मां

 
माँ का एक दिन कहाँ होता है !
वो तो हरदम होता है ।
पहला प्यार हुआ था माँ से
पहला गुरु मिला था माँ में
उंगली पकड़ चलाया माँ ने ।
गोदी भर जीभर प्यार जताया माँ ने
मुझको डाँटा , फिर ख़ुद रोकर अपना दर्द छिपाया माँ ने
शिक्षक को अपना हिस्सेदार बनाया माँ ने
क्या मैं लेख लिखूँगा माँ पर
जब मुझको ख़ुद लिखा है माँ ने ।

2)

आज स्कूल से निकला तो था ज़रा थका हुआ मैं 
निकला तो एक सुगंध सी आई
गुलाब थी या थी वो चमेली
नहीं , थी वो कुछ अजब नवेली
केवड़ा चंपा उसमें सब समा गए थे
सब मिल मुझे ज्यूँ बुला रहे थे
चलते-चलते घर था आया
दरवाज़े पर माँ को पाया
थका देख उसने फिर मुझको झट से गले लगाया
मैं हैराँ था , माँ का आँचल उस अजब सुगंध से महक रहा था ।

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