में पैसे की तंगी बनी ही रहती ।

रवी दिन – रात पतंगें और मिट्टी के खिलौने बनाता लेकिन पतंग और मिट्टी का मोल बड़ी मुश्किल से कोई देता……….

अरे मिट्टी के इतने दाम ……. , और ये पतंग ही तो हैं , इसमें क्या है……..

सब यही कहते और ले दे के थोड़े बहुत पैसे मिल जाते……..मन में विचार आता कि आगे पढ़ लेता तो कोई नौकरी ही कर लेता……..ऐसा कब तक चलेगा ?  वो अपने परिवार को , खुद को इस बेचारगी के जीवन से बाहर निकालना चाहता था………..

पैर नही दिए ईश्वर ने तो क्या हुआ ? जो मिला है ,ये क्या कम है……..?  यही सोचता और फिर काम में लग जाता।

हर रोज़ नियम से भानसिंह की दुकान पर जाकर अख़बार पढ़ना उसका शौक था , गाँव के पढ़े – लिखे लोगों से , देश – विदेश पर चर्चा भी करता । प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की फ़ोटो अख़बार में देख कहता……….

एक दिन मैं भी इनके साथ फ़ोटो खिंचवाऊँगा…….

लोग हँस कर कहते………..

भगत जी सपने बहुत देखते हो….

और वो मुस्कुरा कर कहता……….

सपने देखने में क्या जाता है……

एक सपना उसकी आँखों में हमेशा तैरता रहता , एक सुखी जीवन का सपना……..अपने ईंटों के अधबने घर को पक्का करने का सपना , अपनी माँ , बहन और भाईयों के लिए खुशियों का सपना । कुछ करने की आग मन में भर जाती , लेकिन राह नही सूझ रही थी ।  उदासी और निराशा के बादल कभी घिर जाते तो कभी छंट जाते । आज कल एक नया गाना उसकी ज़बान पर चढ़ गया था जो दिनभर गुनगुनाता……….

अभी – अभी हुआ यकीं कि आग है मुझ में कहीं………

बात ये थी कि एक दिन उसने अख़बार में पढ़ा कि दिल्ली में विकलांगों की एक रेस होने वाली है , उसके लिए अपना नाम इस पते पर भेजें……..इनाम में अच्छी धनराशी और दिल्ली में एक टेलीफ़ोन बूथ मिलेगा । उसने वह ख़बर काट ली और इरादा कर लिया कि वो इसमें हिस्सा लेकर रहेगा , हो सकता है यही रास्ता उसके ख़्वाबों को ताबीर में बदल दे । उसने ख़बर ध्यान से पढ़ी और दिया गया फ़ार्म भर कर भेज दिया । बस फिर क्या था वो रेस जीतने की पूरी तैयारी में जुट गया……..हर रोज़ अपनी ट्रायसाईकिल को शहर ले जाता तो समय देखता और दिन ब दिन अपनी स्पीड तेज़ करता…….उसकी साईकिल उसे हाथ से चलानी होती……कुछ ही दिनों में उसके हाथों में छाले पड़ गए , पर वो रूका नही । हाथों पर पट्टी बाँधी और हर रोज़ चलता रहा…….

ट्रायसाईकिल चलाते – चलाते हाथ इतने घायल हो गए कि पतंग बनानी भी मुश्किल हो गई थी । माँ उसकी हालत देख दुखी हो जाती , लेकिन पतंग नही बनाएगा तो घर खर्च कैसे चलेगा……..यही सोच कर माँ से कहता……..

इतना भी दर्द नही है कि पतंग ना बना सकूँ……..।

घर में सब पतंग बनाने में उसकी सहायता करते । गाँव वाले इसे पागलपन कहते……

ऐसी पुरानी साईकिल पर भला कहीं रेस जीती जाती है…..

पर उसके पास एक ही जवाब होता……..

जीतूँ या हारूँ इससे क्या फ़रक पड़ता है , यहाँ से निकल कर एक कोशिश तो करूँगा……..।

अब समस्या ये थी कि दिल्ली जाएगा कैसे….इस ट्रायसाईकिल पर तो नही जाया जा सकता…..बस में ट्रायसाईकिल आएगी नही , तो एक ही रास्ता है कि ट्रेन से जाए । रेस की तारीख थी पच्चीस अक्टूबर और सभी प्रतिभागियों को एक दिन पहले पहुँच कर अपने नाम दर्ज़ कराने थे , बीस तारीख़ हो चुकी थी , स्टेशन कैसे पहुँचा जाएगा ये सवाल अभी भी सवाल ही था …… माँ ने समझाया……..

रहने दे , चढ़ने – उतरने में कहीं कोई ऊँच नीच हो गई , तो लेने के देने पड़ जाएँगे , क्यूँ अपनी जान जोखिम में डालता है……

लेकिन रवी का मन तो , अपनी बनाई पतंगों की तरह उड़ना चाहता था , ऊँचे बहुत ऊँचे…….आकाश को छूना चाहता था…..उसके ख़्वाबों की पतंग कट भी गई तो क्या हुआ , एक बार आकाश छू कर तो आएगा ना……..।

बेटा रहेगा कहाँ……….. ?

माँ ने चिंता जताई तो हँस कर कह दिया……

माँ इतना बड़ा रेलवे स्टेशन है , कहीं भी रात बिता लूँगा , तू फ़िकर मत कर……

और तेईस तारीख़ को उसने चलने का इरादा बना लिया , दो जोड़ी अपने सबसे अच्छे कपड़े एक थैले में डाले और स्टेशन की ओर चल दिया…..माँ को हिम्मत दी……….

चिंता मत कर , कुछ नही हुआ , तो घर वापस आ जाऊँगा ।

गाँव में कुछ ने हौसला बढ़ाया तो कुछ ने मज़ाक भी उड़ाया…….लेकिन वो बिना किसी बात का असर लिए चलता रहा…..स्टेशन पर दिल्ली की गाड़ी साढ़े बारह बजे आनी थी और वो ग्यारह बजे ही पहुँच गया था । मन में बस एक ही विचार चल रहा था कि ट्रेन में चढूँगा कैसे , मन में खुशी और उलझन दोनों चल रहे थे , वह पहली बार ट्रेन का सफ़र करने जा रहा था । इससे पहले उसे कभी बाहर जाने का मौका ही नही मिला था ।

रवी टिकट विन्डो पर जाकर टिकट ख़रीद ही रहा था कि इतने में तेज़ हॉर्न बजाती हुई ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आ गई थी । स्टेशन पर लोग अपना – अपना सामान लिए एक दूसरे से टकराते , बेतहाशा भागे जा रहे थे , इस भाग दौड़ में उसे अपना वजूद कुछ खोता सा लग रहा था । वह धीरे – धीरे आगे बढ़ा , समय कम था गाड़ी सिर्फ़ बीस मिनट रूकनी थी अब उसके पास केवल पाँच मिनट रह गए थे , या तो छोड़े या हिम्मत करे………स्टेशन पर लगी बड़ी घड़ी की ओर नज़र दौड़ाई और अपनी साईकिल को एक डब्बे के पास ला कर खड़ा कर दिया , अपने हाथों के सहारे उतर कर पास खड़े लोगों को मुस्कुरा कर देखा……..

जी मेरी साईकिल और मुझे चढ़ाने में…..मेरी सहायता करेंगे……फ्लीज़ ।

पास खड़ी बुज़ुर्ग महिला ने चढ़ रहे दो जवान लड़कों की ओर देखते हुए कहा…. देखते क्या हैं……चढ़ाइए इनको जल्दी , ट्रेन चलने वाली है……।

लड़कों ने फ़रमाबरदार बच्चों की तरह रवी और उसकी साईकिल को ट्रेन में चढ़ा दिया और ट्रेन खिसकने लगी , रवी ने एक गहरी , लंबी सुकून की साँस लेते हुए उस महिला और लड़कों का शुक्रिया अदा किया………

भैया , थैंक्यू , आंटी जी थैंक्यू , आप मदद न करते तो आज मेरी ट्रेन निकल जाती…..।

वो लड़के मुस्कुरा दिए……

आप फ़िक्र ना करें , हम आपकी उतरने में भी हैल्प कर देंगे ।

राह में उन हमसफ़र साथियों से उसकी अच्छी दोस्ती भी हो गई थी । भागती ट्रेन हवा से बातें करती , गाँव , शहर को पीछे छोड़ती जा रही थी और रवी का मन भी उसके साथ भाग रहा था……….अपने सपनों की दुनिया की ओर ।

उसे लग रहा था जैसे वो हवा में उड़ रहा हो , दिल्ली वो भानसिंह के टेलिवीज़न पर खबरों में कई बार देख चुका था , शहर तो वो हर रोज़ जाता था लेकिन दिल्ली जाने का मौका कभी नही मिला था । मन में थोड़ी घबराहट थी पर थोड़ा रोमांचित भी…..कुछ नया देखने और कुछ नया करने का रोमांच । जेब में रखा पर्स टटोला कि ठीक हैं कि नही , कुछ पैसे माँ को घर खर्च के देने के बाद जो बचे वो ले आया था , अब आगे ईश्वर मालिक होगा यही सोच रहा था । मौका मिला तो दिल्ली में कुछ काम भी ढूँढ लूँगा , गाँव के मास्टर जी का लड़का विनोद , वहाँ अच्छे बड़े ओहदे पर लगा है , उसका नंबर भी ले लिया था कोई मुश्किल होगी तो उसे फ़ोन कर लेगा………स्कूल में उसी के साथ तो पढ़ता था….फिर रवी ने घर के हालात के कारण स्कूल छोड़ दिया और विनोद पढ़ गया ।

यही सब सोचता रवी दिल्ली पहुँच गया था । हमसफ़र साथियों ने उतरने में सहायता की । नई दिल्ली स्टेशन पर उतर पहले उस जगह जाना चाहता था जहाँ उसे अपना नाम दर्ज़ कराना था । पता अख़बार पर लिखा था लोगों से पूछता हुआ चल दिया , अब तो साईकिल ही उसकी सवारी थी । दिल्ली की सड़कों पर दौड़ता ट्रैफ़िक , भागते लोग , उँची – उँची इमारतें जैसे महासागर में डूब रहा था वो , रास्ते में आते – जाते लोगों के अनमने मन से बताए गए रास्तों पर चला जा रहा था । टाईम ज़्यादा हो गया था , दिन भी छिपने लगा था , मंज़िल कहाँ थी उसे कुछ पता नही था । थोड़ी देर साँस लेने को वहीं बैठ गया और अंजान चेहरों को देखता रहा ,  पास ही एक खोमचे वाला चने बेच रहा था , देख कर भूख लग आई , अजनवी शहर में दो अजनवी कुछ ही पलों में अपने से हो गए , भैया जी नए हो शहर में….. ?  खोमचे वाले ने पूछा ।

हूँ…..रास्ता ढूँढ रहा था , लगता है भटक गया हूँ , भैया आप ही बता दें ये नैशनल स्टेडियम कहाँ होगा……

रवी की थकी आवाज़ सुनकर खोमचे वाले ने एक दोने में चने भर कर उसकी ओर किए……

पहले ये खाओ……आप इंडिया गेट पर हैं और ये रहा सामने ही स्टेडियम ।

जब भूख लगी हो तो चने भी पकवान लगते हैं……, इंडियागेट के नाम से आँखों में चमक आ गई , मन देशभक्ति से भर गया……

वाह , भैया , जवान ज्योति….. !!

रवी ने चने के पैसे खोमचे वाले की ओर बढ़ाते हुए कहा तो अजनवी मित्र ने पैसे नही लिए……..

ये क्या बात हुई भैया , कल मिल जाएँगे , एसी क्या जल्दी है….

रवी उसकी मेहमान नवाज़ी पर मुस्कुरा दिया , फिर कुछ सोच कर गोपाल मास्टर जी के लड़के विनोद को फ़ोन मिला दिया , एक दो बार के बाद उसने फ़ोन उठा लिया……

भाई विनोद मैं यहाँ दिल्ली आया हुआ हूँ रेस में हिस्सा लेने , पच्चीस तारीख़ को रेस है , तू आएगा ना देखने….भाई आइयो ज़रूर , मुझे अच्छा लगेगा । एक तस्सली हुई , चलो कोई तो होगा जो उसकी हिम्मत बढ़ाने आएगा । भानसिंह की दुकान पर फ़ोन कर दिया कि माँ को ख़बर देदे मैं ठीक हूँ । कुछ देर इंडिया गेट पर आराम कर , जवान ज्योति को निहारता हुआ वापस स्टेशन आ गया ,  मन में विचार आया कि विनोद ने उससे एक बार भी ये नही पूछा कि वो कहाँ रहेगा लेकिन फिर उस बात को झटक कर निकाल दिया , जानता था कि विनोद बड़ा आदमी है भला उस जैसे को वह अपने घर क्यूँ बुलाएगा ।

अगले दिन सुबह उठ स्टेडियम अपना नाम दर्ज़ कराने चला गया , पच्चीस तारीख़ में पूरा एक दिन बाकी था , वो आराम नही कर सकता था उसे अपनी साईकिल की मरम्मत करनी थी । आज उसे वो साईकिल , सिर्फ़ साईकिल नही लग रही थी , उसे तो वो अपने ख़्वाबों की वो पतंग लग रही थी जो उसे आसमान में बादलों के पार ले जाएगी जिन बादलों के पार उसकी बनाई न जाने कितनी पतंगें हज़ारों बार हो आईं थीं । वो सोच रहा था कि कितना साथ निभाया है इस साईकिल ने उसका , उसे ये साईकिल स्कूल के हैडमास्टर जी ने दिलवाई थी । उससे पहले तो उसे अपना हाथ जगन्नाथ का मुहावरा ही पता था लेकिन साईकिल मिलने के बाद पता चला कि चलती का नाम गाड़ी होता है । आज भी उसी साईकिल पर वो कुछ ख़्वाब ले कर चला था । रेस सुबह आठ बजे इंडियागेट के पास शुरू होनी थी । सात बजे तक वो इंडिया गेट पर खड़ा था , वो देख रहा था कि सभी की साईकिलें देखने में छोटी और नई तरह की थीं । मन में एक पल को कुछ खटका लेकिन फिर अपनी साईकिल की ओर देखकर मुस्कुरा दिया…..भीड़ जमा हो गई थी , लेकिन उसके लिए वो सभी अजनवी थे , मन घबरा रहा था , पता नही क्या होगा……… एक लाईन से सभी प्रतिभागी खड़े हो गए और हरी झंडी दिखाते ही सब की साईकिलें दौड़ने लगीं……रवी की साईकिल कुछ चली और फिर रूक गई…..उसका दिल जैसे रूक गया…..पूरी ताकत से पैडल घुमाया तो घर्र की आवाज़ के साथ साईकिल एक झटके से चल पड़ी……….पर वो पीछे छूट गया था , बहुत पीछे…..उसके सपने कभी पूरे नही हो पाएँगे ,  आँखों में पानी भर आया और फिर पूरी ताकत से पैडल घूमाने लगा , उसे ये होश नही था कि उसके आगे या पीछे कितने लोग थे , बस वो बेतहाशा पैडल घुमा रहा था , सारे तन की ताकत उसके हाथों में समा गई थी , तभी एक शोर हुआ और उसने देखा कि एक प्रतिभागी सीमा तक पहुँच चुका था , दूसरा पहुँच रहा था……वो रूका नही , मुड़कर देखा भी नही , शोर बढ़ता जा रहा था । उसके हाथ भर गए थे और हथेलियाँ फड़क रही थीं , रवी अंतिम चरण पर पहुँच , निढाल हो अपनी साईकिल पर गिर गया , वो फूट फूट कर रो रहा था । अगले दिन अख़बार में तीन विजेताओं में रवी की फ़ोटो प्रधानमंत्री जी के साथ छपी थी ।